कहानी: रजिया - कृष्णलता सिंह

कृष्णलता सिंह
            काॅलबेल की आवाज पर दरवाजा खोलते ही सामने वर्दीधारी पुलिस को देखकर अनुभा स्तब्ध रह गई, "पुलिस मेरे यहाँ!"

तब तक असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर ने अन्दर प्रवेश करते हुए प्रश्न किया, "मैम, रजिया आपके यहाँ काम करती थी?"
"जी हाँ।"
"कब से?"
"यही कोई चार महीने से।"
"वह कहाँ है?"
"यह मैं कैसे बता सकती हूँ। मैं तो खुद एक हफ्ते से परेशान हूँ। फोन भी स्विच ऑफ आ रहा है उसका।"
"ऐसा उसने पहले भी किया?"
"नहीं, छुट्टी लेने से पहले बताना और समय की पाबन्दी उसकी आदत थी।"
"कोई खास बात, जो आप बताना चाहें?"
"हाँ, जाने से पहले उसने मुझ से पाँच हजार एडवांस लिये थे, उसे घर भेजने थे।"
"अच्छा हम चलते हैं, कष्ट के लिये माफी चाहता हूँ।" दो कदम चलकर इंस्पेक्टर फिर ठिठका, "मैम, कोई फोन या मैसेज उसका आये, तो तुरन्त सूचित कीजियेगा। मेरा मोबाइल नम्बर यह रहा।"

मोबाइल नंबर लेते समय उसे होश आया, पूछा, "उसकी जान को कोई खतरा तो नहीं है?"

"जी नहीं, बल्कि उसके खिलाफ संगीन जुर्म का मामला दर्ज है।" इससे पहले की वह संगीन जुर्म पूछती, इंस्पेक्टर, कांस्टेबल और लेडी कांस्टेबल के पीछे खड़े एक अधेड़ व्यक्ति ने आगे बढ़ कर कहा, "उस हरामजादी कुतिया की जान को क्या होगा?वह तो अपने यार के साथ रंगरेलियाँ मना रही है। जान तो हमारी जा रही है। शहर-शहर दौड़ा रही है। इतनी मुश्किल से कमीनी का पता मिला, लेकिन शातिर औरत फिर अपने यार के साथ चकमा देकर फुर्र हो गई।"

उस आदमी की अभद्र भाषा सुनकर उसे गुस्सा आना स्वाभाविक था, "आप जो भी हो, मेरे दरवाजे पर गाली गलौज नहीं कर सकते।"
"तो क्या मय उस बदचलन औरत का सदका उतारूँ?"
इंस्पेक्टर ने एक डंडा उसकी पीठ पर जमाया, "तमीज से बात कर। चल यहाँ से, रजिया यहाँ नहीं है" कहकर इंस्पेक्टर अपने लश्कर के साथ चल पड़ा।

        "आता हूँ हजूर" कहकर भी वह आदमी दरवाजे से हटा नहीं बल्कि अन्दर घुस आया। उसके पीछे एक बच्चे के साथ दुबली पतली लड़की भी आ गयी। सिर खुजलाते हुए थोड़े बदले सुर में बोला, "मय वशीर अहमद रजिया का शौहर हूँ। " वह आँखें फाड़े उसे देखती रही। कैसे मान ले कि यह रजिया का शौहर है? अभी कुछ दिन पहले रजिया अपने शौहर को लेकर खुद उसके पास आई थी, "मैडम यह मेरा शौहर असलम है, इसकी सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी छूट गई है। बेटे की कम्पनी में इसे लगवा दो।" लगभग  पच्चीस साल की उम्र का असलम किसी भी सूरत में चालीस पैतालीस की रजिया का शौहर नहीं लग रहा था। पर तर्क ने कहा, "जब प्रियंका चौपड़ा का पति उनसे पंद्रह साल छोटा हो सकता है, तो रजिया का क्यों नहीं?" एक पुराना लोक गीत भी याद आ गया था, "मेरा छोटा सा बलमा अंगना में गुल्ली डंडा खेले रे।" समाज में ऐसे रिश्तों का प्रचलन जरूर रहा होगा, तभी तो लोकगीतों में अभिव्यक्त हुआ है।

