अथर्ववेद और आयुर्विज्ञान

- नागेन्द्र कुमार शर्मा

अध्यक्ष, हिंदी विभाग, राम जयपाल महाविद्यालय, छपरा(जय प्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा)


  'वेद' हिंदू धर्म के प्राचीनतम आधार-ग्रंथ हैं। यों, 'वेद' का शाब्दिक अर्थ है- ज्ञान (विद्+घञ्, अच् वा)।1 स्पष्ट ही यह ज्ञान सामान्य लौकिक या भौतिक ज्ञान मात्र तक सीमित न होकर आध्यात्मिक अथवा पारमार्थिक ज्ञान का उपलक्षक है, जैसा कि 'संक्षिप्त हिंदी शब्द-सागर' में इसका अर्थ लिखित भी है कि "किसी विषय का -विशेषत: धार्मिक या आध्यात्मिक विषय का सच्चा या वास्तविक ज्ञान।"2 इस संदर्भ में स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा 'ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका' में किया गया यह निर्वचन उल्लेखनीय है कि "विंदंति जानंति, विद्यंते भवंति, विंदंते लभंते, विंदंति विचारयंति सर्वे मनुष्याः सत्यविद्यां यैर्यषु वा तथा विद्वांसश्च भवंति, ते वेदा:" अर्थात् जिनसे सभी मनुष्य सत्य विद्या को जानते हैं, अथवा विचारते हैं, अथवा विद्वान् होते हैं अथवा सत्य विद्या की प्राप्ति के लिए जिनमें प्रवृत्त होते हैं, उनको वेद कहते हैं।3

   ज्ञातव्य है कि 'वेद' शब्द का प्रयोग प्रारंभ में संपूर्ण वैदिक वाङ्मय के अर्थ में होता था, जिसके अंतर्गत संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद सभी समाहित थे। किंतु, बाद में यह केवल चार संहिताओं-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का ही द्योतक रहा।शेष तीनों-ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद मूल वेदों के अंग/अंश होते हुए भी उनसे पृथक् माने गए, जबकि वास्तव में ये कर्मकांड, उपासनाकांड और ज्ञानकांड के रूप में वेदों के ही विस्तार हैं और इन सबको मिलाकर ही वैदिक साहित्य पूर्ण होता है।ध्यातव्य है कि 'वेद' को 'श्रुति' भी कहते हैं,क्योंकि मूल रूप से ये श्रुति-परंपरा से प्राप्त हैं। चूँकि वेद ज्ञानरूप हैं और ज्ञान ब्रह्मरूप, इसलिए इन्हें नित्य और अपौरुषेय माना गया है।

  वस्तुतः 'वेद' परम ज्ञान के चरम निदर्शन हैं। दूसरे शब्दों में, ये उत्तमोत्तम ज्ञान के अकूत भंडार हैं। अब तक विश्व का कोई भी चिंतन-प्रवाह इनसे आगे या ऊपर नहीं जा सका है। अतः इनकी महिमा-गरिमा के संबंध में यहाँ संक्षेप-कथन भी संभव नहीं। अस्तु, अभी मेरा विवेच्य विषय है- अथर्ववेद और आयुर्विज्ञान।

      वैसे तो सभी वेदों में सभी विषयों का न्यूनाधिक वर्णन मिल जाता है, किंतु आयुर्विज्ञान अथवा स्वास्थ्य विज्ञान की दृष्टि से अथर्ववेद का निश्चय ही सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान है। स्मरणीय है कि सबसे प्राचीन चिकित्सा-पद्धति 'आयुर्वेद' का आरंभ और विकास अथर्ववेद से ही मान्य है। वास्तव में इसके अंतर्गत उन सारे तथ्यों का बड़े विस्तार से उल्लेख है, जिनके आधार पर मनुष्य स्वस्थ और सानंद रहकर शतायु जीवन जी सकता है। आत्मसाक्षात्कार के फलस्वरूप आत्मविश्वास से भरपूर वैदिक ऋषि का यह उल्लसित उद्गार कितना आश्वस्तिकर और आशापूर्ण है - " अयं मे हस्तो भगवानयं भगवतर:। अयं मे विश्वभेषजोयं शिवाभिमदर्शन:।।"4

अर्थात् मेरा हाथ भाग्यवान है, यह सब रोगों का निवारक और सब तरफ मंगलविधायक है।

  अथर्ववेद में स्वास्थ्य संबंधी सभी बातों का बड़ा विस्तृत और व्यवस्थित वर्णन है, जिसे देखकर ऐसा लगता है कि जैसे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का ही कोई अत्युत्तम ग्रंथ हो। इसमें रोगों के लक्षण, रोगोत्पत्ति के कारण एवं स्थान, प्रतिरक्षण और निवारण के उपायों का विशद निरूपण है। इस संदर्भ में डा. अखिलेश झा का यह अभिमत सार्थक और समीचीन है कि "इस वेद में जब भी बीमारी और उसके इलाज का प्रसंग आता है, तब सबसे पहले हर बीमारी की उत्पत्ति का स्थान बताया जाता है, फिर बताये जाते हैं बीमारी के कारण और फिर बताये जाते हैं उस बीमारी के परिणाम। इन सबके बाद बताया जाता है पहले बचाव का उपाय और फिर इलाज के लिए जरूरी ओषधि एवं उसके सेवन के तरीक़े।"5

