सेतु - मानवी विकास यात्राओं के (जीन और मीम)

चंद्र मोहन भण्डारी
जीवन एक संयुक्त उपक्रम (joint venture) है सूचना संग्रह में समर्थ जेनेटिक्स और
ऊर्जा रूपांतरण में समर्थ ऊष्मागतिकी के बीच।

(Life is a joint venture between information storing genetics and energy transforming thermodynamics.)
- Ervin Schrodinger

(सेतु – यह सरल सा दीखता शब्द अपने में एक सागर समेटे है और अपने विस्तीर्ण एवं गहन संदर्भों में जीवन की हर विधा से अंतरंग रूप में जुड़ा है। प्रस्तुत लेख में इस बहुआयामी शब्द के ऐसे ही एक आयाम को चित्रित करने का प्रयास है। मोबाइल और सोशल नेटवर्किंग के जमाने में लगभग हर कोई जानता है मीम क्या होती है और कैसे भेजी जाती है। कुछ लोग अब जानने लगे हैं कि जीन क्या होती है और कैसे एक पीढ़ी से दूसरी में गुणों व लक्षणों को संप्रेषित करती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि जीन व मीम में संबंध क्या और क्यों है? बात सरल है: दोनों विशेष प्रकार के सेतु हैं अलग-अलग संदर्भों में; सेतु का काम है जोड़ना। जीन दो पीढ़ियों को जोड़ते हैं और मीम एक खास तरीके से लोगों के विचारों को।) 

बात विकास यात्राओं की

आज के मानव को उसके वर्तमान स्वरूप तक पहुँचाने में दो अलग किस्म की विकास-यात्राओं का योगदान रहा है: जैविक और सांस्कृतिक। पहली कथा है वर्तमान रूप में मानव देह के विकास की जिसके अंतिम चरणों में मस्तिष्क के अभूतपूर्व विकास ने इंसान को अन्य जीवों से अलग एक पहचान दी। दूसरी कथा है आदिम मानव रूप से आरम्भ कर आधुनिक रूप में आने की; इस दौरान उसे यह क्षमता विकसित करने में सफलता मिली कि अपनी यात्रा कथा के सूत्रों को एक कड़ी में जोड़कर अपने इतिहास को जानने का प्रयास कर सके। लम्बी कथा है जिसका सविस्तार वर्णन अन्यत्र होता रहा है। प्रस्तुत लेख में इस कथा को गति देने वाली दो इकाइयों का पर ध्यान केन्द्रित करने का प्रयास होगा जिन्हें इन विकास-कथा के सेतुओं के रूप में भी समझने का प्रयास करेंगे। यह अत्यंत रोचक जानकारी है कि दो अलग तरह की विकास कथाओं को परिभाषित करते सेतु मूल रूप से सूचना एवं उसके संप्रेषण पर आधारित हैं। 

संप्रेषण और सेतु

मानव की सांस्कृतिक विकास यात्रा में तीन क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं जिन्होंने उसके रहन-सहन और जीवन शैली को गहराई से प्रभावित किया - कृषि-क्रांति, औद्योगिक-क्रांति और सूचना-क्रांति। आज हम सूचना-क्रांति के साक्षी हैं और लाभार्थी भी। हमारे सोचने-समझने का नजरिया भी बदल रहा है। जिन विकास-यात्रा-कथाओं का जिक्र किया गया है उन्हें भी सूचना के संग्रह एवं संप्रेषण की कथा के रूप में समझना संभव हो रहा है और इसी को स्पष्ट करने का प्रयास इस लेख में किया जा रहा है। जैविक या सांस्कृतिक विकास – दोनों में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ रहीं हैं सूचना संप्रेषण की। पहले में सूचना देह के लक्षणों से संबंध रखती है और संप्रेषण एक पीढ़ी से दूसरी के बीच होता है। यह कुछ वैसा ही है जैसे एक बीज में पूरे पेड़ की जानकारी संग्रहीत है और उचित परिस्थितियों में पूरा पेड़ विकसित हो जाता है। इस तरह बीज माध्यम बन जाता है एक पीढ़ी से दूसरी में सूचना संप्रेषण का, और दो पीढ़ियों के बीच एक सेतु बनाता प्रतीत होता है। सवाल उठता है कि बीज के अंदर की वह सूक्ष्म इकाई क्या है जो सही मायनों में सूचना सेतु की तरह काम करती है? इसकी चर्चा समय आने पर करेंगे। 
दूसरी ओर सांस्कृतिक विकास मुख्यत: भाषा-आधारित है जिसमें सूचना संप्रेषण लोगों के बीच होता है। सूचना-संप्रेषण पर आधारित दोनों एकदम अलग तरह की यात्रा कथाओं का यह साम्य नि:संदेह रोचक एवं सारगर्भित है। साथ ही यह भी स्वीकारना होगा कि दोनों कथाओं में सूचना की प्रकृति, उसका संग्रह एवं संप्रेषण एक-दूसरे से कोसों दूर हैं।

