सात कदम: अप्रवासी भारतीय लेखिका जय वर्मा की समृद्ध कहानियाँ

सात कदम (कहानी संग्रह)
लेखिका: जय वर्मा
अयन प्रकाशन, नई दिल्ली
2020 (तृतीय आवृत्ति)
पृष्ठ संख्या: 120, (हार्ड बाउंड)
मूल्य ₹ 250.00

समीक्षा: राजगोपाल सिंह वर्मा

विदेशी पृष्ठभूमि से जुड़े घटनाक्रम की कहानियाँ होने के पश्चात भी इस संग्रह की कहानियाँ भारतीय परिवेश से संबद्ध हैं। इसका मूल कारण लंबी अवधि तक विदेश में रहने के पश्चात भी लेखिका का अपनी जन्मभूमि और जड़ों से जुड़ाव कहा जा सकता है।

जय वर्मा
संग्रह की कहानी ‘गुलमोहर’ हृदय को झकझोर कर कम्पित कर देती है। संवेदना के स्तर पर गहन अनुभूतियाँ दर्शाने वाली इस कहानी में विदेश में रहने वाला पाश्चात्य संस्कृति में रंगा एक बेटा अपनी माँ की संपत्ति विक्रित कर उसे विदेश ले जाने का झांसा देकर एयरपोर्ट पर छोड़कर उड़न-छू हो जाता है। वृद्धा अपने ही बेटे द्वारा दिए गए इस धोखे से उभरने में असमर्थ रहती है। यह उसके हाहाकार और व्यथा की कथा है।

कहानी ‘किधर’ में संपत्ति के प्रलोभन के कारण पुत्र व पुत्रवधू अपने पिता के अन्यथा वैवाहिक जीवन की कल्पना करके चिंतित दिखाई देते हैं। यह घटनाक्रम आज किसी न किसी रूप में लगभग हर उस घर में दिखाई देता है, जहाँ ऐसी स्थितियाँ होती हैं। उनकी पृष्ठभूमि में कोई स्नेह नहीं, पिता की संपत्ति की लालसा हुआ करती है। कहानी का कथानक और उसका प्रस्तुतिकरण मार्मिक है।

राजगोपाल सिंह वर्मा
कहानी ‘गूँज’ में लंबे समय के पश्चात नायिका अपने पुत्र व विदेशी पुत्रवधू वैलरी के साथ मायके पहुँचकर वहाँ की स्मृतियों में खो जाती है। उसे अपने घर में आने वाले सारंगी बाबा का संगीत याद आता है, लेकिन उसकी मुलाकात सारंगी बाबा के स्थान पर उसके पुत्र मुनव्वर से होती है। उसके हाथों से सारंगी बाबा के संगीत की कैसेट पाकर उसे बेहद प्रसन्नता होती है। अमिता की विदेशी पुत्रवधू के लिए यह सब अकल्पनीय है। वह यह सब देखकर विस्मित होती है, उसके लिए ये अनचाहे रिश्ते अनूठा अनुभव जो हैं।

कथा संग्रह ‘सात कदम’ की अन्य कहानियाँ ‘कोई और सवाल’, ‘सात कदम’, गोल्फ’ तथा ‘फिर मिलेंगे’ भी आकर्षक हैं। ये कहानियाँ कथालेखक के रूप में लेखिका की अच्छी छाप छोड़ने में समर्थ हैं। लंबी अवधि तक विदेश में रहने वाली जया वर्मा की हिन्दी भाषा में अच्छी-खासी दक्षता और अभिव्यक्ति पर नियंत्रण है।  उनमें उपयुक्त हुई भाषा स्वाभाविक तथा प्रवाहमय है। कहानियों में निराशा, हताशा और विवशता का समावेश होने के बावजूद भी एक तो वे यथार्थ के करीब दिखती हैं, दूसरे पाठक पर इस दृष्टि से सकारात्मक प्रभाव छोड़ती हैं कि वह कुछ सोचने को मजबूर अवश्य हो जाता है। लगभग सभी कहानियों में कल्पना शक्ति का बेहतर उपयोग किया गया है जिसके लिए लेखिका बधाई की पात्र हैं।

अपने आशीर्वचन में पश्चिम बंगाल के तत्कालीन राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी जी ने इसके आमुख में सही ही लिखा है कि,

“विभिन्न परिवेश से जुडी इन सतरंगी कहानियों में मौन या मुखर रूप से अकुलाती है भारतीयता। विदेशी जीवनशैली में भारतीय संस्कृति और संस्कारों की मनोवैज्ञानिक उपस्थिति से इन पात्रों के मन की उथल-पुथल, बेबसी, हताशा आदि के मद्धिम स्वर इन कहानियों में गूंजते हैं।” 

सन 2017 में अयन प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित जय वर्मा के इस कहानी संग्रह की यह तीसरी आवृत्ति है। उन्हें शुभकामनाएँ। 

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बागपत जनपद के एक गाँव जिवाना में जन्मी जय वर्मा, पिछले 45 वर्षों से ब्रिटेन में रहकर हिन्दी लेखन, भाषा और साहित्य की सेवा में रत हैं। वह नॉटिंघम की ‘काव्य रंग’ संस्था की संस्थापक सदस्य एवं अध्यक्षा हैं। नैनीताल, मेरठ और नॉटिंघम में पढ़ी जय बीटैक हैं। उनकी हिन्दी कवितायेँ और कहानियों का समावेश महाराष्ट्र हाई स्कूल बोर्ड और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा किया गया है। ‘सहयात्री हैं हम’ नामक उनकी काव्य रचनाओं का संकलन भी प्रकाशित है।

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