कविताएँ: उल्लास पाण्डेय

उल्लास पाण्डेय
कविता 1

पथभ्रष्ट होने दो जिसे होना है
मैं पेड़ काटकर रास्ते नहीं बनाऊंगा
बढ़ने दो खरपतवार
गड़ही ताल भरने दो
पैदा होने दो नक्सली
जानवर
बंदूक
साँप को अंडे देने दो
और सबको भूख का निवाला बनने दो बारी-बारी
मैं फिर भी एक जंगल ढो सकता हूँ शरीर पर
पर मैं कोई शहर नहीं बनाऊंगा
मैं नहीं चिपकाऊंगा
सभ्यता का पेट फाड़कर बहते हुए
उत्पीड़न और पलायन की प्रगूढ़ व्यथाओं
पर कोई थिगली!


मैं चीथड़ों में कराहती आत्माओं के लिए
खँडहर नहीं बनाऊंगा
और इस तमाशबीन भीड़ के विरुद्ध
इस अंधकारमय मानवता के प्रति
अभाव रखूंगा
भीतर एक घोर आग्नेय अभाव!
***


कविता 2

सौंदर्य की सिद्धि क्या इसमें नहीं कि
मैं तुम्हारी कुरूपता ढूंढते हुए हताश हूँ!


ऐसी अरुद्ध शुभ्रता किसमें होती है
इतना बेदाग कौन होता है?


मैं जो रात में जीता हूँ
जीने के पतीले को माँजता हूँ
एक चुटकी उजास से
किंतु मैं रोशनी की परवशता में
श्वास नहीं ले सकता
इसलिए तुम्हारी ओर देखते हूए
मैं बेदम ढ़ूढ़ता हूँ अंधेरे की कोई शहतीर
और बार-बार आश्चर्य से
ठिठक जाता हूँ वहाँ...


जैसे उस जगह कई दुखों की अंतिम छाया पड़ी है
एक सुख को गढ़ते,
जैसे मेरी समूची रिक्तता
वहाँ अपना अवसान देखती है,
भटकती हुई प्रेरणा अपना अंतिम पड़ाव!


वहाँ तुम्हारे कपोल के तिल पर।
***


कविता 3

निशीथ विभक्त है
मेरे एकांत के दो टुकड़ों में


एक इस कमरे के आलोक में
मेरे पास ठहरा हुआ...
दूसरा सामने उस कमरे के अंधेरे में
सोते हुए, बिस्तर पर पड़े उन पैरों से लटकते
पायजेब के पास पसरा....


यह दृश्य कितना पाशविक है
किंतु इसका मर्म नहीं मिटता
और मेरे अधरों पर की ग्लानि भी नहीं...


मैं तीसरी जगह
किसी विभाजन पर खड़ा हूँ
मैं नहीं जोड़ पाता वह टुकड़े
दो प्रेत जहाँ अपनी उसाँस में भटकते हैं
और मैं इस टोह में जागता हूँ
कि कब उस दृश्य का रंग श्यामल हो!
***

शोधार्थी, अभियांत्रिकी, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान हैदराबाद, तेलंगाना।

1 comment :

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।