समीक्षा: 'नदी की टूट रही देह की आवाज' की मर्म-भेदी संवेदनाएँ

समीक्षक: विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: नदी की टूट रही देह की आवाज (उपन्यास)
उपन्यासकार: श्रीप्रकाश मिश्र
मूल्य: ₹ 525.00
प्रकाशक: लोकभारती प्रकाशन

संसार में जो कुछ घटित होता है, हमारे चिन्तन से होते हुए वह साहित्य में सम्मिलित होता ही है। विधाओं की बात होती है, यह रचनाकार पर निर्भर करता है कि अपनी अभिव्यक्ति के लिए वह किस विधा का चयन करता है। उपन्यास साहित्य की महत्वपूर्ण विधा है। हिन्दी में भी उपन्यास खूब लिखे-पढ़े जा रहे हैं। साहित्य में उपन्यास लेखन को बड़ी घटना के रूप में देखा जाता है। माना जाने लगा है कि हिन्दी के साहित्यकारों ने इसे चुनौती के रूप में लिया है। साहित्य की अन्य विधाओं की तरह उपन्यास को लेकर बहुत सी बातें कही-सुनी जा रही हैं। देखा जाये तो अपनी-अपनी तरह से सभी कुछ न कुछ जोड़ ही रहे हैं ताकि जनमानस के सामने एक स्पष्ट स्थित उभरे। भेद-मतभेद का होना स्वाभाविक है और यह चलता रहेगा। बस इतना ही मान कर चलना है कि साहित्य समृद्ध हो रहा है, पाठकों को विस्तृत आसमान मिल रहा है और औपन्यासिक कृति के रूप में सृजन का दायरा विस्तृत हुआ है। सबको अपने अनुभूत संसार को व्यक्त करने की बेचैनी है। जिसका जितना बड़ा अनुभव, उनके लेखन में वैसी ही अभिव्यक्ति और बड़ा चिन्तन।

विजय कुमार तिवारी
हिन्दी के बडे साहित्यकार, कवि, लेखक, संपादक, उपन्यासकार श्री श्रीप्रकाश मिश्र जी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। अब तक उनके पाँच कविता संग्रह, पाँच उपन्यास, पाँच आलोचना की पुस्तकें और पाँच चिन्तन की पुस्तकें छप चुकी हैं। इसके अलावा एक मिलिट्री साइंस, एक अन्तर्राष्ट्रीय विधि और एक बंगला से अनुवाद छपा है। उन्नयन पत्रिका का लगातार संपादन करते रहे हैं और देश-विदेश की साहित्यिक गोष्ठियों में उनकी सार्थक उपस्थिति रहती है। कहने में संकोच नहीं है कि उनके सान्निध्य में रहकर, बहुत रचनाकारों ने लेखन शुरू किया है। उनकी महत्वपूर्ण औपन्यासिक कृति 'नदी की टूट रही देह की आवाज" को पढ़ने, समझने का सुअवसर मिला है। अपनी सामान्य बुद्धि से जो कुछ समझ सका हूँ, आप पाठकों, साहित्य-मर्मज्ञों को सादर सौंप रहा हूँ।

अपने 'पूर्व कथन' में उन्होंने दो तरह के उपन्यास लेखन की चर्चा की है। एक वह जो प्रस्थान बिन्दु से चलता है और अन्तिम बिन्दु पर समाप्त हो जाता है। दूसरा जिसकी यात्रा चलती रहती है। वे कुछ प्रश्न उठाते हैं, उत्तर तलाशते हैं और बहुत कुछ पाठकों पर ही छोड़ देते हैं। ऐसे उपन्यास कला की दृष्टि से पूर्ण भले न हों, जीवन की समस्याओं से परिचय करवाते हुए अनुभवों को समृद्ध करते हैं, आनन्द देते हैं और विचारों में जनतन्त्र लाते हैं। 'नदी की टूट रही देह की आवाज' कुछ ऐसा ही दूसरे तरह का उपन्यास है। मिश्र जी लिखते हैं, "इसमें सिलिगुड़ी के उस पार यानी उसके पूरब का इलाका अपनी तमाम समस्याओं के साथ चित्रित हुआ है जिसमें बहिरागतों की, जमीन की, जातियों के विभाजन की, सांस्कृतिक दबावों की, ऐतिहासिक विसंगतियों की, पहचान की, अस्मिता की, जिजीविषा की, इनके अलावा भी तमाम दीगर बातों की, जो खुलासा है वह पाठक को न केवल असम से परिचित करायेगा, कुछ ज्वलन्त प्रश्नों पर अपना मत बनाने का भी मौका देगा।"  कुल 491 पृष्ठों में फैले इस उपन्यास में 33 खण्ड हैं और पेपरबैक संस्करण 2020 में छपा मिश्र जी का पाँचवाँ उपन्यास है। 

बाहर विशेषतः बंगलादेश से आये लोगों के चलते पहले बोडो जनजाति और बाद में पूरे असम के लोगों की पहचान, अस्मिता और जमीन की समस्यायें उठ खड़ी हुईं। ये बहिरागत लोग जमीन और संस्कृति दोनों पर हमला करते थे। अपनी जमीन और संस्कृति वापस पाने के लिए एकजूट होकर बहुत से विद्रोही दल उठ खडे हुए। मिश्र जी ने प्रशासनिक सेवा के क्रम में देश के सुदूर आदिवासी क्षेत्रों की समस्याओं को करीब से देखा है। असम प्रवास के समय के अनुभवों पर आधारित यह उपन्यास निश्चय ही वहाँ के लोगों की संस्कृति, संघर्ष और व्यथा-कथा से परिचित करवायेगा। मिश्र जी की सूक्ष्म दृष्टि, उत्कृष्ट, भाव-प्रधान लेखन, संस्कृति-सभ्यता की पकड़ और अद्भुत भाषा-शैली सचमुच अद्वितीय है। असम सहित सम्पूर्ण पूर्वोत्तर के क्षेत्रों की स्थानीय भाषा के शब्दों का खूब प्रयोग हुआ है। यह मिश्र जी की विशेषता है, जहाँ जाते हैं, वहाँ की भाषा सीख लेते हैं। परिस्थितियों की तह तक जाकर उन्होंने बहुत शोधपूर्ण ढंग से लिखा है। उपन्यास की शुरुआत बहुत रोचक तरीके से हुई है।

