उपन्यास समीक्षा: सितारों में सूराख

पुस्तक समीक्षा: मधु संधु

पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर, पंजाब

सितारों में सूराख (उपन्यास)

लेखिका: अनिलप्रभा कुमार
प्रकाशक: भावना प्रकाशन, नई दिल्ली
वर्ष: 2021
पृष्ठ 152, पेपरबैक
मूल्य ₹ 195.00


अनिलप्रभा कुमार का नवप्रकाशित उपन्यास ‘सितारों में सूराख’ बन्दूक संस्कृति की बात करता है। अमेरिका के राष्ट्रीय ध्वज में पच्चास राज्यों के प्रतीक पच्चास सितारे हैं। लेकिन तथ्य यह है कि पच्चास सितारों वाले ध्वज के उस देश में कितने सूराख हैं, कितने ब्लैकहोल हैं- बंदूक संस्कृति का सूराख, राजनेताओं के आत्मकेंद्रण और वोट नीति का सूराख, रेड इंडियन्स की हत्याओं का सूराख, नसलवाद का सूराख, नारी उत्पीड़न का सूराख, सबवे में हत्याओं और लूटपाट का सूराख, सूचना प्रसारण में सिमटा बाजारवाद का सूराख, नौकरी में अस्थायीत्व का सूराख।

डा. मधु संधु
‘सितारों में सूराख’ प्रवासी साहित्यकार अनिलप्रभा कुमार का भावना प्रकाशन, नई दिल्ली-91 से 2021 में प्रकाशित प्रथम उपन्यास है। इससे पहले उनके दो कहानी संग्रह ‘बहता पानी’, ‘कतार से कटा घर’ और एक कविता संग्रह ‘उजाले की कसम’ आ चुके हैं। 152 पृष्ठों में सिमटे इस उपन्यास में 32 अध्याय/ उपशीर्षक हैं। मुख्य पात्र जय, जसलीन और चिन्मया/ चिन्नी हैं। ऐलन, विन्नी/ विन्सेंट, माइक, डैन, जॉन, समीर खान, आयशा, डॉन और उसकी बहन ओब्री, डैनी, मिसेज ग्रियर्सन, एरीना, जेनिफर फॉक्स, नैन्सी, लूसी जेराल्ड, रिचर्ड, मारिया, शैनन आदि अनेकानेक पात्र भी एक सार्थक उपस्थिति लिए हैं। यह वर्षों पहले विवाहोपरांत अमेरिका में आकर बसी उस जसलीन/ जैस्सी की कहानी है जिसे सितारों के इस देश में भी ज़िंदगी खोखली, शून्य, दिशाहीन लगती है। क्यों? और वह कैसे उसे सारगर्भित बनाती है, दिशा/ उद्देश्य देती है।

बंदूकें अमेरिकी इतिहास, राजनीति और संस्कृति का अभिन्न अंग हैं। गन कल्चर की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इन्हें उखाड़ फेंकना असंभव सा है। अमेरिका के पचास राज्यों के प्रतीक पचास सितारों वाले ध्वज में बंदूक संस्कृति ने सूराख कर दिये हैं। सभ्य देश का असभ्य जन-जीवन। कभी भी कोई मानसिक रोगी, प्रभुत्व कामना या हीन ग्रंथि या डिप्रेशन का शिकार आदमी शॉपिंग मॉल पर, शैक्षणिक संस्थाओं पर, क्लब या कैसीनो पर, मैक्सिकन या अश्वेतों पर गोलियाँ चला उनकी बलि लेने का हक लिए है। अमेरिका की आबादी विश्व का चार प्रतिशत है, जबकि यहाँ बंदूकें बयालीस प्रतिशत हैं। यह बंदूक संस्कृति का देश है। जहाँ बंदूक खरीदना आसान है, कुत्ता-बिल्ली खरीदना मुश्किल। जहाँ मूंगफली की तरह बन्दूकें बिकती हैं। बंदूक माइक के लिए मर्दानगी का प्रतीक है। उसका गौरव, उसकी ब्यूटीज़ हैं। उसके पास अच्छा-खासा गन-कलेक्शन है। जॉन के पास पाँच बन्दूकें हैं। जय भी बंदूक खरीदता है। गन संस्कृति यानी बंदूक और लाशें। अनिलप्रभा कुमार लिखती हैं- 

