बाल कहानी: भैंस

आनंदप्रकाश जैन


आनंदप्रकाश जैन
[बाल साहित्य के बड़े रचनाकार और ‘पराग’ पत्रिका के यशस्वी संपादक आनंदप्रकाश जैन का पूरा जीवन बहुत संघर्ष भरा रहा। जमींदार परिवार में जनमे, परंतु विद्रोही स्वभाव होने के कारण परिवार से अलग होकर चौदह वर्ष की आयु में स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। पंद्रह वर्ष की कोमल आयु में अंग्रेजों के डंडे सहे और दो साल का कठोर कारावास भोगा। जेल से ‘तपा हुआ सोना’ बनकर निकले। बच्चों और बड़ों के लिए एक से एक सुंदर कहानियाँ, उपन्यास और नाटक। खासकर ऐतिहासिक और जासूसी उपन्यासों की बेजोड़ शृंखलाएँ, जो पाठकों को अपने साथ बहा ले जाती थीं। सन् 1959 से 1972 तक टाइम्स ऑफ इंडिया प्रकाशन की बाल पत्रिका ‘पराग’ का संपादन। यह वह दौर था, जब पराग ने एक से एक नए कीर्तिमान स्थापित किए। हिंदी जगत में ‘पराग’ के माध्यम से बाल साहित्य को विशिष्ट स्थान दिलवाने का श्रेय आनंद जी को जाता है।

‘भैंस’ आनंदप्रकाश जैन की बहुचर्चित कहानी है, जिसमें देसीपन का ठाठ है। कहानी में बाल मन की सरलता का इतनी सच्चा और निश्छल वर्णन है कि इसे पढ़कर पाठकों का मन भी भीगता है और नन्ही बच्ची शौकत का चित्र उनकी स्मृतियों में गढ़ सा जाता है।]
*

मुहम्मद हसन पठान बिगड़े हुए रईस थे। पुश्तैनी गाँव की जमींदारी मुकदमेबाजी की भेंट हो चुकी थी। जो कुछ बाकी बचा था, उसी के सहारे पुराने वक्त की यादों को लिए किसी प्रकार चले जा रहे थे।
पठान की छोटी बच्ची शौकत जितनी सुंदर थी, उतनी ही भोली-भाली भी थी। सात वर्ष की यह छोटी सी गुड़िया जिधर से भी गुजर जाती, लोंगों के आकर्षण का केंद्र बन जाती। 
घर में सब कुछ था, बड़ा सा अहाता, बीसियों दरों का दालान और लंबा-चौड़ा मकान, जिसे लोग दरबार कहा करते थे। लेकिन कुछ समय से एक चीज का भारी अभाव हो गया था। घर में कोई भैंस नहीं थी। विश्वस्त स्थान से दूध आता भी था, किंतु गृहस्थी के इन-गिने सदस्यों की तबीयत उससे भरती नहीं थी।
शौकत एक दिन नियमानुकूल अल्पकालीन भ्रमण के लिए घर से निकली हुई थी। गाँव के बाहर निकलते ही उसे एक अपूर्व आकर्षण दिखाई पड़ा, सिर पर पग्गड़ बाँधे एक आदमी कोयले-सी काली, नहलाई-धुलाई भैंस और कटिया के रस्से पकड़े चला जा रहा था। शौकत ने दूर से ही आवाज दी, ‘ओ भैंस वाले, थम जा, थम जा!” और ‘बूढ़े बाबा, रुक जा।’
बच्चे की आवाज सुनकर चौधरी रुक गया। शौकत पास आ गई। बात चलाने के लिए शौकत को कोई उपयुक्त चर्चा नहीं मिली। वह बोली, “यह भैंस है?”
“हाँ।” चौधरी ने उसकी ओर देखते हुए कहा।
“तेरी भैंस है?” शौकत ने फिर पूछा।
“हाँ।” चौधरी ने उत्तर दिया।
शौकत ने देखा कि अपनी ओर से चौधरी कुछ बात ही नहीं चलाता, लेकिन वह जैसे पक्की गृहस्थिन थी, उसने भैंस की तारीफ की।
“अच्छी है।”
“जमना पार से लाया हूँ।” चौधरी ने इस बार कुछ अधिक कहा।
शौकत ने कटिया के गले पर हाथ फेरा, इससे कटिया की खाल ने कुछ फुरफुरी ली। शौकत ने प्रसन्न होकर कहा, “हमारे यहाँ भी एक कटिया थी।”
चौधरी उसकी बातों का मजा लेता हुआ बोला, “अब कहाँ गई?”