यु लिन प्रतिदिन प्रवचन करता है। पतयुग पेड़ के नीचे चटाइयाँ बिछायी गयी हैं। श्री मिश्र जी दृश्यावली, गाँव, बाजार, और लोगों की चर्या का वर्णन करते हैं, जो उन्होंने अपनी आँखों देखा और अनुभव किया है। वसुन्धर भी आ गया। लोगों को कहानी में हर बार नया अर्थ मिलता है। देवों के क्रिमिस् वरिष्ठ थे और निमुल कनिष्ठ। क्रिमिस् की अध्यक्षता में देवों की सभा हुई और निमुल को सुन्दर जगत बनाने का दायित्व सौंपा गया। तमाम प्राणियों के रहने योग्य हरी-भरी धरती बन गयी और नाम दिया गया वसुन्धरा। वेदों में कहा गया है सर्वशक्तिमान ईश्वर अकेले रहते-रहते उब गया तो उसने कहा-"एको$हम बहुष्यामि" अर्थात् "मैं एक हूँ, अब बहुत हो जाऊँ" और उसने सम्पूर्ण सृष्टि रच डाली। यु लिन ने कहा, "जगत के केन्द्र में मनुष्य है, धरती का भोक्ता मनुष्य है और सारे मनुष्य एक स्त्री देव की सन्तान हैं। अपनी सूरत में स्वर्ग के देवता राक्राड की सूरत मिलाकर स्त्री देव सारीपाक ने मनुष्य बनाया। अठारह देवों में से एक देव ताकबोरा ने पशु-प्राणी, जलस्पति, वनस्पति बनाया। मनुष्य में रंग-रूप, आकार, ऊँचाई, चौड़ाई, बुद्धि, सामर्थ्य आदि में जो भिन्नता है, वह इसलिए कि सारीपाक स्त्री देव की प्रजनन सामर्थ्य से आकर्षित हो तमाम देवों ने उसके साथ बारी-बारी से मैथुन किया। उससे विभिन्न प्रकार की मनुष्य प्रजातियाँ पैदा हुईं।" यु लिन कथा सुनाकर चुप हो गया।

आदिकाल से हमारे सामने सृष्टि की रचना का रहस्य बना हुआ है। वेद अपनी तरह से व्याख्या करते हैं। कबीर दास जी ने भी अपनी रचना में इसका वर्णन किया है और यहाँ श्री मिश्र जी ने अपने तरीके से सृष्टि रचना की संकल्पना प्रतिपादित की है।

श्री मिश्र जी असम की फजीर (भोर) का विहंगम दृश्य और पक्षियों का गान दिखाते हुए नयी शब्दावली जोड़ते हैं। वसुन्धर पक्षियों का अपने अधिकार क्षेत्र के सीमांकन का प्रयास मानता है। मिश्र जी इसका विस्तार सहज तरीके से मनुष्य के अधिकार क्षेत्र से जोड़ते हैं और बहुत सुन्दर तर्क प्रस्तुत करते हैं। प्रश्न वाजिब है कि हमारी जमीन में चींटियों, मधुमक्खियों, लोमड़ियों, भेड़ियों पक्षियों, तितलियों, वनगायों और हाथियों का अधिकार नहीं है? हाथियों का ख्याल आते ही वसुन्धर का शरीर गनगना उठा। ये सालभर का किया हुआ श्रम चन्द मिनटों में चट कर जाते हैं। वह दौड़ पड़ा खेतों की ओर। भीतर के प्रश्न, बाहरी दृश्यावली, पक्षियों का सिर उठाकर देखना और सहज हो अपना ठोर पिंजवना, अद्भुत चित्रण है। मिश्र जी को महारत हासिल है, सूक्ष्म से सूक्ष्म को देखने और चित्रित करने में। भोजपुरी, असमिया के शब्द बहुतायत मिले हुए हैं। दूसरे दिन वसुन्धर कचहरी गया। हरेन्द्र शर्मा वकील हैं। मिश्र जी का यह प्रश्न भी विचारने लायक है कि मुफ्त की चीज को पाने में लोगों को मजा क्यों आता है? वकील और उसकी बातचीत रोचक है। पहचान पत्र की बात हो रही है। इस झोल का अच्छा वर्णन है और बंगलादेशियों को भीतर बसा लेने के षड्यन्त्र का भी। वसुन्धर अति विश्लेषण में लगा है। यह पाठकों पर बोझ है परन्तु मिश्र जी की समझ, ज्ञान और चिन्तन अद्भुत है। बेचैनी तब हुई जब उसका खेत नमाजगाह बन गया । एतराज जताने पर उत्तर मिलता, नमाजियों की संख्या बढ़ती जा रही है, यह धर्म का कार्य है। इस तरह उसके पूरे खेत पर कब्जा हो गया। वसुन्धर परेशान हो उठा, "ये बंगलादेशी हमारे खेतों का कब्जा सामूहिक रूप से करेंगे और कचहरी में सुनवायी व्यक्तिगत रूप से अलग-अलग होगी।" उसने पड़ोसियों से कहा, "ये विदेशी हमारे खेत ऐसे ही कब्जा करते रहेंगे और हम देखते रहेंगे?" पंचायत बैठी, बेनतीजा रही। मिश्र जी ने प्रश्न और उत्तर के माध्यम से सारा सुनियोजित रहस्य खोल कर रख दिया है।

