बुन्देलखण्ड के विवाह-लोकगीतों में जीवन सौंदर्य

आर बी भण्डारकर
बुंदेलखंड के लोकगीत बड़े ही मधुर हैं। विवाह के समय जो गीत गाये जाते हैं उनमें हमारी ग्राम्य संकृति, परम्पराओं, लोक विश्वासों की झलक तो मिलती ही पूरा जीवन सौंदर्य ही मूर्तिमान हो जाता है।

भारतीय संस्कृति में पूरब से पश्चिम तक, उत्तर से दक्षिण तक अधिकांश क्षेत्रों में विवाह एक संस्कार है, अस्तु एक उत्सव है। मुझे यह कहने में भी कुछ अतिशयोक्ति नहीं जान पड़ती है कि एक व्यक्ति के जीवन का यह सर्वाधिक बड़ा उत्सव है। 
आज के युवा, आज जो विवाहोत्सव देखते हैं तो उन्हें लगता  होगा कि चूँकि पहले इतना तकनीकी विकास नहीं था, इसलिए पहले के विवाह इतने शानदार, मनोरंजक, आह्लाद प्रदायक नहीं होते होंगे। अगर वह सचमुच में ऐसा सोचते है तो यह उनकी खाम-ख्याली ही है। 
क्षमा करें, यह सच है कि आज के विवाहों में सजावट से लेकर वैवाहिक अनुष्ठानों तक में दिखावा अधिक है, आत्मीयता कम;धन का प्रदर्शन अधिक है, भावनाओं का कम;उतावला पन अधिक है, अवसर को कैमरे में कैद कर लेने की ललक अधिक है ;रुककर धैर्य पूर्वक संस्कार करने की निष्ठा कम। अपने उत्सव की चिंता अधिक है, प्रकृति की चिंता कम। स्वाद की चिंता अधिक है, भोजन को प्रसाद मानने की भावना गायब है। 
वस्तुतः पहले के विवाह-उत्सव कम आकर्षक, कम मनोरंजक और कम उत्साह पूर्ण कतई नहीं होते थे, मुझे लगता है कि वह आज से अधिक स्वाभाविक और नैसर्गिक होते थे। 
आज सजावट में कृत्रिमता का बोलवाला अधिक होता है। अक्सर धनीमानी लोग कहते हैं कि विवाह के लिए उन्होंने अमुक शहर से पुष्प मंगाए हैं, या मंगाए थे, पर सच में उनके वह पुष्प  भी कृत्रिम सजावट की चकाचौंध में निरीह-से दिखते है। 
पहले सजावट पर्यावरण-प्रिय होती थी। बुंदेलखंड की शादियों में स्वागत द्वार बनाने के लिए लोहे के नहीं लकड़ी के खम्बे गाढ़े जाते थे, उन पर प्लास्टिक/धातु की चमकनी के स्थान पर आम या नीम के पत्ते बड़े ही करीने से लपेड़े जाते थे। बेनर कृत्रिम नहीं, कपड़े के बने होते थे जिन पर केमिकल की प्रिटिंग नहीं बल्कि मैदे की लेई और स्वच्छ धवल रुई से "शुभागमन" और "स्वागतम" लिखा जाता था। 
मुहल्ले में जहाँ से बारात प्रवेश करनी होती थी वहाँ "शुभागमन" और विवाह स्थल या कन्या के घर के पास के स्वागत द्वार में "स्वागतम" का बेनर लगता था। किसी भी बेनर में किसी का नाम नहीं, क्योंकि विवाह भले ही एक घर का हो पर यह उत्सव तो सबका होता था-घर का, परिवार का, मुहल्ले का, गाँव का। इसलिए तोरण और पताके पूरे मुहल्ले में लगते, इसके, उसके, तिसके सबके घरों के सामने। 
विवाह में आज डी जे बजता है, तरह तरह के साउंड सिस्टम होते हैं। उनकी कानफोड़ू आवाज से सब उकता जाते हैं, कभी कभी गुस्सा फूट भी पड़ता है, "भई, बंद करो थोड़ी देर के लिए, मंत्रोच्चार भी नहीं सुन पा रहे हैं। "आप कल्पना करें कि यह मशीनें पर्यावरण को तो भारी नुकसान पहुँचाती ही हैं हमारी श्रवण-क्षमता को भी बुरी तरह प्रभावित करती हैं। 
