भाषायी ताना-बाना: (1) विकास यात्रा का पहला अध्याय

चंद्र मोहन भण्डारी
मानव मस्तिष्क का सबसे अहम कार्य भाषाई ताने-बाने की बुनावट है जो उसके अस्तित्व को अर्थ प्रदान करती है। मानव जीवन की  विशेषता उस सामर्थ्य  में निहित है जो उसे निरंतर प्रेरित करती है  भाषाई ताने-बाने की बुनावट के लिये, जिसमें अंतत: वह स्वयं आप्लावित हो जाता है।  
- फ्रिटजॉफ कापरा (Fritjof Capra) [1] 

मानव की सांस्कृतिक विकास यात्रा उसकी शेष जंतु जगत से पृथक एक पहचान बना सकने की कथा है और यह उसके  मस्तिष्क की क्षमता के कारण ही संभव हो सका। इस क्षमता का आरम्भिक चरण  भाषागत संप्रेषण था जो स्वयं भाषाई ताने-बाने की बुनावट का प्रतिफल था और इस प्रक्रिया में वह ताना-बाना निरंतर समृद्ध होता गया। अब हम यह जान रहे हैं कि यह सब अचानक शून्य से नहीं उपजा, इसके सारे प्रावधान मस्तिष्क की संरचना में विद्यमान हैं। यही कारण है कि विश्व के सुदूर एवं अलग-थलग अंचलों में भाषा का विकास स्वतंत्र रूप से हो सका। दो अंकों में समाप्य इस चर्चा का पहला भाग प्रस्तुत है। 

मानव सहित विश्व के सभी जीव धरती एवं वायुमंडल यानी जैवमंडल से घिरे हैं जो उनके अस्तित्व का जनक है। यह तो है दैहिक स्वायत्त अस्तित्व की बात, इसके इतर भी मानव का अस्तित्व है जिसे हम उसका समष्टिपरक अस्तित्व कह सकते हैं और इस विषय पर पहले चर्चा [2, 3] हुई है। मानव के इस दूसरे अस्तित्व की शुरूवात भाषा ज्ञान से होती है जो इस लेख में चर्चा का विषय है। भाषा का ताना-बाना मानव बुनता आया है हजारों साल पहले से कुछ वैसे ही जैसे रेशम का कीड़ा अपने चारों ओर बुनता रहता है वह रेशमी जाल जिसमें वह स्वयं घिर जाता है या (कापरा के अनुसार [1]) आप्लावित हो जाता है।


अंतर्निहित भाषाई प्रावधान

मानव मस्तिष्क की बनावट एवं बुनावट आधुनिक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की सहायता से थोड़ा बहुत समझ में आने लगी है पर इस प्रगति के बावजूद कुछ है जो उलझन में डालने वाला है। विज्ञान के  बढ़ते कदम उन जवाबों के कुछ करीब जरूर ले आये हैं जिनकी हमें तलाश रही है पर पूरी तरह लक्ष्य तक पहुँचना कब हो सकेगा या हो भी सकेगा, कहना आसान नहीं। इसके इतर कई अन्य सवाल हैं जो अभी अुनत्तरित हैं और जिनकी चर्चा समय आने पर करेंगे।

जैविक विकास प्रक्रिया में सरल से आरम्भ होकर जटिल अणुवों की संरचना हुई और धीरे-धीरे जटिलतर अणु सामने आये। विकास की इस कड़ी में विश्व की जटिलतम रचना यानि  मानव मस्तिष्क का अस्तित्व में आना एक बड़ी घटना है। मस्तिष्क की विस्तृत कार्यविधि, मन की बुनावट और चेतना के उदभव एवं विकास से जुड़े कई अहम सवाल एक चुनौती प्रस्तुत करते हैं सशक्त एवं सक्षम आधुनिक विज्ञान के लिये भी।


न्यूरोनी जुडाव और उनका ताना-बाना

भाषाई ताने-बाने सहित मन की हर लाक्षणिकता का सीधा संबंध मस्तिष्क में न्यूरोन तंतुवों  और उनके बीच के युग्मन से है। यह समझा जाता है कि यह युग्मन जन्म के बाद थोड़े समय में क्रियाशील हो जाता है और पहले तीन चार सालों में लगभग पूर्ण सक्रियता प्राप्त कर लेता है। इसके कुछ उदाहरण सामने आये हैं जिसपर संक्षिप्त चर्चा बात को समझने में सहायक होगी।


