कहानी: सनकी सज्जन (चंद्र मोहन भण्डारी)

चंद्र मोहन भण्डारी
अवकाश प्राप्ति के बाद अपनी पुरानी यादों में खोया जब पुरानी डायरी के पन्ने पलट रहा था अचानक मेरी नजर पीले पड़ चुके कागज में धुंधलाई लिखावट पर पड़ी, सहसा एक बिजली की सी चमक मेरे मानस-पटल पर उभर आई और यादों में उभर आया वह एक नाम जो हर मायने में उस मुकाम पर था जिसे हम असाधारण या अद्वितीय ही कह सकते हैं पर जो पारम्परिक संदर्भों में सामान्य से अलग कभी नहीं रहा। वह साधारण-असाधारण इंसान था बालकिशन।
बात कालेज के समय की है जब मैंने स्थानीय डिग्री कालेज में एडमिशन लिया ही था। बालकिशन से मेरी मुलाकात पहली बार जब हुई तो मुझे वो कुछ सनकी टाइप का इंसान मालूम पड़ा। मैं उसे कालेज जाते अक्सर देखता पर कोई अवसर बातचीत का नहीं मिल पाया था। हां, धीरे-धीरे कुछ प्रगति होने लगी और हम दोनों एक दूसरे को देख मुसकरा भर लेते और कभी सिर हिलाकर अभिवादन का संक्षिप्त संस्करण प्रयोग कर लेते’। बातचीत का पहला मौका उसी दिन मिल पाया जब मैंने देखा अपनी साइकिल एक हाथ से पकड़े वह पैदल ही जा रहा था। मैंने सोचा शायद ट्यूब पंक्चर हो गयी हो, मैं भी उतर गया अपनी साइकिल से और करीब पहुँच कर पूछा:
- क्या हुआ भाई, पंक्चर हो गया क्या?
उसने मुझे सिर से पैर तक देखा और खुद एक सवाल किया:
- जनाब आपने कैसे जान लिया कि पंक्चर होगा?
- अरे जाना नहीं, सोचा कि पैदल जा रहे हैं कोई तो बात होगी?
- नहीं ब्रदर, ऐसी कोई बात नहीं, बस यों ही।
- तो चढ़ लीजिये ना, कालेज में देर हो जाएगी।
- आप चले चलो, मेरा पहला पीरियड खाली है। कालेज में इधर-उधर भटकने से अच्छा यही है कि कुछ दूर पैदल ही क्यों न चला जाय। 
मेरा पहला ही पीरियड हुआ करता था इसलिये मैं अपनी साइकिल पर सवार हो आगे बढ़ गया।
मेरा पुराना दोस्त हरीश मेरे ही क्लास में था और उसी के गांव का होने के कारण बालकिशन से परिचित था। मैंने उस दिन वाली घटना का जिक्र किया तो उसे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। बाद में मुझे हरीश ने बताया कि बालकिशन थोड़ा झक्की टाइप का है और तरह-तरह के प्रयोग करता रहता है जैसे घर से कालेज की चार किलोमीटर की दूरी पैदल कितना समय लेती है और साइकिल से कितना? बात सिर्फ इतनी न थी क्योंकि प्रयोग दो-चार बार कर लेने के बाद भी वह ऐसा अक्सर ही करता था। हो सकता है प्रयोग कई बार करके वह उनका औसत निकालता हो। यह भी हो सकता है कि साइकिल नयी होने की वजह से उसे खराब न करना चाहता हो? कंजूस कहीं का! होती है कुछ लोगों में इस तरह की सनक, कम से कम हरीश यही मानता था। उसने मुझे बताया कि उसके चाचा अपनी नयी महंगी घड़ी को घर में ही थोड़ी देर पहनते और साफ कपड़े से पोंछ कर फिर संभाल कर रख देते। वह बालकिशन को चाचा जैसा ही झक्की मानता था। ये और बात है कि बाद में हरीश जान गया कि बालकिशन और जो भी हो कंजूस तो नहीं है हां सनकी तो वह अव्वल दरजे का है। जो भी हो हरीश उसे एक अच्छा इंसान भी मानता था, ‘एक सनकी सज्जन पुरुष’। 
यह मेरी उस सनकी सज्जन पुरुष से पहली मुलाकात और बातचीत थी। इतना मालूम था कि मेरे ही कालेज में पढता था और बी ए कर रहा था और मैं साइंस का छात्र था। इसके बाद जब-तब कालेज जाते वक्त या वहां से लौटते दुवा सलाम हो जाती। एक दिन मेरी साइकिल आधे रास्ते में पंक्चर हो गई और मैं उसे लेकर पैदल चलने लगा। तभी पीछे से आवाज आई:
- क्या हुआ भाई, पंक्चर हो गया?
