कहानी: एक मोड़ पर


हिमांशु पाठक

ए-36, जज-फार्म, छोटी मुखानी, हल्द्वानी-263139, जिला-नैनीताल, उत्तराखण्ड
समय गतिशील एवं परिवर्तनशील है साहब। कब प्रतीक्षा करता है यह किसी के लिये। आज, अभी और यही पल ही तो हमारा है। बाकी तो यादें व सपने हैं। बीत गया तो यादें एवं आने वाला हो तो सपने, दोनों ही पानी के बुलबुले... जिनके लिये हम खो देते हैं इस समय को जो आज हमारा है। यूँ ही कुटिलताओं, राग-द्वेष, निंदा-स्तुति, और लड़ने-झगड़ने में, और फिर रूठकर चले जाया करते हैं दूर अपनों से। हम क्यों करते हैं ऐसा?

शब्द ही तो हर व हरि भी। ये शब्द जीवन देते भी हैं और जीवन लेते भी। पर इतना तो तय है साहिब कि ये शब्द जिस पर प्रयोग होते हैं, न उसे छोड़ते है और न ही उसे, जो इनका प्रयोग करता है। शब्दों का प्रयोग हमेशा होठ ही करें ये जरूरी नहीं कभी-कभी तो आँखे भी शब्दों का उपयोग कर लेती हैं और कभी-कभी मन व धड़कन भी।

जैसा मैंने पहले भी कहा था, कि समय परिवर्तनशील हैं व गतिशील भी। यह कब आता है, कब जाता है, पता ही नहीं चलता। परन्तु इतना जरूर है कि यह अपने साथ बहुत कुछ ले भी जाता है और हमें बहुत कुछ दे भी जाता है। यादों के रूप में यह आँसू या मुस्कान दे जाता है या फिर एक अहसास व पश्चाताप कि काश हम जी लेते वह पल, पकड़ लेते उन पलों को तितलियों की तरह व सहेज लेते इन्हें अपने पास हमेशा हमेशा के लिये अपनी बंद मुट्ठियों में अच्छी या बुरी यादों के रूप में। 

'एक मोड़ पर', मेरी ये कृति भी आधारित है बीते हुये समय की कुछ यादों पर। यादें भी हवा के उस झोंके की तरह होती हैं, जो मन को कुछ समय के लिये ही सही प्रफुल्लित कर देती हैं, और ले जाती हैं कल्पनाओं के शीतल छाँव में यथार्थ की तपिश से दूर। जहाँ मन आनन्द की अनुभूति करता है। ऐसी ही एक स्मृति जो मन मस्तिष्क में रच बस गयी हैं हमेशा के लिऐ, जो शुरू भी हुई एक मोड़ पर और खत्म भी हुई एक मोड़ पर।