“खुदा के घर चली गई।” अब्बा से शौकत ने यही सुना था।
“तू इसे ले जा।” चौधरी ने प्रस्ताव रखा।
अब तो शौकत खिल उठी, लेकिन वह खैरात नहीं लेती थी। उसने भी बराबर का प्रस्ताव रखा, “ये मेरा दुपट्टा तू ले ले।”
चौधरी बड़े जोर से ठहाका लगाता हुआ बोला, “इतना खूबसूरत दुपट्टा देकर क्या करोगी? तेरी अम्मी नाराज होगी।”
“यह तो आया का है।” शौकत ने उसे निश्चिंत करते हुए कहा।
“नहीं, मैं दुपट्टा नहीं लेता।” चौधरी ने कहा, “तू कटिया ले जा।”
“अच्छा!” शौकत ने सामने अब मजबूरी थी, “मै कटिया ले जाऊॅं?”
“हाँ!” चौधरी ने अपनी संपूर्ण अनुमति दे दी।
“यही इसकी माँ है न?” शौकत ने भैंस पर हाथ फेरते हुए निश्चिंत होने के ढंग से पूछा।
“हाँ, यही है।” चौधरी ने उसकी असीम जिज्ञासा शांत करते हुए उत्तर दिया।
“कटिया तो मगर दूध पिएगी। हमारे यहाँ तो दूध कम आता है।”
“यह केवल अपनी माँ का दूध पीती है। चल, इसकी माँ को भी तू ले जा।” पता नहीं क्यों शौकत, चौधरी को नन्ही परी-सी लग रही थी।
“भैंस तो हमें भी दूध देगी?”
“हाँ।”
अब क्या था, खुशी के मारे शौकत वहीं रास्ते में लोटपोट हो गई।
“तू किसकी बेटी है?” चौधरी ने पूछा।
शौकत खड़ी हो गई और तनकर बोली, “मैं पठान की बेटी हूँ।”
“तो जा, अपने बाप को बुला ला। मैं भैंस का रस्सा उसके हाथ में दे दूँगा।”
शौकत सिर पर पैर रखकर दौड़ चली।
पठान तभी रोटी खाने बैठा था। अभी एक लुकमा ही बनाया था कि पुकार सुनाई दी, “अब्बा, अब्बा, भैंस मिल गई!” शौकत के चिल्लाने व इसरार पर रोटी का टुकड़ा हाथ से छोड़ पठान उठ खड़ा हुआ। कंधे पर चादर डालकर वह शौकत के साथ हो लिया।
चौधरी पेड़ से रस्से अटकाकर निश्चिंत बैठा गुड़गुड़ी सुड़क रहा था, जब उसे पठान के साथ उछलती-कूदती शौकत वापस आती दिखाई दी।
पास आकर शौकत ने अब्बा को ठहरा लिया। बोली, “यही है”
पठान की समझ में बातें नहीं आईं। “कितने की आई थी?”
“पूरे बीस कम तीन सौ की जमना पार के मेले से लाया हूँ। अभी पुसाई तक नहीं है। बस, नजरों में निकालकर ले आया हूँ। लेकिन मुझे, जानते हो, सारी उमर जानवर पहचानने में बीती है।” चौधरी ने तनकर अपने शरीर का फूटता हुआ रक्त वर्ण दिखाया।
“अब्बा, ले भी चलो।” शौकत इन फिजूल की बातों को सुनते-सुनते उकता गई थी। उसे आशंका हो रही थी कहीं इन बातों के चक्कर में हाथ में आई हुई भैंस न निकल जाए।
“अच्छा जी, अच्छा!” पठान बोला, “कितने रुपए दे दूँ?”