"ठीक है, भैया से बात करूँगी" सुनकर असलम चला गया था। तब रजिया से पूछा था, "असलम तुम्हारा शौहर जैसा नहीँ लगता है।" रजिया ने जवाब देने में जरा सा भी समय नहीं गँवाया, "मैडम! मेरे पहले शौहर का कालरा से इन्तकाल हो गया था, घरवालों ने मेरा निकाह असलम के साथ पढ़वा दिया।"
"तुमने मना नहीं किया?"
"हमारे यहाँ औरतों को मना करने का हक नहीं है। इसे गुनाह कहते हैं। "

      अब वशीर की बात सुनकर वह पशोपेश में पड़ गयी। भला मुर्दे कभी जिन्दा होते हैं? कुछ न कुछ गोलमोल जरूर है। कड़क होकर पूछा, "तुम उसके शौहर कैसे हो सकते हो? उसका पहला शौहर तो मर चुका है। दूसरे शौहर असलम से मैं मिल चुकी हूँ।" वशीर दाँत पीसता हुआ चीखा, "कितनी बदजात झूठी औरत है। मैं मरा नहीं, तभी तो भागी फिर रही है। असलम की बीबी यह रही" कहकर उसने अपने पीछे खड़ी डरी सी लड़की को आगे कर दिया। लड़की ने दुपट्टे को ही नक़ाब की तरह चेहरे पर लपेटा हुआ था। लड़की की गोद के बच्चे को देखकर अनुभा को लगा , जैसे उसे पहले कहीं देखा हो।

       स्मृति पर जोर डाला, कुछ याद आया। एक दिन उसने रजिया से पूछा था, "तुम्हारे बच्चे कितने हैं?"
"मेरी दो बेटियाँ हैं-जरीना और मंजूरा। मंजूरा अपने मामी मामू के साथ गाँव में रहती है और जरीना अपनी ससुराल में। उसका शौहर अभी सऊदी अरब नौकरी करने गया है, उसका एक बेटा भी है। देखो उनका फुटो"-कहकर उसने झट से मोबाइल सामने कर दिया था। जरीना की गोद में बच्चे की फोटो देखकर उसने कहा था, "वाह! रजिया तुम तो इतनी कम उम्र में नानी भी बन गई।" रजिया ने हँसते हुए कहा था, "हमारे यहाँ निकाह कम उमर में हो जाता है। "

          अपने सामने खड़े इस उलझे रिश्ते से नक़ाब उठाने के लिये उसने लड़की के चेहरे से दुपट्टा खींच लिया , "अरे! यह तो रजिया की बेटी है, यह असलम की बीबी कैसे हो सकती है?" अपने गन्दे पीले और उबड़ खाबड दाँतों को दर्शाता हुआ वह गुस्से में बकने लगा, "अल्लाह जाने कितने झूठे किस्से इस बदजात औरत ने आप सब को सुनाये हैं। साली को दोज़ख में भी कब्र के लिये जगह नहीं मिलेगी। " फिर डपटकर बोला, "बता जरीना मैडम को कि तू असलम की बीबी है या नहीं।" सारी घटना से निर्लिप्त निरीह सी जरीना ने दुपट्टा मुँह में ठूंसे हुये सिर हिला दिया। वह दुविधाग्रस्त थी कि जरीना ने स्वीकृति में सिर हिलाया है या अस्वीकृति में। कुछ पूछती, इससे पहले ही वशीर बोल उठा, "देख लिया आपने। मुझे जर देकर, घर से सारे गहने और नकदी लेकर असलम के साथ भाग आयी है। सोचा होगा कि मय मर गया। पर अल्लाह के करम से मय जिन्दा हूँ। बेहया औरत यहाँ असलम के साथ गुलछर्रे उड़ा रही है और यह मासूम वेवा की जिन्दगी गुजार रही है। बस आप तो रहम करके मुझे उसका पता और फोन नम्बर दे दो।"