जीवन की प्रकृति

जीवन के विकास से बात आरम्भ करते हैं। अपनी प्रतिकृति बना सकने की क्षमता यानि प्रजनन जीवन की पहली और आवश्यक शर्त है। सरलतम उदाहरण में बैक्टीरिया और वाइरस लिये जा सकते हैं जो धरती पर जैविक विकास के आरम्भ बिंदु माने जाते हैं। आज हम यह जानते हैं कि जैविक प्रक्रियाओं में एक पीढी से दूसरी तक सूचना संप्रेषण होता है और यह बात वनस्पति जगत पर भी लागू होती है। किसी पेड़ के बीज में अगली पीढ़ी के निर्माण की सारी सूचना ही तो संग्रहीत है। यह संप्रेषण कुछ इकाइयों में होता है जिन्हे जीन या वंशाणु कहा जाता है यह वैसी ही अविभाज्य इकाई है जैसे अणु या परमाणु। अविभाज्य का अर्थ यह नहीं कि उसके छोटे हिस्से नहीं हो सकते पर संप्रेषण क्रिया में यह पूरी इकाई एक साथ काम करती है। आनुवंशिक संप्रेषण में सूचना संप्रेषण जीन समूह के द्वारा होता है जिसमें हर जीन किसी विशेष सूचना के लिये जिम्मेदार है। जीन को हम जीवन के भवन में ईंटों की तरह मान सकते हैं जहाँ हर ईंट आकार में समान होते भी सूचना संग्रह में असमान है। इस संप्रेषण में विभिन्न लक्षणों के लिये अलग प्रावधान हैं जैसे एक जीन आँखों के रंग के लिये जिम्मेदार है दूसरी बालों के लिये। अगर माता व पिता की ओर से प्राप्त किसी खास जीन में असमानता है तो वही जीन असरदार होगी जो अधिक सबल है। दोनों में मिलावट वाली बात नहीं होती। एक जीन नीली आँखों की है और दूसरी कंजी आँखों की, तब किसी एक संतान में एक ही का असर दिखेगा। दोनों के बीच मिलावट वाली बात नहीं होती। जीन इकाइयों से निर्मित अणु डी एन ए कहलाता है जो डाइ आँक्सी राइबो न्यूक्लियक एसिड (di-oxiribo nucleic acid) का संक्षेप है। हर वाइरस दरअसल एक खास तरह का डी एन ए ही है।

आनुवंशिक सेतु

यह बात हमारी सोच को एक नया आयाम देती है कि जीन वस्तुत: एक सेतु की तरह है दो पीढ़ियों के बीच। एक पीढ़ी से दूसरी तक सूचना ले जाना एक महत्वपूर्ण शर्त है जिसके बिना जीवन की कथा आगे नहीं बढ़ सकती और अपनी प्रतिकृति बना सकने की क्षमता और उसके क्रियान्वयन की बात सामने आ जाती है। हमारे शरीर की कोशिकाएँ अपनी प्रतिकृति बनाती रहती है और पूरे जीव की प्रतिकृति बन जाना ही अगली पीढ़ी का जन्म है। यह काम करने के लिऐ दो चीजें आवश्यक हैं (क) द्रव्य-ऊर्जा प्रवाह और (2) सूचना के आधार पर प्रतिकृति बनाने की क्षमता। मानव और अन्य जीवों में यह द्रव्य-ऊर्जा माँ के गर्भ में प्राप्त होती है और जन्म के उपरांत भोजन के रूप में। जीवन को परिभाषित करने की दिशा में एरविन श्रोडिंजर[1] का उपरोक्त कथन ध्यान देने योग्य है जिसमें जीवन को सूचना-संचय और ऊर्जा-रूपांतरण का संयुक्त उपक्रम कहा गया है। 

