कहानी: महसूल-घर

दीपक शर्मा

- दीपक शर्मा

"आपकी यह आँख कच्ची है," मेरी बाँयी आँख के रेटिना के ऑपरेशन के बाद अपनी सलाह के अंत में मेरे नेत्र विशेषज्ञ ने जोड़ा, "अभी दो चार दिन इस आँख की करवट मत सोइएगा। तिरछा दबाव पड़ने से मुश्किल खड़ी हों सकती है।"
"मुश्किल तो अब भी रहेगी," मैंने कहा, "क्योंकि मुझे नींद ही बाईं करवट आती है।”
"बड़ी मुश्किल से छोटी मुश्किल अच्छी," नेत्र-विशेषज्ञ ने मुझे टाल दिया।
और पहली ही रात बावजूद मेरी भरसक कोशिश के जब मुझे दाँयी करवट नींद नहीं ही आयी तो मुझे बाँयी करवट लेनी ही पड़ी।
जभी नींद आयी तो अपनी बाज़ीगरी के साथ...।
निश्चल हो चुकी उस आग को विलोड़ती हुई जो पन्द्रह-वर्षीया अपनी बहन की अपमृत्यु पर मेरे ग्यारह-वर्षीय कलेजे को जलाए रही थी...
चौंसठ वर्ष पीछे छूटे 1955 के किवाड़ खोलती हुई।
***

पहला किवाड़
यह किवाड़ कस्बापुर के हमारे पुराने घर का है जिसके उस पार हम बहन-भाई के माँ और बाबूजी, बहन की पूनी बना रहे हैं।
"बिट्टो," बाबूजी उसे पुकारते हैं," जल्दी आओ। उस नए गीत की धुन पूरी होनी बाकी है।”
जन्म से नेत्रहीन बाबूजी का मधुर कंठ बहन ने दाय पाया है, मैंने नहीं।
और संगीत मास्टर बाबूजी की संगीत दीक्षा उत्तराधिकार में वही ग्रहण कर रही है, मैं नहीं।
"वह नहीं आ सकती"- माँ आँगन से चिल्लाती है, "उसका घाव अभी भरा नहीं।"
माँ ने हम दोनों बहन-भाई से वचन ले रखा है, बहन की चोट का स्वरूप हमें बाबूजी से छिपाकर रखना है।
"डेढ़ माह होने को आया और बिट्टो अभी भी ठीक नहीं?" बाबूजी हैरानी जतलाते हैं।
"नहीं, अभी भी ठीक नहीं," गुस्से से माँ, बहन की गाल नोच देती है और अपने हाथ के गिलास का घोल उसके मुँह की तरफ़ बढ़ाकर उससे कहती है, "इसे पी ले। इससे तेरी कै बंद हो जाएगी।"
"तू अभी भी ठीक नहीं, बिट्टो?" बाबूजी पूछते हैं। बहन को फिर से ठीक देखने की उन्हें उतावली है। मेरी तरह।
"नहीं बाबूजी", बहन फट पड़ती है, "दरद अभी जा नहीं रहा।"
इधर बहन के साथ माँ की सख्ती बढ़ने लगी है। बात-बात पर बहन को माँ की फटकार और पिटाई सहनी पड़ रही है।
यही नहीं, बहन को घर से अकेली निकलने की भी अब मनाही है। उसे स्कूल भी माँ स्वयं पहुँचाने-लिवाने जाती हैं। उसी समय से, जब से चोट खाई बहन के साथ मैं उसकी स्कूल-सहपाठिनी, विमला के घर से लौटा हूँ।
रिक्शे से। पहली बार।
नहीं तो विमला के घर से हमारा घर पैदल रास्ता ही तो है।
***