“मियाँ, होश में भी हो?” चौधरी गंभीर हो गया, “बेचनी होती तो लाता ही क्यों? ले जाओ, ले जाओ। अब यह प्यारी बच्ची इसका दूध पिएगी और मैं घर बैठा-बैठा मोटा होता रहूँगा। मैं तो तुम्हें जानता भी नहीं, परंतु मियाँ, बच्चों की माया ऐसी ही होती है।”
पठान स्तंभित रह गया, “भला कहीं भैस भी खैरात की जाती है।”
“लानत है उस पर जो खैरात देता हो!” चौधरी जोर से बोला, “जैसी बच्ची तुम्हारी, वैसी मेरी। अपनी लड़कियों को चीजें देकर क्या दाम लिए जाते हैं? बस, ले जाकर बाँध लो। अब पैसे की बात मत करना।”
“बच्चे ईश्वर के अवतार हैं।” चौधरी बोला, “हम जन्म से दूध पीते ही चले आ रहे हैं, आज यह भगवान की भेंट सही।”
जब कोई अपरिचित देने पर उतर आता है, तो हयादारों से सहज ही में ग्रहण नहीं होता। पठान बड़े असमंजस में पड़ा। वह कुछ दलीलें ढ़ूँढ़ ही रहा था कि शौकत ने समस्यापूर्ति कर दी। भैंस को अपने लिए वारी समझकर उसने कटिया का रस्सा पकड़कर खींचा और जब वह चलने लगी, तो उसके पीछे-पीछे भैंस भी चल दी। इधर ये विचित्र क्रेता-विक्रेता नैतिक मोलभाव करते रहे, उधर शौकत के साथ भैंस और कटिया बहुत दूर पहुँच गई।
चौधरी ने जो यह तमाशा देखा तो गला फाड़कर हँसते हुए बोला, “लो, वह तो लेने वाली लेकर चली भी गई। हम यहाँ फिजूल गप्पें लगाए जा रहे हैं।”
पठान हार गया, “अच्छा चौधरी, किसी वक्त जरूरत पड़े और मुझे किसी काबिल समझो तो याद कर लेना। अब तो मैं बँध ही गया हूँ।”
“आऊँगा पठान, जरूर किसी वक्त आकर तुझे सताऊँगा। संसार के सारे नैतिक बंधन मुसीबत के साथी होते हैं।”
चौधरी ने अपनी गुड़गुड़ी उठाई और चलने को तत्पर हुआ। पठान ने उससे रोटी-पानी को पूछा, उसके गाँव का नाम पूछा, चौधरी अपना छोटा सा परिचय देकर विदा हो गया।
*
यह बात भी अन्य सैकड़ों छोटी-छोटी बातों की तरह लोगों के दिमाग से विलीन हो जाती, यदि पठान की जुबान घर पहुँचने तक बंद रहती। हकीम अब्दुल्ला पूछ बैठा, “खाँ साहब! भैंस कितने में ली?”
सरलहृदय पठान ने उत्तर दिया, “मुफ्त में मिल गई।”
हकीम हँस पड़ा, “सस्ती मिल गई मालूम होती है।”
पठान ने कहा, “सस्ती के क्या माने जी, बिलकुल न्यामत में मिली है।”
“अजी, खाँ साहब, क्यों मजाक करते हो?” हकीम अब्दुल्ला नें कहा, “कहीं भैंसें भी मुफ्त में मिलती है?”
“सच!” पठान ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा, “मानकपुर के चौधरी ने शौकत को तोहफे में दी है।”
हकीम साहब एक पल दार्शनिक मुद्रा में खड़े रहे, फिर मानो चेतन होकर बोले, “खाँ साहब, मुझे तो कुछ दाल में काला नजर आता है। माफ कीजिएगा, हो न हो भैंस चोरी की है, उसी के यहाँ थी?”
“जमना पार से मेले में आई है।” पठान ने सकते से में उत्तर दिया। उसने चौधरी की दानशीलता को इस दृष्टिकोण से नहीं सोचा था।
“तो फिर तय है।” हकीम साहब ने बात पक्की कर दी, “जमना पार के मेले के झमेले से यह भैंस खरीदी नहीं गई है, बल्कि चोरी की गई है। यहाँ आकर उसे कुछ खतरा मालूम दिया होगा और उसने जानवर बच्चे के सिर मढ़ दिया।”
“क्या आपने उससे कुछ सबूत ले लिया कि आपने भैंस उसी से खरीदी है?”
“किस्सा तो सारा यही है।” पठान पछताता हुआ सा बोला, “इस तरह से ली दी गई चीज की कहीं लिखा-पढ़ी थोड़े ही होती है?”
