काव्य: प्रीति गोविन्दराज

प्रीति गोविन्दराज
प्रांतीयता

सरल नहीं रहा होगा अहिंसा-प्रचार 
महात्मा, इस चमत्कार का रहस्य बताओ 
जहां प्रकृति एवं प्रवृति, क्रिया का उत्तर 
प्रतिक्रिया से देती रही-कैसे रुकी, समझाओ?
अश्रुधार, दया या रक्त बहाव नहीं 
शब्दों के कुएँ में मची, हाहाकार नहीं 
मूक-संवेदना, विनीत-हृदय चेतन 
ऐसी उच्च कोटि का त्याग समझ आता नहीं!
जटिल है इस प्रकार इंद्रियों पर वश
प्रहार का उत्तर, सौम्य से देना 
धैर्य और शांति का सार्थक संदेश---
अपने जीवन-प्राण, निर्भीक होकर देना। 
जनता निःसंकोच पूजती थी आपको 
क्षण में कूद पड़ते थे क्रांति को,
उपदेश-प्रभाव इतना अद्भुत
जुड़े पृथक राज्य, बनाने इस विराट राष्ट्र को।
जब शत्रु दास बनाकर स्वदेश को 
क्रूर-अन्याय से करता था शोषण,
तब भाईचारे के अनदेखे मशाल जला 
स्वतंत्रता-पथ किया, आपने पल में रौशन!
धन्य हो महात्मा, स्वाभिमान-परिचय 
आपके माध्यम से पहुँचा घर-घर तक
जो प्रांतीयता थी, सोचा क्रांति-अग्नि में स्वाहा हुई 
किन्तु वर्षों बाद भी खौलता है अब तक!
ये विनाशकारी प्रवृति मनुज को 
जलाकर भस्म करती है 
कब से, और जाने करती रहेगी कब तक?
***


चिट्ठी (गीत)

चार दिन, संग उनके जो ठहर गई 
प्रीत-साँचे में उनके, मैं उतर गई!

शहर में जो नौकरी उनकी लगी 
मन में खुशी पेंग भरने लगी 
खनखन चूडी की लय पर,
बेकल सजनी, तड़पने लगी।
वो आगे बढ़े, मैं ठहर गई!

कहते थे वे, बंद किवाड़ों में 
नैनों से धारा बहाना मत,
लोग मिले मेले में, मंडी में 
पूछें कुछ, तो शर्माना मत!
बैन कैसे मेरे, मुझे बिसर गई!
  
सखी-महतारी सब छूटे 
कासे कहूँ, पीड़ा अपनी,
गहना, रंग-चूनर रूठे  
काहे सजाऊँ काया अपनी?
सिंगार दुख में मेरे, सिधर गई!

दिन पर दिन का उपल रखते
आँचल नित नीर पोंछते,
उमस, बादल दिसा बदले
मंद पवन की बाट देखते। 
आते-आते सावन भी मुकर गई!

डाकिया भैया करे है देर 
रोज ये आस-निरास का खेल 
गूंगी अंगना की सूनी बेल 
आज की प्यास भी गई झेल। 
जमी आस पल में, फिर बिखर गई!

अब आई है कागज मतवारी 
काले आखर का उपहार लिए,
एक माह के दुख-दर्द को 
सोखने का जादू लिए!
उनकी चिट्ठी मिली, मैं निखर गई 
चार दिन संग उनके जो ठहर गई।
प्रीत-साँचे में उनके मैं उतर गई!
***


पर्दे हटाओ (गीत)

कौन वहाँ हँसती रहती है, मन आँगन के पर्दे हटाओ 
पुरानी सखी-सी लगती है, सोचो मत, बस हाथ बढ़ाओ!

अपनी ही लय में झूमती, परवाह किसी की न करती
संगीत सागर में डूबी-सी, सुर में जो बहती रहती 
हवा भी हुम्म-हुमम करती है, लहरों नयी धुन तुम गाओ!
सोचो मत, बस हाथ बढ़ाओ!

है उस पार क्या जादू नगरी, बादल रथ पर चढ़ पूछती, 
चाहे बस चाँद की जिगरी, तारों से अब बात न करती 
मुझे रौनक भली लगती है, गगन मेरी छत बन जाओ!
सोचो मत, बस हाथ बढ़ाओ!

अंग में जिसकी क्यारी खिलती, तितली-सी वो उड़ती रहती 
नभ में संध्या पर्व मनाती, रंग यहाँ, कुछ वहाँ पर मलती, 
यूँ ही बस बैठी रहती है, छोड़ो काम, ज़रा घूम आओ!
सोचो मत, बस हाथ बढ़ाओ! 
***


 अनिष्ट घमंडी 

गुणसूत्र में गौण-सा अंतर
सूक्ष्म इतना, परिकल्पना से सूक्ष्म और,
फूंके पल में दुगना चौगुना यह मंतर
पहाड़ों-सा फिर फैले चारों ओर!
समझे क्या कोई मन इसका
मिलता, छिलता फिर बदलता,
सतह पर दिखे न, खुफ़िया द्रोही
कभी सकारण आए, कभी यूँ ही।
भीतर व्यस्त कारखाने चलाए,
पर शोर करे ज़रा नहीं!
अचानक चौंकाये शिराओं को
लसिका ग्रंथ को, या बने दर्द जोड़ों में
ये है ज्ञानी, किंतु समझाये शून्य
दे दंड, सबको कोडों में l
कभी प्रत्यक्ष सूजन बन रूठे
कभी खांसी की ज़िद न टूटे।
रंग रूप इसके नित निराले
अंग भद्दा, जटा घुंघराले।
विषैला कर्क ये रोग
आवश्यकता से बढ़कर है वक्र
जाने कुटिल ही नीति
तीक्ष्ण आरे-युक्त ये चक्र!
कभी सोये वर्षों चुपचाप,
अष्ठभुज केकड़ा सहसा दबोचे
ये करुणा, पीड़ की क्या सोचे?
वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं खोजें
एक रोकथाम, एक उपचार;
शताब्दी श्रम में कुछ मिला फल,
बस एक-तिहाई हुआ संहार। 
दैत्य रूपी शत्रु का चमत्कार
क्षणों में बदले रूप-आकार!
स्तन से काटूँ तो मस्तिष्क में फले
मैरो बदलूँ तो लड़ाकर भाई चले!
सर्जरी, हॉर्मोन, कीमो, या रेडियो
इस बहरूपिये पर निष्फल हर प्रहार!
तू ठहर तेरी चालाकी बंद  करती हूँ अभी,
ये संघर्ष इतना आसान न था कभी।
कैंसर तुम में कूट भर गया अभिमान,
एक दिन तुम्हें वश में कर ही लेंगे,
प्रभु इस केकड़े को क्यों दिया वरदान?
अब आशीर्वाद दो, हो सफल मनु-अनुसंधान।
असाध्य को साध्य करना है,
अनिष्ट घमंडी को अब भस्म करना है!
***

विश्व हिंदी सचिवालय की कहानी प्रतियोगिता 2019 में अमेरिका क्षेत्र में प्रथम स्थान पाने वाली प्रीति गोविन्दराज वर्जीनिया में रहती हैं। यवसाय से वे कैंसर नर्स हैं और कई वर्षों से हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी में मूलत: कविताएँ और कहानियाँ लिख रही हैं। उन्होंने अपने कुछ संस्मरण भी कहानियों के रूप में लिखे हैं।

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