मेरी निगाहों से देखो: डॉ गणेश गायकवाड़ की सकारात्मक सोच

समीक्षक: किरण शिवहर डोंगरदिवे

वॉर्ड न 7, समता नगर, तालुका: मेहकर, जिला: बुलढाणा; चलभाष: 7588565576


मेरी निगाहों से देखो (गजल संग्रह)
रचनाकार: डॉ गणेश गायकवाड़
पृष्ठ: 116 मूल्य: ₹ 215


तुम्हारे कद से मेरा कद अगर मिलता नहीं यारो
तुम्हारे साथ फिर क्यु मैं खड़ा हूँ सोचना होगा।।
वो पत्थर हो कर दुनियाने उसे सर पर बिठाया है
मैं हीरा होके मिट्टी में पड़ा हूँ, सोचना होगा।।

आज के हालात में अगर एक दूसरे से बनती नहीं है तो एक दूसरे के साथ हम क्यों खड़े हैं यह सोचना होगा। अगर किसी रिश्ते में गहराई बाकी ना हो तो वह रिश्ता खत्म करके उसे भूल जाना है या फिर उसे दिल की गहराई तक ले जाना है इस बारे में सोचने की जरूरत है। अगर दुनिया में हम मिलजुल कर नहीं रहेंगे तो हीरे की कीमत होकर भी हम बेमोल बनकर रह जाएंगे। क्योंकी अगर दुनिया को पत्थर भी भा गया तो वह भगवान बन बैठता है, इस बात को ध्यान में रखकर दुनियाके तौर-तरीकों को अपनाकर हर एक से मिलनसार होकर रिश्ता निभाने की जरूरत है। इसी सोच को मेरी निगाह से देखो कहते हुए डॉ गणेश गायकवाड़ अपनी बात रखने आए हैं। गणेश गायकवाड़ यह नाम उर्दू और हिंदी ग़जल की दुनिया का एक जाना पहचाना नाम है। डॉक्टर गणेश गायकवाड़ वैद्यकीय सेवा में अपनी निपुणता हासिल करके जिस तरह से शारीरिक रोगों को मिटाने का जज्बा रखते है। उसी तरहसे समाज में फैली हुयी विचित्र मानसिक बीमारी को अपनी कलम से शल्य चिकित्सा करते हुये मिटाने का हौसला भी रखते है। मराठी भाषिक होने के बावजूद डॉ गणेश गायकवाड़ की अभिव्यक्ति की भाषा हिंदी या उर्दू इनमें से एक होती है। वह उर्दू की नजाकत को समझते हैं तथा राष्ट्रभाषा का महत्व भी जानते हैं। डॉ गणेश गायकवाड़ सही मायने में भाषावाद, प्रांतवाद, जातिवाद आदि से हटकर राष्ट्रहित तथा इंसानियत को अहमियत देते हैं। आगाज, चांद का सफर, मंजर बदल ना जाए, नए सफर का आगाज, आजादी रिटायर हो रही है, कभी सोचा न था जैसे एक से बढ़कर रचना संग्रह के बाद डॉ गणेश गायकवाड़ अब, मेरी निगाह से देखो इस नये गजल संग्रह के साथ अपना आगाज करेंगे.

आगे आगे देखो यारों ऐसे मंज़र आएंगे
हाथों में कशकोल लिए सारे तवंगर आएंगे।।

सच्चा शायर वह होता है जो आनेवाले दिनो का भविष्य आज बयान कर सके। आज के दौर में आदमी ने चाहे कितना भी धन कमा लिया हो, लेकिन कुदरत के सामने वह हरदम बेबस ही रहा है। कशकोल याने भिक्षा के पात्र को हाथों में लेकर हर अमीर आदमी एक दिन पाणी के लिये खडा रहेगा यह कहते हुये शायर डॉ गणेश गायकवाड़ आगे कहते है,

सात समंदर पीकर भी ना प्यास बुझेगी दुनिया की
पानी पानी चिल्लाते हुए लोग सड़क पर आएंगे।।
सारी दुनिया जीतने वाले खाली पीली होंगे सब
मुझ पोरस को ढूंढने आखिर सारे सिकंदर आएंगे।।