आइये चलते हैं आप और हम अतीत के उस सफर में जिसकी शुरूआत हुई थी आज से करीब बीस साल पहले हरी-भरी वादियों से गुजरती हुई सर्पाकार सड़क पर हरी-भरी पर्वत शृंखलाएँ मन को लुभा रहीं थी हरे-भरे वृक्ष जैसे बाँहें फैलाकर हमारा स्वागत कर रही थी और सड़क के अनगिनत मोड़ों से गुजरते हुये मैं अपने एक दोस्त जिसका, नाम अमित था के साथ घूमने के लिये देहरादून से मंसूरी जा रहा था। जून का महिना आसमाँन बादलों से आच्छादित था। पर्वत और बादलों का मिलन, बड़ा ही मनोरम दृश्य था। बस देहरादून से विदा लेकर मंसूरी से मिलने के लिये तेजी से आगे को बढ़ रही थी। मैं और अमित बस की आगे की सीट पर बैठे थे। हम लोगो की बातें चल रही थी। एक मोड़ पर अचानक बस एकदम से रूकी। हम लोगों ने बड़ी मुश्किल से स्वयं को संभाला, क्योंकि झटका जो लगा था। एक कार जो बस को ओवरटेक कर रही थी, अचानक बस के सामने आ गई। किस्मत सबकी अच्छी थी कि कार हल्की सी ही बस से टकराई। हम बस से नीचे उतरे और कार की ओर बढ़े। कार को एक पच्चीस-तीस साल की कोई युवती चला रही थी। हमने पहले उसे कार से बाहर निकाला फिर पास में ही स्थित एक छोटी दुकान की बेंच पर बैठाया। मैं दुकान से पानी की बोतल ले आया व उसके घावों को पानी से धोया, भगवान का शुक्र था कि चोट ज्यादा नहीं लगी थी। पहले उसने स्वयं को संभाला, फिर अपनी गाड़ी को देखा जो बाहर से थोड़ी सी खरोंच खायी हुई थी। अमित ने गाड़ी को चैक किया और गाड़ी स्टार्ट हो गयी। हमने उसको पानी पीने को दिया। अब वह थोड़ी सी आराम महसूस कर रही थी। हम बस की ओर जाने के लिये ज्यूँ ही मुड़े, तो अचानक पीछे से आवाज आई “ऐक्सक्यूज मी” हमने पीछे मुड़कर के देखा तो वह बोली, “मैं भी मंसूरी ही जा रही हूँ,परन्तु मुझे अभी कार चलाने में घबराहट महसूस हो रही है। यदि आप में से कोई एक मेरे साथ मंसूरी तक चल सके तो मैं आपका यह उपकार उम्र-भर याद रखूँगी। सब एक-दूसरे को देखने लगे। वह सभी को आशा भरी नजरों से देख रही थी। जब हर नजर में उसको निराशा दिखाई देने लगी तो उसने अंत में हमारी ओर देखा। मैंने अमित की तरफ देखा। अमित और मैंने ये निश्चय किया कि हमें उसकी सहायता करनी चाहिये। मैंने अमित से कहा कि तू उस लड़की के साथ कार में चले जाये और मैं बस में चला जाता हूँ। मैंने उससे कहा कि मैं उसे यानि अमित को मंसूरी में मिल जाऊँगा। और यह कहकर मैं बस की ओर जाने लगा और अमित उस लड़की के साथ कार में, परन्तु उसने अमित के साथ जाने से मना कर दिया और अमित की जगह मेरे साथ जाने की इच्छा सब के सामने जता दी। हालांकि ये सब कुछ तो मेरी भी समझ से परे था, कि उसने ऐसा क्यों किया? परन्तु स्थिति को भाँपते हुये मैंने भी लड़की के साथ कार में जाने की अपनी स्वीकृति दे दी। इस तरह अमित तो बस में चला गया और मैं उस युवती के साथ कार में चल दिया मंसूरी के लिये।

मैं कार की पिछली सीट में बैठकर चुपचाप खिड़की के बाहर पहाड़ों की खूबसूरती को निहार रहा था। हल्की-हल्की बूँदाबांदी शुरू होने लगी थी। ठंड सी महसूस हो रही थी। मैं सोच रहा था कि काश थोड़ी देर रूक कर थोड़ी-थोड़ी चाय पी लेते। थोड़ी ठंड से राहत तो मिलती। अचानक शहद सी घुलती आवाज मेरे कानों में पड़ी “चाय पियेंगे आप”? मैंने कहा “जी ये तो जैसे आपने मेरे मन की बात छीन ली।” “नेकी और पूछ-पूछ”। कार को एक किनारे पर खड़ी कर,हम एक दुकान की ओर बढ़ने लगे तो वह अचानक लड़खड़ाई। मैंने उसका हाथ थामते हुये कहा “संभल कर” वह भी मेरा हाथ थामते हुये मुस्कुराई, आँखें एक-दूसरे से टकरा करके स्थिर हो गयीं। मैं अपलक देखता रह गया... उसका चेहरा, आकर्षक नीली आँखें, गोरा रंग, मधुमय मुस्कान मानो कोई परी धरती पर उतर आई हो। 

खैर, वह मेरा सहारा ले कर आगे बढ़ी। उसके पैर में हल्की सी तकलीफ थी शायद। मेरा सहारा लेते हुये वह और मैं दुकान के भीतर चले गये। दुकान पुराने समय की थी। लाल टीन की छत, मिट्टी व पत्थर की दीवारें। दीवारों में कुछ तस्वीरें लगी हुई थी। लकड़ी की कुछ बेंचें करीने से लगी हुई थी।

