भाषायी विसंगति: राजनैतिक उपाय ‘दान’ या ‘दाम’

डॉ. धनंजय कुमार मिश्र

- धनंजय कुमार मिश्र

अध्यक्ष संस्कृत विभाग, संताल परगना महाविद्यालय, सिदो-कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय दुमका-814101 (झारखण्ड) चलभाष: +91 993 965 8233

“वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थ प्रतिपत्तये।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वती-परमेश्वरौ॥”

महाकवि कालिदास कृत यह श्लोक न केवल संसार के माता-पिता शिव-पार्वती विषयक मंगलाचरण है अपितु शब्द और उसके अर्थ के माहात्म्य को भी प्रकाशित करता है। बिना अर्थ के शब्द का कोई अस्तित्त्व नहीं और अलग-अलग उनकी कल्पना भी बेकार है। शब्द अपने अर्थ को प्रकाशित करते हैं।

आज-कल विश्व की अधिकांश भाषाओं में ऐसे शब्दों का प्रचलन होने लगा है जो अपने अर्थ के प्रकाशन में असमर्थ हैं। इस विसंगति के कारण प्रयोग में प्रमाद होने की संभावना प्रबल हो जाती है।

भाषा वैज्ञानिक कहते हैं कि परिवर्तन सृष्टि का शाश्वत नियम है। सारा संसार क्षण-क्षण परिवर्तित हो रहा है अतएव भाषा के विभिन्न रूपों में बदलाव लाज़मी है। यह विकार या बदलाव ध्वनि, रूप, अर्थ आदि समस्त अंगों में हो सकता है। उच्चारण सौंदर्य या प्रयत्न लाघव इसका प्रमुख कारण है। प्रयत्न लाघव के कई स्तर इस कार्य में साधक होते हैं। यथा - आगम, लोप, विकार, विपर्यय, समीकरण, विषमीकरण, स्वरभक्ति, समाक्षर-लोप, महाप्राणीकरण, अल्पप्राणीकरण, घोषीकरण, अघोषीकरण, अनुनासिकीकरण आदि। साथ ही बल, भावातिरेक और अपूर्ण अनुकरण भी शब्द की ध्वनियों को बदल डालते हैं। इस स्थिति में प्राचीन मूल शब्दों के सत्यासत्य का प्रश्न उठ खड़ा होता है और स्थिति तब किंकर्तव्यविमूढ़ता की हो जाती है और हमारी शंका का समाधान हमारे आर्ष ग्रन्थ ही करते हैं।

ऐसी ही स्थिति आजकल राजनैतिक उपाय में कथित सामादि के प्रसंग में भी हो गयी है। राजनैतिक एवं प्रशासनिक चर्चा के क्रम में इन उपायों का नाम लिया जाता है। कोई कहते हैं - साम, दान, दण्ड, भेद तो अनायास ही दूसरा कह उठता है न न, साम-दाम-दण्ड-भेद। दोनों अपने-अपने मत पर अडिग दीखते हैं। कुछ इस चर्चा का आनन्द लेते हैं। अपना तर्क प्रस्तुत करते हैं। महाविद्यालय-विश्वविद्यालय में इस स्वस्थ चर्चा का होना हमें भी ग्रन्थ-उदधि में डुबकी लगाने का मौका देता है।

आइए हम चलें अपने मूल की ओर क्योंकि यह शुद्ध भारतीय उपाय है। हिन्दी साहित्य के सार्वकालिक और सार्वदेशिक महाकवि, भक्तशिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास अपने ‘रामचरितमानस’ महाकाव्य में बालिपुत्र अंगद के मुख से कहते हैं - साम दान अरू दंड बिभेदा। नृप उर बसहिं नाथ कह बेदा॥ अर्थात् हे नाथ! साम, दान, दण्ड और भेद राजा के हृदय में निवास करते हैं, ऐसा विद्वान कहते हैं।

नीतिशास्त्रों में शत्रु को वश में करने के चार उपाय कहे हैं- साम, दान, भेद और दण्ड। साम प्रथम उपाय है और दण्ड चतुर्थ एवं अन्तिम उपाय। उत्तम प्रकृति के शत्रु के साथ साम का प्रयोग किया जाता है। मध्यम के साथ दान का, अधम के साथ भेद का और अधमाधम के साथ दण्ड का प्रयोग किया जाता है। इसी बात को महाकवि माघ (650ई0) ने अपने शिशुपालवधम् महाकाव्य में कहा- “चतुर्थोपायसाध्ये तु रिपौ सान्त्वमपक्रिया।” (2/54) अर्थात् - चौथे उपाय (दण्ड) से वश में आने वाले शत्रु के विषय में साम (शान्ति) का प्रयोग अपकार स्वरूप होता है।