इंसान की लालच बहुत बुरी बला है समंदर पीकर भी उसके मन की प्यास नहीं बुझेगी, इंसान के मन का लालच बढ़ता ही चला जा रहा है, सब कुछ पाकर भी वह और कुछ पाने की कोशिश करता है। मगर इस दुनिया में लोगों को डरा कर हराकर लोगों को जीतने वाले सिकंदर कि नहीं बल्कि अपना स्वाभिमान और गैरत को जीवित रखनेवाले पोरस की लोक कद्र करते हैं यह बहुत बड़ी बात शायरने कही है.

करेगा कौन तमन्ना फकीर होने की
यहाँ सभी को है जल्दी अमीर होने की।।


इस हालत में सभी को अमीर बनने की चाहत है उसके लिये मगर मेहनत और सब्र रखने के लिये कोई तैयार नहीं है। इस दौर में डॉ गणेश गायकवाड़ दुनिया की प्यास बुझाने में लगे हुये है। जिस तरह पाणी अपना धर्म निभाते हुये प्यासे की प्यास बुझाने का काम करता है ठीक उसी तरह शायर अपने धर्म निभाते हुये अच्छाई का कार्य करते हुये कहते है,

किसी की प्यास मिटाने को मिट रहा हूँ मैं
निभाता रहता हूँ अजमत मैं नीर होने की।।


हम आज जिस तरह जी रहे हैं, जो सोच हम आज की दुनिया में रख रहे हैं उस सोच का और इस जिंदगी का हिसाब हमें अपने आने वाली नस्लों को देना पड़ेगा यह कहते हुए शायर कहते हैं,

ये हर सवाल का तुमसे जवाब मांगेंगी
ये नसले नौ है पुराना हिसाब मांगेगी


हमारे आज को आनेवाले कलको हिसाब देना पड़ेगा इसलिए हमें हर बात अपनी जिंदगी को नापतोल कर जीना होगा। क्योंकि आज की एक छोटी गलती भी अगले नस्लों को बहुत भारी नुकसान दे सकती है इस बात को हमें हमेशा ध्यान में रखना चाहिए। डॉ गायकवाड़ अपनी गजलों से हमें चेतावनी भी देते हैं और जीने का सबक भी सिखलाते है। आज का दौर बहुत कठिन और जीने के लिए दुश्वार हो चुका है। दुनिया में किसी पर भरोसा किस तरह किया जाए यह कोई बतला नहीं सकता, दिन के उजालों में जो धर्मात्मा बनकर खैरात बांटता फिरता है वह रात के अंधेरों में क्या करता है यह हम नहीं बतला सकते यह बात रखते हुए डॉ गायकवाड़ कहते हैं,

दिन में लूटाता है खजाना, जो गरीबों के लिए
वो चोर बनकर रात में बाहर निकलता है यहाँ।।
कुछ ऐसा बदला है जमाने का मिजाज इस दौर में
अब एक जरा सी बात पर खंजर निकलता है यहाँ।।

छोटी-छोटी बातों में खंजर चाकू और तलवारी निकलती है। इस दौर में समझदारी से काम नहीं लेता, हर इंसान झगड़ालू सा हो गया है, अपने गुस्से पर काबू रखना सब लोग पूरी तरह से भूल गए हैं यह बात अपने सामाजिक जीवन के लिए ठीक नहीं है यह बताना शायर का काम है जो इस संग्रह में शायर ने बखूबी से किया है। ऐसे ही हालत में शायर हौसला देते हुए कहते हैं,

किसी भी जुल्म की दहशत बहुत दिन तक नहीं रहती
किसी जालिम के घर शौहरत बहुत दिन तक नहीं रहती।
मियाँ यह तो हवा है, अपना रुख अक्सर बदलती हैं
यह शौहरत शान ये शौकत बहुत दिन तक नहीं रहती।।