उस समय गीत महिलाएँ गाती थीं सामूहिक रूप से, समवेत स्वर में। लोक के आलोक में निमज्जित यह गीत अत्यंत सुमधुर होते थे। विवाह के हर अवसर पर इन गीतों की सुमधुर ध्वनियाँ गूंजती थी। महिलाओं का यह गायन सामूहिक अवश्य होता था पर सबके बीच तालमेल ऐसा कि एक ही ध्वनि सुनाई देती, मजाल कि किसी का स्वर किंचित भी इधर उधर हो जाये। और इनके गीत तो इतने मनमोहक और भाव भरे होते थे कि घराती हो या बराती, हर किसी का मन मयूर नाच उठता था । यह गीत आज भी हैं पर गाने वाली गृहिणियाँ नदारद हैं। यह पारम्परिक गीत ऐसे हैं कि इन  में रिश्ते की मनुहार है, हँसी-ठिठोली है, मजाक है, व्यंग्य है;उलाहने हैं, ताने हैं, व्यथा है तो संस्कारों की कथा भी है। 
अब आप कहेंगे कि डीजे नहीं होता होगा तो बच्चे क्या करते होंगे ?वह तो एकदम बोर हो जाते होंगे। जी नहीं, बाराती बच्चे दूल्हे के संग कार्यक्रमों में भागीदारी करते, मेहमानबाजी का लुत्फ लेते थे, तो जनाती बच्चों को तो आनंद ही आनंद-माता-पिता के सान्निध्य का आनंद, "करके सीखो का भी आनंद। " माताएँ पूड़ियाँ बेलती, बच्चे उनको दौड़ दौड़ कर भटिया तक पहुँचाते; पिता, चाचा कहते-शाबाश ! और लाओ बेटा दौड़कर। जो किशोर वय होते वे स्वागत द्वार बनवाने, तोरण-पताके बनवाने में बड़ों की मदद करते। सच मानो यह सब करते हुए उन्हें ऐसा लगता कि उन्हें "आठों सिद्धि नवों निधि" का सुख मिल रहा है। 
बुंदेलखंड के उत्तर पश्चिम क्षेत्र के विवाह की विभिन्न रस्मों पर जो गीत गाये जाते हैं, वह गीत मानव मन की आस्था, लोक विश्वास, रीति-रिवाज और परंपराओं को बखूबी प्रकट करते हैं। 
वैसे तो विवाह की प्रक्रिया बड़ी लंबी होती है पर विवाह रस्मों की सही शुरुआत कन्या पक्ष की ओर से वर पक्ष को "पीली चिट्ठी" भेजी जाने से होती है। इस चिट्ठी को बुंदेलखंड में कहीं कहीं "रेवा" तो कहीं कहीं "सुतकरा" भी कहते हैं। 
सुतकरा के बाद तैयारियाँ शुरू हो जाती है। पाँत-पंगत के लिए सामग्री जुटाना, पिसाई, पिलाई का कार्य, वस्त्राभूषण खरीदना, वर्तन-भांडे क्रय करना आदि अनेक कार्य। हर कार्य की शुरुआत पूजन व गायन से। हर अवसर पर आम तौर पर देवताओं का स्तुति गायन होता है। इसके अलावे वर पक्ष के यहाँ बना/बन्ना और कन्या पक्ष में बनी (बन्नी) नामक गीत गाये जाते हैं। जैसे-
बन्ना-
 (1)सांची कहौ मेरे लाला लखन जू ;अबकी मिलन कब होइँ मेरे लाल। 
 (2) बना की कुतलूपुर ससुरार बना मेरौ भोरई से सज गयो रे। 
बना के भैया थानेदार बना को कपड़ा लियाबें रे। 
बना की भौजी लम्बरदार, सबई पै हुकुम चलावें रे। 
बना के फूफा हैं हुशयार, बना कों अँगन सजावै रे
बना की बूआ चतुर सुजान बना की नजर उसारें रे। 
बना की कुतलूपुर ससुरार बना मेरौ भोरई से सज गयो रे। 
 (3)जनक जू के द्वारें राम बना बन के आये। 
बन्नी-