भेड़िया बालक

लगभग चार दशक पहले भेड़िया बालक वाली घटना का जिक्र पत्र-पत्रिकाओं में सविस्तार हुवा था जिसकी यहाँ चर्चा करना उपयोगी होगा। 1976 में उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर जिले में एक मानव  शिशु भेड़ियों की संगत में दिखाई पड़ा जिसे भेड़िये गाँव के पास छोड़कर चले गये। कुछ लोगों ने उसे देखा और मदर टेरेसा के आश्रम में पहुँचा दिया। यह एक हैरत में डालने वाली बात थी कि न केवल भेड़ियों ने उसे किसी तरह का नुकसान नहीं पहुँचाया अपितु उसका पालन-पोषण भी किया। रामू नामक वह बालक भेड़ियों की बहुत सी आदतें सीख चुका था और उन्हीं की तरह कच्चा मांस खाने का आदी था। वह बच्चा ज्यादा समय जिंदा नहीं रहा पर एक बात जो खास थी वह यह कि वापस मानव के बीच आकर वह भाषा सीखने में असफल रहा। 1985 में रामू का देहाँत हो गया। कुछ समय भेड़ियों के बीच रहकर वह उनकी तरह आवाज करता था पर करीब 8-9 साल  मानव के बीच वापस रहकर भी वह भाषा नहीं सीख पाया। एक संभावित कारण यह हो सकता है कि भाषा के अंतर्निहित विकास के सबसे महत्वपूर्ण चरण में उसे मानव का सान्निध्य नहीं मिल सका। 

मात्र एक घटना से किसी निष्कर्ष पर पहुँचना सही नहीं परन्तु कई अन्य प्रेक्षणों के आधार पर यह बात लगभग  सर्वमान्य है कि जिन बच्चों  का भाषा ज्ञान आरम्भिक वर्षों में ठीक से नहीं हो पाता है उन्हें बाद के वर्षों मे कठिनाई होती है। मानव मस्तिष्क में न्यूरोन कोशिकाओं के बीच युग्मन आरम्भिक समय में आसानी से हो जाता है और किसी वजह से यदि ऐसा नहीं हो सका तब बाद में यह काम कठिन हो जाता है। रामू के साथ संभवत: यही हुआ पर यह जानकारी नहीं मिल सकी कि वह भेड़ियों के बीच कैसे पहुँचा। कई बार यह भी होता है कि  माता-पिता ही बच्चे में  कुछ कमी जानकर उसे छोड़ दें और उसका भाषा न सीख पाना उन्हीं कमियों की वजह से रहा हो।


मस्तिष्क संरचना

आधुनिक प्रौद्योगिकी की सहायता से आज मस्तिष्क के विषय में जानकारी बढ़ी है। मस्तिष्क में  देखने, सुनने, स्पर्श, आदि संवेदनों के अलग क्षेत्र हैं और भाषा के लिये भी न केवल निर्धारित क्षेत्र हैं अपितु भाषाई ताने बाने के विकास हेतु विशेष प्रावधान [4] है कुछ यही बात अन्य विधाओं जैसे गणित के लिये भी कही जा सकती है। अंकों तथा गणितीय क्रियाओं (जैसे जोड़ना, गुणन आदि) के लिये अलग  स्थल हैं। अगर किसी दुर्घटना में मस्तिष्क का कोई हिस्सा चोटिल होता है तो उसकी क्षमता में अंतर आता है। एफ एम आर आइ (फंक्शनल मैगनेटिक रेजोनेन्स इमेजिंग) चित्रण से हम पता लगा सकते हैं कि भाषा या गणित का  कार्य  करते समय कौन सा स्थल क्रियाशील हुवा है। यह जानकारी एक बड़ी उपलब्धि है मस्तिष्क की कार्यप्रणाली समझने की दिशा में, पर पूरी बात समझने के लिये अभी बहुत दूरी और तय करनी होगी।