वसुन्धर पहचान पत्र बनवाने के लिए भटक रहा था, उन्हीं दिनों उस क्षेत्र में नेतानुमा दिवांग सभा का आगमन हुआ। उसने कहा, आप के पास राशन कार्ड होना चाहिए। वही पहचान है कि आप यहाँ के, असम के, इस देश के निवासी हैं। बंगलादेशी बहुतायत बसते जा रहे हैं और अपने को यहाँ के मूल निवासी होने का दावा करते हैं। दिवांग सभा रजिस्टर लेकर आया जिसमें जाऊगाँव के लोगों का विवरण, राशन कार्ड बनाने के लिए लिखना था। सिराज और कुन्ती की मदद से रजिस्टर में नाम लिखे गये। इस तरह बीसों गाँव के रजिस्टर लेकर दिवांग सभा विनायक वसुमतारी के पास पहुँचा। मिश्र जी की विशेषता यह भी है कि वे अपने पात्रों की कद काठी, उनके विचार और भोज्य पदार्थों का विस्तार से वर्णन करते हैं। विनायक वसुमतारी ने कहा, ''आप लोगों ने बड़ा काम, मेहनत से किया है। पता नहीं सरकार हर जरूरी काम ढुलमुल नीति से क्यों करती है? बहुत से मुद्दे थे, केन्द्र और राज्य सरकार के दायित्व सम्बन्धी और असम के हितों को लेकर। असम के पुनर्निर्माण की पेचीदगियों भरी दास्तां को जिस सरल तरीके से मिश्र जी ने प्रस्तुत किया है वह उनकी विद्वता, प्रशासनिक अनुभव और लेखन कला का सम्मिश्रण है। उन्होंने परत-दर परत  सारे अन्तर्विरोधों को खोलते हुए स्थानीय से लेकर केन्द्र तक की राजनीति और घुसपैठ को रखा है, अद्भुत है। नागरिकता सम्बन्धी परिचय पत्र के लिए मुख्यमंत्री के कहने पर विनायक वसुमतारी  कामाख्या नारायण त्रिपाठी से मिले। वहाँ बहुत सधी हुई स्पष्ट बातें हुई।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद सरकार की जो रूपरेखा उभरी, उसे मिश्र जी ने अपने तरीके से रेखांकित किया है-हर काम के लिए मेरे पास आओ। दलाल संस्कृति विकसित हुई है। वसुन्धर की वकील से बात होती है। वकील का अपना तर्क है और वसुन्धर का अपना। महत्वपूर्ण कथन उभरा-"मेरा मध्यमवर्गीय असमिया लोग अपनी अकर्मण्यता से जागना ही नहीं चाहते। वही हाल इनकी सरकार का है।" वसुन्धर सोचता-विचारता आगे बढ़ता जा रहा है। कचहरी जाने से उसे बहुत कुछ सीखने को मिला। अब वह गाँवों में घूमता रहता है। बीसों गाँव के लोग पंचायत के लिए तैयार हो गये। उधर मियाँपाड़ा के लोगों की अपनी योजना है-जमीन को छोड़ना नहीं है, बातचीत का द्वार खुला रखना है। नीति वही है जो पाकिस्तान प्रयोग करता है। रोज समझौते का द्वार खोलता है और मौका मिलते ही भारत पर चढ़ बैठता है। यु लिन को लगता है, जीवन से रस सूखता जा रहा है और अंत पास आ रहा है। विशाल पेड़ के सम्पूर्ण जीवन चक्र से उसे अनुभूति होती है। यह व्यर्थता बोध ही जीवन का अन्त कर देता है। यु लिन अपनी कहानी याद करता है। नागरिकता के चक्कर में सब बिखर गया। सन बासठ की लड़ाई में पत्नी और बेटी को बलात् ट्रेन में बैठा दिया गया और मुझे बलात् उतार दिया गया। ऐसी ही एक चार साल की लड़की थी जिसका जन्म भारत में हुआ था, उसे छोड़ दिया गया। उसे मैंने पानी दिया, भोजन दिया, सरकस के हुनर सिखाये, देश भर में घूमा। दिल्ली में कामाख्या नारायण त्रिपाठी मिले। उन्होंने पूछा, "असम चलोगे? वहाँ चाय बागान में रखवा दूँगा। वे मजदूरों के नेता थे। यहाँ जाऊगाँव में बस गया। पंचायत की व्यवस्था हो रही थी। अद्भुत विवरण और विश्लेषण प्रस्तुत किया है मिश्र जी ने। साथ ही विनायक वसुमतारी यु लिन से मिले और विस्तार से असम व भारत में चाय की खेती की चर्चा की।

चाय बागान के इतिहास और अर्थतन्त्र को दिवांग सभा ने गहन अध्ययन और चिन्तन से एकत्र किया। उन्हें चाय की खेती, चाय उद्योग, फैक्टरियों की स्थापना और सरकारी नियन्त्रण आदि की पूरी समझ हो गयी। उन्होंने महसूस किया कि चाय का व्यापार करना और जमीन हड़पना इस सारी व्यवस्था के मूल में था। जिसके घर में रहकर दिवांग सभा ने चाय बागान के लोगों का रजिस्टर बनाना शुरु किया, उसी मुकेश बेझबरुआ ने बागान के मैनेजर को सूचित कर दिया। उसका माथा ठनका। जैसे सूफी लोग इस्लाम के लिए जमीन तैयार करते थे, पीछे से मुसलमान हमलावर रियासतें जीतते गये। पहले अंग्रेजी कम्पनियाँ आयीं फिर महारानी सम्राज्ञी बन बैठीं। मैनेजर ने बड़े साहब को बताया। मिश्र जी ने जिस तरह व्यौरेवार वर्णन किया है, अद्भुत है।

उधर मतीन वकील से कह रहा था, मजिस्ट्रेट को समझायें कि संविधान और मजहब में संघर्ष होने पर धर्म ही हावी होगा क्योंकि धर्म पहले है, संविधान बाद में। यहाँ बहुत बारीकी से सनातन या हिन्दू धर्म को भूला दिया गया है मानो इस्लाम के पहले इस देश में कुछ था ही नहीं। भीषण बरसात शुरु हो गयी। व्यौरेवार वर्णन रुसी उपन्यासकारों की याद दिला रहा है। कचहरी, जज, वकील और सर्वोच्च न्यायालय बने रहते हैं, केवल मुवक्किलों की जिन्दगियाँ बीत जाती हैं। मिश्र जी ने कोर्ट की सम्पूर्ण गतिविधियों का खुलासा और विस्तार से समझाने का प्रयास किया है। मुसलमानों की पूरे क्षेत्र को हिन्दू मुक्त करने की योजना बड़ी साफ थी। खेतों पर कब्जा करना, फिर दंगा-फसाद करना। दंगे का सूत्र यह था कि युवाओं को मार डालो, बूढ़े और बच्चों को खदेड़ दो। युवतियों से बलात् विवाह कर लो और बूढ़ियों का मत परिवर्तन कर नौकरानी बना लो।  मिश्र जी अपने उपन्यास में स्थानीय बोलियों और भाषाओं के शब्दों का भरपूर उपयोग किया है। इस तरह हिन्दी भाषी लोगों को वहाँ की संस्कृति के साथ-साथ भाषा की झलक मिल रही है। महाराजा चरखारी की शानो-शौकत बहुत थी। उन्होंने भव्य महल बनवाया था। बाद में चाय बागान के आधे के हिस्सेदार लीला सिंह विष्ट ने महल ले लिया और रहने लगे। किसी दिन गुब्बारा उड़ाने के उत्सव की तैयारी थी। खूब भीड़ इकट्ठी हुई थी। असम के प्राचीन राजाओं के बारे में उन्होंने बहुत शोध किया है और हर महत्वपूर्ण घटना अंकित की है। दिवांग सभा और जयदेव मजमूदार स्थानीय लोगों की समस्याओं को लेकर किसी आंदोलन की चर्चा कर रहे थे। दिवांग, मुकेश, जयदेव और मादाम मावरी के द्वारा किये गये सहयोग और उपकारों से अभिभूत था।