जुल्म की हुकूमत ज्यादा दिनों तक नहीं रह सकती यह कहते हुए शायर आम इंसान को भी यह मशवरा देते हैं हमें अपने धन दौलत, ताकत सत्ता, खूबसूरती और शौहरत का गुमान नहीं होना चाहिए क्योंकी वक्त के साथ यह सब बातें बदल जाते हैं, हवा के रुख की तरह वक्त बदलते हुए देर नहीं लगती इसलिए हमें हमेशा के लिए जमीन पर पैर रखकर चलना चाहिए। अगर हम कोई काम पूरी लगन और मेहनत से करते हैं तो हम निश्चित रूप से कामयाब और सफल बन सकते हैं। मेहनत का फल क्या होता है, मेहनत क्या रंग लाती है यह कहते हुए शायर कहते हैं,

तराशोगे सलीके से तो पत्थर बोल सकता है
अभी बेजान लगता है वह मंजर बोल सकता है।
जहाँ सूरज नहीं जाता यहाँ भी हम पहुंचते हैं
जो कोई कह नहीं सकता वह शायर बोल सकता है

सलीके और शिद्दत से अगर हम कोई काम करते हैं तो हमें उस काम में सफलता जरूर मिलती हैं, बदहवासी और उदासी का मंजर खत्म होकर हर शय बात करने लगती है। यहाँ तक कि बेजुबान पत्थर भी बोल उठता है। यह सब कहते हुए जहाँ न पहुंचे रवि वहाँ पहुंचे कवि इस हिसाब से शायर अपनी कल्पना से क्या कुछ जीवित नहीं कर सकता इसकी जानकारी डॉ गायकवाड़ अपनी रचना से दिखाते हैं। आज के दौर में दौलत आने के बाद इंसान किस तरह बदल जाता है यह कहते हुये शायर कहते है,

अपनों से मिलने जुलने के चाहत चली गई
दौलत जो आई भर में मुरव्वत चली गई।।
मेहनत की रूखी सूखी में लज्जत थी बेहिसाब
रिश्वत जो आई घर में तो बरकत चली गई।।


ज्यादा दौलत आने के बाद इंसान अपने रिश्ते नाते भी भूल जाता है, बड़ों का आदर करना या छोटू से प्यार करना यह सब दौलत आते ही वह भूल जाता है। इसमें भी अगर वह दौलत रिश्वत और बेईमानी की हो तो घर का सुकून और बरकत भी चली जाती है। एक दूसरे को एक दूसरे से प्यार नहीं रहता इंसान हमेशा लालच और ज्यादा से ज्यादा दौलत कमाने के फंसा रहता है और अपनों से दूर होता जाता है। अगर मेहनत की कमाई थोड़ी भी हो तो उसका परिणाम अच्छा रहता है, घर परिवार में सुकून रहता है,

 कमाई मेरी मेहनत कि मेरे बच्चे समझते हैं
 कहीं पर भी उसे वह बेसबब खर्चा नहीं करते।।
 जरा सी बात का एहसान जो सब पर जताता है
 हम उस कमजर्फ से यारों कभी रिश्ता नहीं करते।।


अगर परिवार में मेहनत की कमाई आती है तो घर के सदस्य उस कमाई की और उस कमाने वाले की इज्जत करते हुए बेसबब और बेहिसाब खर्चा नहीं करते। वैसे ही शख्स छोटी-छोटी बातों पर खुद का बड़प्पन करते हुए लोगों पर एहसान जताता हो उस शख्स से शायर दोस्ती और रिश्ता नहीं बनाना चाहते है। शायद खुद मेहनत कश और इमानदार है और इसलिए अपने इर्द-गिर्द मेहनत कश और ईमानदार लोग दोस्त या रिश्तेदार की भूमिका में चाहिए।

उसकी शौहरत दिखाई देती है
उसकी मेहनत नजर नहीं आती।।
दुश्मनों से मैं जब से उलझा हूँ
दोस्तों की खबर नहीं आती।।