देखा बालकिशन था। मुझे लगा जैसे मेरी फजीहत से मजा ले रहा हो। वह साइकिल से उतर मेरे साथ चलने लगा। मैं कुछ न बोला। बात उसने ही आगे बढ़ाई: 
- अरे, तुम्हारा पहला ही पीरियड होता है देर हो जाएगी।
- तो क्या करूं? इस खटारा बाइक पर बैठ के नहीं जा सकता ना। कुछ झुंझलाते हुए मैंने कहा।
मैं काफी दूर पैदल चलने की मजबूरी की वजह से कुछ थका और परेशान जरूर था और नहीं चाहता था कि मेरी फजीहत का कोई मजाक बनाये। हम दोनों करीब दो-तीन मिनट साथ चलते रहे एकदम चुपचाप। फिर उसने कहा-
- मेरा एक सुझाव है मोहन भाई; लो तुम मेरी साइकिल लेकर जाओ। तुम्हें मालूम है मेरा पहला पीरियड खाली रहता है। अपनी बाइक मुझे दे दो,  तब तक मैं पंक्चर बनवाता हूं।
मुझे यकीन नहीं हुआ और उसकी उस बात ने मुझे गहराई से प्रभावित किया। मैंने महसूस किया कि वह मुझसे छोटा है जरूर पर कद में कितना ऊंचा। मैंने उसकी बात मान कालेज की ओर प्रस्थान किया और वह मेरी बाइक लेकर पंक्चर ठीक कराने पास की दुकान की ओर बढ़ा। 
शाम बालकिशन से मिलते ही मैंने उसे जी भर कर धन्यवाद दिया। मैं सोच रहा था जो इंसान नयी साइकिल होने की वजह से उसे इतना हिफाजत से बचाकर रखता हो दूसरे की जरूरत पर उसे देने में जरा भी देर नहीं करता। पहली बार मुझे लगा किसी के बारे में इतनी जल्दी राय बना लेना कितना गलत हो सकता है? 
एक दिन हरीश ने ही बताया कि बालकिशन को घर और पड़ोस में बल्लू नाम से जाना जाता जिसे उसके पुराने साथी प्रयोग करते थे। पर चीजों के बारे में उसका नजरिया अलग था औसत नजरिये से एकदम अलग, लगभग एकदम उलट। उसकी सोच किसी पारम्परिक सोच से मेल नहीं खाती और यह भी कि उसका सामान्य ज्ञान काफी अच्छा था। इसके बावजूद कोई दिखावा करना उसका स्वभाव न था। इसीलिये उसके दोस्तों ने उसका नाम बल्लू से बदल कर लब्बू कर दिया गया जिसके पीछे की भी अपनी कहानी है। दरअसल यह नाम लाल बुझक्कड़ नाम का संक्षिप्त रूपांतरण था। उस क्षेत्र की लोक कथाओं में यह नाम इंसान के सहज बोध, कल्पनाशीलता एवं प्रत्युत्पन्न हाजिर जवाबी का प्रतीक बन चुका था। अपने सहपाठियों और दोस्तों के बीच बल्लू देखते-देखते लब्बू बन गया जिसमें उसने कभी एतराज भी नहीं किया। लब्बू में वैसी बहुत सी खूबियां थीं जो ऐसे इंसान में होनी चाहिये। बाइक लेकर पैदल मार्च करने वाले वाकये के बाद कई और भी मौके मिले जो उसके नये नाम की सार्थकता को दर्शाते थे।
एक ऐसा वाकया मुझे अक्सर याद आता है। कालेज में एक परिचर्चा आयोजित की गई जिसका विषय था ‘राष्ट्रीय विकास में साइंस की भूमिका’ । अधिकतर छात्र वक्ता साइंस विषयों के ही थे पर कुछ अन्य विभागों के भी थे जिनमें लब्बू भी मौजूद थे। वक्ताओं में किसी ने बायोटेक्नोलाँजी पर फोकस किया तो किसी ने नैनो टेकनोलाँजी पर। कम्प्यूटर साइंस, फिजिक्स, केमिस्ट्री सभी का जिक्र हुआ। मैं स्वयं फिजिक्स की भूमिका पर बोला जो मेरा प्रिय विषय था। जब सब बोल चुके तो लब्बू ने संक्षेप में अपनी बात कहने की इजाजत चाही। उसी के शब्दों में: 