"दोनों आपको सिक्योरिटी गार्ड के रिकार्ड से मिल जायेंगे" कहकर उसने टालना चाहा।

             बच्चा शायद भूखा था। उठकर उसे एक केला दिया। जरीना फर्श पर बैठकर बच्चे को खिलाने लगी। वशीर को हतोत्साहित करने के लिए उसने कहा, "रजिया तुम्हारे साथ रहना नहीं चाहती है। फिर उसकी तलाश में क्यों भटक रहे हो?" वशीर गुस्से से भभका पड़ा, "एक बार वह हरामजादी बस मिल जाये, बीच सड़क पर उसका बाल खींच कर चार जूते लगायेगा मय, फिर तलाक देकर पुलिस के हवाले कर देगा। वह जेल की हवा खायेंगी, तब मेरा जिगरा ठंडा पड़ेगा।" उसने फिर कहा, "अगर असलम जरीना के साथ नहीं रहना चाहता, तो तुम उसका क्या बिगाड़ लोगे?" वह तपाक से बोला, "कम से कम वह जरीना को तलाक देकर आजाद तो कर देगा। असलम घर लौटआयेगा, इस गलतफहमी से बोहर तो निकलेगा जरीना, तब मय इससे निकाह कर लूँगा।"   

           जरीना की निस्तेज आँखें छलछला उठी। उसने अपना दुपट्टा पहले जैसे चेहरे पर लपेट लिया। "चल उठ जरीना" कहकर वशीर चल पड़ा, उसके पीछे जरीना जिन्दा लाश की तरह अपने आप को घसीटती हुई चल पड़ी। वह दरवाजा बन्द करने के लिये उठी। जरीना ने पीछे मुड़कर देखा। उसकी कातर दृष्टि कुछ कह रही थी। वह तय नहीं कर पाई कि जरीना असलम की बेवफाई से छुटकारा माँग रही है या वशीर की मौकापरस्ती से। अथवा कुछ और।

              अनुभा उनके झूठे-सच्चे औरअनसुलझे रिश्तों के जाल में उलझा कर रह गयी।  पर इतना तय था कि इसमें झूठ का प्रपंच रचा गया है। लेकिन किसने? इस का जवाब खोजने के लिये वह खुद ही वकील और जज बनकर सारी घटनाओं का पोस्टमार्टम करने लगी। शक की सुई रजिया की तरफ घूमी - "दोषी है, तभी पुलिस से छिपती फिर रही है। शातिर है, तभी मुझे भी पाँच हजार का चूना लगा गई। असलम को फंसाकर भोलीभाली जरीना की जिन्दगी अज़ाब कर गयी। रजिया के प्रति उसकी संवेदना और अपनापन एक क्षण में तिरोहित हो गया।"

