संयम बनाम भोग का आख्यान: ‘अतिशय’

नीतिका कालड़ा

नीतिका कालड़ा

प्राध्यापिका, गर्ल्स गवर्नमेंट हाई स्कूल, रावलवास खुर्द, हिसार, हरियाणा।
चलभाष: +91 981 238 0182; ईमेल: nitikasidhar@gmail.com


मृदुला सिन्हा का उपन्यास ‘अतिशय’ 498 पृष्ठों में विस्तृत एक प्रेम त्रिकोण कथा है। अनादि काल से चली आई एक स्त्री पुरुष के वैवाहिक और विवाहेतर मान्य और अमान्य संबंधों की अति रोचक कथा है। घटनाक्रम आरंभ से अंत तक एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा राजा ययाति, शर्मिष्ठा और देवयानी की त्रिकोण प्रेम कथा पर आधारित है। उपन्यास में लगभग 50 पात्र हैं। इनमें मुख्य तीन पात्रों – यति, शिवानी और शर्मिष्ठा की कथा आधुनिक परिवेश पर लिखी गई है। इनके अतिरिक्त पुरुष पात्रों में रजनीश, आचार्य वचनदेव त्रिपाठी, हरीश, पुरुषार्थ, परिमल, प्रोफ़ेसर ऋषभदेव, संजीव, रमाशीष, गोयनका, मिस्टर भास्करन आदि तथा स्त्री पात्रों में रमी, मानिनी, अंबिका, रमिला, मिसेज माधुरी आडवाणी, शोभा, कोकिला आदि हैं।
यति और रजनीश घनिष्ठ मित्र हैं जो कॉलेज के छात्र हैं। यति एक धनाढ्य परिवार का लड़का है जो शौकीन तबीयत का दिलफेंक लड़का है। जबकि दूसरा मित्र योगी की तरह जीवन यापन करता है। यति को रजनीश सही रास्ते पर लाने का प्रयास करता है। यति के पिता उसे अपने काम में हाथ बटाने के लिए कहते हैं पर वह आधुनिक तौर तरीके से काम करना चाहता है। इसी क्रम में उसकी मुलाकात मिसेज माधुरी आडवाणी से और उनकी बहन की पुत्री शिवानी से हुई और बाद में विवाह भी। पत्नी से प्रेम के कारण वह उसी के नाम पर शिवानी क्लॉथ मिल भी शुरू करता है।
यति के शौकीन स्वभाव के कारण ही यति शिवानी से आलिंगन को उत्सुक रहता था। यति का मित्र रजनीश जो तीन वर्षों तक रिसर्च करता रहा था उससे जब मिलता है तो उसकी भेंट शिवानी से होती है। शिवानी,वचनदेव त्रिपाठी जी की पुत्री है। त्रिपाठी जी रजनीश के गुरू हैं जो रजनीश के रिसर्च निर्देशक थे। शिवानी को उसकी माता बचपन में ही छोड़कर चली गई थी। बिन माँ की बेटी को संभालना आसान नहीं होता पर त्रिपाठी जी ने इसे सरल कर दिखाया था। रजनीश जब त्रिपाठी जी के पास रिसर्च के लिए आता था तब शिवानी उसको पसंद करती थी। शिवानी ने रजनीश के सामने विवाह का प्रस्ताव भी रखा था परंतु रजनीश ने कहा कि वह आजीवन अविवाहित रहना चाहता है। शिवानी कुछ क्रोधी तथा अहम भाव रखने वाली कन्या थी। अतः वह इस बात पर तिलमिला उठी। यति को अधिक पसंद ना करने पर भी उसने इसी क्रोध के कारण यति से विवाह किया। यति का अतीव लगाव उसे बर्दाश्त नहीं होता था। फिर भी यति अन्य स्त्रियों से संसर्ग न करे इसीलिए वह उसके प्रभास पूरा लेखा-जोखा रखती थी। वैसे दोनों का संबंध रूखा हो गया होता यदि बीच में पुत्र परिमल न आया होता।