संभवत: इस से बेहतर कोई परिभाषा नजर नहीं आती जीवन के लिये। इसे थोड़ा और समझने का प्रयास करते हैं। एक जलती मोमबत्ती को देखें जो द्रव्य एवं ऊर्जा के सतत प्रवाह एवं रूपांतरण का सरल उदाहरण है। मोमबत्ती का हाइड्रोकार्बन वायु की आक्सीजन से मिलकर जलता है और ऊर्जा में रूपांतरित होता है यानि मोम और आक्सीजन की रासायनिक ऊर्जा का प्रकाश एवं ऊष्मा में रूपांतरण होता है। यह क्रिया चलती रहती है जब तक मोम और वायु प्राप्त होते रहते हैं। मोमबत्ती का जलना जीवन की एक शर्त पूरी करता है जिसे उपरोक्त परिभाषा में ऊर्जा प्रवाह एवं रूपांतरण कहा गया है। कुछ मायनों में मोमबत्ती भी एक जीवित निकाय की तरह ही है। मोमबत्ती के जलने का आरम्भ उसका जन्म है और मोम समाप्त होने पर बुझना उसका अंत। कुछ इसी प्रकार एक चक्रवाती तूफान जन्म लेता है अंडमान के पास सागर में हवाओं के छोटे से चक्रीय प्रवाह के रूप में और धीरे-धीरे आकार लेता आंध्र के तट तक जा पहुँचता है एक विकराल रूप में; और फिर तबाही मचाता धीरे-धीरे क्षीण हो जाता है। मोमबत्ती का जलना या चक्रवाती तूफान का बनना द्रव्य-ऊर्जा के प्रवाह एवं रूपांतरण को चित्रित करते हैं और श्रोडिंजर के अनुसार जिसे जीवन की एक आवश्यक शर्त कहा जा सकता है।
जीवन की एक शर्त पूरी होते भी चक्रवात को जीवित निकाय नहीं कहते क्योंकि दूसरी शर्त भी पूरा होना जरूरी है। चक्रवात अपनी तरह का दूसरा चक्रवात नहीं बना सकता यानी अपनी प्रतिकृति नहीं बना सकता लेकिन एक कोशिका अपनी प्रतिकृति बना सकती है बैक्टीरिया एक कोशिकीय जीवन का सरलतम उदाहरण है और जैविक विकास का आरम्भ बिंदु है क्योंकि यह जीवन की दोनों शर्तें पूरी करता है। एक कोशिकीय जीवन का आरम्भ हो चुकने के पश्चात उसका विकास होता गया जिसमें सरलतम जीव से जटिल जीवों के निर्माण की बात सामने आती गई। डारविन का विकासवाद का सिद्धांत इसी प्रक्रिया को चित्रित करता है।