अपनी चादर उठाकर कंधे पर डालते हुए पठान घर की ओर लपका। घर में शौकत ने भैंस और कटिया को ले जाकर बहुत दिनों से खाली रही आती खूँट पर बाँध दिया था। प्रसन्नता से वह उसके चारों ओर तालियाँ बजाती उछलती-कूदती फिर रही थी। अब्बू को देखकर वह अपना सब खेल भूल गई। तत्परता से उसने कहा, “अब्बू, जल्दी से दूध निकालो।”
पठान तेजी से बोला, “यह भैंस हमारी कोई रिश्तेदार नहीं है। मैं इस ससुरी को अभी चौधरी के गले मढ़ आता हूँ।”
उसने चटपट भैंस और कटिया के रस्से खूँटे से खोले और चादर ज्यों की त्यों कंधे पर रख, नौकर को साथ लेकर चल दिया। जब तक पठान का घोड़ा आँखों से ओझल नहीं हुआ, शौकत इस अप्रत्याशित काँड को आँखें फाड़े निरखती रही। फिर वह चिल्ला-चिल्लाकर रो पड़ी।
पठान को रोकने के लिए अपनी नन्ही सी हथेली हवा में उठाकर वह बड़े जोर से भागी। जब भैंस उसकी दृष्टि में आ गई तो उसने और भी तीव्र प्रयत्न किया, किंतु ठोकर खाकर गिर पड़ी। वह रोती हुई उठ खड़ी हुई।
उसकी दशा देखकर पठान रुक गया। शौकत अब पास आ गई, तो वह फिर चल पड़ा। शौकत कुछ दूर रोती-रोती साथ चलती रही। रोने से कुछ काम न चलता देखकर, वह सुस्थिर होकर बोली, “अब्बा, भैंस तो दूध देगी।”
“क्या है?” पठान झुँझलाकर बोला।
डबडबाए नेत्रों और करुण मुद्रा से पिता की आँखों में देखती हुई शौकत ने फिर अपनी इच्छा दोहराई, “भैंस मत ले जाओ, अब्बा।”
झटके से अपनी उँगली छुडाकर पठान आगे चल दिया।
“मेरी भैंस है, भैंस मत दो।” बीच राह वह फिर पठान का हाथ पकड़कर खड़ी हो गई, “अब्बा, भैंस वापस मत करो।”
झल्लाकर पठान ने शौकत के मुँह पर एक चपत लगा दी। तगड़े हाथ की चपत खाकर शौकत धूल में गिर पड़ी। पठान उसे वहीं छोड़कर अपनी राह पर चल दिया। उसके हाथ में भैंस और कटिया के रस्से थे। बिना किसी प्रतिरोध के दोनों जानवर मूक भाव से उसके पीछे चले जा रहे थे।
बहुत देर तक धूल में बैठी शौकत उन्हें देखती रही। जब वो दिखाई देने बंद हो गए, तो वह रोती हुई उठी और दोनों आँखों को मलती हुई घर वापस लौट चली।
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दोपहर होते-होते पठान मानकपुर पहुँच गया। चौधरी का मकान ढूँढ़ने में उसे विशेष कष्ट नहीं हुआ। चौधरी को भी आकर बैठे अधिक देर नहीं हुई थी। वह निश्चिंत बैठा हुआ हुक्का सामने रखे दम लगा रहा था। भैंस और कटिया के साथ पठान को देखकर वह भौचक्का सा उठकर खड़ा हो गया।
“चौधरी!” पठान ने कहा, “यह अपना जानवर सँभाल, हमें नहीं पचा।”
“क्या बात हुई?” चौधरी ने विस्मित भाव से पूछा, “उस समय ले गए और हाथों हाथ वापस ले आए।”
हकीम साहब की जो बात पठान के मन में थी, वह तो अभी गहरी तैर रही थी। भैंस किसी भी सूरत से रखी नहीं जा सकती थी। अंत में बात खुली।
“एक बात कहूँ चौधरी, अगर बुरा न मानो?”