 (1) मेरी बन्नी चतुर सुजान, अनौखौ वर ढूढ़ लओ है रे। 
 (2 )सुहाग बरसैs बन्नी तेरे अँगनवाँ, सुहाग बरसैs बन्नी तेरे अँगनवाँ। 
गुलाल बरसैs बन्नी तेरे अँगनवाँ, सुहाग बरसैs बन्नी तेरे अँगनवाँ। 
बेला चमेली के फूल सजे हैं, गुलाब बरसें बन्नी तेरे अँगनवाँ। 
सुहाग बरसैs बन्नी तेरे अँगनवाँ। 
गीत संगीत का यह उत्सव महीनों चलता रहता है। महिलाएँ सुबह शाम जब भी मौका मिलता है यह गीत गाने लगती हैं। आगन्तुक या राहगीर दूर से ही जान जाता है कि इस घर में लड़की/लड़के का विवाह होना है। सच माने, इन गीतों से पूरे मुहल्ले का वातावरण खुशियों से भर उठता है। 
जब विवाह का मुख्य आयोजन आता है तो उन दिनों को तिलाई (मंगल गीत का दिन), तेल पूजन (देव पूजन का दिन) मंडप (विवाह मंडप तैयार करने का दिन)टीका (बारात आने का दिन)भाँवर (पाणिग्रहण संस्कार का दिन) और विदाई (बारात और कन्या की विदाई का दिन)नामों से पुकारा जाता है।  (स्थानीयता के आधार पर कहीं कहीं इन उत्सव नामों में किंचित भिन्नता भी रहती है। )
समय बड़ी जल्दी निकल रहा है। लो आज तो तेल पूजन है। पुरुषों की जिम्मेदारी है कि वे नाते-रिश्तेदारों, मित्र-मिडोइयों को न्योता दें;देवी-देवताओं को न्योता देने की जिम्मेदारी तो इन गृहिणियों की है। निकल पड़ती हैं एक दो बुजुर्ग महिलाएँ, कुछ युवतियाँ पूजा का थाल सजाकर। मंदिर, मंदिर, थान, थान जाती हैं गीत गाते हुए। देवता के सामने पहुँच कर गाती हैं-
माता मइया नौतौ लेउ, देई बाबा नौतौ लेउ/कालका मैया नौतौ लेउ तो तुम मेरे आइयो। 
तिहाई लाड़ी लाड़ी कौ बियाव सो काज सम्हारियो। 
तुम बिन ररियाँ न होंय कमल नईं बैठियो। 
यह आस्था और विश्वास ही है कि मन में विचार रहता है कि विवाह में सभी देवता आ जायें, कोई चूक न जाये। इसलिए महिलाएँ कहती हैं, " भूले-बिसरे नौतौ लेउ तो तुम मेरे आइयो। ......
सब को न्योता दे दिया, उन्हें कैसे भूल सकते हैं जो कभी हमारे परिवार के अंग थे पर अनंत में विलीन हो गए हैं, "घर के पुरखा नौतौ लेउ तो तुम मेरे आइयो। 
तेल पूजन के ही दिन बन्नी को तेल चढ़ता है। उस समय का मनमोहक गीत देखिए-
"आज मोरी बन्नी को तेल चढ़त है, 
तेल चढ़त है, फुलेल चढ़त है। आज मोरी बन्नी....
सोने के बेलन में तेल  भरौ है, 
हल्दी मिलाय कें बन्नी कों  चढ़ाओ, 
देखो बन्नी मेरी  कैसी दमकत है। आज मोरी बन्नी....
मंडप के दिन सुंदर मड़वा छा लिया गया है। अब आज तो टीका है। .....बच्चों का शोर सुनाई देता है, "बरात आ गयी, बहुत सारी गाडियाँ हैं, बरतयउ कुल्ल हैं। " पुरुष निकल पड़ते हैं बारात की अगवानी करने। बारात जैसे जैसे जनवासे की ओर आती है, महिलाएँ व्यंग्य भरे गीत गाकर हँसी-ठिठौली के साथ बारात का स्वागत करती हैं-
"मेहमान गाड़ी तीन लियाये, मन की एकऊ नइयाँ। टूटी खुटली, फ़टो सलीता, बैलन झूलें नइयाँ। मेहमान....
मेहमान मेरे तीनइं आये मन के एकऊ नइयाँ। 
ठाड़ी चुटिया, फटो अँगोछा, पाँय पन्हइयाँ नइयाँ। मेहमान....
