व्यंग्य: डॉलर का नोट

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

पिछले साल एक विवाह समारोह में शामिल होने मैं और श्रीमती जी भारत के एक अदद शहर में थे। शादियों के मौसम में भारत की आबोहवा में जो ख़ुशबू और रिश्तों के साथ-साथ हवा में भरी गर्माहट आनंदित कर रही थी। हम एन आर आई थे और वर पक्ष की ओर से थे इसलिए हमारे चेहरे पर लालबत्ती जैसी गरिमा थी। सच कहूँ तो देसी के विदेशी होने का इतना भाव भारत में ही मिलता है। आदमी का भाव सहसा ही बढ़ जाए तो उसके पाँव ज़मीन पर नहीं टिकते। मेरी भी हालत यही थी, पाँव हवा में उड़ रहे थे और दिमाग़ सातवें आसमान पर था।  मेज़बान सभी ख़ास मेहमानों से मेरा परिचय यह कह कर कराते थे कि जैन साब शादी अटेंड करने के लिए अमेरिका से आए हैं। वे यह इस अंदाज़ में बोलते थे कि आगंतुकों को लगे, तुम तो बीस-तीस किलोमीटर दूर से आए हो, कोई एहसान नहीं किया। बात आगे बढ़े इसके पहले मैं आवश्यक रूप से संशोधन कर देता था कि मैं कनाडा से आया हूँ। भारतीयों के लिए कनाडा, अमेरिका के सापेक्ष दलित है और दलितों के प्रति उनकी भावना भी दलित रहती है। पर, मेरे कैनेडाई होने से आगंतुकों को ऐसी निराशा नहीं हुई। उन दिनों कोरोना का आतंक नहीं था, हम तबलीगी अंधविश्वासी भी नहीं थे, इसलिए लोग लपक कर हाथ मिलाते, जहाँ गुंजाइश होती गले मिलते और सारी जगह ठहाकों से भर देते। बारात फ़ॉर्म हाउस के उत्तरी कोने से चली थी और दक्षिण कोने तक जानी थी। दो सौ मीटर का फ़ासला तय करने में दो घंटे बीत गए, बारात सरकार की गति से चले तो लक्ष्य पाने की क्या चिंता करना। हम एक क़दम बढ़ते और फिर ठहर जाते। घोड़ी पर बैठे दूल्हे और मेरे अलावा बैंड वाले ही थे जिन्होंने पूरी निष्ठा से यह दूरी तय की थी। बाक़ी बाराती अधिकतर समय छप्पन भोगों के स्टालों का स्वाद लेकर ठहरी बारात में मुँह दिखाई कर जाते थे। हाज़िरी लग जाए तो बारातियों की गिफ्ट पक्की।
स्वागत करने वधू पक्ष वाले जितने क़रीब आ रहे थे बैंड मास्टर और दूल्हे की घोड़ी उतनी ही अड़ियल होती जा रही थी। अब संगीत की लोकप्रिय धुनें बज रही थी कि किसी ने पल्लो लटके की फ़रमाइश कर दी। युवकों की कमर पल्लों की तरह लटकने-मटकने लगीं। दूल्हे की सगी युवतियाँ भी अपने कौशल प्रदर्शन से प्रिय को लुभाने का आनंद उठा रही थीं। क्या बड़े, क्या छोटे सब नोट निकाल-निकाल कर हवा में लहरा रहे थे। भारत नोटों से भरपूर था, जिधर देखो उधर नोट ठूँसे जा रहे थे, ढोली के ढोल पर, ड्रमर के ड्रम पर, भोंगे वालों के हाथों में और बैंड मास्टर की क्लेरिनेट और सैक्सोफ़ोन पर। ट्रम्पेट बजाने वाले ने बाजा बजाना छोड़ कर नोट इकट्ठे करना शुरू कर दिये थे। बड़ा नोट दिखता था तो वह जाँच कर लेता था कि कहीं नोटबंदी का प्रतिबंधित माल तो कोई यहाँ नहीं खपा रहा। नोट इकट्ठे करने में उसकी तत्परता और निपुणता देख कर मुझे लगा कि उसे किसी राजनीतिक दल का खजांची होना चाहिये था।