 अथर्ववेद में अधिकांश रोगों की उत्पत्ति का कारण कृमियों या विषाणुओं को बताया गया है, जो आधुनिक चिकित्सा विज्ञान से भी पुष्ट और प्रमाणित होता है। अथर्ववेद के अनुसार ये कृमि मुख्यतः दूषित जल से उत्पन्न होते हैं। जल के अतिरिक्त ये पहाड़ पर, जंगल में, वनस्पति में और पशुओं में भी उत्पन्न होते हैं। इनमें कुछ तो दिखाई पड़ने वाले कृमि होते थे और कुछ दिखाई न पड़ने वाले भी। अथर्ववेद में दर्जनों प्रकार के कृमियों के वर्णन के साथ उनके प्रभाव में आने के कारणों का भी पूरा उल्लेख है। इस संबंध में सबसे बड़ा कारण सूर्य-किरणों का समुचित सेवन न करना कहा गया है। साथ ही शुद्ध जल का पर्याप्त सेवन न करना और पोषण का अभाव यानी पौष्टिक आहार का न लेना भी प्रमुख कारण बताए गए हैं। इनके अतिरिक्त अनेक रोगों के कारणस्वरूप मनुष्य पर, पशुओं पर, पेड़-पौधों पर खेत-खलिहान या कहीं और होनेवाले गलत प्रयोगों की भी चर्चा है।

    पूर्वोक्त परिस्थितियों में वैदिक काल में अनेक प्रकार के रोग होते थे।वेद में उन सबकी बड़ी लंबी सूची मिलती है।उदाहरणार्थ एक बुखार के उसमें दर्जनों रूप गिनाए गए हैं- हूडु, अर्चि,शौचि, शकल्य, रूर, अभिशोक, बलास, कास, शीत, ग्रैष्म, वार्षिक, शारद, सदंदि, अन्येषु, उभयद्यु, तृतीयक, वितृतीयक आदि-आदि। बुखार के इतने प्रकार अन्यत्र शायद ही उपलब्ध हों। इसी प्रकार अथर्ववेद में अन्य अनेक रोगों के अनेकानेक प्रकार भी वर्णित हैं।
   अथर्ववेद में न केवल रोगों का वर्णन है, बल्कि उनके निवारणार्थ अनेक ओषधियों का भी उचित निर्देश है।वैदिक ओषधियों में अधिकतर प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली और रोग होने की संभावनाओं को ही नष्ट करनेवाली हैं, जिन्हें आजकल अंग्रेजी में 'प्रीवेंटिव मेडिसिन' कहा जाता है। डा. अखिलेश झा के शब्दों में-"वैदिक ओषधियाँ अनेक प्रकार की थीं। कुछ ओषधियाँ गुच्छों वाली थीं, कुछ एक कोंपल वाली,कुछ बहुत फैलने वाली, कुछ फूल वाली तो कुछ बिना फूल वाली थीं, कुछ शाखारहित तो कुछ विस्तारवाली, कुछ हजार पत्तों वाली, कुछ तीखी नोंक वाली, कुछ मीठी थीं तो कुछ स्वादरहित थीं और कुछ ओषधियाँ प्रकाश वाली भी थीं।ये ओषधियाँ एक तो मनुष्य को बीमार ही नहीं होने देती थीं और यदि रोग किसी कारण से हो जाए, तो उनका निराकरण ओषधियों से पूरी तरह हो जाता था।"6

  अथर्ववेद में रोगों के उपचार हेतु ओषधियों के अतिरिक्त स्पर्श एवं शल्य चिकित्सा का भी वर्णन हुआ है। आज भी कुछ जगह स्पर्श चिकित्सा का प्रयोग किया जाता है, जिसे एक्यूप्रेशर आदि नाम से जाना जाता है। पुनः अथर्ववेद में अनेक स्थानों पर रोगोपचार में मंत्रों, मणियों आदि के प्रयोग का भी वर्णन देखने को मिलता है।

  इस प्रकार स्पष्ट है कि अथर्ववेद और आयुर्विज्ञान में बड़ा सीधा संबंध है।यदि समग्रता में देखा जाए तो अथर्ववेद से विकसित आयुर्वेद ही सर्वोत्कृष्ट चिकित्सा विज्ञान है।इसके अंतर्गत मनुष्य के सुखी-स्वस्थ जीवन हेतु निर्दिष्ट सम्यक् आचार-विचार का अवलंबन हर तरह से आवश्यक, उपयोगी और उपादेय है।दुर्भाग्यवश आज हम अपने उस ज्ञान-प्रवाह से विलग-वियुक्त हो पराश्रित और परमुखापेक्षी हो चले हैं।अतः आवश्यकता है-अपने उन तप:पूत तत्त्वद्रष्टा ऋषियों के विचारों के अनुसंधानसहित अनुपालन की, ताकि हमारा वर्तमान जीवन अधोगति से उबरकर उन्नत और ऊर्ध्वमुखी है सके।अंततः यही आह्वान कि "कृण्वन्तो विश्वमार्यम्"।7

संदर्भ-संकेत : 
1- वामन शिवराम आप्टे- संस्कृत-हिंदी कोश, पृष्ठ-975
2- संक्षिप्त हिंदी शब्दसागर- नागरी प्रचारिणी सभा, पृष्ठ-928
3- डा. राजबली पाण्डेय- हिंदू धर्मकोश, पृष्ठ- 596
4- अथर्ववेद- कांड-4,सूक्त-13, मंत्र-6
5- अखिलेश झा- वेदगाथा, पृष्ठ-54
6- उपरिवत् - पृष्ठ-57
7- ऋग्वेद, मंडल-9, सूक्त-63, मंत्र-5 का एक अंश

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