काव्य: वाचस्पति द्विवेदी

वाचस्पति द्विवेदी
प्राचार्य, सन्त विनोबा स्नातकोत्तर महाविद्यालय देवरिया, उत्तर प्रदेश
चलभाष: +91 902 614 8141

1. नई रेख रच देंगे!

मैं तुम्हे पुष्प बुलाऊँ
तुम कहो भ्रमर मुझको
ये वही बात पुरानी
इसमें कुछ नया क्या है?

तुम बनो सागर मेरे
मैं नदी बहती बेकल 
ये बही बात पुरानी
इसने कुछ नया क्या है?

समय के वेग में
यूँ बह गए रिश्ते अपने
फूल पर धूल है
नदी रेत से पट चुकी कब की!

सागर को इंतजार है
लंबा...नदी से मिलने का!
कवि गरीब सा
प्रतिमान खोजता फिरता!

कोयल की कूक कहाँ है?
मैना की डाल खाली है
महुए का स्वाद कहाँ?
न सरसों का धानीपन!

वे कहते हैं, कवि जी
तुम भी पिज्जा-हट जाओ
बरगरे-हुस्न पर 
दो चार पंक्तियाँ कर लो!

अब लिखो 'सौस बन कर,
मैं ब्रेड से लिपट जाऊँ'
या 'रिंग- टोन बन कर
मैं बजता रहूँ बारंबार'!

नया जमाना है,
सब कुछ नया है इसमें
है पासवर्ड भी
वायरस भी नया है इसमें!

रहना अभी बचकर
ओ प्यारे से पाठक मेरे!
आज मायूस हैं
कल नई रेख रच देंगे!
***


2. सब चले गए!

सब चले गए!
जितने थे
नेह के, स्पर्श के
ताप के, संघर्ष के
प्रतिबिंब चले गए!

वो छोटा सा घरौंदा
क्षिति पर
मिट्टी का चूल्हा
कुछ सोंधा सोंधा सा
खदर कर बह गया जो
बारिश के थपेडों में कभी का!

वो माँ की हथेली और आंचल
जो हमें था सिक्त करता
वो दादी, खुद कहानी बन गईं 
लोरी सुना कर
पोते के सिर पर फिर रहे वो हाथ
बाबा के, कुछ खुरदरे से
उंगलियाँ जो सिंक गईं होरहा लगाते
बाप के कंधे, कराते जो सवारी
पीढियों का एक होना परस्पर
जूझना, सहना सिखाना!

वो सीधे और साधे 
बोली मैं कड़क पर गुड़ से मीठे
मिट्टी की महक में रच-बसे से
सब चले गए!

खो गई
हर गाँव की उम्मीद
शहर की भीड़ मैं
बस रह गए हम-तुम, 
कमरा और कमरे!
***


3. हर पल को ग़ज़ल कर दूं!

ये बहुत है, तुम साथ हो मेरे
जिंदगी खुशियों की पुरवाई है
वरना घर में बैठकर तन्हा
हर पल का वज़न गिनते!

तुम दिन के हो उजाले
रातों की महक तुम हो
होठों पर मुस्कुराहट की
बस एक वजह तुम हो!

कैसे ये वक्त बीता
मालूम नहीं मुझको
अभी तो हम चले थे
दो चार कदम मिलकर!

अभी तो इश्क सीखा है
मजलिस के माहिरों से
बाकी है आजमाना
कितने ही मशवरों को!

अभी तो फलसफे ही
समझ में नहीं आये
बस इतना जानता हूँ
तुम हो तो जिंदगी है!

वक्त को थाम लूँ बढ़कर
कितना तेज चला जाता है
डरता हूँ, कहीं जल्दी से
रेत शीशे से फिसल जाए तो?

इससे पहले कि वह घड़ी आये
मैं तुझको अमर कर दूँ 
लिखना है शगल मेरा
हर पल को गज़ल कर दूँ!
***


4. फिर खिलेंगे फूल प्रियतम

फिर खिलेंगे फूल प्रियतम
फिर से होगी भोर
आस की किरणें जगेंगी
मधुमास में चहुँ ओर!

रात रानी फिर करेगी
नींद से मुँहजोर
मोगरे पर फिर से होंगे
भ्रमर, रस के चोर!

सुख दुःख लिखें हैं नियति में
ज्यों दिवस में अवसान
रात का होना निरंतर
है सुबह का सम्मान!

सुख परखता आदमी के
कर्म को, संज्ञान को
दुख परखता आत्मबल को
तेज को, अभिमान को!

क्या मनुज जो रो रहा है
अल्प से ठहराव में
क्या मनुज जो दुखी होकर
डूबता अवसाद में!

क्या हुआ जो आज कुछ
अपने निगाहें फेरते हैं
क्या हुआ जो कुछ मनुज
कर्तव्य अपने भूलते हैं?

संघर्ष ही केवल हमारे
मान के हिस्से में है
लड़ चुके कितनी लड़ाई
एक लड़ाई और भी!

देखना एक दिन हमारे
सत्य की ही विजय होगी
देखना एक दिन स्वयं ही
काल चरणों में गिरेगा!

तुम हो मेरे साथ
समय की चाल भी कोई विषय है?
क्या अपव्यय अश्रु का
श्रम सदा से अंतिम निलय है!

फिर खिलेंगे फूल प्रियतम
फिर से होगी भोर
उम्मीद की किरणें जगेंगी
मधुमास में चहुँ ओर!
***

5. वसंत

आज वसंत ने खोल दिया है
पट अपना अनुराग से
मन हर्षित है नया कलेवर 
सजती भू उल्लास से!

लेश मात्र भी याद नहीं है
क्या खोया पतझड़ में हमने
नव उमंग है, नई सुबह है
नई मंजरी महक उठी है!

जित देखो तित रंग राग है
नए पुष्प खिलते आंगन में
नई कोंपलें झाँक रहीं हैं
कब आयें, ज्यों पूछ रही हों!

मनुज अचंभित और आनंदित
सहसा जैसे विश्वास नहीं हो
दुख से उबरा जैसे तैसे
डर है कोई वहम नहीं हो!

स्वागत है तेरा वासंती
मन में मेरे वास करो तुम
जीवन मेरा आनंदित कर
धरती का हर कण महका दो!
धरती का हर कण महका दो!


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