कहानी: माँ- आचार्य नीरज शास्त्री

आचार्य नीरज शास्त्री
         सात साल का जतिन कॉर्मेल कान्वेंट स्कूल में दूसरी कक्षा में पढ़ता है। प्रतिदिन वैन से स्कूल जाता है।  वह अपनी शिक्षिकाओं का प्रिय है। माँ ने बड़े नाजों से उसका पालन पोषण किया है। उनकी आँखों में एक ही सपना है जतिन बड़ा होकर आईएएस अधिकारी बने।
         माँ की अपेक्षाओं पर सदा खरा उतरने वाला जतिन मन लगाकर पढ़ रहा था। सुलेख, निबंध, भाषण व  वाद-विवाद आदि प्रतियोगिताओं में प्रथम स्थान प्राप्त कर वह अपनी माँ का नाम रोशन कर रहा था। पुरस्कार समारोह के अवसर पर जतिन के विद्यालय में माँ को भी मंच पर बुलाया जाता तो उन्हें गर्व की अनुभूति होती थी।
         जतिन के पिता सेना में सूबेदार थे। कारगिल के युद्ध में देश के लिए शहीद हो गए। तब से माँ ने माता-पिता, दोनों का प्यार देकर जतिन को संभाला है। वही तो उनके जीने का एकमात्र सहारा है।


लेकिन पिछले कुछ दिनों से जतिन न तो ठीक से खाना खा रहा है और न ही खेल रहा है।  पढ़ने में भी पहले जैसी तल्लीनता नहीं है। माँ उसका यह व्यवहार देखकर परेशान हैं।
      "परेशान क्यों हो बेटा?" उसका दिल बहलाने के लिए माँ ने याद दिलाया, "तुम्हें तो खुश होना चाहिए! कल फिर तुम्हें पुरस्कार मिलेगा। इस बार फिर प्रथम स्थान प्राप्त कर तुमने मेरा नाम रोशन किया है। कल जब मैं स्कूल आऊंगी तो फिर मुझे मंच पर बुलाया जाएगा। एक बार फिर मेरा सिर गर्व सेपऊँचा हो जाएगा। "
       यह सुनकर जतिन ने माँ की ओर देखा और तेजी से बोला, "नहीं... तुम मत आना मेरे स्कूल। मेरी परेशानी का कारण कोई और नहीं, तुम हो। जानती हो, जब तुम स्कूल जाती हो, स्कूल के बच्चे मुझे चिढ़ाते हैं। ... मेरे दोस्त की माँ कितनी सुंदर है! और तुम... तुम कितनी कुरूप हो!"
       इतना सुनते ही माँ रो पड़ीं। उनका धैर्य जवाब दे गया। माँ को रोता देखकर जतिन व्याकुल हो उठा। बोला, "माँ! क्यों रो रही हो तुम? बताओ न माँ!"
माँ कुछ नहीं बोलीं। जतिन ने फिर कहा -"बताओ माँ! तुम्हें मेरी कसम!"
      कुछ ठहरकर माँ को बताना पड़ा, बोलीं, "बेटा, बात तब की है... जब तेरे पिताजी जीवित थे। वे सीमा पर तैनात थे। दीवाली का दिन था। चारों ओर फुलझड़ी पटाखे चल रहे थे। अचानक ... कोई पटाखा आकर हमारे घर में कोने के छप्पर पर गिरा और हमारे घर में आग लग गई। बेटा, आग इतनी भयंकर थी कि कोई भी पास आने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। तुम घर के अंदर थे मेरे लाल। तुम्हें बचाने वाला कोई नहीं था मेरे जतिन! इसलिए मैं तुम्हें बचाने को आग में कूद गई। मेरा शरीर जल गया, परंतु उस दिन मैं तुम्हें सकुशल बाहर निकाल लायी। इसलिए मैं कुरूप हो गई मेरे बेटे!"
        माँ एक बार फिर  फूट-फूट कर रो पड़ीं। जतिन की आँखें भी नम हो गईं। उसने माँ के आँसू पोंछकर कहा, "माँ! तुम दुनिया की सबसे अच्छी माँ हो। और सबसे सुंदर भी हो माँ। तुमसे सुंदर तो किसी की माँ नहीं है। मैंने पढ़ा था, भगवान के बाद माँ ही सबसे बड़ी होती है ...पर नहीं... मेरी माँ, तुम  तो भगवान से भी बड़ी हो। मुझे माफ कर दो माँ! आज से तुम्हारा बेटा भगवान से पहले तुम्हारी आरती उतारेगा।"
         इतना कहकर जतिन रोने लगा। माँ ने उसे सीने से लगा लिया और दोनों एक दूसरे के आँसू पोंछने लगे।
     

4 comments :

  1. मां कहानी के प्रकाशन हेतु सेतु परिवार को हार्दिक धन्यवाद।
    आचार्य नीरज शास्त्री

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    1. हृदयको छू लेने वाली कहानी

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  2. वाह, अति मार्मिक कहानी।
    प्रकाशन हेतु सेतु पत्रिका को तथा लेखक को भी हार्दिक बधाई।

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  3. मर्मस्पर्शी रचना।

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