लघुकथाएँ: संतोष श्रीवास्तव

संतोष श्रीवास्तव

मंगलसूत्र
झोपड़पट्टी के नजदीक समाज सेविका मनोरमा की गाड़ी रुकी। गाड़ी को बच्चों ने घेर लिया। खबर हर एक झोपड़ी तक पहुँच गई
"मनोरमा ताई आई हैं।"
औरतें झोपड़ियों से निकल उनके संग संग चलने लगीं।
"भोत बुरा हुआ ताई। मंदा का मरद नाले मेइच मर गया। "
"भोत दारु पियेला था। पाँव फिसल गया नाले में।"
वे मंदा के झोपड़े के सामने खड़ी हो गईं। मंदा चूल्हे पर भात पका रही थी। बच्चे थाली लिए बैठे थे।
"कैसी है मंदा। आज मैं तेरे ही लिए आई हूँ। तेरे पति के मरने की खबर सुनकर।देख शहर के बड़े सेठ जी ने तेरे लिए मदद भेजी है। फैक्ट्री में काम भी दिला दूंगी तुझे।" कहते हुए उन्होंने रुपयों से भरा लिफाफा उसकी ओर बढ़ाया। 
मंदा खड़ी हुई। उनके पैर छुए।
"भोत दया है आपकी ताई पर मेरे को मदद नईं चईए। कमाती न मैं। बिल्डिंग में झाड़ू पोछा बर्तन करके।"
"हाँ पर उतने में तेरा गुजारा कैसे होगा। तीन बच्चे हैं तेरे। पति की कमाई भी तो...।"
"अच्छे से होगा ताई। पहले भी होता था न। मरद तो अपनी कमाई दारू में उड़ा देता था। उल्टा रोज मारता था मुझको। आधी-आधी रात तक गाली गलौज, उठापटक। एक रात भी चैन से नहीं सोई।"
वे मंदा के चेहरे पर पीड़ा की रेखाएँ स्पष्ट देख रहीं थीं। 
सहसा मंदा ने बेटी को आवाज दी।
"रे छन्नो, ताई के लिए गिलास में लिमका ला। बड़ी बॉटल मंगाई है ताई। बच्चे तरस गए थे। तीनों की किताब कॉपी भी खरीद ली। मंगलसूत्र बेचकर।"
मंदा उनके नजदीक आकर फुसफुसाई, "भोत चुभता था ताई मंगलसूत्र।"
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पैर पसारता लॉकडाउन
अरसे बाद आई थी छोटी बहन शशि। "दीदी, पीएचडी के लिए यहाँ यूनिवर्सिटी में थोड़ा काम है। डाटा कलेक्ट करना है। प्रवासी प्रोफेसर के साथ हम शोधकर्ताओं की मीटिंग्स भी है।"
"वाह, यह तो अच्छी खबर है। तुम रहोगी तो मुझे सिया की कमी नहीं खलेगी। "
उसकी इकलौती बेटी सिया पेंसिलवेनिया में अपने पति के साथ है।
शशि के आने के हफ्ते भर बाद ही कोरोना ने विकराल रूप ले लिया। ट्रेनें, हवाई जहाज बंद। लॉकडाउन की स्थिति में शशि को रुक जाना पड़ा। लेकिन उसका रुकना, पति के साथ उसकी बढ़ती नजदीकी, दिन भर एक ही कमरे में दोनों का ताश या शतरंज खेलना, बात-बात में खिलखिलाना, पति द्वारा, हँसती हुई शशि की ठोड़ी छूना या नाक दबाना। बालकनी में शशि की कमर में हाथ डाले रहना। शशि भी उनके कंधे पर सिर टिका देती। यह सब क्या हो रहा है? शंका से भर उठी वह।
"सुनिए लॉकडाउन की अवधि तो बढ़ती ही जा रही है। ऐसे में शशि कब तक रहेगी यहाँ?