हम दोनों भी एक बेंच में बैठ गये और दो चाय का कह कर हम चाय की प्रतीक्षा करने लगे।

वह मुझे अनवरत देख कर मुस्कुराये जा रही थी और मैं उसके यूँ मुस्कुराने से झेंप रहा था। वह मुस्कुराते हुये बोली “बिल्कुल भी नहीं बदला बबलू तू, जैसा बचपन में था अब भी वैसा ही है”। मैं अब तक कुछ समझ नहीं पा रहा था। एक तो मेरे बचपन का नाम जो काफी कम लोग जानते हैं इसको कैसे पता, दूसरा ‘तू’ का सम्बोधन वह भी पहली मुलाकात और जब कोई परिचय भी नहीं।

आश्चर्य व विस्मय मिश्रित भरे मेरे चेहरे को देख वह शरारतपूर्ण निगाहों से मुझे देखकर खिलखिलाने लगी।

मैंने आश्चर्यचकित होते हुये जैसे ही कुछ कहना चाहा तभी वह बोली, “चौंक मत, मैं प्रत्युषा,जिसे तू पतरू कहकर चिढ़ाता था बचपन में”। 

“अरे पतरू तू”। मैं आश्चर्यमिश्रित खुशी के साथ चिल्लाया। हम दोनों ही लगभग पगला से गये थे थोड़ी देर के लिये। हम दोनों पहले जी भर के गले मिले। फिर थोड़ा सा सामान्य हुये।

वह पल भी बड़ा अजीब होता है, जब आपका बचपन पुनः एक बार फिर से लौट आता हैं आपके सामने कभी यादों के रूप में कभी बचपन के बिछुड़े हुये संगी के रूप में और खास तौर पर वह संगी, जो स्वर्ग से उतरी कोई अप्सरा हो, तो फिर आपको कहाँ किसी की सुध। यही स्थिति इस समय हम दोनों की भी थी, हम भीड़ के बीच बिल्कुल अकेले एक-दूसरे के साथ। भूल गये थे कि हमारे अगल-बगल में भी लोग हैं।

चाय वाले की आवाज से हम वापस वर्तमान में आये और सामान्य हुये आस-पास के लोग भी हम पर हँस रहे थे, परन्तु वह भी सामान्य हो गये। समझ जो गये थे कि थोड़ी देर को ही सही बच्चे जो बन गये थे। चाय की चुस्की का आनन्द लेते हुए मैंने प्रत्युषा से पूछा, “एक बात बता तूने मुझे पहचाना कैसे?”

“तू मेरा बचपन का प्यार जो है तो तुझे पहचानूँगी कैसे नही”। उसने चुटकी काटते हुये कहा”। फिर हँसते हुये बोली, “अरे पगले, अमित ने मुझे तेरे बारे में बताया”। मैं चौंका चाय हाथ से गिरते-गिरते बची और चौंकते हुये जोर से “क्या?”

प्रत्युषा बोली, “हाँ अमित ने”।

“अमित ने”! मैं लगभग चौंकते हुये बोला, “मतलब अमित और तू एक दूसरे को जानते हो”?

प्रत्युषा बोली, “हाँ अमित और मैं कॉलेज में साथ पढ़े हुये है। “

“एक दिन अमित और मेरे बीच ऐसे ही कॉलेज में बातचीत चल रही थी। तब मैंने ही अमित को अपने बचपन के बारे में बता रही थी उसमें तेरी भी चर्चा निकली।”  