और फिर-
मेहमान मेरे आये हो, मोरा रेरा हो। 
मेरौ पातुरिया सौ दूल्हा रे, मोरा रेरा हो। 
मेहमान मेरे आये हो, मोरा रेरा हो। 
वे तो कनवइं कनवा आये हो, मोरा रेरा हो। मेहमान..
वे नकटई नकटा आये हो, मोरा रेरा हो। 
मेहमान...
वे तो बूँचई बूँचा आये हो, मोरा रेरा हो। 
मेहमान...
यहाँ भावनाएँ देखिए;इन महिलाओं को  बराती  तो काने, नक कटे, कन कटे दिख रहे हैं पर इन्हें दूल्हे में कोई कोर कसर नहीं दिख रही है। इनकी दृष्टि में तो वह "पातुरिया" जैसा सुंदर है। हाँ भाई, इन्हें दूल्हे में खोट दिखेगी कैसे ? उसे तो हमने ही, इनके लोगों ने ही ढूँढ़ा है, तमाम में से चुना है न। 
बारात जनवासे में ठहर गयी है। जलपान कराया गया, अब द्वारचार की बारी है। ...लो दूल्हे को लेकर बारात दरवाजे पर आ गयी है। हर कोई दूल्हा देख लेना चाहता है। घर की, गली-मुहल्ले की बालाएँ, महिलाएँ उचक उचक के देख रही हैं ;कुछ कुछ अपनी अपनी अटारियों से देख रहीं हैं। दरवाजे पर "स्वागत का सम्मुख मोर्चा सम्हाले महिलाएँ" गाने लगती हैं-
राम आय गए जनक जी के द्वार, औसर नीकौ बनौ। 
लला आइ गए जनक जी के दुआर, औसर नोनौ बनौ। 
दूल्हा के मामा ढोलक बजावैं, फूफा बजायँ करताल; औसर नोनौ बनौ। 
दूल्हा के कक्का झींका बजावें, भैया मंजीरा में निढाल। औसर नोनौ बनौ। 
यहाँ बाजे वालों को वर पक्ष का नजदीकी सम्बन्धी कहकर हँसी-मजाक किया जा रहा है। कोई बुरा नहीं मान रहा है। फूफा, मामा, काका हँस रहे हैं। सम्बन्धों का सौंदर्य जीवंत हो रहा है। 
एक और हँसी-ठिठौली देखिए-
साजन आये, हितुआ आये, 
ऐसी गरज कहा (क्या) साजन आये। 
बाँधत कौ अंगौछा साजन घर धर आये
जुइया कौ लुगरा लपेटें आये, हो चले आये
ऐसी गरज कहा साजन आये। 
पहनत कौ कुर्ता सजना घर धर आए
सो बहना कौ ब्लॉउज पहरे आये। हो.....
पहनत की धोती सजना घर धर आये
सो भौजी को लहँगा पहन आये। हो चले......
यहाँ प्यार है, मनुहार है, स्वागत है, वन्दन है, अभिनन्दन है पर मजाक का हक भी झलक रहा है। 
वर दरवाजे पर है। जल्दी टीका होना है। सो अब लड़की के बाबा टीका का थाल लेकर आ गए  हैं। पंडित जी जोर जोर से मंत्रोच्चार कर रहे हैं। मंत्रोच्चार थमा, पंडित जी बाबा से दूल्हे का तिलक करवा रहे हैं, महिलायें गा रही हैं-
कोट नवै, पर्वत नवै, सिर नवै न नवाये। 
माथो अजुल (Grand father) राजा तब नवै, 
जब साजन आये। 
कोट नवै पर्वत नवै, सिर नवै न नवाये। 
माथो बबुल (Father) राजा तब नवै, 
जब साजन आये। 
परम्परा है, हृदय के भाव हैं कि किसी के लिए विनम्र हुआ जाय या नहीं पर जिसे बेटी दे रहे हैं वह तो साजन हो गया, उसके प्रति विनम्र भाव तो अंदर से उपज जाता है, उसके सम्मान में सिर स्वयमेव झुक जाता है। 