कमाल है ऐसा सोच भी कैसे सकती हो तुम। दिमाग के ताले खोलो और अपने काम में मन लगाओ। अच्छी-अच्छी डिशेस बनाकर हम दोनों को खिलाओ।"
कहकर जाते हुए पति सीधे शशि के पास पहुँचे और दरवाजा बंद कर लिया।
उसकी जिंदगी का लॉकडाउन शुरू हो चुका था।
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 मौत निश्चित है

दिहाड़ी मजदूरों के झुंड में वह भी काम मिलने की आस लगाए खड़ा था कि कारखाने और इमारत निर्माण के ठेकेदारों ने सूचना दी, "घर जाओ तुम लोग और इक्कीस दिन निकलना मत घर से। बहुत बुरा समय चल रहा है। क्या तुम्हें पता नहीं है कोरोना के कारण सरकार ने लॉकडाउन की घोषणा की है। 21 दिन तक पूरा देश बंद रहेगा। सभी कारखाने बंद रहेंगे। निर्माण कार्य रोक दिया गया है।"
उसने सिर से गमछा खोलकर पेट की कुलबुलाती अंतड़ियों पर कसकर बांध लिया। महानगर के मच्छर, कचरे से भरे, बदबूदार नाले की दीवार से सटे उसके झोपड़े में खाली पेट लिए बच्चे भी तो इंतजार कर रहे हैं थाली में भात का।
इस बुरे समय में मौत निश्चित है। फिर चाहे भूख से हो या कोरोना से।
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ग्रहण
हरिप्रसाद मास्टर सातवीं कक्षा के बच्चों से पूछ रहे थे -
"कल सूर्य ग्रहण था। जब चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के मध्य से होकर गुजरता है तो वह सूर्य को पूर्ण रूप से आच्छादित कर देता है। सूर्य का बिंब ढक जाता है और धरती पर उसकी छाया से अंधेरा छा जाता है। इसका आध्यात्मिक स्वरूप भी हमारे पुराणों में मिलता है। बताओ रोहित, कल तुमने क्या किया?"
रोहित ने खड़े होकर कहा -"कल सूतक लगने के पहले हमने नाश्ता कर लिया था। फिर सूतक समाप्त होने के बाद खाना खाया।"
उसके मोटे शरीर को देखकर सब हँसने लगे। 
"तुम बताओ मीरा। खाने के अलावा तुमने क्या किया?"
जब तक ग्रहण था हमने कुछ नहीं खाया। माँ ने जो थोड़ी बहुत खाने की सामग्री घर में थी उसमें तुलसी के पत्ते डाल दिए। ग्रहण समाप्त होने पर माँ ने घर में गंगाजल का छिड़काव किया। फिर हम सब ने स्नान करके भोजन किया।"
"नहाते क्यों है मास्टर जी?" रोहित ने पूछा।
"पृथ्वी पर छाया पड़ती है न चंद्रमा की।"
"तो क्या छाया अपवित्र होती है?" मीरा ने पूछा 
मीरा के प्रश्न ने हरिप्रसाद को न जाने कितने वर्षों के पार पहुँचा दिया। आज वह पढ़ लिखकर मास्टर है। लेकिन है तो दलित, अछूत होने के कारण उनके माता-पिता, पूरे परिवार ने सवर्णों का घोर अत्याचार सहा है। 
सड़क पर चलते हुए उनकी छाया उन पर पड़ जाए तो वे तुरंत स्नान करते थे। मुँह में तुलसी रखकर सूर्य का जाप करते थे।
एक बार तो सड़क पर एक पंडित के आगे आगे चलने के कारण उनके पिता पर पंडित ने मैला फिकवाया था। 
"बताइए न मास्टरजी, छाया अपवित्र कैसे हुई?"
"छाया अपवित्र नहीं होती। जो छाया को अपवित्र मानते हैं उनके मन अपवित्र होते हैं, सोच अपवित्र होती है।"
कहते हुए हरिप्रसाद को भर आईं आँखें पोछने के लिए दो बार चश्मा उतारना पड़ा।
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 विजेता
एवरेस्ट विजय दल के साथ उसका भी फूल मालाओं से स्वागत हो रहा था। "देखो हमारे गाँव की बेटी को। बिना किसी ट्रेनिंग के एवरेस्ट तक जा पहुँची।"
हिमालय की तराई में बसे उसके छोटे से गाँव से सभी लोग जलसे की जगह पर इकट्ठा थे। माइक पर दिल्ली से आए पत्रकार पर्वतारोहियों के विषय में बोल रहे थे। जब उसकी बारी आई वह अपनी कुर्सी से उठी, "रुकिए महोदय"
सभा में सन्नाटा छा गया। उसके गाँव के लोग भी सकते में आ गए। जाने क्या कहने वाली है यह। 
वह मंच की सीढियाँ चढ़कर माइक तक पहुँची
"महोदय, क्या मैं कुछ निवेदन कर सकती हूँ।"
क्यों नहीं, आप तो विजेता पर्वतारोही दल के साथ हिमालय की चोटियों से लौटी हैं। आपके इस अभियान पर हम गौरवान्वित हैं कि तराई के एक छोटे से गाँव की .......