“यह गन कल्चर अमेरिकी कल्चर का पर्याय है। यूँ कहें कि आज का यह अमेरिका स्थापित ही बंदूक के बल पर हुआ है। सभी जानते हैं कि यहाँ के मूल निवासी रेड इंडियन्स को बंदूक के बल पर ही तो पराजित कर उनकी ज़मीन हथियाई गई थी। फिर अमेरिकन रेवोल्यूशनरी वार। सब इस बात की गवाही देते हैं कि जिसके पास ताकत है, वही विजेता रहा है।”1
अनिलप्रभा कुमार

अमेरिका की बंदूक संस्कृति की देन संत्रास सबके जीवन का कठोर यथार्थ है। शिक्षण संस्थानों पर बंदूकों से हमले आम बात है। विद्यार्थियों को बचाव का प्रशिक्षण दिया होता है। फायर अलार्म सुनते ही फुर्ती से छिपना/ अदृश्य होना होता है- अलमारियों के अंदर, मेजों-डेस्कों के नीचे। गोलियों की आवाजें, घायल साथी, खून की धाराएँ, धुआँ, चीत्कार, लाशें, खौफ, सिसकियाँ, पथराई आँखें, और तनाव - मृत्यु से यह सीधा साक्षात्कार है। चिन्नी के स्कूल पर भी ऐसा ही हमला होता है। सत्रह विदयार्थी अध्यापक मारे जाते हैं। समीर की हत्या इस किशोर बिन ब्याही बच्ची को वैधव्य सा दर्द दे जाती है। साथ की सीट वाला छात्र जब नहीं रहता, तो कैसा लगता है। डैनी की बहन ओब्री मारी जाती है। दहशत का अजगर दिल-दिमाग पर रेंगता है। चर्च के बाहर गोलियों की बौछार, कैसीनो में गोलाबारी, सबवे में लूटपाट और हत्याएँ, अश्वेतों या मैक्सिकन मूल के लोगों की हत्या। पराये देश में जब अपने गोलियों के शिकार हो जाते हैं, तो कितना बेगानापन, फालतूपन महसूस होता है। कोई भी कहीं भी सुरक्षित नहीं है- कैलिफोर्निया, टैक्सास, ओहाओ, इलीनायस, फ्लॉरिडा, लासवेगन, ऑरलेन्डो।
 
 उपन्यास का मुख्य पात्र जय / जे / जायेश / जयसिंह खबरों की दुनिया यानी न्यूज़ बिज़नेस से जुड़ा है। युद्ध संचालन जैसी तीव्र गति और बाज़ जैसी पैनी आँखों से खबरें पकड़ना - यही है दूरदर्शन की दुनिया। न्यूज़ एजेंसी से चैनल प्रसारण के लिए खबरें खरीदते हैं। कोई बड़ा हादसा या खबर उन्माद के स्तर पर भी पहुँच जाती है। सीरिया में गोलियों की दनदनाहट, विमान दुर्घटना की फुटेज, नाइटक्लब में गोलियाँ चलना, सबवे में बंदूक की नोक पर पड़ने वाले डाके। आखिरी वक्त में सेटेलाइट से खबरें पहुँचती हैं, रेकॉर्ड होती हैं, संपादित होती हैं कहानी में प्राण फूँकने के लिए टेलीकास्ट हेतु वीभत्स दृश्य चुने जाते हैं - चीखें, अंधेरा, गिरते पड़ते लोग, खून, सायरन, एम्बुलेन्स। खबरें नकारात्मक ही क्यों? संचार माध्यम का यह भी एक भयंकर, भयभीत करने वाला सुराख है।

 कहा जाता है कि अमेरिका की औरतें प्रगतिशील और स्वतंत्र विचारों की हैं। लेकिन इस अवधारणा में छेद यह है कि यहाँ बंदूक संस्कृति की सबसे अधिक शिकार स्त्री ही हुई है। मास शूटिंग द्वारा होने वाली हत्याओं से भी बड़ा आँकड़ा महिलाओं की उन हत्याओं का है, जो उनके पतियों, बॉय फ़्रेंड्स या दूसरे पुरुष साथियों द्वारा की जाती हैं। अमेरिका में दस करोड़ लोगों के पास बंदूकें हैं। गायिका जेनिफर फॉक्स का बॉयफ्रेंड उसकी सफलता से जलता है और इसीलिए वह उसकी तीन गोलियों का निशाना बन पाँच वर्ष अस्पताल में रहने के लिए अभिशप्त है। 