मिश्र जी का प्रकृति चित्रण देखिए-हवा चलती तो लगता कि उसकी भार से फसल में मीलों लम्बी उर्मियाँ उठ रही हैं। वसुन्धर मियाँपाड़ा की ओर गया, पुरानी स्मृतियों में खो गया। 1920 के बाद मेमन सिंह, खुलना, पबना से मुसलमान लाकर बसाये जाने लगे। सरकार को अधिक लगान लेकर खजाना भरना था। खेत उनके नाम कर दिये गये। वसुन्धर टोह में आया था, फसल काटने लायक हो गयी है। नमाजी और एक अन्य लड़के ने कहा-हम तैयार हैं, फसल काट लेंगे, यह काम बटाईदार ही करते हैं। तय हुआ कि एक दाना भी उन्हें नहीं देंगे। अंत में मियाँपाड़ा और जाऊगाँव के बीच मारपीट हो गयी। पूरे इलाके में यही हुआ, मुसलमानों ने खेत काट लिए और हर जगह संघर्ष हुए। इसकी कहीं सुनवाई नहीं थी। अदालतें अन्धी हो गयी थीं। वसुन्धर अधिकारी को पेटिशन देना चाहता है। वह सोचता है, गान्धारी और न्याय की मूर्ति की आँखों की पट्टी में समानता है। सामान्य आदमी के पास कुछ नहीं होता। मिश्र जी कहते हैं-सब कुछ करने का अधिकार सरकार के पास है। न तो वह खुद कुछ करती है और न किसी को करने देती है।

क्रिश्चियन मिशनरियो ने अपना काम शुरु कर दिया। पादरी नियुक्त किये गये। उनका काम था धर्म परिवर्तन करवाना। विनायक वसुमतारी महत्वपूर्ण व्यक्ति है। सब उनकी बात सुनते हैं। उनमें चेतना जाग रही है, कोई जरूरी नहीं कि जो नेहरू कह रहे हैं, वही अच्छा है, दूसरे भी लोग हैं, पटेल, लोहिया, जय प्रकाश नारायण, उनकी भी सुनो। मिश्र जी का अध्ययन बहुत बारीक है और उन्होंने सारी स्थितियों को, बदलती परिस्थितियों को खूब तार-तार जोड़कर लिखा है। एक-एक विवरण को अपनी औपन्यासिक कृति में शामिल किया है। बंगाल-विभाजन खलबली पैदा करने वाला था। उसके बहुत दूरगामी परिणाम दिख रहे थे। असमिया-बंगाली के द्वन्द्व की राजनीति का अलग ही मसला है। मिश्र जी की चेतना वैदिक काल तक जाती है, मनुष्य के मनोविज्ञान को पकड़ती है, सभ्यता-संस्कृति, अदालतों की चुप्पी और पक्षपात की राजनीति को समझती है। असमिया को असम सरकार की कामकाज की भाषा घोषित कर दी गयी, बंगाली लोग भड़क उठे। पूर्वी पाकिस्तान के मुसलमान हिन्दू-बंगालियों को मार-मार कर भगाने लगे। बहुत सारे लोग बौद्ध होने लगे। वसुमतारी जितना सोचता है, उलझन बढ़ती ही जाती है। सर्वत्र वर्चस्व की लड़ाई है।

रीता राजखोवा का सुन्दर फ्रेम वाला चित्र पर विचार करना, मिश्र जी कला- विवेचना को दर्शाता है। चित्र को देखते-देखते उनके जुल्फों में सिहरन, आँखों में चमक, होंठों पर स्मिति, उरोज तन गये, नाभि में सनसनाहट, जांघों में गुदगुदी और पांव में निर्बलता फैल गयी। कोई मूर्छा उभरी और स्वप्निल दुनिया में सहज प्रवेश हुआ। उधर वसुन्धर को सूचना मिली कि मतीन को डिग्री मिल गयी है। राजनीति का खेल बदस्तूर जारी है। बंगलादेशी मुसलमानों के नाम  रजिस्टर में हैं। मतदाता सूची तैयार हो रही है। गाँव के चौधरी का अपना तर्क है, कहता है, फैसला लाठी से होता है, रियासतों के नक्शे उसी से तय होते हैं, बदलते हैं। अन्ततः मान लिया गया कि प्रदर्शन करना सही रास्ता है। लक्खी स्त्रियों का दल तैयार करना चाहती है। मंगलदोई में बिना किसी नेतृत्व के, बिना किसी राजनैतिक दल के अभूतपूर्व प्रदर्शन हुआ। विनायक वसुमतारी नेता बनकर उभरा।

यु लिन धर्म की बात कर रहा है और लोग सुन रहे हैं। कुछ लोग आये और उनका प्रचार शुरु हुआ। मूल मुद्दा था-हमारे खेत कब्जा किये जा रहे हैं, कल बहू-बेटियाँ उठा ली जायेंगी, हम कहाँ जायेंगे? सरकार की घुसपैठियों के साथ सहमति है, उनकी मिलीभगत है। स्वायतता के बिना काम चलने वाला नहीं है। 69 में केन्द्र ने असम के पुनर्गठन सम्बन्धी कानून पास कर दिया और मेघालय बन भी गया। लड़कियों का खुलकर नृत्य करना और लड़कों का चोरी-चोरी देखना कोई मतभेद पैदा नहीं किया। चुनाव को लेकर बहस और बातचीत हो रही है।

वसुन्धर अपनी सोच में उलझा हुआ है, अपने आसपास एक-एक चीज को देखता है और पुरानी स्मृतियों से जोड़ता है। प्रकृति के इन दृश्यों से रोमांचित होता है, आगे बढ़ो और देख लो आलोक और आशा की मूर्ति। मिश्र जी की दृष्टि से कुछ भी छूटा नहीं है चाहे वह बाहरी दृश्य हो या मन के भीतर का स्याह-उजास चिन्तन। वह नदी में नहाता है और सुखद अनुभूति लिए बाहर निकलता है। मिश्र जी शब्दों का प्रयोग बहुत खुलकर करते हैं। कछारी लोगों को मार भगाया घुसपैठियों ने, उनके हल-बैल ले लिए और चार थानों में रपट लिखा दिया। कछारी लोगों को थाने से भगा दिया गया, बिना रपट लिखे। वैसे भी कछारी लोग कम बच्चे पैदा करते हैं और इन्हें कोई रोक नहीं है, सरकार को कुछ करना चाहिए। मिंज रमजान से मिलने दलबल के साथ आया, वह घर में छिप गया। उसकी तीन बीवियाँ हैं। औरतों ने हमला कर दिया। रमजान ने कहा, सलवार उतारो, मिंज पर बलात्कार की कोशिश का केस बनाना है। वसुन्धर सोचता है, हमारे खेत कब्जाए जा रहे हैं, हम इतने कमजोर कैसे होते गये हैं? मिंज कहता है, इसीलिए लोग ईसाई बन रहे हैं। नागालैण्ड, मिजोरम, खासी और गारो हिल्स की पहाड़ी जन जातियाँ सब की सब ईसाई हैं, अपनी लड़ाई लड़ी हैं, यहाँ बहिरागतों का शोषण और धक्का-मुक्की नहीं है। श्री प्रकाश मिश्र जी ने पूरे असम क्षेत्र में फैली जातियों के विकास की कथाएँ लिखी हैं।