लोग मुझे धक्के मार-मार कर डांस समूह के घेरे में ले आए और पूछने लगे आपकी फ़रमाइश। मैं क्या बताता, मैं दो-तीन तरह के डांस-फ़ॉर्म जानता हूँ, नागिन डांस, भांगड़ा या डांडिया। यह बारात पंजाबियों या गुजरातियों की नहीं थी इसलिए मैंने बिना सोचे कह दिया कि हो जाए नागिन डांस। फिर क्या था, रुमाल की पुंगी बन गई और अच्छा ख़ासा लड़का नागिन। लड़कों को कुछ भी बना दो बस वाहवाही देते रहो। तभी कुछ मोटरसाइकिलें धड़ाधड़ आईं, धीमी होती हुई कारों का काफिला आया और एक बड़ी सफ़ेद एम्बेसेडर कार वहाँ रुकी। लोग गेंदें-गुलाब की मालाएँ लेकर उधर दौड़े, मैं सोच में पड़ गया, मुझे लगा अब दुल्हन इस तरह आने लगी है। माल्यार्पण का यह तरीक़ा मेरे लिए नया था। पर उस कार में से एक मंत्रीवर निकले। बैंड ने सलामी धुन बजायी। मैं मंत्रीवर के रूप पर मोहित हो गया, क्या तो सफ़ेद झकाझक कपड़े, ताज़ा-तरीन चेहरा और ऊर्जा से भरपूर। सोचने लगा कि मैं तो शाम तक थक कर चूर-चूर हो जाता हूँ, मंत्रीजी शाम को और ज़्यादा तरोताज़ा लगते हैं, सारे दिन वे ऐसा क्या काम करते हैं। बहुत से बाराती मंत्रीवर के दाएँ-बाएँ हो उनके साथ चले गए। अब मुँह लटकाए नागिन डांस वाले थे और हम कुछ दर्शक। बैंड मास्टर अपना बैंड-बाजा समेटना चाहता था। मंत्रीवर की आंधी उसके अधिकांश दर्शकों को उड़ा ले गई थी।

खैर गाना शुरू हुआ, माहौल नहीं बन रहा था। कुछ दूल्हा पक्ष वाले नोट उँचे किये खड़े थे पर बैंड वाला मायूस था। मैंने भी अपनी जेब ढीली की और कुछ नोट निकाले। एक नोट नागिन पर फहराया और ट्रम्पेट वाले को इशारा कर ही रहा था कि मेरा सह-दर्शक चिल्लाया, डॉलर। सब मेरी ओर देखने लगे। मेरे हाथ से डॉलर का नोट लेकर बैंड वाले ने उसे उलटा-पलटा और ज़ोर से बोला डॉलर। नागिन की गति में लय और उल्लास भर गया, ड्रम की थाप में जोश आ गया। डॉलर की इस ताक़त का मुझे अब अनुमान हुआ। मैं डॉलर का नोट कभी नागिन तो कभी मदारी पर फहराता और भारी शोर-शराबे के बीच डॉलर का नया नोट बैंड वाले की तरफ़ लहरा देता। बढ़ती भीड़ चिल्लाने लगी थी, डॉलर-डॉलर का ऐसा मीठा शोर मेरी प्रतिष्ठा बढ़ा रहा था। एक दर्शक ने कहा ये डॉलर भी काग़ज़ का निकला, मैं तो इसे सोने का समझता था। दूसरा बोला इसके वाटरमार्क में सोने का तार लगा है तो किसी ने जिज्ञासा प्रकट की कि मेटल डिटेक्टर डॉलर को पकड़ लेता होगा, आप कस्टम्स पर कितने दे कर बचे। समीप ही खड़े एक बाराती ने पूछा डॉलर में ऐसा क्या है कि इसका भाव इतना ऊँचा है। अन्य ने फटाक से जवाब दिया, इस पर अंग्रेज़ की फ़ोटो लगी है। वाकई देवों के देश में मुफ़्त में, दुर्लभ ज्ञान बाँटने वालों की कमी नहीं थी।

