काव्य: पुनीता जैन

पुनीता जैन
   
                      कवि का घर…

ककून के भीतर रेशम बनाता है कीड़ा
उसे फर्क नहीं पड़ता
कौन धारण करता है  रेशम
वह बनाता है भीतर उतर गहराई से
मग्न होकर डूबकर
खत्म होकर

कवि का काव्यकर्म
कुछ इसी तरह होता है
भीतर भीतर बुनता वह बाहर की भी सुनता है
इसी में सोता जागता
इसी में वह खत्म होता है...

घिस घिसकर झरता पीड़ा में एकांत
इसमें ही पर  खुश होता है
रेशम का कीड़ा
रेशम में ही चैन की नींद सोता है...
***


                      सहयात्री

मै पलकों के काम में बाधा नहीं पहुँचाती
उन्होंने वक्त बेवक्त बहुत साथ दिया है मेरा
आँख उठाने /तल्खियों को दरकिनार करने में
शर्म और ग्लानि /मुस्कुराने और रोने में
मिलने और बिछुड़ने मे
ये करती रहीं अपना काम ... अपनी तरह

किसी समय जब शून्य में टिकती हूँ एकटक
चेहरे की लिपि पढ़कर
बदल देतीं हैं ये अपने झपकने का क्रम
कोई कठिन क्षण जब रेल की तरह धड़धड़ाते हुए
गुजरता है मुझ पर
अपने चरैवेति के सिद्धांत के विरुद्ध ये
कठोर श्रम करती हैं
रूक जाती हैं किसी सूने नक्षत्र पर एकटक

बंदूक की तरह देर तक
टिकी रहती हैं पलकें
जब तक पहुँच नहीं जाती हूँ मैं
किसी निर्णय पर...
***


                       रूठारूठी

मैं और शब्द अक्सर एक दूसरे से रूठ जाते हैं
ये हमारे आपस की बात है
इस रूठारूठी में
मैं शब्दों से बात नहीं  करती और वे मुझसे

अब एकांत जीवन में करती हूँ बतरस जी भर भर…
शब्द कनखियों से देखता है मुझे बार बार
पर क्यों करूँ बात उससे
कविता बन शब्दों में आऊँ
क्यों आऊँ...!!
नहीं आना मुझे!
हर तरह की अड़ीबाजी से परे
सीधे जीवन को ताकना ...
इस रस  का स्वाद वो क्या जाने

उस दिन ही
उड़ते पंख को थामना चाह रही थी
पंजों ने साथ दिया तो हल्का सा कूदी ही थी
कि शब्द ने पंख पकड़ हथेली पर रख दिया
अब बहुत तेज गुस्सा थी मैं
उसकी सहयोगी मुद्रा कह रही थी
अब क्या हुआ भाई...!!
कैसे कहूँ पंख छूने के प्रयास में
मैं पंख हो रही थी
कि तुम फिर टपक पड़े
मेरे और जीवन के बीच बार बार आ धमकने की
उसकी यही आदत नापसंद थी मुझे
शब्द है कि समझता ही नहीं..

घास पर अद्भुत रंगों से सजे उस कीट की थिरकन में
कैसे मस्त हो बहने लगा था मन
कि एक हाथ बढ़ा
मेरी आँखों के ठीक निकट तक ले आया था उसे शब्द
उसे एहसास ही नहीं कि आँखों के इतने निकट
गड्डमड्ड हो जाते हैं रंग
नन्हा कीट तो क्या
अपनी ही गति नहीं बूझती इतने निकट से
पर उसे क्या... हौले से उठाया
हौले से फिर उसी घास को सौंप दिया
मुस्कुराते शब्द में एक बालक छवि देख
मुस्कुरा ही दी  बरबस मैं भी

पर सच कहती हूँ
शब्द उतावला बालक ही है
गेंद उछालता अपने जिज्ञासु प्रश्न लिए
आ ही जाता है मेरे और एकांत के बीच
सौंप देती हूँ फिर उसे
समय और मेरे बीच हुए कुछ वाकये
जिसमें डूबता है वह
और मैं डूबे शब्दों के मौन में
जीवन का लास्य फिर ढूंढती हूँ...
***
   
 
         कितनी साँसों पर कितने घुटने

जार्ज फ्लायड!
तुम साँस नहीं ले पाए
व्यवस्था के घुटने के नीचे दबकर
एक पूरी सभ्यता इसी तरह साँस नहीं ले पा रही है

अनगिनत साँसों की कराह में
अनगिनत साँसें कराह रही हैं जब

तब ... हे जार्ज फ्लायड*!
मेरे इस महान देश में
किस नाम से पुकारा जाए तुम्हें...


2 जून 2020
*अमेरिकी अश्वेत, जिसकी मौत का कारण एक पुलिसकर्मी द्वारा अपने घुटने से नौ मिनट तक उसका गला दबाना था।


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