आजकल, उपन्यास या कहानियों में एक बात उभर कर आती है कि भारत का युवा, अधेड़ और बूढ़े सब के सब आँख सेंकने का मौका ढूँढते रहते हैं। असमिया मानुस काम करने बाहर नहीं जाता, बाहर के लोग असम आते हैं। चाय की दुकान पर भीड़ होने लगी है। लोग कहते हैं, हम तो यहाँ आँख सेंकने आते हैं। असम की सामान्य व्यवहृति है दुकान पर स्त्री का बैठना। यहाँ धर्म-परिवर्तन पर मिश्र जी ने अच्छा विचार किया है। मुक्ति चाहिए तो संघर्ष करना होगा। जाऊगाँव के रुपन कुछ लोगों के साथ अपना कब्जा किया हुआ खेत जोतने पहुँचे। उधर मियाँपाड़ा से नमाजी भी आ गये। रुपन ने तीर चलाना शुरु कर दिया। लोग घायल होकर गिरने लगे। रात में जाऊगाँव पर हमला हुआ। लोग सजग थे, आगजनी हुई। आग की तरह यह समाचार पूरे देश में फैल गया और प्रेस वालों ने खूब हवा दी। धरना-प्रदर्शन शुरु हुआ। वसुन्धर दार्शनिक भाव से सोच रहा है। लोगों में थोड़ी जागृति भी है। सरकार मध्यम वर्ग की चिन्ता करती है। विनायक वसुमतारी की बातें सुनकर वसुन्धर अवाक था। मणिराम दीवान कलकत्ता में पकड़ लिए गये और पियाली बरुआ के साथ 26 फरवरी 1958 को फांसी पर लटका दिये गये। वसुन्धर ने सोचा, वह स्वयं कुछ नहीं कर सकता है परन्तु करने वालों का सहयोग तो कर सकता है। विनायक करना चाहता है पर करे क्या? जो यहाँ हैं, उन्हीं के आधार पर कुछ करना होगा। मनुष्य प्रयत्न करता है, ईश्वर मदद करता है। चेतिया फूकन, वसुमतारी, स्नेहलता आदि का विमर्श पूरी चिन्ता के साथ चल रहा था। चेतिया फूकन ने कहा, "हमें स्वतन्त्र सम्प्रभु देश के बारे में सोचना चाहिए।" "यह बनाना है भी आसान। यदि वह बाईस किलोमीटर गलियारा काट दिया जाय, " उस ऐनक धारी ने कहा। इस तरह हफ़्तों उहापोह चला। उधर उर्सला और नितिन की रोचक सहज कहानी चलती रही।

बरसठ और सिरजा का मामला तुल पकड़ने लगा। केस दर्ज हुआ। मामले में ढीलापन देख प्रदर्शन की योजना बनी। विरंची ने कहा, बरक्तुल्ला को हमें सौंप दो। भीड़ ने थाने का घेराव कर दिया, उसे बाहर खींच लाये और काम तमाम कर दिया। उधर वसुमतारी नव गठित दल का अधिवेशन बुलाना चहते थे। मिश्र जी लिखते हैं-हम संसदीय प्रणाली वाले जनतन्त्र के अनुयायी हैं। पर क्या यह प्रणाली, हमारी आकांक्षाओं की पूर्ति में सहायक रही है? हमारा अनुभव नकारात्मक और बहुत ही कड़वा है। चाय बागान और बस्तियों में घटनाएँ होने लगीं। आंदोलन शुरु हो गये। लोग नौकरी से अनुपस्थित होने लगे तो वेतन काटा जाने लगा। उधर मतीन समझा रहा था, समूह में काम करने से खतरा कम रहता है। मिश्र जी ने चाँद और सूर्य के बहाने बीच-बीच में रोचक चित्रण किया है। उर्सला और सिरजा प्रसंग चर्चा में है। प्रेम में डूबे लोगों का हर कार्य निराला होता है।

श्री प्रकाश मिश्र जी का यह उपन्यास हिन्दी साहित्य को अपनी तरह से समृद्ध करने वाला है। इसमें काल खण्ड की राजनीति है, सामाजिक संघर्ष है और असमिया मानुस को जाति, धर्म, क्षेत्र में बांटने का षड्यन्त्र भी है। कुल मिलाकर ऐतिहासिक दस्तावेज है जिसे पूरे देश को जानना चाहिए। सम्पूर्ण निराशाओं के बावजूद लोगों में उम्मीद थी, शायद उनके छिने गये खेत वापस मिल जायें। उनका यह मूक समर्थन वसुमतारी को पर्याप्त लगता। विद्यार्थी जोश में आ रहे थे और आंदोलन के लिए उतारू होने लगे। शान्तिपूर्ण और उग्र दोनों तरह के आंदोलनों के हिमायती थे। जुलूस निकला और बाजार आते-आते अनियंत्रित हो गया। दुकानें धड़ाधड़ बंद होने लगीं, मारपीट शुरु हो गयी। नेत्री दिव्या के कपड़ों को गुण्डों ने तार-तार कर दिया। अपनी लाज बचाने के लिए हाथ-पाँव समेटकर जमीन पर बैठ गयी। किसी महिला ने अपनी शाल डाल दी। जुलूस में शामिल कुलियों पर बहुत मार पड़ी। उधर जाऊगाँव में सजधज कर बैठी उर्सला ने नितिन बड़ ठाकुर के साथ विवाह की अनुमति, आशीर्वाद और सहमति मांगे। नितिन को उर्सला के सामने खड़ा किया गया। सबकी अनुमति मिली। वधू शुल्क दो हजार रुपये तय हुआ। यु लिन रो पड़ा। उर्सुला भी पिता से लिपटकर रोने लगी। मार्मिक चित्रण मिश्र जी ने किया है।