"यही तो मैं कहने आई हूँ महोदय। मैं हिमालय की चोटियों पर पताका फहराने नहीं गई थी। न ही मेरा नाम एवरेस्ट विजय में शामिल करें। मैं तो अपनी देवभूमि हिमालय पर से कचरा हटाने गई थी। आप विजय पताका फहराते हैं पर हिमालय की चोटियों पर कितना कचरा फैलाते हैं। इसी कारण तो हमारी देव नदियाँ मैली हो रही है।" सहसा सभागृह उसके नाम की जय जयकार से गूँजने लगा। पर्वतारोही नजरें नीची किए बैठे थे और वह फूल मालाओं से लद चुकी थी। 
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मुखौटा
आज वह अपने प्रिय कथाकार उमेश दीक्षित से मिलेगी। स्त्री पक्षधर एक ऐसे लेखक से जिनकी कहानियाँ, लेख विभिन्न पत्रिकाओं में वह अरसे से पढ़ती आ रही है। यह पहला लेखक है जिसकी रचनाएँ स्त्री के पक्ष में होती हैं। विभिन्न साहित्यिक समारोहों में छाए रहते हैं उमेश दीक्षित। पता चला है कि वे उसी के शहर में आ बसे हैं। मुलाकात के लिए बिना फोन किए वह उन्हें सरप्राइस देना चाहती थी।
"उमेश दीक्षित जी मैं आपकी फ़ेन हूँ। मन खुश हो जाता है आप की कहानियाँ पढ़ कर। मैं भी एक छोटी मोटी कवयित्री हूँ। यह मेरा पहला कविता संग्रह आपको भेंट करने के लिए लाई हूँ। 
इतवार का दिन। आज तो उसकी ऑफिस से भी छुट्टी है। अच्छा समय बीतेगा अपने प्रिय लेखक के साथ। 
उमेश दीक्षित के फ्लैट के सामने खड़ी होकर उसने घंटी की तरफ हाथ बढ़ाया ही था कि अंदर से मारने, पीटने, बर्तन फेंकने और एक स्त्री स्वर के रोने की आवाज सुनकर रुक गई। एक पुरुष स्वर रोती हुई स्त्री को गंदी-गंदी गालियों से नवाज रहा था। 
तभी सामने वाले फ्लैट से एक महिला निकली। फ्लैट के लैच में चाबी घुमाकर उसने लिफ्ट का बटन दबाया। उसकी ओर देखकर वह महिला मुस्कुराई, "दीक्षित जी से मिलने आई हैं। अभी तो वे शराब पीकर अपनी पत्नी पर मर्दानगी आजमा रहे हैं। रोज का तमाशा है, इतवार के दिन तो सुबह से शुरू हो जाते हैं। बनते हैं बड़े लेखक।"
वह अवाक... कभी उमेश दीक्षित का फ्लैट देखती कभी लिफ्ट का इंतजार करती महिला को... 
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वापसी
वह भाग रहा है। आवाज पीछा कर रही है -"करमजला, माँ तो मर गई तेरी पर मेरी छाती पर मूंग दलने तुझे और इस अपाहिज को छोड़ गई। रोज-रोज का कोसना, काटना, मारपीट से तंग आ चुका है वह। जब से सौतेली माँ आई है। एक दिन चैन से नहीं गुजरा। बेचारे पापा उन्हें इसलिए ब्याह कर लाए थे कि उनके दोनों बेटों को वह कलेजे से लगा कर रखेंगी। शादी से पहले ही पापा ने कह दिया था -"देखिए रमा जी, हम शादी अपने दोनों बेटों के लिए कर रहे हैं। दोनों की माँ असमय चली गई। आप उनकी माँ की तरह ही परवरिश करेंगी।"
गाड़ी, बंगला, समृद्धि देखकर रमा ने शादी के लिए हाँ कर दी थी पर अब दोनों बेटों के पीछे हाथ धोकर पड़ गई हैं। जब से उनका अपना बेटा हुआ है तब से तो और। पापा से कह भी दिया उन्होंने।
"सब कुछ मेरे बेटे के नाम होगा। जमीन जायदाद रुपए जेवर तुम्हारे निकम्मे अपाहिज बेटे तो बेच खाएंगे सब। "
भागते भागते वह अचानक रुका। यह वह क्या कर रहा है। उसके जाते ही उसके पोलियो ग्रस्त छोटे भाई को तो मार ही डालेंगी वे। वही तो सब कुछ करता है। नहलाना धुलाना, खाना खिलाना, बातें करके उसका मन बहलाना। 
जितनी तेजी से वह घर छोड़कर भागा था, उस से दुगनी तेजी से वह घर वापस लौट पड़ा। 
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