कहानी: जीना आता है मुझे

आशीष सहाय श्रीवास्तव

चुनौतियों को मात देते चैम्पियन्स के बारे में खूब पढ़ा है, जीतने का हुनर भी सीखा है... बुजुर्गों की जिजीविषा से भरी कहानियों ने हौसला बढ़ाया है, उम्मीदें जगाई हैं और परिश्रम, लगन का मंत्र सिखाया है....बताया है कि सफलता थाली में सजी हुई नहीं मिलती.... न ही बाजार से ही खरीदी जा सकती है इसलिए आज भी महामारी के दौरान, घर में बंद, एकांत में रहकर भी मैं हताश नहीं...निराश नहीं...उदास नहीं....! कुछ पल की  बदलियां हैं फिर छंट जाएंगी ये जानती हूँ मैं। जब अच्छा समय नहीं रहा तो बुरा समय भी नहीं रहेगा ये भी अच्छी तरह से पता है मुझे। मैं मुश्किल वक्त में रास्ता निकालना और धैर्य रखना भी जानती हूँ। समय आ जाए तो निर्णय भी ले सकती हूँ। सब कुछ भूलकर नई जिंदगी शुरू करना और अपने आप में खुश रहना आता है मुझे...हाँ जीना आता है मुझे...जीवन जीना कुशलता से आता है मुझे! 
सुबह की सैर को निकली शांभवी अपने निर्णय पर प्रसन्नचित्त हो उठी। चलते हुए आगे कदम बढ़ाते हुए ताजगी भरे हवा के झौंके के बीच उसके भीतर नई कविता का सृजन होने लगा।
विपरीत परिस्थितियों से मुकाबला करना...आंतरिक शक्ति को बनाये रखना....अपने मन-मस्तिष्क पर नकारात्मकता को हावी न होने देना ही उसने अपने माता-पिता और दादा-दादी से सीखा। दृढ़ इच्छाशक्ति, गिरकर और भी मजबूती से उठ खड़े होना और आत्मविश्वास के बल पर ही तो वह कुछ साल पहले महानगर में आत्मनिर्भर होने के लिए आई थी, लेकिन अच्छी जिंदगी की चाहत में पहले एक सीलन भरे किराये के फ्लैट में रहने को विवश हुई फिर कच्ची-तंग गलियों और पीछे झुग्गी बस्ती से लगे एक अस्थायी रेल के डिब्बानुमा दो कमरों में सिमटकर रह गई थी। नौकरी चले जाने के भय से वह स्वयं भी मशीन जैसी होकर रह गई थी। 
शांभवी कभी भी ऐसे नहीं रहना चाहती थी, लेकिन मन में एक आस, एक विश्वास और एक शानदार जीवन की उम्मीद लिये शांभवी तंग बस्ती के पास रहकर भी नौकरी करती रही। अच्छी काॅलोनी में मकान लेने के लिए पैसे जोड़ती रही। यह सोचकर अपना मनोबल बनाये रखती कि जैसे सब रह रहे हैं वह भी रह रही है। आज नही ंतो कल दिन बदलेंगे।
इसी बीच संघर्ष करते हुए विचार मिले, स्वभाव से लगा कि ‘‘एक से भले दो’’ तो शादी भी कर ली और उमंग, उत्साह और सपनों को पूरा करने के जुनून के बीच एक बच्ची भी उनकी खुशियों को बढ़ाने के लिए आ गई। अपना तो जैसे-तैसे काम चल गया, पर बच्ची के साथ शांभवी समझौता करने को तैयार नहीं थी। इसलिए पति के साथ प्रत्येक अवकाश वाले दिन समाचार-पत्रों में पढ़कर अपने सपनों का घर तलाशने वे निकल पड़ते।
कहीं पैसे कम पड़ते तो कहीं लगता जहाँ हैं वहीं ठीक हैं। दिन गुजर रहे थे कि कोरोना महामारी ने दस्तक दे दी। लाॅकडाउन ने उसी दड़वेनुमा घर में समेटकर रख दिया। पहले तो घर से निकलने पर दस-बारह घंटे आवोहवा बदल भी जाती थी, लेकिन लाॅकडाउन ने तो दोहरी मुश्किलें खड़ी कर दीं थी। एक तो संक्रमण से बचना दूसरा ताजी हवा के झौकों को तरसना....। 
क्या करें, क्या न करें की हालत में सभी पुराने परिचितों, रिश्तेदारों से एक-एक कर बात की। अब तो व्यस्तता का बहाना भी नहीं, तो क्यों न सभी से हालचाल ही पूछ लिये जाएं। कहते हैं अच्छे में भले ही किसी को याद न करो पर बुरे वक्त में साथ जरूर देना चाहिए। यही सोचकर डायरी में भी जिनके नंबर लिख रखे थे उनसे भी बात की। बहुत अच्छा लगा, परंतु शांत मन से जब लाॅकडाउन में बैठकर शांभवी ने सोचा तो लगा कि प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ में वह कहाँ भागे जा रही है। आखिर वह करना क्या चाहती है, कुछ बेहतर ही न, जो उसके लिए, उसके परिवार के लिए, उसके देश के लिए अच्छा हो। जिससे उसे लगे कि उसका ये मानव जीवन ये जन्म सफल-सार्थक रहा। तो फिर वह यहाँ महानगर की सड़ांध में क्या कर रही है। यहाँ तो ऊंचाईयों का कोई अंत ही नहीं। शायद बराबरी के लिए दूसरा जन्म लेना पड़े। पर इस जीवन की सांसें तो पूरी ही लेना होगीं। इन सांसों का दम घोंटना कहीं से भी उचित नहीं। चाहे जैसे हो जीना तो है, क्योंकि जीना आता है मुझे। 
इसी उधेड़बुन में शांभवी मास्क लगाये, दो गज की दूरी बनाये गृहस्थी के काम निपटा रही थी कि पता चला उसकी पूरी सघन मलिन बस्ती को क्वारेंटाइन में तब्दील कर दिया गया है। वह आहत हो गई। उसे समझते देर नहीं लगी कि संक्रमण वहीं अधिक फैल रहा है जहाँ सघन आबादी है। कई बार दूर से देखने पर लगता है कि आगे जाकर रास्ता खत्म, लेकिन जब वहाँ तक निडरतापूर्वक पूरे हौसले और आत्मविश्वास से पहुँच जाओ तो पता चलता है कि एक नया रास्ता निकल रहा है। इसलिए चलते जाना, बढ़ते जाना ही बेहतर उपाय लगता है। तुरंत अपने मित्रवत पति रोहित से बात की:-‘‘पता है ये नतीजा प्रकृति से खिलवाड़ का है। कुछ लोगों ने अति भी बहुत कर दी है। उसी का परिणाम भुगत रहे हैं हम भी।’’ रोहित ने सहमति वाले अंदाज में कहा: ‘‘हाँ, महसूस तो मैं भी यही कर रहा हूँ।’’ ‘‘तो चलो, गाँव की ओर चलो, वनों की ओर लौटने को कह रही है ये कुदरत। उसकी आवाज सुनो!’’
और फिर दोनों ने एक आवेदन तैयार कर गश्त पर निकली पुलिस को थमा दिया: ‘‘हम यहाँ से निकलना चाहते हैं।’’ पुलिस ने कुछ घूरते हुए पूछा ‘‘कहाँ जाओगे?’’ गाँव! गाँव चले जाएंगे’’ कहते हुए शांभवी ने तत्काल जोड़ा ‘‘हम सक्षम हैं, कुल तीन लोग हैं, बस जाने की व्यवस्था हो जाए।’’ 
पुलिस: ‘‘ठीक है कल ये आवेदन लेकर थाने आ जाना।’’ 