- सही है राष्ट्र -निर्माण में साइंस का योगदान बहुस्तरीय और बहुमुखी है जिस पर काफी विस्तार से चर्चा हो चुकी है और होती रहेगी। अंतरिक्ष विज्ञान का जिक्र संभवत: नहीं हुआ और हम जानते है कि मंगलयान के बाद चन्द्रयान-२ की बारी है। पत्र-पत्रिकाओं में यह जानकारी उपलब्ध है, पर एक बात जो हम नजरअंदाज करते रहे हैं कि हमारे देश मे जो साइंस शीर्ष पर है उसका जिक्र यहां नहीं हुआ। वह उन चर्चित विषयों से अलग है।
यह कह वह कुछ रुका और सभी उसकी ओर उत्सुक नजरों से देखने लगे कि जो खुद साइंस का नहीं वह किस नयी साइंस का जिक्र करेगा? लब्बू ने फिर शुरू किया:
- जनाब, वो साइंस है पालिटिकल साइंस।  पालिटिकल साइंस इज द मदर आव आल साइंसेज। बस मैंने पहले ही कहा था मैं अपनी बात संक्षेप में रखूंगा, धन्यवाद।  यह बात हमारे देश के लिये खासकर सही है। 
कुछ देर सन्नाटा रहा। कुछ खलबली टीचर्स के खेमे में भी दिखायी दी। लेकिन जब सभी वहां से बाहर निकले तब अधिकतर लोगों को लग रहा था कि लब्बू की बात कुछ अजीब लगते भी अपनी जगह एकदम सोलह आने सच है। 
   ऐसा ही एक और वाकया याद आया जब परिचर्चा का विषय था अध्यात्म। जाहिर है घुमा-फिरा कर बात भारत और पश्चिम के तुलनात्मक पहलुवों पर आ निकली। किसी ने भारत की अध्यात्मिक परम्परा व पश्चिम की भौतिकता पर कुछ कहा जिसके समर्थन में अधिकतर लोग दिखायी दिये, और जैसा अक्सर होता है हमारे पूर्वाग्रह ऐसे मौकों पर खुल कर सामने आते दिखायी दिये। लब्बू तब तक चुप्पी लगाये थे जैसे सांप सूंघ गया हो। सब अपनी-अपनी डफली बजा चुके और कई वक्ता भारत की महानता की व उसकी अध्यात्मिक परम्परा की विस्तृत चर्चा कर चुके। परिचर्चा लगभग समाप्ति की ओर अग्रसर थी तब हरीश ने कहा लब्बू जी भी कुछ कहें। मैं जानता था लब्बू यों तो कुछ बोलेगा नहीं और अगर बोलेगा तो लोग बोलेंगे कि बोलता है। उसकी बात कुछ इस तरह थी –
- यहां पर चर्चित लोगों के अधिकतर विचार आंशिक रूप से ही सही माने जा सकते हैं। हमारे यहां अध्यात्म की परम्परा से कोई इंकार नहीं करेगा पर यह कहना कि हमारे यहां अध्यात्म की परम्परा है और पश्चिम मे भौतिकता का ही बोलबाला है सही नहीं कहा जा सकता। मैं ऐसे ही किसी सवाल के जवाब में कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा दिये गए कथन को उद्धृत करूंगा। जब टाइटेनिक जलपोत महासागर में डूब रहा था उसमें लगभग दो हजार लोग थे यात्री और नाविक मिलाकर। जहाज के कैप्टेन और उच्च अधिकारियों ने घोषणा की कि जितनी नावें हैं उनमें सबसे पहले स्त्रियां, बच्चे और वृद्ध भेजे जायेंगे उसके बाद अगर जगह हुई तब औरों की बारी आ सकेगी। कुछ अपवादों को छोड़ और कुछ कमियों के बावजूद यही हुआ और लगभग सभी वृद्ध, स्त्रियां व बच्चे बचा लिया गए। अधिकांश डूबने वालों में जहाज के कर्मचारी थे या युवा। क्या यह अध्यात्म का उदाहरण नहीं है? क्या केवल कीर्तन या पूजा ही अध्यात्म है? क्या हम कभी अध्यात्म को सही तरीके से परिभाषित करने का प्रयास करते हैं?
