दो गीत: राजेंद्र प्रसाद श्रीवास्तव


सँभल संयम परीक्षा की घड़ी है।

अभी भी यदि,सँभल न पाएगा तू।
याद रखना बहुत पछताएगा तू।
चला है तू जिसे जीवन समझकर
मृत्यु सूरत बदल कर ही खड़ी है।
सँभल संयम परीक्षा की घड़ी है।

परख कर,जो छिपा है- सत्य, जानो
चमकती ओस को, मोती न मानो।
सरल भयभीत हिरणी मत समझना-
बहुत चालाक निष्ठुर लोमड़ी है।
सँभल संयम परीक्षा की घड़ी है।

दूर से दीप को देखो सुरक्षित
नहीं तो दाह भी होगा सुनिश्चित।
शलभ-सेना सतत आती रही पर,
दीप की लौ अकेली ही लड़ी है।
सँभल संयम परीक्षा की घड़ी है।
***


गीत 2

कब तक हाथ मलोगे अपने,

कब तक यह सिर और धुनोगे?

जाग, जाइए अभी समय है
मित्र, अन्यथा पछताओगे।
लाभ उठा लो,कभी नहीं फिर
ऐसा शुभ अवसर पाओगे।

अब यथार्थ का चुनो धरातल
कब तक झूठे स्वप्न बुनोगे।

समय, लगाकर 'पंख' उड़ रहा
सूरज-चाँद लगाते फेरी।
राह कठिन उतनी ही होगी
जितनी चलने में हो देरी।
कदम बढ़ाओगे कब पथ पर-
कब जीवन का लक्ष्य चुनोगे?

चुप रह कर आगे बढ़ जाओ,
छोड़ो आलस, आनाकानी।
यहाँ सुनाने को आतुर सब-
अपनी-अपनी राम-कहानी।
यहाँ कर्णभेदी कोलाहल
कब तक रहकर मौन सुनोगे?
***

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