  शिवानी और यति दोनों को एक दूसरे से कुछ शिकायतें थी। शिवानी को शिकायत थी कि यति परिमल पर अधिक ध्यान नहीं देता है और सदा या तो कंपनी के काम में या फिर भोग में ही अपना ध्यान लगाता है। यति को शिवानी की यह बात खटकती थी कि व ह उपभोग तो धन-संपदा का पूरा करती है पर उसके अथक परिश्रम की सराहना नही करती है। यति, शिवानी के खिले अंगों से खेलना चाहता था, उसे संपूर्ण शिवानी चाहिए थी, तन मन से पूरी। शर्मिष्ठा, शिवानी की कॉलेज के समय की सहेली थी किंतु इन दोनों की मित्रता यति और रजनीश जैसी नहीं थी। शिवानी को शर्मिष्ठा से बहुत जलन होती थी। शर्मिष्ठा की चमचमाती कारों, आलीशान महल, दास-दासियों के कारण शिवानी उससे जलती थी। शर्मिष्ठा कॉलेज के संस्थापक की पोती तथा तत्कालीन कॉलेज सेक्रेटरी की बेटी थी। शिवानी, प्रिंसिपल की बेटी थी। कॉलेज के वार्षिकोत्सव में शर्मिष्ठा ने शिवानी का उपहास किया, जिसके कारण शिवानी कार्यक्रम में अधूरा नृत्य छोड़कर चली गई। तभी से शिवानी क्रोध की ज्वाला में जल रही थी। आज शिवानी को प्रतिशोध लेने का मौका मिला था। शर्मिष्ठा के घर के हालात ठीक न होने के कारण आज उसे ‘शिवानी क्लॉथ मिल’ में काम करना पड़ रहा था। हरीश जो यति की मिल में काम करता था तथा यति का अच्छा मित्र था। वह शर्मिष्ठा को अपनी दीदी मानता था तथा उसके काम की प्रशंसा भी करता था।
शिवानी की मौसी माधुरी आडवाणी जो एक तलाकशुदा औरत हैं अपने दुखों और कष्टों से अनुभव प्राप्त करने के कारण शिवानी को सदा घर बसाये रखने की सलाह देती हैं। वह शिवानी से यति के गुणों को देखने तथा हर समय यति और उसके पिता की तुलना न करने की सलाह देती है। किंतु शिवानी अधिकतर यति और रजनीश के विषय में सोचती है कि एक यति है जो अपनी इच्छाओं, वासनाओं और स्त्री से लिपटी रहने की लिप्सा से कभी संतुष्ट नहीं होता था और दूसरा रजनीश है जो पूर्णतः अनासक्त रहता था। यति तो स्वप्न में भी नारी ही नारी देखता है। यति और रजनीश की बातें भी गृहस्थी और तपस्या की होती थी। एक संयम और नियंत्रण का पाठ पढ़ाता तो दूसरा यह सब बेकार समझता था। रजनीश ने यति को बता दिया था कि शिवानी उसके गुरू की पुत्री थी और उनकी पहचान पहले से ही थी। शिवानी, यति और रजनीश के विषय में यति से कहती भी है कि – “रजनीश और तुम्हारी क्या मित्रता ? दोनों एक नदी के दो किनारे हो।”1
यति ने रजनीश को अपनी ‘शिवानी क्लॉथ मिल’ भी दिखाई। वहाँ रजनीश शर्मिष्ठा से मिला। रजनीश और यति में आमतौर पर जो बातें होती थी, उनमें शर्मिष्ठा भी शामिल हो गई। रजनीश इंद्रियों पर कड़े बंधन का समर्थन करता है तो शर्मिष्ठा उससे कहती है – “मेरा ख्याल है कि बिना अंगूर खाए अंगूर खट्टे हैं कहने वाले की अज्ञानता ही टपकती।”2 शर्मिष्ठा ने टैक्सटाइल्स डिजाइनिंग कर रखा है। यति के पास से जब वह जाती है तो यति को ऐसा लगता है मानो सौंदर्य और शालिनीता की देवी उसके सामने झुक गई। यति धीरे-धीरे शर्मिष्ठा की ओर आकृष्ट होने लगा। यति के मन में उसके प्रति वासना में प्रेम उभरने लगा। किंतु वह रिचा और सोनिया जिनकी जिंदगी उसने अपनी शारीरिक भूख मिटाने के लिए झूठा प्रेम का नाटक रच कर खराब कर दी थी के विषय में सोचने लगा। यति के मुख से शर्मिष्ठा की प्रशंसा शिवानी के लिए असहय थी। शर्मिष्ठा को यति के प्रति सहानुभूति थी - “पत्नी का प्यार पाने की खोज में अपने स्व का भी उत्सर्ग करने वाला पुरुष विफल होकर दूसरे की सहानुभूति का आश्रय चाहता है। घर में पानी न मिलने पर कुए पर जाता ही है आदमी।”3
