लघुकथा: समय बड़ा बलवान

आशीष सहाय श्रीवास्तव

"पापा दरवाजा खोलिए, हम आ गए...!" बूढ़े पिता ने बाहर से आती आवाज सुनी और देखा कि विदेश से लौटे बेटा-बहू दरवाजे पर खड़े हैं। वे 104 नंबर पर फोन करने लगे।
बेटा अपनापन जताते हुए कहने लगा, "क्या पापा, फोन पर बता दिया था कि आ रहे हैं, फिर भी फाटक पर ताला लगा दिया।"
पिता ने कहा, "हाँ, बेटा! हम बुड्ढा-बुडढी अकेले ऐसे ही सुरक्षा उपाय करके रहते हैं और फिर कोरोनाकाल है। बचाव जरूरी है।"
बेटा बोला, "विदेश में तो बहुत बुरी हालत है बाबा! लोग तड़प-तड़प कर मर रहे हैं। वहाँ तो वायरस का दूसरा ही रूप सामने आ रहा है। अच्छा हुआ समय रहते हम देश वापस आ गए। यहाँ भी आस-पड़ोस सबके दरवाजे बंद हैं। सब बहुत ही संशय के साथ घूर रहे हैं।"
पिता बोले, "हाँ बेटा, एक वो समय भी था लोग गर्मजोशी से हाथ मिलाकर स्वागत करते थे। आज दूर से नमस्कार कर रहे हैं या कन्नी काट रहे हैं। सब समय का फेर है।"
बेटा झुंझलाते हुए बोला, "अरे आप दरवाजा खोलिए न, इतनी देर से आप कहाँ फोन लगाए जा रहे हैं?"
बूढ़े पिता ने सहजता से कहा, "लॉकडाउन के नियमानुसार स्वास्थ्य विभाग को सूचित कर रहा हूँ। तुम 14 साल विदेश में रहकर घर लौटे ये तो खुशी की बात है, लेकिन अब 14 दिन आइसोलेशन या क्वारेंटाइन में भी रह लो तो क्या हर्ज है?"
बहू ने कहा, "पर पापा जी, एयरपोर्ट पर हमारी जाँच हो गई है, तभी तो हम यहाँ तक आ पाए, सब नार्मल है।"
पिता बोले, "फिर भी सुरक्षा के लिहाज से सूचित करना जरूरी है बेटा। तुम तो समझदार हो। और फिर हम दोनों तो बूढ़े हैं। सबसे ज्यादा खतरा तो हमें ही है।"
बेटा भावुक हो गया। कहने लगा, "पापा हमें माफ कर दीजिए, इतने दिन आपसे ठीक से बात भी नहीं हो पाई।"
पिता ने कहा, "कोई बात नहीं बेटा। कोरोना के बहाने ही सही, तुमको हमारी याद तो आई। तुम्हारी माँ की तबियत ठीक नहीं रहती, अब शायद उन्हें कुछ चैन मिले।"
क्वारेंटाइन के लिए ले जाने वाली एम्बुलेंस दरवाजे पर आ चुकी थी।
पीछे चुपचाप खड़ी बूढ़ी माँ ने इतने वर्षों बाद बेटा-बहू को देखा तो आँखें डबडबा आईं। वह बड़बड़ा रही थी, "किसी ने सही कहा है, समय सबसे बड़ा बलवान है।"

स्वतंत्र पत्रकार, भोपाल मप्र
चलभाष: +91 887 158 4907
ईमेल: ashish35.srivastava@yahoo.in

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