वंदे मातरम्: चंद्रशेखर 'आज़ाद'

धरोहर
चन्द्रशेखर आज़ाद, मास्टर रुद्रनारायण सिंह के परिवार के साथ
हम दिखायेंगे तुम्हें वे क़ुव्वतें फ़रियाद की
बैसदा* होती नहीं ज़ंज़ीर है आज़ाद की

कौन कहता है कि मेरा रायगाँ** खूँ जायेगा
मरनेवालों ने जब इक दुनिया नयी आबाद की

किस तरह से जंग करते हैं वतन के वास्ते
किस तरह से जान देते हैं वतन के वास्ते

फ़क्त*** दुनिया में तुम्हें थे यह बताने आये हम
खुश रहो अहले वतन चलते हैं, वंदे माररम्


*बैसदा = निरर्थक, फिज़ूल
**रायगाँ = व्यर्थ, बेकार
***फ़क्त = मात्र, केवल
***

भगतसिंह के वरिष्ठ सहयोगी और अपने 'आज़ाद' नाम को सार्थक करने वाले महान क्रांतिकारी चन्द्रशेखर 'आज़ाद' का जन्म 23 जुलाई 1906 को श्रीमती जगरानी देवी व पण्डित सीताराम तिवारी के यहाँ भाबरा (झाबुआ मध्य प्रदेश) में हुआ था। 

15 वर्षीय बालक आज़ाद ने असहयोग आन्दोलन में भाग लिया, अपना नाम "आज़ाद" बताया, पुलिस के डण्डे खाये, और बाद में ज्ञानवापी में वयस्कों की भीड के सामने भारत माता को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य पर एक ओजस्वी भाषण दिया। काशी में जनसामान्य ने उनका सम्मान किया। सम्पूर्णानन्द के सम्पादन में छपने वाले "मर्यादा" पत्र में इस घटना की जानकारी के साथ उनका चित्र भी छपा। यही सम्पूर्णानन्द बाद में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी बने।

चन्द्रशेखर 'आज़ाद' पण्डित रामप्रसाद "बिस्मिल" की हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसियेशन (HRA) में थे और उनकी मृत्यु के बाद नवनिर्मित हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी/ऐसोसियेशन (HSRA) के प्रमुख चुने गये थे।  काकोरी काण्ड के बाद 'आज़ाद' को 'बिस्मिल' से लेकर सरदार भगत सिंह तक उस दौर के लगभग सभी क्रांतिकारियों के साथ काम करने का अवसर मिला था।

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