भाषा-उच्चारण और समझ

आज प्रौद्योगिकी के विकास के साथ यह संभव हो गया है कि हम मस्तिष्क के उस स्थलों को पहचान सकें जो भाषा के लिये जिम्मेदार हैं और यह भी जानकारी है कि भाषा  की समझ तथा उच्चारण के स्थल भी अलग [5] हैं। वह भाग जो उच्चारण से संबंधित है ब्रोका (Broca’s area) क्षेत्र कहलाता है और दूसरा जो भाषाई समझ के लिये चिन्हित है वेर्निक क्षेत्र (Wernicke’s area); भाषा से जुड़े दोनों क्षेत्र मस्तिष्क के बायें गोलार्द्ध में स्थित हैं और इनकी क्रियाशीलता को एम आर आइ की सहायता से जाना जा सकता है। किसी कारणवश यदि ब्रोका क्षेत्र ठीक से काम न कर सके तब वह  व्यक्ति कही गई बात पहले की तरह समझ लेगा पर अपनी बात को ठीक से अभिव्यक्ति न दे सकेगा। वैसे ही वेर्निक क्षेत्र प्रभावित होने पर कही गई बात समझना मुश्किल हो जायेगा जबकि बोलने की क्षमता यथावत बनी रहेगी। जैसा पहले कहा जा चुका है भाषा संबंधी क्रियान्वयन बायें गोलार्द्ध में मुख्यत: होता है पर कुछ विशेष अवस्थाओं में दाहिने गोलार्द्ध का सहयोग भी  लिया जाता है। 

यह ध्यान देने योग्य है कि कई अन्य बातों के लिये भी  मस्तिष्क संरचना में प्रावधान हैं। रूपकों, अलंकारों का प्रयोग विशेषकर कविता में अक्सर होता रहा है। गद्य में भी इनका प्रयोग देखने को मिलता है जो हमारे चिंतन व संप्रेषण को एक नया सृजनात्मक आयाम दे देता है। माइकेल रेड्डी [6] के अनुसार रूपक या अलंकार कविता में या अन्य विशिष्ट स्थितियों में ही नहीं, अपितु सामान्य दैनन्दिन संप्रेषण का एक अंतरंग एवं आवश्यक अंग है। जाने-अनजाने सामान्य बातचीत में इसका प्रयोग संप्रेषण को प्रभावी करता है और भाषा वैचारिक आदान-प्रदान का सशक्त माध्यम बनकर उभरती है जिसे अलंकार अधिक सशक्त और समर्थ कर देते हैं। गौर करें तो देखेंगे कि अलंकार मूलरूप से अवधारणात्मक [6] है और उसका भाषाई संदर्भ बाद में उजागर होता है। एक उदाहरण लेकर बात को स्पष्ट करेंगे। मैं कोई चीज अपने मित्र को भेजना चाहता हूं जिस चीज को भेजना है उसे एक लिफाफे या झोले में रखकर भेजूंगा और प्राप्तकर्ता उसे लिफाफे य झोले से निकाल कर रख लेगा। अवधारणा या विचार उस चीज की तरह है जिसे भेजा जाना है और भाषा है लिफाफे या झोले की जगह। पार्सल भेजने की क्रिया संप्रेषण का स्थान लेगी। 

अवधारणा           -    भेजी जाने वाली चीज
भाषा                  -     जिसमें रख कर भेजा जायेगा, जैसे झोला या वाहक
संप्रेषण                -      पार्सल  भेजा जाना 

उदाहरण:
तुम्हारे शब्द खोखले हैं यानी तुम्हारा भाषाई झोला तो है पर खाली है कोई ठोस आवधारणा या विचार से हीन। इसके ठीक विपरीत शब्द वजनी भी हो सकते हैं। जैसे: अपने भाषण में वे बोले बहुत  कम, लेकिन उनके शब्दों में वजन था।    

अब जरा मिर्जा गालिब के शब्दों पर गौर करें:
कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीरे नीमकश को
वो खलिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता।

तीरे नीमकश यानी दिल में फँसा हुआ तीर –  यह एक अवधारणा है जो शब्दों के माध्यम से प्रेषित हो रही है। फंसा हुवा तीर आरपार निकल गये तीर की तुलना में ज्यादा कष्टदायक होगा। शब्दों में बड़ा वजन है।