यति, शिवानी और शर्मिष्ठा के शारीरिक सौंदर्य की तुलना भी किया करता था। यति अब शर्मिष्ठा के प्रति आसक्त होने के कारण उसे बाहों में भरना चाहता था। शर्मिष्ठा भी उसके मनोभावों को समझने लगी थी। उसकी सारी सद्भावना, सहानुभूति, सम्मान, सराहना और स्नेह यति पर केंद्रित हो गए थे। पहली बार उसके कुंवारे मन पर किसी पुरुष का अधिकार हुआ था। यति और शर्मिष्ठा का अहमदाबाद एसोसिएशन की कांफ्रेंस में जाने का कार्यक्रम बना। वहाँ पर दोनों में शारीरिक संबंध स्थापित हो गए। शिवानी को एक बार शर्मिष्ठा के उल्टी करने के कारण उसके माँ बनने की बात पता चली। शिवानी ने उसे बहुत बुरा भला कहा। शर्मिष्ठा ने उत्तर में कहा कि - “शिवानी, यह पाप नहीं है मेरे पेट में किसी भीखमंगे का नहीं, करोड़पति का बच्चा है और मैं इसे अरबपति बनाऊंगी। तुम चिंता मत।”4 अगले ही दिन शिवानी दिल्ली चली गई। रमी ने शर्मिष्ठा का साथ दिया। उसने फोन पर यति को भी सब कुछ बताया। वह जब उससे मिलने आया तो भविष्य से बहुत डरा हुआ था। शर्मिष्ठा ने उससे कहा कि - “मैं, माँ बनने वाली हूं मात्र यहाँ सत्य मुझे दुर्बल बना देगा क्या?”5
रमी ने भी दोनों को सांत्वना दी तथा बच्चा न गिरा कर अच्छी प्रकार से परवरिश करने की सलाह दी। यति के जाने के बाद रमी ने शर्मिष्ठा को अपनी बेटी सोनिया की कहानी सुनाई। सोनिया जब कॉलेज में गई तो एक वासना प्रिय भंवरे ने उसके शारीरिक सौंदर्य का मजा लूटा, उससे विवाह करने का झूठा वादा किया। किंतु बाद में धनाढ्य कामप्रिय युवक ने उसे धोखा दे दिया जिसके कारण उसे आत्महत्या करनी पड़ी। वास्तव में धनाढ्य वासनामय युवक यति ही था किंतु रमी यह नहीं जानती थी। शिवानी, शर्मिष्ठा पर क्रोधित थी। उसके मन में क्रोध, घृणा, संशय और दुख के भाव भरे हुए थे। वह रजनीश को इसका जिम्मेदार मानती थी। रजनीश से भेंट पर शिवानी ने उसे बुरा भला कहा किंतु रजनीश ने बहुत शांत भाव से उसके संदेह को समाप्त कर दिया और उसे बहन बनने को कहा - “हाँ, शिवानी तुम्हारा कोई भाई नहीं है। क्या तुम अपने हृदय के रिक्त कोने में मुझे यह स्थान दे सकती हो?”6 शिवानी उसकी बात मान गई थी। रजनीश ने उस से विदा ली। अब शिवानी रजनीश पर क्रोधित नहीं थी। उसका मन शांत था। इधर शर्मिष्ठा और यति एक साथ मुंबई में सात दिन तक रहे। दोनों ने बहुत छककर प्यार व शारीरिक आनंद दिया एक दूसरे को। किंतु दिल्ली पहुँचने पर यति भूखा का भूखा था। यति के शिवानी के प्रति शारीरिक बंधन और स्पर्श वही थे किंतु ऐसा लगता था मानो वह उन्हें प्रयोगशाला में परिमार्जित करके आया हो। शर्मिष्ठा तीन महीने से ऑफिस नहीं आई थी, उसको लड़का हुआ था । शर्मिष्ठा के मन में अनेक शंका प्रश्न तथा डर थे किंतु हृदय से वह सबल थी। यति भी किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया था। रमी ने दोनों को सहारा दिया।
इस बार वह शर्मिष्ठा से मिलने गया तो रमी की बेटी सोनिया की कहानी शर्मिष्ठा ने उसे सुनाई। आज यति जान गया कि सोनिया रमी की बेटी थी और सोनिया को प्यार करके उसे गर्भवती करके छोड़ देने वाला कॉलेजिया गुंडा उसके खिलते शरीर को चूसने वाला लोभी भँवरा कोई और नहीं वह स्वयं था। यति का मन आत्मग्लानि और क्षोभ के संगम पर खड़ा था। उसने सोनिया को खोजना चाहा था पर शिवानी मिल गई और शिवानी को संपूर्णता से पाना चाहा तो शम्मी उसके मन में समा गई। सोनिया, शिवानी और शर्मिष्ठा की त्रिवेणी बहती