हम जब मन में किसी से बैर रखकर अपना वर्तमान व्यतीत करते हैं हमें अपने दोस्तों की याद नहीं आती बल्कि हमेशा दुश्मनों की दुश्मनी के बारे में हम सोचा करते हैं और अपने जीवन को अधिकाधिक तन्हा और अकेलेपन की ओर ले जाते हैं। हमें चाहिए कि दुश्मन की दुश्मनीको भूल कर अपने दोस्तों की दोस्ती के मीठे पल हमेशा दिल में तरोताजा रखकर जिंदगी को खूबसूरत बनाया जाए। अगर कोई शौहरत के आसमान पर बैठा है हमें उससे जलन या ईर्ष्या होने की बजाय उसकी मेहनत का फल उसे मिला है यह सोच कर उसकी कद्र करनी चाहिए। इस तरह से सच्चाई और ईमानदारी से जीने के लिए हमेशा दिल में सफाई और दिमाग में सच्चाईको लेकर चलना चाहिए खुद शायर हमेशा वही करते हैं और कहते हैं,

किसी पराए का चेहरा नहीं लगाया कभी
मेरा ही अक्स सदा मेरे आईने में रहा।।
वो जिसके हुकुम से यह सारी कायनात चले
तमाम उमर मैं उसके ही कायदे में रहा।।


अपनी जिंदगी को जीते हुए किसी दूसरे के मुखोटे को लेकर जिया नहीं जाएगा, हमें अपनी पहचान खुद बनानी चाहिए, खुद को पूरी सच्चाईसे परखना चाहिए, जिसने यह सारी कायनात बनाई है, और जिसके इशारे से वह चलती है उस विधाता या कुदरत के कानून और नियमों का पालन करते हुए जीवन व्यतीत करते हैं तो जीवन की परेशानी या दुख तो हमें नहीं सता सकती इस बात को हमें जेहन में रखना चाहिए यह बहुत बड़ी बात है डॉ गणेश गायकवाड़ ने अपनी शायरी में कही है। जीवन में अगर कुछ काम आता है तो बुजुर्गों की दुआ, बचपन के साथी का प्यार और यादें, माँ की दुआ यह गजल में लिखते हुए डॉक्टर गायकवाड़ कहते हैं,

हम अपने बुजुर्गों की वह बात नहीं भूले
हर हाल में अपनी औकात नहीं भूले।।
वो धूप बला की थी साया न था बच्चो पर
हम माँ की उन आँखों की बरसात नहीं भूले।।
शौहरत ने तुझे हमसे दूर किया लेकिन
वह दोस्तों के बचपन की सौगात नहीं भूले।।


बच्चों पर धूप का असर देख कर जिसकी आँखों से की बरसात हो वहाँ आँखे सिर्फ माँ की होती है, इतना प्यार शायद ही कोई रिश्ता दूसरे रिश्तो से निभाता है। उसी तरह से इंसान कितना भी शौहरतमंद और सफल इंसान अभी क्या आसमान को छू ले लेकिन बचपन के साथी और बचपन के दोस्तों का प्यार नहीं भूल सकता यह बड़े भावनिक ता और संवेदना के साथ समय मान लेना चाहिए। डॉक्टर गणेश गायकवाड़ की शायरी में इंसान, इंसानियत और इंसान का वजूद केंद्र स्थल पर है। वह इंसान किस जाति धर्म से है, कितना अमीर या गरीब है इससे उनको कुछ लेना देना नहीं है सिर्फ मानवता धर्म से वह इंसान को इंसान बनाने की गुजारिश करते हैं। धर्म के दायरे में बटे हुए लोगों से वह कहते हैं,

हिंदू हैं मुसलमाँ हैं ईसाई या सिख हैं सब
इस भीड़ में लेकिन क्या इंसान सलामत है।।
हर साल जलाते हैं रावण को मगर अब भी
इंसान के अंदर का शैतान सलामत है।।


