बालकृष्ण गुप्ता ‘गुरु’ की कविताएँ

बालकृष्ण गुप्ता 'गुरु' (सेवानिवृत्त प्राचार्य)
राजनीति 

मुआवजा,
कर्ज माफ़ी
तार-तार हो रहे तन ढकने के चादर पर
खूबसूरत पैबंद
सबकी नजर उस पर जाती।
***


प्रश्न

नीचे कर्ज में डूबा खेत
बादल ने डुबा दिया
बीच में गले तक फँसा
तैरना सीख पायेगा कब?
***


पिता

शून्य से बड़ा 
शून्य से हल्का
तरबतर उत्तरों का 
बच्चे के पीठ पर 
हँसता बस्ता।
***


सफाई अभियान

पान की पीक से भर गया सूचना बोर्ड
यहाँ-वहाँ थूककर दीवारें न करें गन्दी
अब कहाँ थूकें?
दीवारों को बचाने
लगाना जरूरी है दूसरा बोर्ड।
***


कर्ज

तिजोरी इतनी बड़ी
खेत इतना छोटा
कोने में दुबका पड़ा
खुलती तिजोरी कभी–कभी
खेत साँस लेने आता दरवाजे पर।
***


मजदूर

ज़िंदगी के मोर्चे पर
सुबह से शाम
हाड़-तोड़
सीने पर लटकता
सोंधी खुश्बू वाला गोल-गोल मेडल
कभी पिचके पेट लिये हो जाते शहीद
सूरज निकलते जी जाते,
जाते फिर जंग में।
***


परिणाम

दिल के घर की दीवारों में
खोज ही लेती है, प्रदूषित हवाएँ दरारें,
और बो देती हैं अपने इरादों का बीज,
दीवारों के पालने में पलते इरादे,
बड़-पीपल का रूप लेती,
तोड़ देती पालने को ही,
दिल हो जाता बेघर,
बेदिल, नंगा।
नंगे दिल पर प्रदूषित हवाओं का 
हो जाता कब्ज़ा।
करेला ऊपर से नीम चढ़ा
नचाने लगता दिल को अपनी मर्जी,
भोगने लगता व्यक्ति,
अपनी दरारों का परिणाम
जाने-अनजाने।
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डॉ. बख्शी मार्ग, *खैरागढ़- 491881, जिला- राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़)
चलभाष: +91 942 411 1454
202201H, हिन्दी, काव्य, कहानी, आलेख, निबंध, पुस्तक, समीक्षा, अनुवाद

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