यद्यपि राजनीति के एक से एक अपूर्व ग्रन्थ संस्कृत भाषा में पाये जाते हैं तथापि पण्डित विष्णुशर्मा रचित पंचतन्त्र परम प्रसिद्ध है क्योंकि उस ग्रन्थ में नीतिकथा उत्तम प्रणाली से लिखी गयी हे जिससे पढ़ने में रूचि और समझने में सुगमता होती है। यह संस्कृत साहित्य का अत्यन्त समादरणीय ग्रन्थ है। समस्त संसार में इसकी महती प्रसिद्धि है। विश्व की अनेक भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है। अरबी, फारसी, अंग्रेजी, हिन्दी आदि भाषाओं में इसका अनुवाद आसानी से उपलब्ध है। नारायण पण्डित ने पंचतन्त्र तथा अन्य नीति ग्रन्थों से हितोपदेश नामक एक नवीन ग्रन्थ संगृहीत करके प्रकाशित किया जो पंचतन्त्र की अपेक्षा अत्यन्त सरल और सुगम है। विद्वानों ने हितोपदेश को यथा नाम तथा गुणाः कह कर भारतवर्षीय शिक्षा विभाग में प्रचारित किया है। हितोपदेश में भी प्रसंगानुसार सामादि की चर्चा की गयी है। हितोपदेश के तृतीय भाग ‘विग्रह’ में कहा गया है, “साम्ना दानेन भेदेन समस्तैरथवा पृथक्। साधितुं प्रयतेतारीन्न युद्धेन कदाचन॥”(3/40) अर्थात् प्रथमतः मीठे वचन से, धन देकर और तोड़-फोड़ करके इन तीनों से एक साथ अथवा अलग-अलग शत्रुओं को वश में करने के लिए यत्न करना चाहिये पर युद्ध से शत्रु को कभी भी वश में करने का यत्न नहीं करना चाहिये। तात्पर्य है कि मनुष्य को पहले साम, दान और भेद नामक उपाय का प्रयोग करना चाहिये। दण्ड का प्रयोग सदैव अन्तिम रूप से समस्त विकल्प के बन्द हो जाने पर ही करना चाहिए।

आदिकाव्य रामायण में आदिकवि महर्षि वाल्मीकि ने भी इन राजनैतिक उपायों की तरफ संकेत करते हुए कहा -
 त्रीनुपायानतिक्रम्य चतुर्थ इह दृश्यते। (5/41/2)
 न साम रक्षस्सु गुणाय कल्पते, न दानमर्थोपचितेषु युज्यते,
 न भेदसाध्या बलदर्पिता जनाः पराक्रमस्त्वेष ममेह रोचते॥ (5/41/3)

मनुस्मृति में आचार्य मनु इन उपायों को उद्घाटित करते हुए कहते हैं -
सामदीनामुपायानां चतुर्णामपि पण्डितः।
सामदण्डौ प्रशंसन्ति नित्यं राष्ट्राभिवृद्धये॥ (7/109)
साम्ना दानेन भेदेन समस्तैरथवा पृथक्।
विजेतुं प्रयतेतारीन्न युद्धेन कदाचन॥ (7/188)

अर्थशास्त्र के प्रणेता आचार्य कौटिल्य (विष्णुगुप्त, चाणक्य) ने अपने अर्थशास्त्र के नवम अधिकरण में इसे अत्यन्त सूक्ष्मता से प्रतिपादित किया है। वे कहते हैं -
 “शत्रोः शंकितामात्येषु सान्त्वं प्रयुक्तं शेष प्रयोगं निवर्तयति।
 दूष्यामात्येषु दानम्। संघातेषु भेदः। शक्तिमत्सु दण्ड इति।”

अर्थात् अपने जिन अमात्यों पर शत्रु संदेह करता है उन सभी उपायों का निवारण कर देता है। इसी प्रकार शत्रु के दूष्य अमात्यों में भेद और शक्तिमान अमात्यों में दण्ड का प्रयोग शेष सभी उपायों को निवृत कर देता है। आचार्य कौटिल्य आगे कहते हैं -
“तासां सिद्धिः पुत्रभ्रातृबन्धुषु सामदानाभ्यां सिद्धिरनुरूपा, पौरजानपददण्डमुख्येषु दानभेदाभ्यां, सामन्ताटविकेषु भेददण्डाभ्याम्।”