दूसरा किवाड़
यह दूसरा किवाड़ विमला के घर का प्रवेश द्वार है जिसकी चौखट में खड़े महेंद्र चाचा, हमें अपनी सीढ़ियों के तीसरे घुमाव पर पाते ही उसके अगवाड़े आ लपकते हैं।
"ध्यान से आना, बच्चों," हम पर घेरा डालने की उनकी पुरानी आदत है, "इन सीढ़ियों के कई पत्तर दरके हुए हैं।"
सर्पाकार वे सीढ़ियाँ खस्ताहाल एक सिनेमाघर, रियाल्टो टॉकीज, की पिछली दीवार में बनी हैं और उनके पत्तर लोहे के हैं जो अंदर हॉल की सीटों ही की तरह इस्तेमाल करने पर किरकिराते हैं।
"विमला अंदर है क्या?" बहन पूछती है।
हम प्रवेश द्वार तक आ पहुँचे हैं।
"विमला से मिलने आए हो? या आज की बदली गई, मेरी ताज़ा फिल्म की झाँकी लेने?" महेंद्र चाचा रियाल्टो टॉकीज के मैनेजर हैं और फिल्मों के प्रति हम बहन-भाई के उन्माद से परिचित हैं। वे जानते हैं विमला हमें अक्सर इसके प्रोजेक्शन रूम में ले जाया करती है जो प्लेटफ़ॉर्मनुमा उनके घर के इस अगवाड़े के मोड़ पर स्थित एक गलियारे के रास्ते से आता है।
"विमला ही से मिलने" बहन झेंप जाती है।
"और अगर मैं तुमसे कहूँ विमला अपनी माँ के साथ अपनी मौसी से मिलने गई है और तुम मेरी चपाती सेंक दो, तो?"
"मैं सेंक दूँगी," बहन तैयार हो जाती है।
विमला के साथ उसका संबंध घनिष्ठ है, पारिवारिक है।
"और अगर मैं नंदू से कहूँ इस समय फिल्म में लंबे-तड़ंगे दो तलवारियों की जबरदस्त भिड़ंत चल रही है, तो? और वह बॉक्स में बैठकर उसे देख सकता है, तो?" महेंद्र चाचा मेरी ओर देखकर मुस्कराते हैं।
"तो मैं बॉक्स में जा बैठूँगा," मैं उत्साहित हो आया हूँ। रियाल्टो टॉकीज में सिर्फ़ स्टंट फ़िल्में ही लगती हैं और वे भी पुरानी। इसीलिए बारह से तीन वाले उसके शो ज्यादातर ख़ाली जाते हैं। अपनी आधी दरों के बावजूद।
"फिर कभी देख लेना", बहन मुझे आँखें तरेरती है, "अभी तो मेरे साथ अंदर चलो और चाचा की थाली लगाने में मेरी मदद करो।"
"मेरी दो चपाती सेंकने में तुझे मदद की जरूरत आन पड़ी?"
"नहीं ऐसी कोई बात नहीं", बहन हड़बड़ा जाती है।
"अभी तू आटा तो तैयार कर" महेंद्र चाचा मेरा हाथ थाम लेते हैं, "जब तक मेरी दाल भी गल जाएगी और इसे मैं बॉक्स तक छोड़ भी आऊँगा।"
***

तीसरा किवाड़
यह तीसरा किवाड़ रियाल्टो टॉकीज के बॉक्स की पीठ लिए है, जहाँ मैं अकेला बैठा हूँ।
अपने को उन दो तलवारबाज़ों के सुपुर्द किए, जो द्वंद्वयुद्ध में लीन हैं।
अपने-अपने लबादे में।
एक दूसरे की "थ्रस्ट" (प्रहार) को "पैरी" (परिहार) में विक्षेपित करने को तत्पर।
अपने नए "लन्ज" (झपट्टे) की तैयारी में।
चमड़े के दस्ताने वाले हाथ में तलवार थामे। दूसरी बाँह में ढाल का पट्ट बाँधे। चेहरे पर जाल के डोरों वाला नकाब चढ़ाए। कानों पर पैड लगाए। एक बाँह की काँख के अंदर से दूसरी बाँह के कंधे तक जाती हुई गाती से लैस। जाँघिए-नुमा ब्रीच ताने। जुर्राब जैसी सफ़ेद स्टॉकिंग्स पहने। चपटे तल्ले के जूते कसे।
तभी "एडवांस," अग्रगति, के अंतर्गत एक लड़ाकू दूसरे पर झपट लेता है। इस बार दूसरा "रिट्रीट", पश्चगमन नहीं कर पा रहा।
कट-ओवर चालू हों गए हैं।
ताबड़-तोड़।
दूसरे की तलवार की धार पर पहले ने अपनी तलवार की नोंक अब झोंकी, जब झोंकी, कब झोंकी...
"तुम्हारी बहन तुम्हें इधर बुला रही है" गेटकीपर मेरे पास आया है।
अपने को उन तलवारबाज़ों से मुझे अलग करने में समय लग रहा है।
"चलो, उठो", गेटकीपर कहता है, "देर नहीं करो। मैनेजर बाबू कह गए हैं, वह बहन तुम्हारी तुम्हें जरूरी बुला रही है, जल्दी बुला रही है...।"
***