ऐसे उदाहरणों से साहित्य भरा पड़ा है पर मूलत: बात वही है शब्दों के माध्यम से किसी भाव या अवधारणा का  उपयोग कर अपनी बात को सार्थक तरीके से संप्रेषित करना। इसी आधार पर इन  अलंकारों को वाहक अलंकार (conduit metaphor) कहा जाने लगा।

हमने इन सभी बातों के लिये मस्तिष्क में प्रावधान होने की बात कही है। मस्तिष्क संरचना के अधिक विस्तार में जाना इस लेख में संभव नहीं पर हम संक्षेप में बात स्पष्ट करेंगे। मस्तिष्क के कनेक्शन यानी जुड़ाव लचीले होते हैं जो शरीर की कोशिकाओं का स्वभाव है,  सामान्य बिजली के कनेक्शन की तरह नहीं। लचीलेपन के कारण एवं अन्य कारण से जुड़ाव आगे-पीछे या असामान्य हो सकते हैं और होते भी हैं। ऐसा होने पर कई तरह की बातें हो सकती हैं जैसे गणितीय अंकों का रंगीन दिखाई देना यानी सिनेस्थेसिया  (synaesthesia), शरीर के किसी अंग के न होने पर भी होने वाला आभासी संवेदन या रूपको, अलंकारों का अंतर्निहित प्रावधान। गणितीय अंकों के लिये निर्धारित क्षेत्र और रंग वाले क्षेत्र पास हैं और थोड़ी सी त्रुटि सिनेस्थेसिया का कारण बन जाती है।  


अंतर्निहित भाषाई ज्ञान

भाषा विज्ञान में हाल के दशकों में कई महत्वपूर्ण बातें सामने आई हैं और हमारी न्यूरोलाँजिकल जानकारी भी कुछ बातों के समझने में सहायक हुई है। जैसा पहले कहा जा चुका है मस्तिष्क में भाषाई विकास के सारे प्रावधान अंतर्निहित हैं। इस दिशा में नोम चोम्स्की (Nom Chomski) [7] का योगदान अत्यंत महत्व का है जिसकी चर्चा विस्तार से करना समीचीन होगा। चोम्स्की के अनुसार मानव शिशु में व्याकरण सीखने के गुण अंतर्निहित हैं जिसे वे यूनिवर्सल ग्रामर कहकर संबोधित करते हैं। कुछ भाषाविद इस बात को स्वीकार नहीं करते पर अधिकांश लोग अब इन विचारों से सहमत हो रहे हैं। आधुनिक न्यूरोलाँजिकल जानकारी से भी चोम्स्की की बात को बल मिलता है। भाषा से जुड़े अन्य पहलू भी इसी ओर इशारा करते दिखायी देते हैं। अलंकारों की बात पहले की जा चुकी है जिसके प्रावधान दिमागी कोशिकाओं के जुड़ाव में मौजूद हैं। 

अगर संसार की विभिन्न सभ्यताओं एवं मानव समूहों के भाषा विकास पर गौर करें तब यह साफ नजर आता है कि उनमें बहुत समानता है। वे मानव समूह भी जो एकदम दूर दराज इलाकों में पले-बढ़े, स्वतंत्र रूप से भाषागत सामर्थ्य का विकास करने में सक्षम रहे। आज से पांच सौ साल पहले जब यूरोपीय अभियानों में अमेरिका की खोज हुई तब वहाँ स्वतंत्र रूप से विकास कर रही सभ्यताओं की जानकारी मिली जिनमें माया और इंका समूह भाषा ज्ञान के इतर कृषि संबंधी जानकारी भी स्वतंत्र रूप से प्राप्त कर चुके थे। पन्द्रह से बीस हजार साल पहले अलास्का के हिमसेतु से होते हुए कुछ मानव समूह एशिया से अमेरिका पहुँचे होंगे ऐसा माना जाता है और इसके साक्ष्य भी मौजूद हैं।