“एक औसत माह में, तिरपन अमेरिकी औरतें अपने साथी द्वारा बंदूक से मारी जाती हैं और इससे ज्यादा घायल होती हैं। ---- दुनिया के किसी भी समृद्ध देश के मुक़ाबले अमेरिकी औरतों के बंदूक से मारे जाने की संभावना इक्कीस गुना ज्यादा है।--- औसतन साढ़े पाँच सौ औरतें हर साल इन बंदूकों की वजह से अपनी जान गँवा देती हैं।”2

 कुछ अमेरिकी राजनेता श्वेत राष्ट्रवाद के समर्थक हैं, यानी उनके वक्तव्यों में डर, नफरत और कट्टरता है, क्योंकि उन्हें गन-लॉबी से चुनावों में बहुत सा अनुदान मिलता है। कुछ राजनेता बंदूक संशोधन कानून पर कार्यवाही के हक़ में कभी नहीं रहे। अमेरिकी पुरुष के लिए शस्त्र मर्दानगी का प्रतीक हैं। नस्लवाद तो है ही। यहाँ सहकर्मी होते हैं, मित्र नहीं-

“अश्वेत तो खैर हैं ही अलग। महिलाएँ कितनी भी मिली जुली क्यों न हों, पुरुषवर्ग अपनी सुविधानुसार उन्हें भी अलग कर देता है। इतालवी हैं तो एक तरह का भाईचारा या यहूदी हैं तो दूसरी तरह का सांझापन।”3

सबवे से निकलना भी जोखिम से जूझना ही है। अपराधी वृति का कोई भी पुरुष आपको घेर सकता है और बंदूक की नोक पर पर्स और दूसरी कीमती चीजें छीन सकता है। अगर आपके पास यह सब नहीं है तो आपकी हत्या निश्चित है। सुरक्षा तंत्र में घुसा मृत्यु भय का यह सुराख व्यक्ति को पल-पल संत्रस्त करता है। 

अमेरिका रूपी सितारे में एक सुराख यह है कि नौकरी का कोई भरोसा नहीं। कभी भी ‘बाय आउट’ की स्थिति घेर सकती है, जैसे कि माइक के साथ हुआ। वह पहले शहर और फिर दुनिया ही छोड़ गया। 

उपन्यास में माँ नहीं माँएँ नायिकात्व लिए हैं। पक्षी हों या मनुष्य - दुनिया की सभी मादाओं के लिए बच्चे और घर-परिवार ही प्रथम वरीयता है। स्त्रियों द्वारा अमेरिका के 50 राज्यों में ‘मी टू’ और ‘मदरज अगेन्स्ट ड्रंक ड्राइविंग’ की तरह ‘मॉमस डिमांड एक्शन फॉर गन सेन्स इन अमेरिका’ आंदोलन भी चलाया जाता है। ऐसे आंदोलन जिन्होंने पुरुषों को कठघरे में ला खड़ा किया है। एँटी गन मूवमेंट में जसलीन, आयशा, लूसी, जेराल्ड जैसी मायेँ हिस्सेदारी निभाने के लिए झट से कूद पड़ती हैं। वे इस अभियान के लिए दिन रात काम करती हैं। चर्च, सिनेगाग, स्कूल, इस्लामिक सेंटर, हैल्थक्लब, मंदिर में जा लोगों को अपने साथ जोड़ती हैं। परिणामत: रेचर्ड, जय, खान जैसे पुरुष भी उनके साथ जुड़ जाते हैं।

स्कूली छात्र सबसे अधिक आहत हैं। चुप नहीं बैठ सकते। सभी छात्र संगठित हो वाशिंगटन में रैली निकालते हैं- मार्च फॉर अवर लाइव्ज़।  