“मेरी चर्चा” मैं फिर बोला प्रत्युषा बोली “हाँ असल में अमित मुझे प्रपोज करना चाह रहा था तो मैंने ही उसको बताया कि मैं बचपन से ही एक लड़के से प्यार करती आई हूँ। अमित को मेरे बारे में जानने की जिज्ञासा हुई तब मैंने अमित को अपने बचपन और तेरे बारे में बताया कि उसका नाम बबलू था वैसे उसके स्कूल का नाम हेमन्त था हेमन्त पाण्डे। तब अमित बोला मेरे एक मित्र का नाम भी हेमन्त पाण्डे है मैं ज्यादा तो उसके बारे में नहीं जानता पर हाँ बीच-बीच में कभी-कभार वह अल्मोड़ा के बारे में बात जरूर करता है। खासतौर पर अल्मोड़ा में रहने वाली अपनी बचपन की दोस्त के बारे में पर उसने कभी उसका नाम नहीं बताया। फिर मैंने उससे तेरे बारे में पूरी जानकारी ली जैसे बाबूजी का नाम, माँ के बारे में पूछा भाई-बहनों के बारे में पूछा फिर उसने तेरी फोटो दिखाई। उसके बाद मैंने घर जाकर तेरा फेसबुक प्रोफाईल चैक किया उसमें परिवार की फोटो से मैंने तुझे ढूँढ लिया था फिर तेरे बारे अमित को बताया कि तू वही बबलू है। अमित ने ही मुझे बताया था कि तू अगले महीने देहरादून आने वाला है। और आज तुम लोग मंसूरी घुमने बस से सुबह निकलने वाले हो और बस में बैठकर अमित ने ही मुझे बस की जानकारी व कहाँ पहूँचें हैं ये पूरा विवरण दे दिया था। बस, मैं कार लेकर मंसूरी को निकली और एक मोड़ पर कार को तुम लोगों की बस से टकरा दिया हल्की सी चोट थी तुम लोग बस की ओर बढ़ रहे थे तभी मैंने सहायता की गुहार की और तुझे अपनी कार में बैठा लिया। और इस तरह आज मैं और तू इस जगह मिले हैं।

यहाँ प्रत्युषा की बात पूरी हुई, वहाँ हमारी चाय भी पूरी हुई। फिर हम आगे की यात्रा पर निकलने के लिये अपनी कार की ओर बढ़ चले। बारिश भी थोड़ी सी हल्की हो गयी थी।

मुझे अब बचपन का वह शहर अल्मोड़ा, अल्मोड़ा का वह मुहल्ला, वह आगन सब याद आने लगा। मेरे मुहल्ले में प्रत्युषा जब पहली बार रहने को आई थी, सफेद व लाल रंग की फ़्रॉक पहने हुए। गोरा रंग। अपने मम्मी व पापा के साथ। मुझे ठीक से तो याद नहीं कि ये लोग आये कहाँ से थे। मैं और प्रत्युषा एक साथ खेलते, स्कूल जाते, साथ होमवर्क करते, साथ-साथ खूब सारी मस्तियाँ भी। अगर मुझे किसी रिश्तेदार के वहाँ एक-दो दिन के लिये जाना पड़ता ईजा के साथ तो वह उदास हो जाती। इसी तरह से कभी वह बाहर जाती तो मेरा मन नहीं लगता। हमारी दिन-रातें मानो हवा की तरह उड़ रहे थे। खुब मस्तियाँ, लड़ना-झगड़ना। उसके आने के बाद हम दोनों ही एक दूसरे के दोस्त बन गये थे हम दोनों का हम दोनों के अलावा हमारा तीसरा कोई दोस्त नहीं था। मुहल्ले वाले मुझे चिढ़ाते, शर्म नहीं आती लड़का होकर लड़की के साथ रहता है या शर्म नहीं आती लड़की होकर लड़के के साथ खेलती है। हम कहाँ परवाह करने वाले किसी की। इस तरह हम लोगों ने पाँच साल बड़े ही सुनहरे व यादगार बिताये, कई खट्टी मीठी यादों के साथ। हम साथ-साथ पतंग उड़ाते, कभी कंचे खेलते, कभी आइसपाइस खेलते, कभी नींबू सानके खाते, होली में साथ चंदा मांगते, फिर होली के गीत गाते और मिलकर होली खेलते। अल्मोड़ा में जाघनदेवी की रामलीला देखने के लिये पूरे मौहल्ले में घूम-घूमकर सभी को इकट्ठा करना। क्या-क्या नहीं करते थे हम। इन सारी यादों को अपने मन मस्तिष्क में सहेज कर नौ साल की अवस्था में अपने परिवार के साथ अल्मोड़ा को हमेशा के लिये विदा कहकर हम हल्द्वानी आ गये। मैंने प्रत्युषा को अंतिम बार तब देखा था, जब हम लोग हल्द्वानी के लिये बस में बैठ रहे थे और वह अपनी मम्मी व पापा के साथ स्टेशन तक छोड़ने आई थी। उसके व मेरे दोनों ही के आँखों में आसुओं की अविरल धारा बह रही थी। बस चलने लगी थी धीरे-धीरे हम भी हमेशा के लिये बिछुड़ रहे थे हम तब तक एक-दूसरे को देखे जा रहे थे, जब तक बस आँखों से ओझल न हो गयी, और फिर एक मोड़ पर बस भी मुड़ गयी और प्रत्युषा भी मुझसे हमेशा-हमेशा के लिये बिछुड़ गयी।