अंतर्निहित बौद्धिक क्षमता

चोम्स्की ने जिस अंतर्निहित व्याकरण सीखने के गुण की बात कही उसने भाषाविज्ञान में हलचल मचा दी। लगभग इसी दौरान विज्ञान की जानकारी ने भी इस दिशा में चिंतन को प्रेरित किया। यह समय था जब अंतर्निहित ग्रामर ही नहीं अपितु अंतर्निहित भाषा ज्ञान की  बात न्यूरोलाँजी के अन्वेषणों से सामने आने लगी थी, और बात सिर्फ भाषा ज्ञान तक ही नहीं उसके इतर भी जाती दीखती है। क्या गणित के बारे में भी इसी तरह की बात नहीं कही जा सकती? गणित एक भाषा ही है अमूर्त की एक विशिष्ट भाषा।


अंतर्निहित भाषा ज्ञान: एक संभावित प्रयोग

मान लें  लगभग दो दर्जन मानव परिवारों को ऐसी जगह भेज दिया जाता है जिनमें पांच वर्ष से कम आयु के बच्चे हों और सभी परिवार अलग अलग भाषाऐं बोलते हों। यहाँ उनकी सभी जरूरतें जिनमें भोजन व सुरक्षा शामिल हैं प्राप्त हैं लेकिन उनकी शिक्षा का कोई प्रावधान नहीं। ऐसे में क्या वे आपस में कोई सार्थक संवाद आरम्भ कर सकेंगे? जवाब है हाँ जिसमें पहले संकेतों का प्रयोग होगा और फिर धीरे-धीरे उन समूहों की भाषाओं के आधार पर एक मिश्रित या खिचड़ी भाषा प्रयोग में आने लगेगी। 

छोटे बच्चों की उपस्थिति में अंतर्निहित ग्रामर  वाली बात सामने आ सकती है ऐसा विश्वास कई भाषाविदों को था और इसकी चर्चा हम अगले पृष्ठों पर करेंगे।


भाषाज्ञान एवं संप्रेषण में पैटर्न की भूमिका

मन की कार्यप्रणाली में पैटर्न बहुत महत्वपूर्ण हैं जिसे समझने के लिये एक वैचारिक प्रयोग करेंगे जिसका सविस्तार वर्णन एडवर्न डि बोनो [8] ने किया है। जिलेटिन से ढकी किसी हलके ढलान वाली सतह पर गर्म पानी उडेलते हैं पानी ढाल की कोई दिशा लेकर बहना आरम्भ करता है यह बहाव-पथ क्या होगा पहले से ठीक से कहा नहीं जा सकता। गर्म पानी से बहाव पथ पर कुछ जिलेटिन पिघल जाता है और पिघला जिलेटिन  एक पैटर्न प्रस्तुत करता है। दूसरी बार यही प्रयोग दोहराने पर पानी का बहाव-पथ किसी हद तक निश्चित हो जाता है और वह पहले प्रयोग में बने पथ का अनुसरण करता है। यानि पहला प्रयोग सबसे महत्व का था जिसमें जिलेटिन सतह पर एक लगभग स्थाई बहाव पथ बन जाता है जिसे पैटर्न कहते हैं। धरती पर नदियों के बहाव-पथ भी कुछ ऐसे ही बने [9] हैं। जिन्हें हम संस्कार कहते हैं वह भी एक प्रकार के पैटर्न हैं।

जिस भाषाई ताने-बाने की बात हो रही है उसके निर्माण में भी इन पैटर्नों की अहम भूमिका है। हम यह भी कह सकते हैं कि हमारी सीखने व सिखाने की प्रक्रिया में इन पैटर्नों की अहम भूमिका है।

सामान्यतया हम यह जानते आये हैं कि शिशु मन एक कोरा कागज ( tabula rasa ) है जिसपर पहली लिखावट दूरगामी प्रभाव छोड़ सकती है। आरम्भिक घटनाऐं शिशु मन पर गहरा असर डालती हैं कुछ वैसे ही जैसे जिलेटिन प्रयोग में पहला बहाव  पथ। भेड़िया बालक रामू की भाषा संबंधी कठिनाई को इस आधार पर  समझा जा सकता है। आज हम धीरे-धीरे यह जान सके हैं कि शिशु मन एकदम कोरे कागज की तरह न होकर विशेष क्षमता युक्त कागज जैसा है जिसपर हल्की अस्पष्ट सी लिखावट अप्रत्यक्ष विद्यमान है और जो उचित माहौल में तेजी से भाषाई ज्ञान प्राप्त करा सकने में सक्षम है। 