              कुछ समय बाद एक अप्रत्याशित घटना घटी। अनुभा किसी विवाहोत्सव में शामिल होने के लिये हैदराबाद गई। वहाँ मेहन्दीपट्टनम के भीड़ वाले बाजार में रजिया दिखी। वह उस धोखेबाज से मिलना नहीं चाहती थी, लेकिन रजिया ने आगे बढ़कर रोक लिया और हर्षातिरेक में गले लगते हुए पूछा, "मैडम आप यहाँ?"उसके अन्दर भरा हुआ क्रोध और घृणा अपनी भड़ास निकालने के लिए व्याकुल हुआ, लेकिन बीच बाजार में अपने को संयमित करते हुए उसने सिर्फ इतना कहा, "जरीना की जिन्दगी सत्यानाश क्यों की?"वह व्यंग्य से हँसी, "आप वशीर से जरूर मिला होगा। दुई मिन्ट के लिये मेरे साथ आयें, सब सवाल का जवाब मिलेगा , "कहकर उसका हाथ पकड़कर लगभग घसीटते हुए एक तंग गली में ले आई। घर का दरवाज़ा खटखटाया। दरवाजा खोलने वाली जरीना को देखकर वहअवाक् रह गई। रजिया ने थोड़े भारी स्वर में कहा, "मैडम जी, सुकून की जिन्दगी जीने के लिये अपना देश छोड़कर बार्डर पार किया था वशीर के साथ, पर उसने मेरी जिंदगी दोज़ख बना दी। मेरी बेटी जरीना को भी बन्धक बना लिया। "अविश्वास से मैंने कहा, "अपनी ही बेटी को!" "जरीना उसकी बेटी नहीं है, वह मेरे पहले शौहर की औलाद है।" " तेरे कितने शौहर है?"मैने झुंझलाहट में पूछा। "सच पूछो तो एक भी नहीँ। पहला शौहर दो बेटियाँ की माँ बनाकर अल्लाह को प्यारा हो गया। घरवालों ने मेरा निकाह वशीर अहमद से करा दिया। वह दरिन्दा निकला। नशा और जुआ की लत थी। मुझ से पेशा कराना चाहता था। इनकार पर मारपीट गाली-गलौज की तो कोई इन्तिहा ही नहीँ थी। सब कुछ सहा लेकिन एक बात नहीं सहा गया, जब उसने मेरी तेरह साल की जरीना पर बुरी नजर डाली। मय चोरी से अपने बाप को बुलाया और दोनों बेटियों को उनके साथ भेज दिया। भाई ने फूफी जान के बेटे रहमत अली से उसका निकाह करा दिया। वशीर इस बात से बौखला गया। उसने मुझे ऐसी सजा दी जो आप सुन भी नही सकोगी और मुझे तलाक़ दे दिया। छुटकारा पाकर मैं भाई के पास मुर्शिदाबाद आ गई। मेहनत मजदूरी करके मैं खुश थी। लेकिन वशीर मेरा पीछा छोड़ने वाला नहीं था। पछतावे का ढोंग करके उसने भाई के पैर पकड़ लिया। दुुबारा निकाह की पेशकश की। भाई भावज के दबाव में मुझे झुकना पड़ा। हलाला के लिये पैसे देकर निट्ठल्ले असलम से मेरा निकाह पढ़वा दिया। उस दरिन्दे की बीबी बनना कबूल नहीं था। इसलिये हलाला के लिये कुर्बानी भी मंजूर नहीं थी। असलम को और पैसे का लालच देकर पटाया। वह मान गया। हम दोनों उसी रात भाग आये। रसूले पाक की कसम मय कभी असलम की बीबी बनी ही नहीं। वह तो दुनिया में अकेले रहने के लिये शौहर नाम की मेरी ढाल था। खिसियाने वशीर ने जहर देकर मारने के झूठे केस में फँसाकर पुलिस मेरे पीछे लगा दी। जरीना का आदमी परदेश में था। मौके का फायदा उठाकर वह जरीना का बेटा अनवर को उठा लाया। जान से मारने की धमकी देकर जरीना को अपनी उँगली पर नचा रहा था।"

अपने आप पर शर्मिंदा अनुभा ने धीरे से पूछा, "अब वह कहाँ है?" रजिया चहक कर बोली, "उसे अपने गुनाह की सजा मिल रही है। जरीना के शौहर ने उसे जेल की हवा खिला दी है।"

तभी कोई अन्दर से झांका। रजिया बोली, "इमराना है, असलम की बीबी। असलम टैम्पो चलाता है।" जरीना के बेटे के हाथ में सौ का नोट थमा कर रजिया की पीठ सहलाकर वह चली आई।

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