कैम्प में आग लगा दी गयी। उस दिन नितिन का आफ था। उर्सुला को लेकर चाँदनी रात में उसी स्थान पर गया जहाँ पहली बार देखा था। मिश्र जी की एक और विशेषता है, उन्होंने स्थानीय रीति-रिवाजों पर खूब शोध किया है और अपने उपन्यास में यथास्थान प्रयुक्त किया है। शादी-विवाह, प्रेम-रोमांच के दृश्य बहुत जीवन्त हैं। यही तो मौके होते हैं जब शरीर और उड़ता हुआ मन खिलता है, प्रस्फुटित होता है। क्या देहाती, क्या शहरी, निपढ़ या पढ़ा-लिखा सबकी भाषा एक होती है, सब जीवन का आनन्द उठाते हैं। उधर लक्ष्मी अचेत हो गयी, बरकत को मार दिया गया था। उसके बाद वह गायब हो गयी और मतीन के पास पहुँच गयी। "इतना तो स्पष्ट है कि बड़-कछारी अब जाग चुका है। दौरा किया जाय और पार्टी की बुनियाद डाल दें, "दिवांग सभा और पूरनचन्द्र ब्रह्म ने विनायक वसुमतारी से कहा। दौरा शुरु हो गया। मुख्यमंत्री के पाँव तले की जमीन खिसक गयी। कामाख्या नारायण त्रिपाठी ने स्थिति सम्हाल ली। उधर चेतिया फूकन, स्नेहलता आदि की बाते हो रही हैं। हमले शुरु हो गये। न जाने कौन आता और घरों में आग लगाकर चला जाता। गैर असमिया चले जायें का पोस्टर लगा था। सबने अपनी सेना बनायी और मारवाड़ियों ने धन दिया। दिवांग जली हुई बस्ती में गया। मिश्र जी ने लीला सिंह के तोते का यथार्थ चित्रण किया। वह रसिक बातें करता है, बोले गये शब्दों को दुहराता है। दिवांग मावरी से मिला। इस बीच लाचित सेना और असम मुक्ति मोर्चा के मतभेद सामने आ गये।  दिवांग मावरी के उपर आ गया परन्तु कुछ हो नहीं सका। वह शर्मसार हुआ। मावरी ने उसे अपराध-बोध से बाहर निकाला और उसी रात सब कुछ हुआ, सहमति से हुआ। सब जीवन का आनन्द उठाते हैं।

वसुमतारी को वसुन्धर के चेहरे पर उम्मीद की कोई किरण दिखाई दी। उसने सोचा इस किरण को पकड़ना चाहिए। अपने खेतों के लिए रोते रहने वाला वसुन्धर आज पूरे इलाके की खेती के लिए मरा जा रहा है। हर जगह से दुत्कार मिलती है। सरकार से कोई उम्मीद नहीं है, वह लोगों को बझाकर रखना चाहती है। प्रशासन की क्रूरता जग-जाहिर है। तमाम राजनैतिक दल समस्या को उलझाकर रखना चाहते हैं, अपनी रोटी सेंकते रहने के लिए। दुश्मन, हर मुकाबले के लिए तैयारी में लगे हैं। फिर भी यह मर्द जुटा हुआ है। यह हमारे समय का गाँधी है। मिश्र जी लिखते हैं, आज हर आदमी परजीवी होता जा रहा है, अपना वजूद गवाँ बैठा है। सब सरकार करेगी। लोग दलाल की भूमिका में आ गये हैं। न्याय देंगे नहीं, वे सभी बिचौलियों के हित-साधन में लगे हैं। मिश्र जी ने आदमी ही नहीं, पूरे देश का मनोविज्ञान समझा दिया है। लक्ष्मी की बातें होती रहती है। खेत बोया उन्होंने है, काटेंगे हम, मतीन सबको समझा रहा था। मियाँपाड़ा के लोग सक्रिय हो उठे। वसुन्धर हथियार लेकर टूट पड़ने के लिए आवाज दे रहा था। यु लिन ने रोकना चाहा। दोनों तरफ के लोग मारे गये और घायल हुए। असम में आग लगी थी, पूरा प्रान्त जलकर राख हो गया। रंगनाथ अब कहानियाँ सुनाता फिरता है। लक्ष्मी उसे बदमाश और सरकार का जासूस समझती है। कामाख्या नारायण त्रिपाठी दुखी हैं, यह मुख्यमंत्री कुछ नहीं कर रहा है। यह तमाशा केन्द्र सरकार देर तक नहीं देख सकती थी, उसने तुरन्त राज्य सरकार को बरखास्त कर दिया।

उर्सुला आ गयी। यु लिन देखता रहा। पूरा गाँव कैम्प में शरण लिए हुए था। वसुन्धर का बेटा भी आ गया। उसने कहा, "पेड़ हमेशा अनन्त युद्ध में संलग्न रहते हैं। हवा उनके हाथ काट भी देती है तो जहाँ से कटे होते हैं, वहीं से पनका फेंकते हैं और नये सिरे से युद्ध में शामिल हो जाते हैं।" जाऊगाँव की झोपड़ियाँ खड़ी होने लगीं। रामनाथ मन ही मन कहता है, "यही जीवन है, ज़हाँ भी जमीन जरा सरस होती है, अँखुए फूट पड़ते हैं।" मिश्र जी ने आपसी बात में सरसता भर दी है। उधर मतीन कहता है, सरकार हमें वोटबैक समझती है, इसीलिए सब कुछ कर रही है। अल्पसंख्यक वाहिनी सक्रिय है। लक्ष्मी को मैमुल ने धर दबोचा, वह बच नहीं पायी। उसने कहा, "तुम्हारी जान न ले लिया तो बड़ के बीज से पैदा नहीं हुई।"

अमेरिका के बड़े पत्रकार पीटर वरले से रंगनाथ की बड़ी-बड़ी बातें हुईं। उम्मीद थी कि असम की जमीनी सच्चाई दुनिया के सामने आयेगी। दोनों ने अगली योजना बना ली। चार आदमी गन खरीदते हुए पकड़े गये। अन्य लोगों की भी धर-पकड़ शुरु हो गयी। भूमिगतों के शिविरों पर आक्रमण हुए। लक्ष्मी ने कहा, "फौज आ गयी है जंगल के छोर तक, हमला करेगी।" फौज पीछा कर रही है। विद्रोहियों के सामने प्रश्न है कि भागा जाय या टकराया जाय। तय हुआ, दोनों किया जाये। गोलियाँ चलती हैं। अखबार में इस मुठभेड़ की खबर नहीं छपती। खबर छपती है कालीपद सेन की हत्या की। तिरका देखता है, पिता वसुन्धर बाहर निकल यु लिन को आवाज दे रहे हैं। दोनों आयु-वर तक जाने के लिए निकलते हैं। उम्र हो गयी है दोनों की। पाकुड़ का चौधरी, पोचई और कुछ लोग मिलते हैं। सबकी चिन्ता एक परन्तु तर्क अनेक हैं। वसुन्धर गुवाहाटी चलने की बात करता है। वहीं सरकार है।  चौधरी निराश होता है। उसकी निराशा, सबकी निराशा है। वसुन्धर ने कहा, "राजा है, माँगूँगा। दे देंगे तो ठीक। नहीं तो तुमड़ी लेकर चला आऊँगा। उसे फोड़ नहीं देंगे न। " 