अमेरिका में रह रहे भारतीय और पाकिस्तानी प्रवासियों में अपनी भाषा, खान-पान, संस्कृति के कारण आत्मीयता पनप ही आती है, किन्तु विभाजन के समय हुई नृशंसता, वहशत बीच की नफरत को नहीं मिटा पा रही है, छुरों के नंगे नाच, लूट-पाट, बलात्कारों की शृंखला, जिसने जय के दादा-दादी को, विस्थापितों को ज़िंदा लाशों में बदल दिया था। जैसा क्रूर इतिहास अमेरिका यूरोप के पास है, वैसी ही वीभत्स भारत विभाजन की त्रासदी है। द्वितीय महायुद्ध में जिस बर्बरता से साठ लाख यहूदियों का संहार किया गया, नाज़ियों द्वारा हजारों लोग रोज़ मौत के घाट उतारे गए, चार गैस चैम्बर बनाए गए - इसे जेरूसलम के लोग भूल नहीं पाते। जय को भी नंगे छुरों के पैशाचिक नाच, कुएँ में गिरती युवतियाँ, दादी की विक्षिप्तता के दृश्य हॉण्ट करते हैं। इसी कारण जय बेटी चिन्मया की मुस्लिम लड़के समीर खान के साथ दोस्ती स्वीकार नहीं कर पाता।

जय खलनायक नहीं है, लेकिन नायक या महामानव भी उसे नहीं कह सकते। सिर्फ तर्जनी उठाकर पत्नी जसलीन या बेटी चिन्मया की बात काटने का अचूक अस्त्र उसके पास है। चाहे पत्नी का दूर वाशिंगटन में रह रही बचपन की सहेली से मिलने का अनुरोध हो या बेटी का समीर खान के साथ हाई स्कूल की प्रॉम पर जाने अनुरोध। लेकिन बेटी का गोलियों की बौछारों से बचकर आना उसे निःशब्द कर देता है और वह एँटी-गन मूवमेंट की महत्ता स्वीकार लेता है। 

आज के व्यक्ति को सोशल मीडिया ने एक ऐसी आभासी दुनिया में लाकर छोड़ दिया है, जहाँ वह आस-पास के संसार से, उसकी विसंगतियों से, दुख और पीड़ा से कट कर रह गया है। इस आत्मकेंद्रित मनुष्य का चित्रण करती अनिल प्रभा कुमार लिखती हैं- 

“फेसबुक भर गया आत्ममुग्ध तस्वीरों और टिप्पणियों से। मेरे पुरस्कार, मेरी पुस्तकें, मेरी तस्वीरें, मेरे यात्रा विवरण, मेरे बच्चे, मेरी प्रशस्तियाँ। संवेदना शर्मिंदा होती रही और सोशल मीडिया पर चुटकुले घूमते रहे।”5
प्रकृति के चित्र पूरे उपन्यास में बिखरे पड़े हैं। जैसे- 

 “इस खिड़की के बाहर बरसात होकर हटी है। सब कुछ भीगा हुआ, धुला, साफ और उन्मुक्त। कभी- कभी कोई बूँद अभी भी ऊपरी शाखाओं से निचली डाली पर टपक पड़ती है और वह पत्ता झनझना उठता है। फिर कोई ओर बूँद किसी और पत्ते पर। बूंदें गिर रही हैं और पत्ते मदमस्त होकर थिरकते हैं।”5

पेड़ों की गहरी भूरी रेखाओं, स्वच्छ नीले आकाश, गदबदे बादलों, खिलखिलाती धूप के बिम्ब यहाँ वहाँ बिखरे हुये हैं। 

अपने देश की याद के स्वर का एकाधिकार यहाँ मंद पड़ गया है। अनिल प्रभा कुमार बताती हैं कि जय के दफ्तर के कंट्रोल रूम में दुनिया के अलग-अलग देशों का समय बताने वाली घड़ियाँ लगी हैं और उसे सारे बेगाने माहौल में अपने देश का समय बताने वाली न्यू दिल्ली की घड़ी और उसका समय ही अपना लगता है। लेकिन अमेरिका की सड़कों पर बदहवास भाग रहे अप्रवासी भारतीय उस देश में भी अपनी मूल्यवत्ता को, मानवता के प्रति निष्ठा को लेकर आगे आ रहे हैं। उन्होंने जान लिया है कि अमेरिका के सुख और दुख दोनों ही उनके अपने हैं। 
 सूत्रात्मता उपन्यास की सारगर्भिता में, भाषिक सौंदर्य और अर्थगत व्यंजना में चार चाँद लगा रही है। 