थी यति के अपने शरीर में। आज सोनिया का हत्यारा, शिवानी को धोखा देने वाला, यति, शर्मिष्ठा को मझधार में छोड़ने वाला कई दर्द से एक साथ भर गया। यति और शर्मिष्ठा के संबंध की भनक शर्मिष्ठा के माता-पिता को लगी तो उन्होंने शर्मिष्ठा से अपना रिश्ता तोड़ लिया। आज तक शिवानी को यति की करतूत की भनक भी न लगी थी पर सच्चाई कब तक छिपती। आखिर शिवानी ने यति और शर्मिष्ठा के संबंधों की असलियत जान ही ली। उनके बेटे पुरस्कार को भी देख लिया। फिर क्या था? वह शिवानी जिसे अंगुली की ठेस भी गवारा नहीं थी वह आज चोट खाकर गिर पड़ी। होश आने पर पिता के घर चली गई। रजनीश को यति ने फोन पर सब बातें बताई। दोनों इलाहाबाद पहुँचे। त्रिपाठी जी ने वहाँ इस अपराध पर यति को शुक्राचार्य के समान शाप देना चाहा, किंतु चुप रहे। परिवेश में उस समय पीड़ा, तिरस्कार और घृणा का साम्राज्य था। गुत्थी सुलझने की बजाय और उलझने लगी। दोनों को खाली ही वापिस जाना पड़ा।
इधर शर्मिष्ठा भी कहीं चली गई थी। यति ने स्वयं को शराब में डुबो लिया। रजनीश जब उसे देखने आया तो वह शराब के नशे में धुत अपने सामने बोतलें रखे था और कह रहा था कि इनमें से एक सोनिया, एक शर्मिष्ठा और एक है शिवानी और तुम तीनों आओ, मैं तुम तीनों से एक साथ प्यार करूंगा। रजनीश ने उस समय बात करना ठीक न समझा और इलाहाबाद जाकर शिवानी को समझाया। शिवानी का मन कुछ शांत तो हुआ पर वह यति के पास जाने को राजी न हुई। रजनीश वहीं कुछ अन्य प्राध्यापकों से भी मिला इसी उद्देश्य से कि वे लोग शिवानी से मिलते जुलते रहें। रजनीश, हरीश के घर भी गया। उसने शर्मिष्ठा को अभी वापस बुलाने से इंकार कर दिया और यति का ख्याल रखने को कह कर रजनीश चला गया। यति और कंपनी के हालात बिगड़ते ही जा रहे थे। इसलिए मिसेज आडवाणी और हरीश ने इलाहाबाद जाकर शिवानी को मनाने का प्रयास किया। वहाँ उन्हें पता चला कि परिमल को अरविंद आश्रम भेज दिया गया था। त्रिपाठी जी बहुत ज्ञानी हैं। इनके भाषण तथा विचारों की प्रशंसा विदेशों तक होती है। वे उन्हें समझाते हैं कि - “मनुष्य जीवन के चार उद्देश्य होते हैं जिन्हें चार पुरुषार्थ कहा गया है धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। काम का भव्य रूप जीवन है और अभद्र रूप मृत्यु है। जो मनुष्य अपना जीवन जीने के क्रम में धर्म पुरुषार्थ की अवहेलना करते हैं। वे ही काम के वशीभूत हो जाते हैं। मुश्किल में फँसते हैं और दूसरों को तबाह करते हैं।”7
शिवानी और यति के संबंध अब धीरे - धीरे सुधरने लगे थे। वे कुछ समय भी एक साथ मधुर बातों में व्यतीत करने लगे थे। यति ने शिवानी से माफी भी माँगी किंतु आज का यति पहले के यति से शिवानी की ही तरह परिवर्तित हो चुका था। अब वह यति पहले की तरह शिवानी पर भूखे शेर की तरह नहीं झपटता था, बल्कि उसमें तो अब वे भाव शिवानी के लिए जागृत ही नहीं होते थे । वह शिवानी से सच्चा प्रेम करता था। उसका जीवन को जीने का नजरिया परिवर्तित हो चुका था। इसकी पुष्टि उसके द्वारा उसके द्वारा दिए गए भाषण की इन पंक्तियों से भी होती है कि - “अपने अनुभवों के आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर आया कि भोग से इंद्रियां शांत नहीं होंगी। संयम और त्याग से ही मनुष्य मनुष्योचित कार्य करता है। दूसरों के लिए दो पल जीता है, दूसरों के लिए एक मुट्ठी छोड़ता है, उसे शांति मिलती है, सुख मिलता है, जीवन का आनंद मिलता है।”