काव्य: हरिचरण अहरवाल 'निर्दोष'

हरिचरण अहरवाल 'निर्दोष'
और हँसने लग जाती हो

ओस में नहाई बूंदें
जब भी गिर जाती है 
केनवस पर 
खुद-ब-खुद
बन जाती है 
तुम्हारी तस्वीर,
और हँसने लग जाती हो 
रंगों के स्वरूप में 
तुम,
और तुम ही 
भागती सी दिखती हो 
अंगुली छुड़ाकर,
जैसे
कोई चिड़िया 
पिंजरे से बाहर निकलकर
फिर से लौट आती है 
मन के मोहपाश में,
मैं 
देख रहा हूँ 
तुम्हारी तस्वीर पर 
बिंदी लगाकर,
हाँ!अब ठीक है!
तुम भी ना 
भूल ही जाती हो 
कभी-कभी तो 
मेरे पास आकर 
फिर से तस्वीर बन‌ जाना!
***


हाँ! बेटियाँ सीख लेती है

हाँ! पता नहीं कब सीख लेती है 
बेटियाँ!
बेटी होने का मर्म 
बहन होने का धर्म 
पत्नी होने की शब्दावली 
और माँ बनने की नियमावली! 
बेटियाँ कब सीख लेती है?
निगाहों को 
मन ही मन में पढ़ लेना!
रास्तों पर पड़े काँटों को हटाकर 
आगे बढ़ जाना,
बिना सलवटों के 
बारीक तुरपाई से 
साड़ी की फाॅल लगा लेना!
पता ही नहीं चलता 
कब सीख लेती है 
आसमाँ के बराबर 
अपना कद ऊँचा कर लेना,
ढलती शाम को 
दीपक की लौ के सामने 
आरती का सस्वर उच्चारण कर 
शक्ति की पूजा कर लेना!
उगते सूरज के साथ ही 
अपनी जिम्मेदारियों को 
अच्छे से फलीभूत कर लेना!
हाँ! बेटियाँ सीख लेती है 
तुतलाती जुबान से 
माँ की भाषा बोल लेना 
स्कूल जाने से पहले 
बालों को सँवारकर 
दो चोटियाँ बांध लेना!
हाँ! पता नहीं कब सीख लेती है 
बेटियाँ! 
डर को आत्मसात कर लेना 
हौसलों में आग भर लेना 
सब कुछ सहकर भी 
फिर से कोख से गोद में आकर 
मुस्कुरा लेना! 
***


प्रेम का महापुराण

मैंने देखा है 
जब भी तुम हँसती हो तो 
अनायास ही आ जाती है 
बसंत सी खुशबू
सच में!
महक उठता है
मेरा तन-बदन
हँसती रहो ना 
बना रहेगा पांचवा मौसम
मेरे जीवन की बगिया में,
तुमने ही कहा था ना 
एक बार,
झूठ बोलते हो तुम तो 
सच में झूठ बोलता हूँ 
कि तुम 
गुलाब सी खिल जाती हो 
जब भी हँसती हो 
हाँ झूठ है यही
कि गुलाब की क्या बिसात
जो हँस सके 
तुम्हारे माफिक!
सच में!
अनुपम है तुम्हारा उल्लास
मैं ही भ्रमर सा 
पढ़ नहीं पाया 
निनाद!
शायद 
गुनगुना रहा हूँ 
तुम्हारे हृदय की कुण्डलियाँ,
याद करो 
इसी हँसी ने 
लिखवाये हैं मुझसे
प्रेम के महापुराण
और इसी हँसी ने 
भर दिया है 
मेरी साँसों में 
प्रेम का महासागर,
तभी तो 
कर रहा हूँ तुम्हारा इंतजार 
सच में दूर मत हो जाना 
वरना मुरझा जाएगी 
प्रेम-बेल 
जिसे आँसुओं से सींचकर
अब तक रखा है हरा-भरा 
हँसो ना फिर से 
कुछ अधखिले केवड़े 
मुरझा जाएंगे 
तुम्हारी हँसी के बग़ैर!
***


हाँ! रहता है वह मुझमें

रहता है वह मुझमें 
शीतल चांदनी बनकर 
मैं सपनों के पिरामिड बनाकर
छू लेना चाहता हूँ 
चांद की जमीं 
सितारों की देह 
अंतरिक्ष की नमी!
चुरा लेना चाहता हूँ उससे
तिथियों का तिलिस्म
कभी उष्ण सी 
सिसकियाँ 
कभी शीत का समर्पण!
हाँ! मुझमें महकता है वह
चंदन का दरख़्त बनकर
समेट लाता है 
जन्नत की खुशबू!
बावरा मन 
फिर भी रिक्त सा 
ढूंढता है 
उसकी मोजूदगी
कभी किताबों में
कभी छंदों में 
वो अलिखित सा रहता है
मेरे आस-पास 
मुझमें 
तासीर बनकर
कभी उजालों में 
कभी अंधेरे की ओट में!
हाँ! रहता है वह मुझसे
श्वास बनकर
जो आता-जाता रहता है 
मुझसे,
मुझमें ही,
एक विश्वास बनकर 
आता है ऐसे 
वह बनकर,
रह जाता है मुझमें 
मैं बनकर!
***

परिचय: 
जन्म: जुलाई 1975, पीसाहेड़ा (आमली झाड़) सांगोद, कोटा (राजस्थान) 
शिक्षा: एम.ए. (संस्कृत, अंग्रेजी), बी.एड.
लेखन: खड़ी हिंदी और राजस्थानी में विविध विधाओं में रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं मे प्रकाशित। ‘बेटी’ (2012) काव्य-संग्रह सहित हिंदी में पुस्तकें प्रकाशित।
संपर्क: चलभाष: +91 995 036 5312; ईमेल: brijeshxy340340@gmail.com
डाक: प्रज्ञा, 50 B श्री कृष्णा एन्क्लेव, बख्शी स्कूल के पीछे, देवली अरब रोड़, बोरखेड़ा, कोटा - 324004 (राजस्थान)


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