अर्थात् पुत्र, भाई और बन्धु-बांधवों के सम्बन्ध में साम तथा दान के अनुरूप प्रतीकार करना हीं उचित समझा गया है। इसी प्रकार नागरिकों, जनपदवासियों, सैनिकों और राष्ट्र के प्रमुख व्यक्तियों के विषय में दान तथा भेद उपायों का प्रयोग करना ही उचित है। सामन्त और आटविकों के सम्बन्ध में भेद और दण्ड के उपायों का प्रयोग उचित है।
“एषाऽनुलोमो विपर्यये प्रतिलोमा। मित्रामित्रेषु व्यामिश्रा सिद्धिः। परस्परसाधका ह्युपायाः।”
 आचार्य कहते हैं कि इस रीति से किया गया प्रतीकार ‘अनुलोम’ कहलाता है और इसके विपरीत होने पर प्रतिलोम कहा जाता है। मित्र और शत्रुओं के विषय में आवश्यकतानुसार व्यामिश्र (मिले-जुले) अपायों द्वारा प्रतीकार करना चाहिए क्योंकि सभी उपाय परस्पर एक दूसरे के सहायक ही होते हैं।
“तेषामेकयोगाश्चत्वारस्त्रियोगाश्च, द्वियोगाः षट्, एकश्चतुर्योग इति पञ्चदशोपायाः। तावन्तः प्रतिलोमाः।”

सामादि चारों उपायों को अलग-अलग, दो-दो, तीन-तीन या चार-चार एक साथ मिलाकर पन्द्रह तरह से प्रयोग में लाया जा सकता है। जैसे - साम, दान, भेद, दण्ड, सामदान, सामभेद, सामदण्ड, दानभेद, दानदण्ड, भेददण्ड, सामदानभेद, सामदानदण्ड, सामभेददण्ड, दानभेददण्ड, सामदानभेददण्ड। पन्द्रह प्रकार के प्रतिलोम उपाय भी होते हैं - दण्ड, भेद, दान, साम, दण्डभेद, दण्डदान, दण्डसाम, भेददान, भेदसाम, दानसाम, दण्डभेददान, दण्डभेदसाम, भेददानसाम, दण्डदानसाम, दण्डभेददानसाम। उक्त उपायों में से एक ही उपाय के द्वारा जो कार्यसिद्धि होती है उसे एकसिद्धिः कहते हैं। इसी प्रकार दो उपायों से हुई सिद्धि को द्विसिद्धिः, तीन उपायों से हुई सिद्धि त्रिसिद्धिः और चार उपायों से हुई सिद्धि को चतुःसिद्धिः कहते हैं। इन सिद्धियों के प्रतीकारस्वरूप होने वाले अनेक लाभों में से धर्म, काम और अर्थ का साधक होने के कारण अर्थ-लाभ ही सर्वश्रेष्ठ होता है, उसी को सर्वार्थसिद्धिः के नाम से कहा जाता है। आचार्य के शब्दों में “धर्ममूलत्वात्कामफलत्वाच्चार्थस्य धर्मार्थकामानुबन्धा याऽर्थस्यसिद्धिः सा सर्वार्थसिद्धिः।”

इसी प्रकार पंचतन्त्र, अमरूकशतक, महाभारत आदि ग्रन्थों में भी प्रसंगानुसार राजनैतिक उपायों की चर्चा के प्रसंग में साम, दान, भेद और दण्ड का उल्लेख मिलता है। संस्कृत के प्रसिद्ध टीकाकार आचार्य मल्लिनाथ भी दानम् को ही द्वितीय उपाय मानते हैं। संस्कृत भाषा के ग्रन्थों में तो दानम् ही प्राप्त होता है।

अमर कोश एवं संस्कृत-हिन्दी शब्द कोश में भी द्वितीय राजनैतिक उपाय के रूप में दानम् ही मिलता है। प्रश्न उठता है कि कुछ लोग दान के जगह पर दाम क्यों कहते हैं? इस पर विचार करने से पूर्व चारों शब्दों के अर्थ पर विचार करना उचित होगा। प्राचीन ग्रन्थों में प्रयुक्त चारों राजनैतिक उपाय का अर्थ इस प्रकार है -
1. सामन् = शान्ति के उपाय, समझौता-वार्ता, सुलह करना, खुश करना, शान्त करना। (सो + मनिन्)
2. दानम् = समर्पण, रिश्वत, घूस, पुरस्कार, उपहार, उदारता। (दा + ल्युट्)
3. भेदः = फूट डालना।
4. दण्डः = सजा देना।

 इनके अतिरिक्त तीन और उपाय हैं जो भारतीय राजनीति में निकृष्ट उपाय कहे गये हैं -
1. माया =धोखा।
2. उपेक्षा = अवहेलना, दाँव-पेंच।
3. इन्द्रजाल = जादू-टोना करना।