‘‘कल, अभी क्यों नहीं?’’ शांभवी के पति की प्रश्नवाचक दृष्टि से बचते हुए पुलिस ने कहा: ‘‘एक फार्म भरना होगा, तब यात्रा की अनुमति मिलेगी।’’
ठीक है! अगले दिन ई-पास की व्यवस्था होते ही वे कार से निकल पड़े गाँव की ओर। जो रकम दोनों ने महानगर में घर खरीदने के लिए जोड़ी थी उससे गाँव में ही खेत और मकान खरीदा और देखते-ही-देखते अपने साथ-साथ गाँव को भी खुशियों का घर बना दिया। खेतों और गाँव में नवाचार करते हुए दोनों ने अपनी आजीविका भी बढ़ा ली। साफ-सुथरी हवा और कर्मठ, निश्चल जीवन ने दोनों को आत्मसंतोष से भर दिया। जहाँ न तो संक्रमण का भय था न ही अस्त-व्यस्त दिनचर्या के कारण बीमार हो जाने की दहशत। खुला-खुला वातावरण, प्रकृति में रचे-बसे, स्वच्छ पर्यावरण ने उनके मन को आनंद विभोर कर दिया। उन्हें जीवन के सही मायने समझ आ गए, क्योंकि ग्राम्य जीवन ने उनकी महानगर की आपाधापी वाली जीवन शैली को सुखद अनुभूति से जो भर दिया। शांभवी ने अपनी बच्ची की ओर देखकर कहा: बेटी जब तक रास्ते हैं हमें चलने से कोई नहीं रोक सकता, मंजिल चाहे मिले न मिले पर हमें समस्याओं के हल ढूंढते हुए आगे बढ़ते जाना है। समाधान वाले रास्ते पर। एक ऐसे रास्ते पर जो संदेश देता हो खुश रहो-खुश रहने दो का संदेश।


स्वतंत्र पत्रकार, भोपाल मप्र
चलभाष: +91 887 158 4907
ईमेल: ashish35.srivastava@yahoo.in

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