बात कुछ युवा समझे कुछ नहीं, पर इस बात ने खलबली तो सभी के मन में मचा ही दी। मैं उसकी बात का कायल हो गया। इतना तो मैं जान गया था कि लब्बू सबसे अलग है और भीड के बीच भी अकेला।. उसका सहजज्ञान विस्मयकारी था अध्ययनशील तो वह था ही। और सबसे खास बात उसकी संवेदनशीलता थी। जब सभी छात्रों का मकसद परीक्षा में अधिक नंबर लाना होता उसका ध्यान सही मायनों में ज्ञानार्जन ही रहता। सिर्फ परीक्षा में अधिक अंक प्राप्त करना उसका उद्देश्य होता तो उसके लिये मैरिट लिस्ट में पहला स्थान लाना मुश्किल न होता। एक सामान्य से मध्यमवर्गीय परिवार से होते भी उसकी सोच उसके परिवेश को प्रतिबिम्बित नहीं करती थी। धीरे-धीरे मैं उसके करीब आने लगा और मैं यह भी मानने लगा कि आज की आपाधापी और प्रतियोगिता वाली जिंदगी में ऐसा इंसान जिंदगी की दौड़ में पीछे रह सकता है क्योंकि वह उन मानकों को लेकर नहीं चलता जो आगे बढ़ने के लिये जरूरी माने जाते हैं। तभी मुझे याद आया केमिस्ट्री के प्रोफेसर सत्य प्रकाश का वह चर्चित कथन कि किसी देश की  सही दिशा में प्रगति इस बात पर निर्भर होती है कि वहां झक्कियों या सनकियों की संख्या कितनी है। एक बार  मैंने अपनी चिंता लब्बू से साझा की :
मैं- तुम थोड़ा प्रयास करो तो अपने विषय में टाँप कर सकते हो आगे चलकर प्रशासनिक परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन कर अपना भविष्य बना सकते हो या विश्वविद्यालय में पी.च.डी के लिये प्रयास कर सकते हो । पर तुम उन मानकों से संचालित नहीं होते जो बाकी सबके लिये आदर्श हैं।
लब्बू- यार मैं ऐसा ही हूं, और मुझे कोई शिकायत भी नहीं।
मेरे लिये उसे समझाना मुश्किल था। मैं भी उसको वैसा ही स्वीकारने लगा था और धीरे-धीरे मेरा उसके प्रति स्नेह विश्वास और सम्मान बढता ही गया। 
हरीश से मुझे पता लगा कि वह शाकाहारी था पर केवल पिछले डेढ या दो सालों से ही उसने मांसाहार छोड दिया था। मैं भी जानना चाहता था कि क्यों ऐसा परिवर्तन आया।
- तुम अब शुद्ध शाकाहारी हो जबकि पहले ऐसा न था। वैसे मैं भी शाकाहारी हूं पर यह इसलिये कि पहले से ही ऐसा परिवार में चलता रहा है।
- यह मैंने अनुभव किया कि सभी में जीवन है और हिंसा तो हिंसा ही है भले ही हमने न की हो।
- क्या तुम्हें मांसाहार स्वादिष्ट लगता है?