मैंने हल्द्वानी में अपनी शिक्षा पूरी की और नौकरी के लिये बैंगलूर चले गया था। आज अमित के ही बुलावे पर मैं देहरादून आया था। हालांकि प्रत्युषा ना कभी मेरे दिल से गयी ना ही मस्तिष्क से वह हमेशा मेरे ही साथ रहती मेरी यादों में और मेरी साँसों में। पर वह इस तरह से मुझे मिलेगी ये मैंने कभी सोचा ही ना था। वह भी एक मोड़ पर। एक मोड़ ही हम बिछुड़े थे और एक मोड़ पर ही मिले भी।

अचानक एक झटका लगा मुझे,मैं वापस स्मृतियों से वर्तमान में वापस आ गया। प्रत्युषा जोर से हँस पड़ी और मेरी ओर देखते हुये बोली “कहाँ खो गया था तू बबलू”? मैंने कहा, ”प्रत्यु बचपन में, वापस अल्मोड़ा चले गया था जहाँ तू थी मैं था और थी हमारी मीठी यादें। फिर मुझे तेरा वह चेहरा याद आया जो अंतिम बार मैंने देखा था। जो दुःखी था उदास था सच कहूँ मैं उस दिन हल्द्वानी आया जरूर था। लेकिन अपने आप को तेरे पास छोड़कर। मन हमेशा तुझे ही तलाशता हर चेहरे में, फिर मैं ये सोचकर मन को बहलाता कि पगले अब प्रत्युषा बड़ी हो गयी होगी उसकी अपनी दुनिया होगी, अपने दोस्त होंगे अब कहाँ याद करती होगी तुझे। अब तुझे जीना सीखना होगा अकेले, उसके बिना अपूर्णता के साथ। पर तू मिलेगी अचानक इस तरह से एक मोड़ पर ये सोचकर मैं भगवान से मन ही मन ये प्रार्थना कर रहा था कि काश ये पल यही थम जाये इसी मोड़ पर सदा-सदा के लिये ताकि तुझे फिर ना खोना पड़े किसी एक मोड़ पर।”

प्रत्युषा बोली, ”नहीं बबलू बहुत उम्र गुजार दी, जिन्दगी की तेरी यादों में और तूने भी मेरी प्रतीक्षा में एक दूसरे के बिना। अब मिले हैं हम हमेशा के लिये जिन्दगी की एक मोड़ पर।

इस तरह प्रत्युषा और मैं चल दिये जिन्दगी की नई राह में नई शुरुआत के लिये।

परन्तु कहते हैं ना कि मिलन भी है तो बिछोह भी। सब कुछ हमारी इच्छानुसार हो ऐसा कभी हुआ है क्या? नियति बड़ी ही क्रूर होती है। हम मंसूरी भी पहूँच गये। वह फिर मुड़ गयी एक मोड़ पर इस वादे के साथ कि हम फिर मिलेंगे।

मैं फिर कई बार उस सड़क से गुजरता हुआ अमित के साथ ही देहरादून से मंसूरी को निकलता था इस विश्वास से कि वह फिर मिलेगी, परन्तु वह नहीं मिली आज भी जब-जब हम उस सड़क से गुजरते हैं जैसे ही वह मोड़ आता है, मेरी उत्सुकता बड़ जाती हैं दिल भी जोरों से धड़कने लगता है ये सोचकर कि फिर कोई कार आयेगी बस से टकरायेगी और अचानक ही प्रत्युषा मिल जायेगी। अब न ही अमित को ही उसकी जानकारी है न ही मुझे। हम मिले भी थे एक मोड़ पर और बिछुड़े भी एक मोड़ पर।


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