“बात एक नहीं, दो कहो।” चौधरी बोला।
“गाँव के लोग कहते है कि भैंस चोरी की है। मुझे तो यकीन नहीं आया, लेकिन सबके ऊपर होकर रह भी नहीं सका।”
चौधरी ने शांत मन से पठान की यह बात सुन ली। कुछ देर वह किंकर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा रहा। फिर शांत स्वर में उसने कहा, “मियाँ, अहाते में खूँटा है, अपने हाथ से ही बाँध जाइए, मैं बाद में सानी-पानी कर दूँगा।”
पठान ने भैंस खूँटे से बाँध दी। जब चलने लगा तो चौधरी बोला, “बच्चे का मन शुद्ध होता है, खाँ साहब। माँ के दूध और मनुष्य के मन की स्वच्छता को वही अच्छी तरह पहचान सकता है।”
पठान लज्जा से पानी पानी हो गया, बिना कुछ आगे बोले-चाले वह दिन ढलते घर आ पहुँचा। उसका मन भारी था और उसके भीतर बैठा कोई गवाही दे रहा था कि काम अच्छा नहीं हुआ।
घर में घुसते ही आशंका विश्वास में बदल गई। पठानी ने देखते ही माथा पीटकर कहा, “शौकत को बड़ा तेज बुखार है।”
पठान के बदन में काटो तो लहू नही। धड़कते दिल से बच्ची के माथे पर हाथ रखा, वह तवे की तरह जल रहा था।
“यह तो बहुत बुरा हुआ, शौकत की अम्माँ।” पठान घबराकर बोला, “जरा सी बात जान की बवाल बन गई।”
पठान भागा-भागा हकीम साहब को बुलाकर लाया। बच्ची को देखकर वे बोले, “घबराने की बात नहीं, ठीक हो जाएगी। सुबह-सुबह सर्दी में निकलने के कारण ठंड खा गई है।”
किंतु न घबराने से भी मामला सुधरा नहीं। शौकत की दशा बिगड़ती ही चली गई, रात को उसे सन्निपात हो गया। ज्वर के प्रकोप में बड़बड़ाती रही, “मेरी भैंस थी।”
रात भर पठानी उसे कलेजे से लगाए पड़ी रही। खुदा को लक्ष्य करके दुआ मनाती रही, “मेरी बच्ची अच्छी हो जाए तो पीर की दरगाह में दुशाला दूँगी।”
बराबर में चापाई डाले पठान सारी रात बैठा रहा, कलेजा मुँह को आता रहा। क्या करे क्या न करे? सुबह होते ही चौधरी के पास जाएगा, अपने अविश्वास की क्षमा माँगेगा।
खुदा-खुदा करके सुबह भी हो गई। पठान ने चादर कंधे पर डाल, हाथ में लाठी लेकर घोड़े पर मानकपुर की ओर दोड़ लगा दी। द्वार पर चौधरी का जवान बेटा मानो उसकी प्रतीक्षा ही कर रहा था। उसे देखते ही वह सूरजमुखी की तरह खिल उठा। बड़े आदर से अंदर लिवा लाया।
“कहाँ है चौधरी?” पठान ने हाँफते हुए पूछा।
“लड़का उसे भीतर के कोठे मे ले गया, जहाँ चौधरी आँखें टिमटिमाए चारपाई पर पड़ा था। लड़के ने कहा, “रात भर बड़बड़ाते रहे, तुम्हारी बेटी की याद कर चौंकते रहे। अच्छा हुआ अब तुम आ गए।”
चौधरी ने पठान को अपना कान उसके मुँह के पास करने का इशारा किया, “मियाँ, यह भैंस तुम अभी ले जाओ। सब अच्छे काम ईश्वर के काम हैं, बच्चे भी उसी के रूप हैं।”
पठान ने स्वीकृति से सिर हिला दिया।
जब वह भैंस खोलकर चलने लगा तो बूढ़े ने उसे फिर अपने पास बुलवाया। एक परचा आगे बढ़ाता हुआ वह बोला, “देखो, यह पुरजा मैने लिख दिया है, यह इस बात की सनद है कि भैंस चोरी की नहीं है, और मैंने तुम्हारी बच्ची को भेंट में दी है।”
असमंजस में पड़े हुए पठान ने लज्जा से गरदन झुका ली। शायद वह सोच रहा था कि चौधरी के हाथ से कागज ले या न ले।
***

प्रस्तुति: मंजुरानी जैन
10, नरूला बिल्डिंग, पहला माला, 21वीं रोड, चेंबूर, मुंबई-400071,
चलभाष: 09869686430

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