सांस्कृतिक विकास 

अगर हम मानव की सांस्कृतिक विकास यात्रा का अवलोकन करें तो एक बात साफ नजर आती है कि भाषा का कुशल एवं सफल प्रयोग करना मानव को शेष जंतु जगत से अलग एक विशिष्ट पहचान दिलाने में सफल हुआ। यह बात सीधे मस्तिष्क के विकास से जा जुडती है। यह भाषा का विकास व उसका कुशल प्रयोग एवं प्रबंधन था जिसने विकास को गति दी और मानव को एक अलग पहचान दी। इसमें मानव का अपना श्रेय कम और संयोग या कहें भाग्य अधिक है क्योंकि भाषा की क्षमता के सारे प्रावधान उसके मस्तिष्क में विद्यमान थे और भाषा का विकास देर-सबेर होना ही था। यही वजह है कि दुनिया के हर कोने में दूरस्थ एवं दुर्गम अंचलों में रह रहे इंसान भाषा का प्रयोग करना स्वतंत्र रूप से सीख चुके थे। अगर गौर करें तो साफ नजर आता है कि भाषा स्वयं एक सेतु है वैचारिक आदान-प्रदान के लिए।
मानव को शेष जंतु-जगत से अलग करने वाली पहली पहचान भाषा ही है और गौर से देखें तो इस प्रक्रिया में दो चरण हैं जो महत्वपूर्ण हैं: (1) भाषा के विकास के साथ वैचारिक क्षमता का तेजी से बढ़ना। कोई भी विचार या अवधारणा बिना सशक्त भाषा के अधिक दूर तक नहीं जा सकतीं। संक्षेप में यह कहना पर्याप्त होगा कि दो इंसानों के मध्य संप्रेषण भाषा के बिना सक्षम नहीं होता। इतना ही नहीं एक ही इंसान के मन में चल रही विचार प्रक्रिया या चिंतन भाषा के बिना लगभग अपंग है। भाषा के बिना हमारा सोच गतिहीन एवं दिशाहीन है।
(2) भाषा विकास के पहले भी सांकेतिक संप्रेषण हुआ करता था पर उसकी उपयोगिता अत्यंत सीमित थी। जंतु जगत में यह संप्रेषण होता ही है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि धरती पर मानव की इस रूप में उपस्थिति लाखों वर्षों की होते हुए भी सांस्कृतिक विकास में तेजी आना भाषा के त्वरित विकास के बाद ही संभव हो सका।
चिंतन और संप्रेषण के सम्मिलित प्रभाव ने सांस्कृतिक विकास यात्रा की शुरूआत कर दी। इस प्रक्रिया में और भी कुछ है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भाषागत संप्रेषण एक सेतु की तरह है दो व्यक्तियों के बीच। संप्रेषण का काम एक सेतु निर्माण की तरह है दो इंसानों के बीच। यह सेतु एक इंसान के दो विचारों को भी जोड़ता है शब्दों से वाक्य बनते हैं हमारे अंदर विचारों का प्रवाह भी तभी हो सकता है जब शब्दों के बीच सेतु बनें औेर इस तरह वाक्य अस्तित्व में आते हैं फिर एक वाक्य दूसरे और तीसरे से मिलकर एक विचारधारा, एक धारणा या अवधारणा का विकास करने में सक्षम हो सकते हैं।
शब्द, वाक्य, विचार, अवधारणा – इस वैचारिक यात्रा में सेतुओं की एक श्रंखला से होकर गुजर जाते हैं। 

शब्दों-शब्दों में वाक्यों में 
मानवी अभिप्रायों का जो सूरज निकला
उसकी विश्वाकुल एक किरण तुम भी तो हो।
- मुक्तिबोध 

अभिप्राय एक धारणा या अवधारणा है जिसका सक्षम होना भाषा के विकास को गति देता है। कुछ उदाहरण लेकर बात स्पष्ट हो सकेगी। लोकतंत्र एक अपेक्षाकृत आधुनिक एवं विकासशील अवधारणा है लेकिन जब इस शब्द का प्रयोग होता है तब एक पूरी पद्धति सामने आ जाती है जिसमें कई अवधारणाएं शामिल हैं जैसे वयस्क मताधिकार, संविधान, विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और इनके बीच नियंत्रण एवं संतुलन की रूपरेखा। संविधान या विधानमंडल भी अवधारणाएँ हैं जो सम्मिलित होकर एक बड़ी इकाई का निर्माण कर रहे हैं जिसे लोकतंत्र कहा जाता है।