 नाव तैयार है। हरि बोल, हरि बोल का सम्मिलित स्वर उभरा। यु लिन ने कहा, यही जीवन है। कोई बुलाता है, गले लगाता है और निःसंग चल देता है। ऐसा ही समाज, देश और पूरी मानवता के साथ भी होता है। बहुत सी सभ्यताएँ थी, कुछ मिट गयीं, भारत, चीन और यहूदी सभ्यताएँ जीवित हैं। जिसने स्वयं को बदल लिया, वही जीवित है। यु लिन ने चील की कथा सुनाई, मां मुक्तेश्वरी मन्दिर की कथा सुनाई। गन्तव्य पर पहुँच कर नाव रुक गयी। सभी उतर गये। निर्धारित योजना के अनुसार सभी अपने-अपने काम में लग गये। राज्यपाल से मिलने की अर्जी दी गयी। मिलने की उम्मीद नहीं है। निराशा फैल गयी। भाग्य साथ नहीं दे रहा है। वे लोग कामाख्या बाबू से मिलने पहुँचे। कामाख्या बाबू ने यु लिन को नर-रत्न कहा। अकस्मात कामाख्या बाबू ने गुवाहाटी आने का कारण पूछा और राज्यपाल से मिलने की योजना बन गयी। मुलाकात मात्र आठ मिनट की हुई। सबको वापस लौटना था, नाव लग चुकी थी। वसुन्धर को खोजते हुए  तरुण गोगोई आये, बोले, "वसुन्धर ने बहादुरी का काम किया है। शायद वे पहले सच्चे किसान हैं जिन्होंने राज्यपाल से मिलकर बहिरागतों की समस्या को उठाया है।" वसुन्धर ने कहा, "हमारी मदद करने एक और संगठन आ गया, पर मेरा खेत मुझसे और दूर चला गया। इनमें मियाँ नमाजी मस्जिद बनायेंगे।" नदी को लेकर श्री प्रकाश मिश्र जी ने अद्भुत चिन्तन दिखाया है, कहते हैं, "नदी का स्वरूप बदल गया है, वह मरु की नदी बन गयी है।" यहाँ उन्होंने असम के कवि देवकान्त बरुआ के दो काव्यांश उद्धृत किया है। नदी यही सब लेकर चल रही है। उसी से टूट रही है उसकी देह और टूटन की आवाज उभर रही है। रूप नारायन नदी में नाव को धारा के विपरीत चलना है। वसुन्धर की रूप नारायन के किनारे-किनारे पैदल चलने की इच्छा बचपन से ही है। वह नाव से उतर गया। यु लिन भी उतरा, तिरका और पीछे से सिरजा भी। 

वसुन्धर और यु लिन दोनों अपनी वृद्धावस्था का सुख भोग रहे थे। रंगनाथ जाऊगाँव समाचार लाये कि असम की जनता की तरफ से अखिल असम छात्र संगठन और असम गण संग्राम परिषद, असम सरकार की तरफ से मुख्य सचिव और भारत सरकार की तरफ से गृह सचिव ने लिखित समझौता, प्रधानमंत्री की उपस्थिति में, 15 अगस्त 1985 से असम में शान्ति के लिए किया है। तय हुआ था कि बहिरागतों से कब्जा की गयी सरकारी जमीन वापस ली जायेगी और सुनिश्चित किया जायेगा कि ऐसा फिर कभी न हो। वसुमतारी, दिवांग ने सोचा, शान्ति समझौता तो हुआ परन्तु समस्या तो रह ही गयी। लक्ष्मी, साइकिया के पास आ गयी। प्रसव का समय हो गया था। उसे बच्चा हुआ, किसी सन्तानहीन दम्पति को दे दिया गया। वह भी बच गयी। कह दिया गया कि मरा हुआ बच्चा पैदा हुआ था। पीटर वरले के लेख प्रकाशित हो रहे थे। रीता राजखोवा और स्नेहलता को संतोष नहीं हुआ। आयु-वर फिर आबाद होने लगा। पोचई की चाय की दुकान खुलने लगी। युलिन और वसुन्धर भी आते। बातचीत में संभावनाएँ टटोलते, खेत खाली कब तक हो जायेंगे। वसुन्धर कहता, बहिरागत उनके वोट बैंक हैं, सरकार कभी नहीं खदेड़ेगी। पोचई को अखबार मंगाने की सलाह दी जाने लगी। अखबारों से पता चला, सरकार अपने वादे की पक्की है, बहिरागतों की समस्या को हाथ में लिया है। विद्रोहियों पर सुरक्षा बल भारी पड़ने लगे। खूब हो-हल्ला हुआ। केन्द्र-राज्य सरकार के अधिकार का मामला उठा। उग्रवादी गतिविधियाँ के तौर पर अनेक स्थानों पर एक ही समय में बम फूटे, दुकानें जलीं, कुछ घायल हुए और कुछ मरे।

ये तमाम समाचार वसुन्धर को अखबार और मित्रों से मिलते रहते हैं। उसकी निराशा बढ़ती जा रही है और वृद्ध भी होता जा रहा है। संतोष की बात इतनी ही थी कि उनकी जमीन पर मस्जिद बनाने के लिए जो ईंट-पत्थर लाया गया था, धीरे-धीरे मियाँपाड़ा के लोग उठा ले गये। गुलाम उस्मानी ने कह दिया था कि मस्जिद की जिद्द रही तो बहुत मुश्किल होगी। इससे भी बड़ा कारण था, उनके पारिवारिक जीवन में गहरे दुर्दिन आ गये थे। वसुन्धर तैश में आ गये, बोले, इसका मतलब यह नहीं है कि हम अपना खेत कब्जा होने दें। वसुन्धर खुश हुआ, उर्सुला प्रसव के समय गाँव आ गयी और उनकी पत्नी और बहू ने अपनी देख-रेख में ले लिया। प्रसव हुआ। यु लिन ने गाँव में छोटी सी दावत दी। आयु-वर के नीचे जमघट लगने लगा, कुछ दुकानें खुल गयीं। वसुन्धर ने अपनी चित्तवृत्ति को बाहर से समेटकर भीतर कर लिया।