विवाह है, बारात आई है, घराती भी हैं, उत्सव है, बड़े पैमाने पर  खाना बन रहा है। महिलाएँ मंगल-गीत गा रही हैं। इल्ले ! यह तो आँधी-पानी आने लगा, अब खाना कैसे बने?चिंता की कोई बात नहीं, महिलाएँ गा उठती हैं-
आँधी औ पानी कों बंद करत हैं, 
सो हनुमत है  रखवारे पवन के
 हनुमत हैं रखवारे। 
और सचमुच आँधी-पानी रुक गया। हनुमान जी पहले से ही निमंत्रित थे, उन्होंने पुकार सुनी, तुरंत अपनी शक्ति से विघ्न दूर कर दिया। धन्य भाग्य मेरा कि आस्था....और..विश्वास दोनों के दर्शन हुए। 
अब भोजन की बारी है। आज भोजन केवल भोजन नहीं एक प्रसाद है। कितनी ही भीड़ हो, यहाँ बुफे की गुंजाइश नहीं। भोजन के लिए पंगत (पाँत)बैठती है तसल्ली से। भोजन प्रेम से, मनुहार से थर्मोकॉल /प्लास्टिक के पत्तलों में नहीं, हमारे पूज्य वृक्ष बरगद के पत्तों से बने पत्तलों  में परोसा जाता है, पानी के लिए थर्मोकॉल या प्लास्टिक के गिलास नहीं, मिट्टी के कुल्लड़ होते हैं, जिनके पानी में मिट्टी की सोंधी खुशबू आती है। इस प्रकार बड़े सत्कार भाव से भोजन खिलाया जाता है, "पूड़ी गरम है, बहुत मुलायम है, एक परोस दूँ साब ?"
टीका का दिन बीता। पंडित जी ने बताया था कि विवाह का शुभ मुहूर्त अगले दिन प्रातः 9 बजे तक ही है। सो सारी तैयारियाँ जल्दी जल्दी हुई। मंडप के नीचे वर-कन्या उपस्थित है। हवन हो रहा है, पंडित जी बड़ी ही मधुर ध्वनि में मंत्र पढ़ रहे हैं। कन्यादान की रस्म के लिए लड़की के माता-पिता गांठ जोड़ कर बैठे हैं। महिलाएँ गा रही हैं-
दिइयो गैयाँ, बछियाँ सोने सींग मढ़ाय। 
दिइयो भैंस जनेई छिडरिया को छोभौ खाय। 
बिटिया दे रहे हो तो हे पिता! वह सब कुछ दे देना जो बिटिया की गृहस्थी बसने के लिए आवश्यक हो। लोगों की ऐसी धारणा बन गयी है कि दूल्हे की माँ को सर्वाधिक अपेक्षा होती है कि विवाह में खूब उपहार मिलें ताकि वह औरों  के सामने अपनी और अपने परिवार की महत्ता दिखा सके। इसीलिए यहाँ दूसरी पंक्ति में कहा जा रहा कि "दुधारू भैंस अवश्य देना ताकि दूल्हे की माँ को सन्तोष मिल सके। "
अब पैर पुजाई की बारी है। घर परिवार, नाते-रिश्तेदार सब पैर पूजते हैं बारी बारी से, उपहार में पैसे, वर्तन, घरेलू सामान देते हैं। पुण्य का कार्य है यह। कौन यह पुण्य नहीं कमाना चाहेगा ?
लोग पैर पूज रहे हैं। यजमान को उत्साहित करते हुए तथा दूल्हे को रिश्ते की जानकारी कराने के उद्देश्य से महिलाएँ गाती हैं-
घरईं बहिनियाँ/भतीजिया/भनिजिया के पाँय पूजौ, घरही गंगा नहाव। 
पैर पूजने का परिणाम क्या हुआ ? इन महिलाओं के शब्दों में ही सुनिए-
पापऊ पनारिन बह गए, धरम रहे उतराय। 
पैर पुजाई हो गयी अब भाँवर (अग्नि-परिक्रमा=सात फेरे) होनी है, विवाह तो तभी सम्पन्न होगा। सुनिए-
जा पहली भाँवर हो, अभै तौ बिटिया बापई की। 
जा दूजी भाँवर हो, अभै तौ बिटिया बापई की। 
...