सब मिलाकर यह कहना सही होगा कि भाषाज्ञान में बाह्य परिवेश से प्राप्त जानकारी के साथ अंतर्निहित भाषाई प्रावधान, दोनों का ही योगदान रहता है। सुदूर अंचलों में बसे और कभी दूरस्थ लोगों के संपर्क में न आने पर भी समानताऐं उनके बीच दिखाई देती हैं शब्दों का चयन एवं उच्चारण एकदम भिन्न हो सकते हैं या लिखावट भी अलग हो सकती है लेकिन व्याकरण की समानताऐं यह सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि इस तरह की जानकारी के लिए मस्तिष्क में प्रावधान रहा होगा। इसीलिये इसे सर्वजनीन ग्रामर ( universal grammar ) की संज्ञा दी गयी। एकवचन से बहुवचन बनाने, वर्तमान से भूतकाल की क्रिया बनाने एवं वाक्य रचना में में कुछ न सिखाने पर भी अंतर्निहित प्रावधान कुछ जानकारी दे सकने में सफल होते हैं। इस बात को सिद्ध करने के लिये कुछ साक्ष्य मौजूद हैं जिनकी चर्चा यहाँ पर करेंगे।

डेरेक बिकरटन [10]  का अध्ययन इस विषय में महत्वपूर्ण है और उसकी चर्चा करना उपयोगी होगा। ब्रिटिश भाषाविद डेरेक हवाई विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे जिन्होंने लम्बे समय तक हवाई और गुयाना द्वीपों में एवं अन्यत्र भी मिश्रित भाषाई मजदूर समूहों में भाषा के विकास का अध्ययन किया। दरअसल आरम्भिक समय में डेरेक ने अपनी शोधों के लिये एक अनोखा प्रस्ताव अधिकारियों के सामने रखा जिसमें अलग अलग भाषाऐं बोलने वाले छ: परिवारों को जिनके छोटे (चार वर्ष से कम) बच्चे हों एक जगह पर कुछ समय के लिये अस्थायी रूप से रखने की बात थी ताकि भाषा के विकास संबंधी कुछ महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध हो सके। लेकिन उनका प्रस्ताव अस्वीकृत हो गया इस आपत्ति के साथ कि यह अन्यायपूर्ण एवं अनैतिक कार्य माना जायेगा। 

इसके कुछ ही समय बाद डेरेक को उन स्थानों पर अपना प्रयोग करने का अवसर मिल गया जहाँ अलग अलग जगहों से लाये गये मजदूरों को एक साथ काम करने के लिये बाध्य होना पड़ा। इन समूहों के मध्य बातचीत के लिये कोई भाषा न होने के कारण आरम्भिक कठिनाई के बाद धीरे धीरे काम चलाने के लिए संकेतों का प्रयोग किया गया जो क्रमश: एक सांकेतिक भाषा का स्थान लेता गया। धीरे-धीरे एक मिश्रित खिचड़ी भाषा का प्रयोग होने लगा जिसे पिजिन (Pidgin) कहा जाने लगा। इस शब्द का  आरम्भ दक्षिण चीन के भूभाग में अंग्रेजी-चीनी मिश्रित भाषा के प्रयोग से जुड़ा है माना जाता है कि बिजनेस शब्द का चीनी उच्चारण पिजिन शब्द के रूप में प्रयोग होने लगा। इस तरह पिजिन शब्द मिश्रित भाषा के स्थान पर प्रयोग किया जाने लगा। डेरेक का यह अध्ययन उन्नीसवीं सदी में हवाई एवं गुयाना द्वीपों में किया गया लेकिन पिजिन या खिचड़ी भाषाओं का विकास विश्वभर में कई स्थानों पर हुवा क्योंकि साम्राज्यवादी शक्तियाँ अपनी सुविधा एवं जरूरतों के लिये जगह जगह से बंधवा मजदूर लाया करते। अपने देश से ही मारीशस और फिजी जैसे द्वीपों में गये मजदूरों के विषय में सुनते आये हैं। बचपन में मुझे अपने पिता से कुछ जानकारी मिला करती कि कैसे अंग्रेजों व सामान्य स्थानीय मजदूरों व दूकान वालों के बीच बात हुवा करती थी।  अपना सामान बेचने के लिये कोई छोटा दुकानदार किसी अंग्रेज खरीदार से जिद करता है और कहना चाहता है कि मेरा सामान लो या न लो एक बार देख तो लो। इसे वह इस प्रकार बयाँ करता था:’ टेक टेक, नो टेक तो एक दफे तो सी यानि take take, no take, to ek dafe to see’; यह एक काम चलाऊ भाषा थी जिसका कोई निश्चित व्याकरण या शब्द विन्यास नहीं था लेकिन काम चल जाता था। 