सूत्र:
1. खिड़कियाँ शायद होती ही इसलिए हैं कि आदमी बाहर देखता-देखता भीतर की ओर भटक जाये।6
2. भटकन और भूलभुलैया का दरवाजा पता नहीं क्यों अतीत की गली में ही खुलता है। जहाँ सपने नीम बेहोशी में सोये रहते हैं।7
3. सीधी सपॉट और सुखद खबरें बिकती नहीं, सनसनी बिकती है।8
4. सत्य संवेदना कुछ भी हो, उसकी आखिरी मंज़िल बाज़ार ही होता है।9
5. दुनिया के किसी भी डाउनटाउन का कलेवर अलग हो सकता है, पर भीतर वही आत्मा विचरती है। एक समय के बाद या कहें कि एक उम्र के बाद आप इनसे पीछा छुड़ाना चाहते हैं। भागना चाहते हैं, पर भाग नहीं पाते। यह बाज़ार आपकी मजबूरी बन जाता है।10
6. दुख कोई भेद भाव नहीं करता। न धर्म देखता है, न जाति, न देश, न त्वचा का रंग। बस एक जैसा ही दागता है ममता को।11
7. जब सिसक-सिसक कर थक गया दुख भीतर की ओर मुड़ता है, तब वहाँ अवसाद की खाई की शुरुआत हो जाती है। अंधेरा, संशय और भीषण संत्रास।12
8. वह औरत है। उसे काँप-काँप कर स्थिर होना आता है। वह, जिसकी जड़े ज़मीन में इतनी गहरी धँसी होती हैं कि वह गिर-गिर कर फिर खड़ी हो जाती है। जानती है, अगर वह अस्थिर हुई, उसकी शाखाएँ हिली तो उसका सारा घर डगमगा जाएगा।13
9. औरत जब माँ बन जाती है तो ज़िंदगी के प्रश्न पत्र के सभी उत्तर बादल जाते हैं। सम्बन्धों के नए समीकरण, नए सिरे से जुड़ते और टूटते हैं।14

निष्कर्षत: पचास राज्यों के पचास सितारों को चिह्नित करने वाले उस ध्वज की सार्थकता तभी बनी रह सकती है, जब देश बंदूक संस्कृति से मुक्ति पा ले। इसके लिए हर राजनेता/ जन प्रतिनिधि को, जन- जन, छोटे- बड़े सब को जागृत होना पड़ेगा। देश को, प्रजा को मृत्युभय और संत्रास से मुक्त करने के लिए एँटी गन कानून बनाने होंगे। उस देश में कितने सुराख हैं- बंदूक संस्कृति का सुराख, राजनेताओं के आत्मकेंद्रण और वोट नीति का सुराख, नसलवाद का सुराख, नारी उत्पीड़न का सुराख, सबवे में हत्याओं और लूटपाट का सुराख, सूचना प्रसारण में सिमटा बाजारवाद का सुराख, नौकरी में अस्थायित्व का सुराख आदि और अंत तक आते-आते इस सौद्देश्य रचना में बंदूक-संस्कृति से मुक्त होने के लिए लोग आगे आने लगते हैं। 

संदर्भ-
  1. अनिलप्रभा कुमार, सितारों में सूराख, भावना प्रकाशन, दिल्ली-91, 2021, पृष्ठ 129 
  2. वही, पृष्ठ 90
  3. वही, पृष्ठ 12 
  4. वही, पृष्ठ 73 
  5. वही, पृष्ठ 7 
  6. वही, पृष्ठ 7 
  7. वही, पृष्ठ 7 
  8. वही, पृष्ठ 15 
  9. वही, पृष्ठ 15 
  10. वही, पृष्ठ 32
  11. वही, पृष्ठ 67 
  12. वही, पृष्ठ 68 
  13. वही, पृष्ठ 101 
  14. वही, पृष्ठ 111 

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