वैचारिक विकास की इकाई

सवाल यह उठता है कि वैचारिक संप्रेषण में भी क्या इस उस तरह की कोई इकाई विद्यमान है जो जैविक प्रक्रिया में हैं जीन रूप में। निश्चय ही जैविक प्रक्रिया और चिंतन प्रक्रिया में शत-प्रतिशत एकरूपता खोजना लगभग बेमानी होगा। जीन एक आणविक इकाई है जिसका भौतिक अस्तित्व है जबकि वैचारिक संप्रेषण में जो इकाई होगी वह एक सॉफ्टवेयर की तरह होगी। फिर भी यह सवाल निरर्थक नहीं होगा कि क्या वैचारिक सूचना संप्रेषण की कोई इकाई है जो जीन की ही तरह एक साथ प्रभावी होती है? उत्तर भी मुश्किल नहीं, वैचारिक संप्रेषण भी कई बार छोटी बड़ी इकाइयों के रूप मे होता है जिन्हें धारणा या अवधारणा कहा गया है। एक उदाहरण लोकतंत्र एवं उसके घटकों के रूप में लिया गया है। ऐसे कई उदाहरण आसानी से ढूढे जा सकते हैं। हमारे विचार भाषा के साथ और उसकी सहायता से आगे बढ़ते हैं और संप्रेषित होते हैं। मानव मस्तिष्क की संरचना और मन की बुनावट में कुछ खूबियाँ हैं जो सामान्यतया कम्प्यूटर में नहीं। मशीन हमसे बहुत तेजी से गणना कर सकती है और उसका स्मृति क्षेत्र भी बहुत बड़ा हो सकता है उसकी समझ के लिये भी यही कह सकते हैं। शतरंज के खेल में अच्छे खिलाड़ी को भी मात दे सकती है यह मशीन पर फिर भी मानव मस्तिष्क में कुछ खास तो है जो मशीन में नहीं।
मानव मन अक्सर पैटर्न के आधार पर काम करता है। अवधारणाएँ भी एक प्रकार के पैटर्न ही हैं जिसे एक सरल उदाहरण से समझने की कोशिश करेंगे। कभी ऐसा होता है कि हम किसी से मिलते हैं और लगता है कि शायद कहीं देखा है पर कुछ समझ नहीं आता। तभी अचानक याद आ जाता है कि यह तो अपना बचपन का साथी है जिसके साथ खेला करते थे। एक और उदाहरण लेते हैं किसी गीत की पंक्ति याद करने की कोशिश करते हैं पर याद नहीं आ पाता। तभी कोई उस गीत का पहला शब्द याद दिला देला है और तब वह पूरा का पूरा गीत हमारी जुबान पर आ जाता है। इसे समझने के लिये एडवर्ड दि बोनो के चर्चित जिलेटिन प्रयोग [2, 3] की चर्चा करेंगे। 
एक बड़े समतल बोर्ड पर जिलेटिन की मोटी परत लगा देते हैं और उसे कुछ तिरछा कर रख देते हैं। गर्म स्याही ऊपरी हिस्से पर किसी बिंदु पर धीरे-धीरे उड़ेलते हैं। स्याही बहना शुरू करती है और उसके बहाव के पथ में कुछ जिलेटिन पिघल जाता है। आरम्भ में स्याही का बहाव पथ अनिश्चित रहता है पर बाद में पथ काफी सीमा तक निश्चित हो जाता है क्योंकि गर्म स्याही जिलेटिन पिघला कर एक पथ निर्धारित कर देती है। यह बहाव-पथ एक पैटर्न है। धरती पर हजारों लाखों सालों से बह रही नदियों के बहाव-पथ पैटर्न ही तो हैं। एक बच्चे का मन एक जिलेटिन सतह की तरह है जहाँ पहला या आरम्भिक प्रभाव लगभग स्थायी सा होने लगता है।

मीम: वैचारिक संप्रेषण की ईंट

शब्दों के जरिये संप्रेषण होता है पर कई बार कोई शब्द मात्र अक्षर-समूह न होकर एक परिकल्पना या अवधारणा का रूप लेता है उस शब्द के संप्रेषण में पूरी अवधारणा संप्रेषित हो जाती है लोकतंत्र, न्यायपालिका, विज्ञान, दर्शन – ये मात्र शब्द न होकर विचारधारा या अवधारणा हैं कुछ वैसे ही जीन के अंदर सूचना है इन शब्दों में भी सूचना समाहित है। यों कह सकते हैं कि अगर जीन दैहिक भवन की ईंट है तब अवधारणा वाले शब्द वैचारिक संप्रेषण की ईंटें हैं। इन्हें मीम(meme) कहा जाता है इस शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द मीमेमा (mimema) से हुई है जिसका अर्थ है नकल या प्रतिकृति [4]। जब हम इन शब्दों का प्रयोग करते होते हैं तब लोकतंत्र जैसा शब्द एक पूरे विचार या अवधारणा की प्रतिकृति या नकल की तरह संप्रेषित होता है। आज मोबाइल का उपयोग काफी बढ़ गया है और मीम बनाकर उसे हजारों तक पहुँचाना साधारण बात हो चुकी है। 
मीम वैचारिक या सांस्कृतिक सूचना संप्रेषण की इकाई है जिसका प्रसार मुख्यत: नकल या प्रतिकृति
की सहायता से हुआ करता है।