पिजिन एवं क्रिओल

डेरेक के प्रयोगों से सबसे रोचक व महत्वपूर्ण बात यह सामने  आयी कि कम उम्र  के बच्चों के  लिये यह स्वत:प्राप्त भाषा ज्ञान अपेक्षाकृत आसान था जो कि अधिक उम्र वालों के लिये मुश्किल या लगभग असंभव था। बढ़ती उम्र  के साथ यह अंतर्निहित सहजज्ञान लगभग विलुप्तप्राय हो जाता है। अलग अलग भाषा बोलने वाले मजदूरों की नई पीढ़ी जब ऐसे मिश्रित भाषी वातावरण में पलती-बढ़ती है तब उनके भाषाई सहजज्ञान यानि language instinct [11] के कारण उस खिचड़ी भाषा में व्याकरण के नियमों का आंशिक समावेश उसे कुछ सीमा तक भाषाई ताने-बाने से समृद्ध कर देता है। पिजिन की तुलना में यह अपेक्षाकृत समृद्ध भाषा तब क्रिओल (creol) कहलाती है। सामान्तया क्रिओल का जन्म दो भाषाई समूहों के संपर्क में आने पर होता है जिनमें एक अधिक सशक्त होता है जैसा यूरोपीय साम्राज्यवाद के विस्तार के इतिहास में नजर आता है। आरम्भिक क्रिओल भाषाओं में सेनेगल में पुर्तगाली भाषा आधारित क्रिओल प्रमुख है यद्यपि अब तो इसके दर्जनों उदाहरण विश्व में बिखरे पड़े हैं। सामान्यतया पिजिन एवं क्रिओल [12] में शब्द मुख्य रूप से अधिक सबल भाषा से होते हैं जबकि व्याकरण एवं वाक्य-विन्यास दूसरी से।


संदर्भ:

[1] फ्रिटजॉफ़ कापरा, द वेब आँव लाइफ, एंकर बुक्स, 1995.
[2] मानव के उभयचरीय अस्तित्व की कथा: [1] एक विशिष्ट पर अधूरा अभियान, सेतु, मार्च, 2022.
[3] मानव के उभयचरीयअस्तित्व की कथा: [2] भविष्य की संभावित रूपरेखा, सेतु, अप्रैल, 2022.
[4] वी रामचन्द्रन, The Emerging Mind, Profile Books Ltd., 2003.
[5] इन क्षेत्रों के नामकरण Paul Broca एवं Carl Wernicke के सम्मान में किये गये।
[6] अलंकारों के प्रयोग: अवधारणात्मक चिंतन एवं भाषा के संबंध में M Reddy  के अध्ययन पर आधारित।  Reddy, M. J. (1979). The conduit metaphor: A case of frame conflict in our language about language. in A. Ortony (Ed.), Metaphor and Thought (pp. 284–310). Cambridge: Cambridge University Press. ISBN 0-521-29626-9 paperback
[7] Nom Chomski, Syntactic Structures, Mouton and Co., 1957.
[8] एडवर्ड डि बोनो, Lateral thinking in Scumacher lectures (ed. Satish Kumar), Blond and Briggs, 1980.
[9] चंद्रमोहन भंडारी, ऊंट और उसकी अनोखी करवट, सेतु, अक्टूबर, 2019.
[10] Derek Bickerton, Roots of Language, Karoma Publishers, 1981.
[11] S. Pinker, The Language Instinct, : the new science of language and mind, Penguin, 1994.
[12] www.dailywritings.com/pidgin and creole languages

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