चौथा किवाड़
और यह चौथा किवाड़, विमला के घर की रसोई की ओर ले जाता है।
जहाँ बहन फ़र्श पर गिरी पड़ी है। अपने शाल से अपना चेहरा छिपाए।
महेंद्र चाचा के हाथ में एक लोटा है और वह उसमें से पानी पी रहे हैं। चुल्लू-चुल्लू साधते हुए।
आधे-सने आटे की परात बहन की बगल में औंधी लेटी है। गर्म चूल्हे के सामने।
जिस पर चढ़ी दाल अभी भी उबल रही है।
"क्या हुआ जीजी?" बीच में फिल्म छोड़ देने का दुःख मैं भूल गया हूँ।
जवाब में बहन अपने चेहरे से शाल हटाती है। उसके चेहरे का हाल बेहाल है: ठुड्डी पर खरोंच, नाक पर रगड़, होठों पर सूजन, गालों पर चिकोटी के चिह्न, माथे पर छिलन, कान की लोलकी में लाली।
"तुम उठोगी नहीं?" महेंद्र चाचा उससे पूछते हैं, "या फिर उठना नहीं चाहती?"
बहन निश्चेष्ट पड़ी रहती है।
"जीजी को क्या हुआ, चाचा?" मैं पूछता हूँ।
"मालूम नहीं। मैं तो तुम्हें उधर बॉक्स में छोड़कर आया तो यह मुझे इन, लकड़ियों पर गिरी हुई मिली।"
"उठो, जीजी", मैं बहन को जा हिलाता हूँ। बहन अपनी बाँहें मेरी ओर फैला देती है। अपनी बाँहें खोलकर मैंने उसके कंधों को नीचे से सहारा देता हूँ।
उसके ऊपरी भाग का वजन अपने वक्ष पर लेने हेतु। बहन अपना धड़ थोड़ा ऊपर खिसका कर अपने पैर सरकाती है। मगर वे तनिक सरक कर निश्चल हो जाते हैं।
"क्या पैर में चोट आई है?" मैं घबरा जाता हूँ। मुझे डर है मेरी ताकत का समूचा संवेग भी बहन की वजनदार काठी को अकेले सँभाल नहीं पाएगा। घुमावदार सर्पीली सीढ़ियों पर तो बिलकुल नहीं।
"हाँ," बहन रो पड़ती है।
सर्दी के मौसम के कारण बहन के पैर अनावृत नहीं, मोजों से ढके हैं।
"हम घर कैसे जाएँगे", मैं महेंद्र चाचा की ओर देखता हूँ।
"रिक्शा बुला दूँ?" महेंद्र चाचा अपने हाथ का लोटा, एक ओर रखकर बहन की ओर बढ़ लेते हैं।
"नीचे मैं ले चलूँ?" महेंद्र चाचा बहन के ऊपर झुकते हैं।
"नहीं" बहन उनका हाथ एक ओर झटककर चीख पड़ती है। महेंद्र चाचा की बहन द्वारा अवमानना मेरे लिए नई है। मैं स्तब्ध हूँ।
मुझे फिल्म का प्रलोभन देकर वे क्या मेरी अनुपस्थिति मोल ले रहे थे?
बहन के साथ एकांत प्राप्त करने के निमित्त?
"नहीं कैसे?" बहन को महेंद्र चाचा जबरन अपनी बाँहों के कसाव में जकड़ लेते हैं, "रिक्शे के भाड़े की चिन्ता है तो वह मैं दे दूँगा....."
***

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