जा सातैं भाँवर हो अब बिटिया भईं हैं पराईं। 
लो विवाह हो गया, अब बिटिया ससुराल की हो गयी। 
अरे कुछ रस्में और होनी है। इनमें एक है, कंकन छोरना। दूल्हे राजा दुलहिन का कंकन छोर रहे हैं। बड़ी कठिनाई हो रही है, सखियों ने पहले से ही कंकन की गाँठों को कस दिया है। बड़ी-बूढ़ी महिलाएँ गा रही हैं-
छोरौ छोरौ सिया जू के कंकन महाराज अब छोरौ। 
तो सखी-सहेलियाँ, भावजें हँसती-ठिलठिलाती हुई गाती हैं-
लला हँसी खेल नइयाँ कंकन को छोरबौ, 
जाय समझो न तुम  तौ धनुष  टोरबौ। 
लला कंकन की गाँठें लगी हैं मजबूत, 
देखें हम कैसे  हौ तुम लला  या सपूत। 
यहाँ "लला" एक करारा व्यंग्य है। जो लड़के बचपन में लाड़-प्यार में केवल "लला" बने रहते हैं, जीवन-संग्राम के लिए आवश्यक शिक्षा ग्रहण नहीं करते हैं वे जीवन मे कभी सफल नहीं होते हैं। 
दूल्हा कोई भी हो आज वह राम का प्रतीक बन जाता है;वह इस समय राम ही बन जाता है और दुलहिन सीता बन जाती  है; क्योंकि जन मानस के आदर्श यही हैं। 
विवाह की सभी रस्में सम्पन्न हो गयी हैं ;अब बारात की विदाई की बेला है। देर हो रही है, धूप चढ़ आई है। महिलाएँ व्यंग्य-वाण छोडती हैं-
 गहाय दे इनकी लठिया कौने बिलमाये। 
आँस की नइयाँ बाँस की नइयाँ, 
अंडउआ की लठिया, कौने बिलमाये। गहाय दे...
बाराती जाने लगे हैं। दो दिन की चहल-पहल सुनसान में बदल रही है। भाव उमड़ने लगते हैं-
काहे भगे जात पानी पियें जउ। 
हो मेरे नए साजन पानी पियें जउ। 
ऐसे गीत हजारों हैं। विवाह की हर छोटी छोटी रस्म के  सैकड़ों गीत, तरह तरह के गीत है । इतने समसामयिक, भाव भरे गीत किसने लिखे, इनका रचनाकार कौन है, कोई नहीं जानता। कुछ गीतों को तो आज के  स्थानीय लोकगीत कारों ने सृजा;भले ही उनके नाम हम भूल गए  हों पर अधिकांश गीत परंपरा से चले आ रहे हैं और श्रुति-स्मृति के आधार पर अपना अस्तित्व आज भी बनाये हुए हैं। हाँ हमारी गृहिणियाँ अवश्य ही इनमें अवसर, स्थिति, स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार कुछ न कुछ जोड़ती, घटाती रहती हैं और इन्हें स्थानानुकूल बना लेती हैं। इसीलिए इन गीतों के बोलों में भी अंतर आ जाता है। एक बात यह भी कि महिलाएँ इन गीतों में अपने घर-परिवार और वरपक्ष के लोगों के नाम जिस सफाई से जोड़ लेती हैं उससे इन के मस्तिष्क की स्तुत्य उर्वरता, प्रत्युत्पन्न मति प्रकट होती है। 
विवाह के यह गीत लोकगीत हैं ;इनमें सहज रस-निष्पत्ति होती है। भाव ऐसे अप्रतिम कि ध्वनि काव्य, गुणीभूत व्यंग्य और चित्र सब दण्डवत करते से दिखाई देते हैं। इन में ऐसी रसधार बहती है कि वात्सल्य, शृंगार, हास्य, शांत रस देह धरे उपस्थित हो जाते हैं। बेटी की विदाई के समय सब जानते हैं कि विवाह के बाद भी बेटी का आना-जाना होता रहेगा लेकिन फिर भी पहली बार बेटी को विदा करते समय करुणा का जो दृश्य उपस्थित होता है वह "करुण रस" की सी ही मनःस्थिति ला देता है। धन्य है बुंदेलखंड, धन्य हैं वहाँ की परंपराएँ, स्तुत्य हैं वहाँ के लोकगीत। 

1 comment :

  1. बेहतरीन लेख सर, बुंदेलखंड क्षेत्र खासतौर पर पंचनद क्षेत्र की वैवाहिक परम्पराओं को जीवंत कर दिया, वहाँ के लोकगीतों और परम्पराओं को सूक्ष्मता से वर्णित करने के लिए आभार, बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं सर 💐💐🙏🙏

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।