व्यंग्य: आदान प्रदान का सुख

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

आदान और प्रदान दोनों ही सुख के कारक हैं। रिश्वत किसी भी रूप में हो, शिष्टाचार और सुख की पराकाष्ठा है। डाउ जोन्स का ग्राफ ऊपर उठ रहा है और नैतिक मूल्य नीचे गिर रहे हैं। बेईमानी निपुणता मान ली गई है और विश्वासघात उत्तम कला। कितना सहज और सरल समय है, जो मर्जी आए करो। आपके पास देने को है तो सब जायज है, आदानम् सुखम्, प्रदानम् सुखम्। रिश्वत का भाषाशास्त्र बदल गया है, अब रिश्वत तारक हो गई है।
रिश्वत रसगुल्ले जैसी होती है। दिखती है तो मुख लार से भर जाता है। आती है तो अविलंब भीतर हो जाती है। इतनी भीतर की भ्रष्टाचार निरोधक दस्ते की मशीनें भी नहीं देख सकतीं। बस यह अकेले नहीं पचती, मिल बाँट कर खाओ-खिलाओ तो सुपाच्य है। ऐसी सुपाच्य कि इससे कभी पेट नहीं भरता। एक बार खा लो तो बार-बार खाने की अंतःप्रेरणा मिलती है। एक बार खा लो तो खिलाने वालों की लाइन लग जाती है। खिलाने वाले भी जबरदस्ती कभी बच्चों के नाम पर, कभी भगवान के नाम पर, कभी जिलेटिन की छड़ों के नाम पर खा-खिला जाते हैं। किसी गँवार को फिर भी खाना नहीं आए तो खिलाने वाले उसका जबड़ा फाड़ कर ऐसे ठूँस जाते हैं कि हमें उनके कौशल की दाद देनी पड़ती है।

रिश्वत पचाने की क्षमता के अनुपात में पद मिलता। दो सौ – पाँच सौ की रिश्वत पचती हो तो सरकार ने कर्मचारियों की चतुर्थ श्रेणी बना रखी है। रिश्वत का मान हजार में हो तो तृतीय श्रेणी, लाख में हो तो द्वितीय श्रेणी और करोड़ में हो तो प्रथम श्रेणी के पद बना रखे हैं। सौ करोड़ से ऊपर पचाने की क्षमता हो तो धूर्त श्रेणी है। धूर्त और महाधूर्त का राजनीति शास्त्र में अर्थ अलग है। पावर बढ़ता है तो आधार अंक का मूल्य विकराल हो जाता है। दस का पावर दस हो तो यह दस अरब होता है। आप गिनिए मत, यह सही है, मैंने गिन कर देखा है। अर्थव्यवस्था का आधार ट्रिलियन में करना हो तो रिश्वत का आकार बिलियन में होना चाहिए। वह जमाना गया जब रिश्वत बिना गिने, बिना देखे और भरोसे में रख ली जाती थी। डर लगता था कि उसे छूने पर हाथों में रंग लग जाएगा और ईडी वाले पकड़ लेंगे। अब रिश्वत हाथों-हाथ कैश काउंटिंग मशीन पर गिन ली जाती है। कर्मचारी का काम रिश्वत उगाहना और कार की नंबर प्लेट बदलना है, नोट गिनना नहीं।

विकास बलि माँगता है। गरीब हो और रिश्वत नहीं दे पाओ तो गरीब रहो और अपने बच्चों को सड़कों पर जन्म दो। रिश्वत दे पाओ तो धीरे-धीरे इतने अमीर हो जाओ कि खुले हाथों, खुले मन से, गुपचुप दे सको और हजारों करोड़ कमा सको। विकास की गंगा में आचमन करना हो तो हर जगह पंडे हैं। हमारा परंपरावादी सोच हमारी आर्थिक प्रगति में बड़ा बाधक रहा है। रिश्वत खाने वाले राजनेताओं को प्रोफेशनल नहीं समझा गया। डॉक्टरों, वकीलों और सीए जैसे पेशेवरों ने जिस तरह फीस खाना शुरू की तो रिश्वत को प्रतिष्ठा मिली। एक जमाना था, लोग रिश्वत संभाल कर रखने के लिए स्विट्जरलैंड का मुँह ताकते थे। अब देश में ही एक अदद राजनेता खरीद कर रख लो, मनचाहा काम करेगा और बढ़िया करेगा। देखिए, रिश्वत लेकर खरीदी गई तोपें कितनी अच्छी मार कर रही हैं, चीनियों को पीछे ही धकेल रही हैं। विरोधियों ने तब गड़बड़ नहीं मारी होती तो हम सस्ते में कितनी सारी तोपें खरीद सकते थे। उतनी रिश्वत में अब कॉफिन बॉक्स ही खरीदे जा सकते हैं।

अब हमारी अर्थव्यवस्था उदार हो रही है और रिश्वत के प्रति हमारा आग्रह मुखर। ये विकास के दिन हैं, विशाल होने के दिन हैं। रिश्वत का बीज गाँव के खेत में छोटा-सा होता है, पटवारीनुमा। राजधानी में वह बरगद जैसा विशाल वटवृक्ष हो जाता है। जिन्हें बरगद असांस्कृतिक लगता है वे इसे आम मान सकते हैं। इससे मीठे-मीठे केसरिया आम टपकाने की व्यवस्था कर सकते हैं। वे आम की टोकरी आगे भिजवा सकते हैं। बरगद को बरगद मानने से आदान-प्रदान का सुख नहीं मिलता। विकास का फल सभी हितधारकों को मिलना चाहिए। जिसे रिश्वत लेना नहीं आए वह ऐसे घूरा जाता है जैसे क्लास के बाहर कोई बच्चा खड़ा हो। पाप पर सोने का मुलम्मा चढ़ाकर ये उसे पुण्य बनाने के दिन हैं, सुख के दिन।
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