सोशल नेटवर्किग
मीम [5] शब्द जीन की ही तरह वैचारिक संप्रेषण की इकाई के रूप मे प्रयुक्त किया गया था रिचर्ड डौकिंस द्वारा पर धीरे-धीरे इसका प्रयोग सोशल नेटवर्किंग में आम हो गया है। कोई विचार, धारणा या चित्र इस प्रकार प्रचारित या प्रसारित किया जा सकते हैं और किये जा रहे हैं। जिस तरह जीन की सहायता से किसी जीव के आनुवांशिक गुण संचारित होते हैं और एक की कई प्रतिकृतियाँ बन जाती हैं कुछ वैसे ही मीम की सहायता से कोई विचार, धारणा या अवधारणा एक इंसान से दूसरे और तीसरे चौथे तक पहुँच जाती है। यह काम एक चित्र, कार्टून या वीडियो की सहायता से भी होने लगा है जिसमें कुछ ही समय में हजारों प्रतिकृतियाँ या नकल बन जाती हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में इन मीमों का चलन तेजी से बढ़ता गया है। विज्ञापनों की दुनिया में या राजनीति में, या सोशल नेटवर्किंग की सभी विधाओं में इसका प्रयोग एक आम बात हो चुकी है। मजाकिया व रोचक मीमों का प्रचलन भी बढ़ा है। परीक्षा नजदीक आते ही छात्रों की समस्या को लेकर मजाकिया मीम देखने को मिलती हैं जिनमें कुछ वाइरल हो जाती हैं। एक उदाहरण:

एक चित्र है जिसमें टीचर और छात्र के बीच संवाद:
सवाल: बिजली कहाँ से आती है?
उत्तर: मामा के घर से।
- वह कैसे?
- जब भी बिजली जाती है पापा बोलते हैं ‘काट दी सालों ने’।

हाल ही में एक वीडियो मीम देखने को मिली जिसमें एक छोटी बच्ची आज की शिक्षा पर अपना गुस्सा उतारती दिखती है जिसमें घर या स्कूल हर कहीं सिर्फ पढ़ाई की ही बात होती है। उसकी बातों में कुछ सार भी प्रतीत होता है। संभवत: इस तरह की मीमें हमें सोचने पर मजबूर कर सकती हैं कि छोटे बच्चों पर पढ़ाई का अत्यधिक बोझ हानिकारक भी हो सकता है।
 इन मीमों का दुरुपयोग भी होता है जिससे सावधान रहने की जरूरत है। कोई दुर्भावनापूर्ण या उन्मादी मीम हजारों-लाखों तक पहुँच कर तनाव पैदा कर सकता है और इस तरह की कई घटनाएँ हो चुकी हैं।
किसी वास्तविक या गलत तरीके से किसी दंगे के दृश्य की मीम कुछ घंटों में उन्मादी भीड़ इकट्ठा कर जाती है। 

संदर्भ:
1. एरविन श्रोडिंजर, वाट इज लाइफ, केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 1944.
2. एडवर्ड डि बोनो, शुमाखर लेक्चर्स (सं. सतीश कुमार), पार्श्व चिंतन, ब्लांड एंड ब्रिग्स, 1980.
3. चन्द्रमोहन भंडारी, अंध-गुफाओं का कैदी, सेतु हिंदी, अक्टूबर 2019.
4. रिचर्ड डौकिंस, द सेल्फिश जीन, आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1976. 
5. मीम, एक विचार, व्यवहार, या शैली है जो किसी संस्कृति के भीतर एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को संचारित होता है। जहाँ एक जीन जैविक जानकारियों को संचारित करता है वहीं एक मीम, विचारों और मान्यताओं की जानकारी को संचारित करने का काम करता है। विकिपीडिया

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