- हां, मैं खाया करता था। जबसे मैंने जैविक-विकास सिद्धांत समझना शुरू किया मैं आश्वस्त होता गया कि सारा मानव-मात्र ही नहीं सारा जीव-जगत आपस में जुड़ा है हम कई वैसी ही अवस्थाओं से गुजरे है। चिंपांजी एवं इंसान के ‘जीन’ ९८ प्रतिशत समान हैं यानि वह हमारा निकटतम रिश्तेदार है। कुछ और पहले सामान्य कपि यानि बंदर हमारा संबंधी लगता है।
मैं बस अवाक था। मैं साइंस का छात्र था पर शायद उसकी सोच अधिक करीब थी विज्ञान के। मुझे लगा कि उसकी बात विज्ञान की जानकारी पर आधारित अध्यात्म का ही एक पहलू था। मुझे लगा कि उसके विचार विज्ञान एवं अध्तात्म दोनों के करीब थे। और यह भी कि उसके सोचने और जीवन जीने में फर्क बहुत कम था। मुझे लगा वह वक्त से या तो बहुत आगे है या बहुत पीछे। उसकी बातें सामान्य से अलग होते भी अपनी गहरी छाप छोड़ती थी जो यथार्थ के धरातल पर स्वीकार्य न भी हो सकें परन्तु जिन्हें सैद्धांतिक धरातल पर नकारना मुश्किल था।
अब उस दिन मैं कालेज के लिये निकला ही था कि चौरस्ते के पास लब्बू दिखाई पडा। बाइक का अता पता भी न था और महाशय पैदल ही सडक नाप रहे थे। मैंने सोचा बाइक का काम ही है पंक्चर होना, छोड़ आया होगा घर। फिर भी पूछ बैठा-
- फिर से पंक्चर हो गई, ब्रदर।
लब्बू कुछ न बोला। मैंने दुबारा पूछा तो उसने घूर कर मेरी तरफ देखा और मुंह पर उंगली रख चुप रहने का इशारा किया। तभी उसने जेब से एक छोटी सी डायरी निकाली औेर उसमें कुछ लिखा। उसने बतलाया कि वह कदमों के आधार पर दूरी मालूम कर रहा है चार किमी की दूरी कितने कदमों में नापी जाती है और इस तरह उसके एक कदम की दूरी लगभग सवा दो फुट होती है। मैं अवाक था उसकी प्रयोगधर्मिता पर। विज्ञान का छात्र न होते भी विज्ञान उसकी रगों में था।
कुछ दिन बाद मुझे हरीश मिला और मैंने उस दिन की बात का जिक्र किया जब लब्बू कदमों से दूरी तय कर रहा था। चार कि मी की दूरी तय करने में कितने कदम लगे इसकी गिनती की और पता लगाया कि उसका एक औसत कदम सवा दो फुट का है। हरीश बोला:
- सच, उसने ऐसा कहा?
- और क्या मैं अपने मन से बोल रहा हूं।
- यार पहले मैं उसे झक्की मानता था झक्की सज्जन। पर लगता है ऐसा बिलकुल नहीं।
- क्यों, अब तुम ऐसा क्यों सोच रहे हो?
- बस वो सबसे अलग है, अपनी तरह का। तुम्हें मालूम है उसने बाइक पड़ोस के साथी मनोहर को तीन-चार हफ्तों के लिये दे रखी है।
- वह क्यों?
- पिछले हफ्ते मनोहर की बाइक चोरी हो गई थी और अभी वो नयी खरीद सकने की हालत में न था और आजकल उसके इंटर फाइनल के एक्जाम चल रहे हैं।
मुझे लगा कि इस इंसान का कोई नया नाम दूढना पडेगा। लब्बू नाम भी उसे पूरी तरह परिभाषित नहीं करता। शायद कोई भी नाम उसे अपनी परिधि में बांध नहीं सकेगा। वैसे नाम में क्या रखा है और उस से होता भी क्या है? लब्बू जो है सो है हमारे माथा-पच्ची करने से उसे फर्क नहीं पड़ने वाला। पर मुझे इस बात की खुशी रहेगी कि मैंने ऐसे इंसान को करीब से जाना है। मैं उसे ठीक से पहचान पाया हूं यह दावा तो नहीं कर सकता पर इतना जरूर है कि जीवन में  वह कोई बड़ा पारम्परिक मुकाम हासिल करे या न करे वह आज जिस मुकाम पर है हममें से अधिकतर वहां पहुँचने की सोच भी नहीं सकते। जिस निष्काम कर्मयोग की बात अक्सर सुनी थी वह अपनी पूरी सार्थकता में हमारे समक्ष उद्भाषित था।
कालेज से पढ़ाई पूरी कर हम अपनी-अपनी जिंदगी की भाग-दौड़ में जुट गये। मैं एम एस सी के बाद पी एच डी करने में जुट गया और हरीश अपने पिता का बिजनेस संभालने लगा। लब्बू से संपर्क होना मुश्किल था लेकिन हरीश से ही काफी समय बाद पता लगा कि लब्बू उत्तराखंड में चम्पावत के एक कालेज में अध्यापन करता है और यह भी कि उसका नाम पर्यावरण-संरक्षण के विशिष्ट प्रयासों से जुड़ा है और अपनी प्रतिबद्धता एवं प्रयासों के कारण चर्चा में भी आया है।

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