व्यंग्य: अमरीकी प्याले में भारतीय चाय

हरीश नवल

हरीश नवल


मेरे घर-आँगन में एक छोटी सी सफेद गोलमेज और चार लोहे की सुंदर सफेद कुर्सियाँ हैं। वहीं से मेरा दिन आरंभ होता है। वहाँ हरितिमा बरसाते हुए पौधे हैं और पड़ोस में एक स्कूल है, नन्हे बच्चों के लिए एक स्कूल...

रोज सुबह जब मैं घूमने के बाद आकर गोल मेज पर तुलसी ग्रीन टी का अमरीकन प्याला तैयार कर रहा होता हूँ, अक्सर तभी स्कूल में ‘प्रार्थना-सत्र’ का शुभारंभ हो जाता है। चाय पीते-पीते मैं उन स्वरों को सुनता हूँ जो स्कूल के लाऊड-स्पीकरों से गूंजते हुए मेरे कानों में विचरण करने लगते हैं। स्वरित शब्दों को यूँ तो मैंने कई दशक पूर्व चित्रपट पर सचित्र देखा-सुना था, यदा कदा सुनता भी रहा, लेकिन जब से यहाँ रहने लगा, लगभग हर सुबह इन्हें सुनता हूँ---- फिर गुनता हूँ और इसके भावों को मन में बुनता हूँ। एक आत्मिक उदासी पल्लवित होने लगती है --- वे शब्द हैं – ''इतनी शक्ति हमें देना ओ दाता/मन का विश्वास कमज़ोर हो ना/हमें चलें नेक रस्ते पे लेकिन/भूल कर भी कोई भूल हो ना।''

सोचता हूँ कि इतने बरसों से यह ‘प्रार्थनागीत’ असंख्य नागरिकों ने सुना होगा, मेरी तरह ही सुना होगा, स्कूलों, मंदिरों में रोज सुनते होंगे, हो सकता है मेरी भाँति सोचते भी हों कि क्या ‘दाता’ ऐसी शक्ति दे सकता है या देता है तो कैसे, क्या करें कि ऐसी अद्भुत ‘शक्ति’ प्राप्त हो जाए जिससे मन का विश्वास कभी दुर्बल न हो। मुझे जैसा साधारण व्यक्ति जिसका विश्वास रोज़ ही डोलता सा है, कैसे उसे बली बनाए? कौन बनाएगा? ‘दाता’ ही न?
दाता यानी प्रभु। प्रभु कौन? सर्वशक्तिमान, निर्णय लेने के सक्षम अधिकारी, दीन को कुलीन और कुलीन को हीन बना सकने वाले विराट व्यक्तित्व के स्वामी... कहाँ मिलेंगे वे, कैसे शक्ति प्रदान करेंगे?

मनन का सिलसिला बिन दूसरा सिरा मिले तब तक चलता है जब तक भारतीय ग्रीन टी का अमरीकन प्याला रिक्त नहीं हो जाता। मानसिक यात्रा अबाध नहीं चलती पर खूब चलती है। ‘प्रभु’ किसको माना जाए, पौराणिक संदर्भों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश के ‘प्रभुत्वों’ के विषय में सर्वप्रथम विचार-मंथन होने लगता है - ब्रह्मा सृष्टिकर्ता हैं, हमें बनाया है - चाहते तो निर्मित करते ही बलशाली मन बनाते। अब उनका अपना मन ही कहाँ पक्का था... उन्होंने अपनी पुत्री का ही वरण कर लिया, सोच सकते हैं कितना कच्चा है उनका मन। भगवान विष्णु से निवेदन करूँ, वे क्षीर सागर में शेषनाग की गोद में विश्राम कर रहे हैं, थके हुए हैं सृष्टि का पालन करते हुए, साक्षात लक्ष्मी उनके पाँव दबाकर थकान दूर करने का यत्न कर रही हैं। थके हुए प्रभु से कैसे याचना करूँ? करोड़ों-करोड़ जीवों में मेरा नम्बर कब आयेगा, जब आयेगा मेरा जीवन ही जा चुका होगा। क्या शिव के दरबार में अर्जी लगाऊँ, वे औघड़ हैं, पहले तो बहुत भोले थे, तुरंत वरदान दे दिया करते थे, लेकिन जब से भस्मासुर के हत्थे से मुश्किल से बचे, सयाने हो गए हैं, धूनी रमाते शिव तपश्चर्या छोड़ मेरे मन का विश्वास सशक्त करेंगे, मुझे संदेह है।

मर्यादा पुरुषोत्तम राम की ओर उन्मुख होऊँ, लेकिन संदेह की प्रबल छाया यहाँ भी है --- ''भूल कर भी मुझसे कोई भूल न हो, इसे राम कैसे सार्थक कर सकेंगे, जिनके मन का विश्वास इतना डगमगाया कि पुनीता सीता की ‘अग्नि परीक्षा’ ली। कालांतर में गर्भवती पत्नी को वनों में भटकने के लिए छुड़वा दिया। लीला पुरुषोत्तम कृष्ण से कैसे कहूँ, उनके जीवन के कई अंश, दंश देते हैं, वे स्वयं रण छोड़ कर सागर में बसी द्वारका में बस गए - अपने मन के विश्वास के टूटने पर....