8 इस प्रकार भोग के स्थान पर संयम को जीवन में आत्मसात करने के कारण यति के जीवन में आमूलचूल परिवर्तन घटित होता है। फलतः सभी एक दूसरे से प्रेम से मिलते हैं और - “फिर एक बार सब की हँसी उभरी और आँखें भीग आई। मानो भादो मास की कड़ी धूप में बारिश की फुहार हो। अतिशय उमस में निकली हल्की सी बायर।”9 यहाँ पर रचना की समाप्ति होती है।
इस प्रकार रचना में पौराणिक कथा को आधुनिक परिवेश में रच कर यह बताया गया है कि प्रत्येक वस्तु की अति बुरी होती है। जीवन में भोग के स्थान पर संयम को महत्व देना चाहिए। इससे जीवन विकृत नहीं होता है। आज के समय में यह रचना अपने इसी मंतव्य के कारण और भी प्रासंगिक हो जाती है कि संयम ही जीवन का मूलाधार है और इसके अभाव में जीवन का क्षरण प्रारंभ हो जाता है। कहना अनावश्यक न होगा कि संयम रूपी प्रवृत्ति के ह्रास से ही आज सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनैतिक इत्यादि क्षेत्रों में मूल्यों का ह्रास द्रुतगति से हो रहा है। यदि इसी प्रकार संयम के स्थान पर भोग की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में घनघोर अराजकता व्याप्त हो जाएगी। विश्व में बढ़ती भोगवादी प्रवृत्ति के फलस्वरूप ही आज वायु दूषित तो जल प्रदूषित होता जा रहा है। बाढ़, अकाल, सूखा, बादल फटने, बलात्कार, यौन-हिंसा और जालसाजी जैसी घटनाएँ आम हो गई हैं। ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से तो संपूर्ण विश्व ही आक्रांत है। ऐसे में अतिशय उपन्यास में अभिव्यक्त संयम रूपी स्वर को सुनने और आत्मसात करने की आवश्यकता है। क्योंकि भोग चाहे कामरूपी हो या लालसारूपी, वह विकृति को जन्म देता ही है। इसलिए यह आवश्यक है कि भोग का समावेश जीवन में संयम के निकष पर ही हो।

संदर्भ ग्रंथ सूची –
1. मृदुला सिन्हा (2003), अतिशय, प्रतिभा प्रतिष्ठान, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या – 88
2. मृदुला सिन्हा (2003), अतिशय, प्रतिभा प्रतिष्ठान, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या – 94
3. मृदुला सिन्हा (2003), अतिशय, प्रतिभा प्रतिष्ठान, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या – 115
4. मृदुला सिन्हा (2003), अतिशय, प्रतिभा प्रतिष्ठान, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या – 134
5. मृदुला सिन्हा (2003), अतिशय, प्रतिभा प्रतिष्ठान, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या – 137
6. मृदुला सिन्हा (2003), अतिशय, प्रतिभा प्रतिष्ठान, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या – 147
7. मृदुला सिन्हा (2003), अतिशय, प्रतिभा प्रतिष्ठान, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या – 201
8. मृदुला सिन्हा (2003), अतिशय, प्रतिभा प्रतिष्ठान, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या – 483
9. मृदुला सिन्हा (2003), अतिशय, प्रतिभा प्रतिष्ठान, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या – 498

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