रंगनाथ ने सूचना दी कि कामाख्या नारायन त्रिपाठी नहीं रहे। रंगनाथ के साथ तरुण गोगोई भी आया था। वसुन्धर ने आशीर्वाद दिया। उपरी अदालत में जनहित याचिका दायर करनी है बहिरागतों के विरूद्ध। दूसरा बिन्दु है कब्जाए खेतों को मुक्त करवाना। खेत वालों के कागज पर हस्ताक्षर लिए गये। वसुन्धर ने दस्तखत कर दिया और बोला, भाई धरती पर न्याय नहीं होता। बेटे तिरका ने कहा, देवता! आपकी लड़ाई मैं समाप्त होने नहीं दूँगा। जब जाने लगूँगा तो औलाद से कहूँगा कि वे इस लड़ाई को आगे ले जायें। वसुन्धर को कमला पोखर में मछली पकड़ने का मन हुआ। यु लिन, सिरजा सब साथ हो लिए। पूरा ताल खिली श्वेत कुमुदिनी से आच्छादित थाा वसुन्धर ने सोचा, आदमी तो चला जाता है, पर जो किये रहता है, उसकी छाप रह जाती है। धोबिन मछली के पकड़े जाने पर यु लिन ने वसुन्धर को जोरदार बधाई दी। वसुन्धर का मुँह खुला हुआ है और मक्खियाँ भिनभिना रही हैं। यु लिन देखते ही जोर से चीख पड़ा, सिरजा भी चीखा।

यु लिन को वसुन्धर के घर में अकेले रहना अच्छा नहीं लगता। एक दिन उसने कहा, मैं निकल रहा हूँ उन जगहों को देखने के लिए जो बोडो-संस्कृति से जुड़ी हैं। वसुन्धर की बड़ी ईच्छा थी, उसकी आत्मा को शान्ति मिलेगी। पोचई भी साथ हो लिया। एक दिन पोचई ने लक्ष्मी को देखा, दोनों की आँखें मिलीं, आँखें गिली हुईं। उसने कहा, "लक्ष्मी!" 'देवता! कहकर चीख पड़ी। लोगों ने पिता-पुत्री का मिलन देखा। पोचई ने कहा, अब घर लौट चलो।' किंचित चुप्पी के बाद लक्ष्मी ने कहा, 'आपके मुँह पर कालिख पोत दिया। अब जाने पर उसकी परत और मोटी हो जायेगी।' 'मिश्र जी ने पिता-पुत्री और यु-लिन की मर्मस्पर्शी बातें लिखी हैं। लक्ष्मी ने पोचई की दुकान सम्हाल ली है। लोग हँसते हैं। यु लिन मृत्यु की दार्शनिक चिन्तन करता है। कुछ अस्पष्ट भाव से बुदबुदाता है, लक्ष्मी तुलसी के पत्ते मुँह में डालती है। उर्सला, बच्चा और नितिन के साथ भागी आयी है। लोग कहते हैं, यु लिन हमेशा बड़ लोगों की तरह रहे, खाये और जीये। उनका संस्कार भी वैसा ही होना चाहिए। सारे लोग दफनाने के लिए जमीन खोदते हैं, सभी जाति-धर्म के लोग। मियाँ नमाजी कहते हैं, यहीं तक साथ रहता है। यहीं तक ईर्ष्या, द्वेष, मलाल रहता है। इसके आगे सारा काँव-काँव समाप्त हो जाता है। सभी एक हो जाते हैं। राजन राजखोवा परेश नाथ सब अपने-अपने तरह से विचार करते हैं और निष्कर्ष निकालते हैं। चेतिया फूकन समझाते हैं कि सभी असम को लिबरेट करना चाहते हैं। पोचई ने उनका स्वागत किया, तिरका, सिरजा सब सहयोग करने लगे। लक्ष्मी और सिरजा की छेड़छाड़ देखकर तिरका ने कहा, तू कहे तो तेरी शादी सिरजा से करवा देता हूँ। तिरका उन लोगों के साथ जाने को तैयार होता है। एक दिन इनकी फोर्स लेकर आऊँगा और मियाँपाड़ा के पास वाला अपना खेत कब्जा करूँगा। तरुण गोगोई, रंगनाथ को लेकर एडवोकेट मुकुल सोनोवाल के साथ दिल्ली जाने वाली ट्रेन में सवार होते हैं, बहिरागतों के विरूद्ध जनहित याचिका दाखिल करने के लिए।

मैंने बार-बार अनुभव किया है, श्री प्रकाश मिश्र जी की अद्भुत लेखन क्षमता का परिचय इस उपन्यास में दिखाई देता है। उनकी भाषा, शैली और चिन्तन-प्रवाह अलग तरह से प्रभावित करता है। उनके लेखन में सूक्ष्म से सूक्ष्म विवरण चकित और रोमांचित करते हैं। असमिया, बंगला, हिन्दी, भोजपुरी, उर्दूऔर स्थानीय स्तर पर बोलियाँ, सबके सम्मिश्रण की भाषा मिश्र जी ने पूरे आत्म-विश्वास से किया है। भाषा और बोलियों पर ऐसा नियंत्रण बहुत कम देखने को मिलता है। उनके लेखन को, प्रकृति-चित्रण, भू-दृश्यावली का वर्णन, सर्ग-उपसर्ग और विम्ब जीवन्त और रोचक बनाते हैं। उनका रसिक भाव छिपता नहीं, जहाँ आवश्यक है, पूरे प्रभाव के साथ प्रकट होता है। उनका दार्शनिक-आध्यात्मिक चिन्तन पात्रों को प्रामाणिक और श्रेष्ठ बनाता है। मनुष्य के जीवन-संघर्ष के क्रम में क्रोध, चिन्ता, ईर्ष्या-द्वेष, लोभ, लालच, प्रेम, करुणा, वासना, उन्माद, नशा जैसी भावनाएँ खूब मुखरित हुई हैं। यह उस क्षेत्र-विशेष के निश्चित काल-खण्ड का दस्तावेजी इतिहास है। उपन्यास शोधपूर्ण विवरणों से भरा हुआ है तथा भारत के उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र की पृष्ठभूमि पर आधारित है। जातीय-संघर्ष, घुसपैठ और वर्चस्व की लड़ाई है। असम और उसके आसपास की भूमि पर हुए आंदोलन, खूनी संघर्ष, घुसपैठियों को सरकारी संरक्षण और वहाँ के निवासियों के रीति-रिवाज, तीज-त्यौहारों का अद्भुत चित्रण है। मिश्र जी को बधाई कि उन्होंने बहुत श्रम किया है इस लेखन में और निश्चित रूप से यह कृति शोधार्थियों के लिए प्रेरक और मार्गदर्शक होगी।
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समीक्षक: विजय कुमार तिवारी (कवि, लेखक, समीक्षक, कहानीकार, उपन्यासकार)
भुवनेश्वर, उड़ीसा
चलभाष: +91 910 293 9190


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