... मथ रहा हूँ, अनेक समकालीन संत, महंत, बाबा, पीर, फ़कीर जिनके ‘प्रभुत्व’ की गाथाएँ सुनता रहा था ---- चलचित्र की भाँति मस्तिष्क में विचरते हैं, साथ ही उनके दुर्बल पक्ष भी दृष्टिगत हो रहे हैं। लाखों, करोड़ों भक्तगण उनके उन पक्षों के साक्षी हो गए हैं। फिर, कौन ‘दाता’? यह प्रश्न कुंडली मारे खड़ा है। क्या विधान बनाने वाले, राज चलाने वाले कौन हो सकेंगे ‘दाता’? कैसे चलूँ नेक रास्ते पर, किससे पूछूँ राह? मैं चिंतन के गहरे तालाब में गोता लगाता हूँ --- ‘नेक रास्ता’ अर्थात् सच्चाई का रास्ता, ईमानदारी का रास्ता... उस पर चलने के प्रयास में कितने जोखिम हैं, देख चुका हूँ। ईमानदारी से काम करूँगा, मेरी बदली कर दी जायेगी। रिश्वत नहीं दूंगा मेरे काम ठप्प हो जायेंगे, विलंबित हो जायेंगे। खुशामद की नौका पर सवार नहीं होऊँगा तो डुबो दिया जाऊँगा, सत्य का प्रयोग मुझे बरबाद भी कर सकेगा - समझता हूँ, मैंने सही न्याय करने वालों पर बहुधा अन्याय होते देखा है।

... कैसे पाऊँगा नेक रास्ता? अनेक भाव आ आकर बेभाव हो रहे हैं। जिनको शीर्ष पर बिठाया था, वे हमारी ही जड़ें खोदते रहे, उनमें से अनेक के ‘नेक’ कारनामों से कितनी शर्मिंदगी उठानी पड़ती है वे नहीं जानना चाहते, उन्हें अपने से है, हमसे क्या? उनके परदे हटाना, उनके विरुद्ध जाने का अर्थ है - अपने विरुद्ध जाना।

हरी चाय, हरे पौधे मेरे मन में हरियाली नहीं भर पा रहे हैं। प्रार्थना-गीत के स्वर मेरा मंथन कर रहे हैं या मैं उनका --- भेद करना कठिन होने लगता है, बुद्ध, महावीर से लेकर विवेकानंद मेरा विवेक जागृत करने हेतु एक सूत्र देते हैं ‘अपना दीप स्वयं बनो’, मुझमें कुछ दीप्त होने लगता है, मुझे अपने विश्वास को सबल मनाने के लिए स्वयं ही ‘दाता’ बनना होगा, मैं आलोकित होता हूँ - अंतर्मन में झाँकता हूँ - देखता हूँ नेकी के तत्त्व औंधे मुँह गिर पड़े हैं और बदी के चमक रहे हैं --- सत्य कहीं मुँह छिपा रहा है और असत्य का ‘बाज़ार’ भी ‘बाजारी हो गया है, जो गर्म है और लीलने हेतु जीभ लपलपाता है --- मुझे स्वयं ही नेकी को थामना होगा, पर कैसे? क्या मैं बिना ‘बाहरी दाता’ के ऐसा कर सकूंगा? मुझे स्वयं से युद्धरत होना पड़ेगा मेरा युद्ध मुझसे ही? बनना होगा स्वयं के उत्थान हेतु ‘दाता’? प्रार्थनागीत अब मुझे खुद को इंगित करके गाना होगा, किसी दृश्य, अदृश्य अन्य को नहीं ---- कैसे?

मैं सोच में डूबता हूँ, तभी जीवनसंगिनी हमारे बेटे का बस्ता गोल मेज पर रखते हुए आदेश देती है, “सुनो, मुन्नू को स्कूल बस तक छोड़ आओ।” “अभी से?” मेरा कमज़ोर सा प्रतिवादी स्वर निकलता है। उत्तर आता है, “अरे! तुमने आज इसका होमवर्क पूरा नहीं किया? पहले कम्पलीट कर दो, फिर छोड़ आना।”

‘प्रार्थना-गीत’ से कहीं अधिक प्रभावी हो जाता है पत्नी का कथन। मैं मन में पनपते विश्वास को झटक कर मुन्नू का होमवर्क पूर्ण करने की सोचने लगता हूँ----- 

मेरे भारतीय चिंतन तत्त्व बिखर जाते हैं और मन कर रहा है कि ग्रीन ही का एक अमेरिकन प्याला और मिल तो विश्वासपूर्वक होमवर्क सही सही कम्पलीट कर सकूंगा।



1 comment :

  1. Very well said, we all listen to great things but seldom mull over it or implement. I resonate with these thoughts in the article. I often wonder that the whole world loves listening to love songs, keep humming them too, but seldom apply in our life. It would be a different world altogether if we did not just hear things for entertainment alone but contemplate on them too, to make it a better place to live in.

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