हमें जाति धर्म से ऊपर उठकर इंसानियत को सलामत रखना चाहिए, जब तक इंसान के भीतर का शैतान सलामत है तब तक हर साल रावण को जलाने से दिल को सिर्फ झूठी तसल्ली मिलेगी,लेकिन बुराई खत्म नहीं होगी। हम इंसान को अगर भगवान की चाहत है तो हमें उसे मंदिर और मस्जिदों में ढूंढने के बजाय मजलूम और गरीबों में ढूंढना चाहिए, इस तरह की सोच रखने वाले डॉ गणेश गायकवाड़ वर्तमान का आईना लेकर चलने वाले शायर है। वर्तमान बेहद ही कठिन है यह बताते हुए वह कहते हैं,

रुखा परस्तों का यह हाल है जमाने में
नमक भी मिलता नहीं अब नमकहलालों को।।
मिटाता रहता है जो भूख इस जमाने की
वही तरसता है दुनिया में दो निवालों को।।


ईमानदार लोग आज के दौर में भुखे रह रहे हैं, भेज दो वक्त का खाना भी मुश्किल से मिलता है। सच्चाई और नमकहलाली की कद्र करनेवाले आज के दौर में कम दिखते हैं हर तरफ बेईमानी और मक्कारी फैली हुई है यह कहते हुए डॉ गणेश गायकवाड़ अपनी कलम से किसानों का हाल भी दुनिया के सामने रखते हैं, जो सारे जमाने की भूख मिटाता है वह किसान आज के दौर में भूख से परेशान होकर दो निवालों के लिए तरसता है यह हकीकत अपनी रचना से बयाँ करते हुए शायर अपनी संवेदनशीलता का परिचय देते हैं। मेरी निगाह से देखो कहने वाले डॉक्टर व्यवसायिक डॉक्टर है मरीजों का हाल देखते हुए उनका इलाज करते हुए वह कहते हैं,

जिस्म को पहले तो बीमार किया जा रहा है
और फिर बाद में उपचार किया जा रहा है।।
मुद्दतों बाद मियाँ निकले हैं खुदसे मिलने
आईने को भी खबरदार किया जा रहा है।।


इंसान को शारीरिक और मानसिक तौर पर बीमार करना और उसका उपचार करना आज के वर्तमान की सच्चाई है। वर्तमान स्थिति में हमारा आहार, सोच विचार, रहन सहन, रंग ढंग आदि सभी को हमने आधुनिकता के नाम पर तितर-बितर कर दिया है, जिसकी वजहसे हर आदमी शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर होता जा रहा है। आज के दौर के इस इंसान की शारीरिक और मानसिक बिमारीरी को दूर करने के एक सकारात्मक सोच की नीव की जरूरत है जबकी एक वैद्यकीय सेवा करते हुये डॉ गणेश गायकवाड़ रोग-निवारण में माहिर हैं, ठीक उसी तरह अपनी कलम की ताकत से सामाजिक समस्या, इन्सानी सोच में फैली हुयी नकारात्मकता को सकारात्मक बनाने की क्षमता रखते है। मेरी निगाह से देखो यह गज़ल संग्रह उनकी सकारात्मकता और संवेदनशीलता का परिणाम है। जिसे एज्युक्रेशन पब्लिकेशन नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है। मशहूर शायर राहत इंदौरी मेरी निगाहों से देखो के लिये बहुत महत्व पूर्ण टिप्पणी करते हुये कहते है," मैंने डॉक्टर गायकवाड़ का बहुत मुख्तसर कलाम पढा और सुना है बावजूद इसके यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं के वो गजल की तारीख तहजीब और रिवायत से मुकम्मल तौर पर वाकफियत रखते है और उन की गजल उन तमाम तकाज़ों को पूरा करती है जो आज की गजल के लिये जरुरी है।" राहत इंदौरी साहब ने डॉ गणेश गायकवाड़ को जिस तरहसे काबिले तारीफ समझा है उसे पढकर हम डॉ गणेश गायकवाड़ की शायरी की ऊँचाई का अनुमान जरूर लगा सकते है। इस नेकदिल और सच्चे शायर को जिंदगी में हर वह मकाम हासिल हो जिसके वो हकदार है। यह आशा व्यक्त करते हुये डॉ गणेश गायकवाड़ को दिल से बधाई।

सेतु, मार्च 2021

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