 दान के जगह पर दाम का प्रयोग आाधुनिक प्रवृति है। तुलसी की चौपाई में “साम दान अरू दण्ड बिभेदा” का भाषावैज्ञानिक कारणों से कुछ लोग “साम दाम अरू दण्ड विभेदा” प्रयोग करने लगे। मूल ग्रन्थ को न देखने की आदत ने इसे बल दिया। दान का अर्थ संकोच हो गया। हिन्दी में प्रयुक्त विदेशज शब्द दाम अर्थात् मूल्य या कीमत अर्थ से भाव साम्य के कारण हिन्दी के आधुनिक शब्दकोष में भी यह शब्द आ गया है। आधुनिक आलोचकों, लेखकों एवं इतिहासकारों ने भी भूलवश दाम प्रयोग को स्वीकार कर लिया।

कहीं-कहीं प्रभावशाली एवं लोकप्रिय वाक्यों में पाठान्तर भी स्वाभाविक है। पाठान्तर चेष्टित या अचेष्टित हुआ करती है। कभी-कभी पाण्डुलिपियों के गलत पढ़ने से, प्रतिलिपिकरण या अनुलिपि से भी पाठान्तर हो जाते हैं। प्रसिद्ध वाक्यों, ग्रन्थों में पाठान्तर देखे गए हैं। दानम् के स्थान पर दाम हो जाने का यह भी एक कारण हो सकता है।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि जब प्राचीन भारतीय राजनैतिक उपाय की बात हो तो साम, दान, भेद और दण्ड ही प्रयुक्त है और इसी क्रम में प्रयुक्त है। दान के स्थान पर दाम प्रयोग संस्कृत की अवहेलना या संस्कृत की अल्पज्ञता का प्रमाण है। निश्चय ही संस्कृत के मूल ग्रन्थ रत्नों का अवलोकन ऐसे विषयों में हमारा पाथेय है।

 इति शुभम्॥


सहायक ग्रन्थ

1. रघुवंशम् - कालिदासकृत
2. रामचरितमानस - गोस्वामी तुलसीदासकृत
3. अर्थशास्त्र - आचार्यकौटिल्यकृत
4. शिशुपालवधम् - कविमाघ
5. तुलनात्मक भाषाशास्त्र - डॉ मंगलदेव शास्त्री
6. काव्यादर्श - आचार्य दण्डी
7. .निरूक्त - महर्षि यास्क
8. पाणिनीय शिक्षा - आचार्य पाणिनि
9. भाषा विज्ञान - डॉ कर्ण सिंह
10. भाषा विज्ञान की भूमिका - आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा
11. भाषा विज्ञान - डॉ भोला नाथ तिवारी
12. भाषा विज्ञान कोश - डॉ भोला नाथ तिवारी
13. .भारतीय भाषा विज्ञान - आचार्य किशोरीदास वाजपेयी
14. मुग्धबोध भाषा विज्ञान - डॉ रामेश्वर दयालु
15. सामान्य भाषा विज्ञान - डॉ बाबू राम सक्सेना
16. भाषा विज्ञान - डॉ श्याम सुन्दर दास
17. भाषा विज्ञान: सिद्धान्त और प्रयोग - डॉ अम्बा प्रसाद सुमन
18. वाक्यपदीय - भर्तृहरि
19. भारतीय भाषाशास्त्रीय चिन्तन - डॉ पुष्पेन्द्र कुमार
20. भाषा सन्दर्भ और साहित्य - राधा कृष्ण सहाय
21. भाषा-विज्ञान एवं भाषा-शास्त्र - डॉ कपिलदेव द्विवेदी
22. महाभारत - व्यासकृत
23. शिशुपालवधम् टीका - मल्लिनाथ कृत।
24. मनुस्मृति - महर्षि मनु
25. पंचतन्त्र - आचार्य विष्णुशर्मा
26. अमरूकशतक - कवि अमरूक
27. अमरकोश - अमर सिेह
28. संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश - वामन शिवराम आप्टे
29. मेगा हिन्दी शब्दकोष - आबिद रिजवी
30. अर्थशास्त्र ऑफ कौटिल्या एण्ड द चाणक्य सूत्र - सम्पादक वाचस्पति गैरोला
31. कौटिलीय अर्थशास्त्र - सम्पादक महामहोपाध्याय गणपति शास्त्री।
32. रामायण - श्रीमद्वाल्मीकि कृत।
33. हितोपदेश - नारायण पण्डित संगृहीत।

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