कुछ भी हो, मैं यकायक फेमस हो रहा था। लोगों ने मुझे डॉलरवाला कहना शुरू कर दिया था। लोग मुस्कराते मेरे पास आते और डॉलर दिखाने का आग्रह करते। मुझे अपार ख़ुशी मिल रही थी कि मेरे पास उनको दिखाने लायक कुछ नया था। मेरे आसपास ज़्यादा चहल-पहल देखकर मंत्रीवर ने मुझे काम का समझ अपने पास बैठा लिया। उन्होंने मुझसे पूछा आप क्या करते हैं। मैंने कहा मैं लेखक हूँ। उन्होंने मुझे घूर कर ऊपर से नीचे तक देखा और पूछा, अच्छा आपके यहाँ लेखक के पास भी डॉलर रहते हैं, हमारे यहाँ तो सिर्फ नेताओं के पास ही....। उन्होंने वाक्य पूरा नहीं किया और हँस दिए। बोले, भारत में अपने पास विदेशी मुद्रा रखना अपराध है। इसमें फेरा ऐक्ट लागू हो जाएगा, आप क्यों झंझट में फँसना चाहते हैं। मैंने कहा, सर हमने तो भारत में प्रवेश के वक़्त इस रक़म को घोषित कर दिया था, इसलिए क़ानून का उल्लंघन नहीं बनता। वे बहुत ख़ुश दिखे, समझाते हुए बोले आप प्रवासी भारतीय क़ानून का पालन करते हैं, ठीक है, पर आपको खुलेआम डॉलर लेकर नहीं घूमना चाहिए। आपकी सुरक्षा को ख़तरा हो सकता है। आप डॉलर हमारे पास जमा करा दीजिये। फिर उन्होंने मेरे हाथ को अपने हाथ में लेकर इतनी ज़ोर से हिलाया जैसे भारत के प्रधानमंत्री अमेरिकी राष्ट्रपति का हाथ हिला रहे हों। मंत्रीवर से इतना सम्मान पा कर मुझे अपने एनआरआई होने पर बहुत गर्व हुआ।

मैं महिला मंडल की तरफ़ देखना चाह कर भी नहीं देख पा रहा था। कई भद्र अँखियाँ मुझे घूर रही थीं, श्रीमती जी उधर डॉलर दर्शन करा रही थीं। पहली बार उन्हें मुझ पर गर्व हुआ होगा कि मैंने ढंग का कोई काम किया। डॉलर कमाते तो हम दोनों ही थे पर खर्च करने का सर्वाधिकार उनके पास ही था। पूरे शहर और आसपास से आए सारे मेहमानों को पता लग गया कि हम डॉलर वाले हैं। कई लोगों ने हमें उनके घर नाश्ते-खाने पर आमंत्रित किया। कई परिवारों ने हमारे बच्चों के बारे में जानकारी माँगी। हमें नमस्ते और दुआ-सलाम करने वालों की संख्या बढ़ गई थी। मैं उन्हें नहीं जानता था, वे भी मुझे नहीं जानते थे पर मेरी जेब में रखे डॉलर को जानते थे। स्थानीय कॉलेज के प्राचार्यजी का फ़ोन आया, वे कॉलेज में मेरा भाषण रखना चाहते थे। मुझे लगा प्राध्यापक और छात्रवृंद हमारे लेखन पर चर्चा करना चाहते होंगे। मैंने विनम्रता से अपने भाषण का विषय पूछा तो वे बोले, सर बच्चे अमेरिका जाने के तरीक़ों के बारे में जानना चाहते हैं और डॉलर देखना चाहते हैं। प्रफुल्लित मन लिए टहलते-टहलते मैं बनारसी पान के अड्डे पर पहुँचा तो पान वाले ने कहा सर, आपसे क्या पैसे लेना, डॉलर दे जाइए। यहाँ काँच पर लगा कर रखूँगा तो ज़्यादा लोग एक्सपोर्ट क्वालिटी पान खाने आयेंगे, उन्हें लगेगा यहाँ डॉलर वाले भी आते हैं।

डॉलर मुझे मदांध करता जा रहा था। मेरे चमचमाते जूते हाथ में लिए मैले-कुचले कपड़ों में पॉलिश वाला लड़का खड़ा था। मैंने डॉलर उसे थमाते हुए कहा, जाओ ऐश करो। उसने डॉलर वापस लौटा दिया और बोला सर, डॉलर मेरे किस काम का। मैं तो बूट पॉलिश करके अपना घर चलाता हूँ। मेहनत के बीस रुपये मिलेंगे तो काम आएँगे। डॉलर का नोट वापस जेब में रखते हुए मेरा अहंकार और डॉलर दोनों चूर-चूर हो रहे थे।

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