देश-विदेश की यात्राओं के जीवन्त चित्र प्रस्तुत करती पुस्तक: यादों के झरोखे से.... देश-विदेश

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पुस्तक: यादों के झरोखे से.... देश-विदेश  (यात्रा वृत्तांत)
सम्पादक: श्रीमती स्नेहलता 
ISBN: 978.93.85593.89.5
पृष्ठ: 246
मूल्य: ₹ 400.00 रुपये
प्रकाशन वर्ष: 2021
प्रकाशक: सुबोध प्रकाशन, लखनऊ


राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय अनेक साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत/ सम्मानित, राष्ट्रवादी विचारधारा की पोषक, प्रखर चिंतक, विदुषी, साहित्यकार श्रीमती स्नेहलता जी ने 16 देशों की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक यात्राएँ की हैं। हिन्दी साहित्य की कविता, कहानी, उपन्यास, निबन्ध, आलोचना तथा बाल साहित्य आदि विविध विधाओं में आपकी दो दर्जन से अधिक कृतियों का प्रकाशन भी हो चुका है।

पुस्तक ‘यादों के झरोखे से.... देश-विदेश’ में विभिन्न शीर्षकों से 12 यात्रा संस्मरण समाहित किये गये हैं। जिनमें 8 यात्रा संस्मरण अपने देश भारत के विभिन्न स्थलों की यात्रा के दौरान तथा 4 यात्रा संस्मरण विदेश भ्रमण के अपने अनुभवों पर लिखे गये हैं।
दिनेश पाठक ‘शशि’

पुस्तक के पहले यात्रा संस्मरण का शीर्षक है ‘अमरनाथ यात्रा’ इस संस्मरण में विदुषी लेखिका ने लिखा है कि अमरनाथ यात्रा एक ऐसी यात्रा है जिसमें अध्यात्म के साथ प्रकृति के नैसर्गिक स्वरूप के दर्शन होते हैं। प्रकृति के इस नैसर्गिक रूप की प्रशंसा करते हुए मुगल बादशाह जहाँगीर ने कभी कहा था कि पृथ्वी पर अगर कहीं स्वर्ग है तो वह यहीं हैं। लेखिका का कहना है कि 500 वर्ष बाद भी यहाँ के सौन्दर्य में कोई कमी नहीं आई है। वे लिखती हैं-

बर्फ से ढँकी चोटियाँ दुग्ध फैनिल झर-झर करते हुए झरने, पर्वत श्रृंखलाएँ विश्राम करती झीलें, ऊँचे-ऊँचे चिनार के वृक्ष, केसर की क्यारियाँ फूलों से लदे शिकारे, झील पर तैरते हाउसबोट, अनार, सेब, किशमिश, अखरोट और बादाम से लदे वृक्ष, देवतुल्य सौन्दर्य से सज्जित लोग, स्वर्ग सा ही सुख प्रदान करते हैं। (पृष्ठ - 20)

लेखिका ने अमरनाथ, चन्दनबाड़ी, पिस्सुघाटी, शेषनाग, महागुणस पर्वत, , पंचतरणी तथा अमरनाथ गुफा आदि की भोगोलिक स्थिति एवं आध्यात्मिक स्वरूप, तथा यातायात के साधन सभी का विस्तृत वर्णन किया है जो पाठक के सामने सादृश्य चित्र उपस्थित करता है।

पुस्तक में दूसरा संस्मरण ‘दक्षिण भारत यात्रा’ नाम से है जिसमें स्नेहलता जी ने यात्रा के प्रारम्भ से वापसी तक की प्रक्रियाओं, आने-जाने की कठिनाइयों, वहाँ पर बिकने वाली वस्तुओं सहित तिरुपति बालाजी मंदिर, चैन्नै के दर्शनीय स्थलों जैसे विश्व का सबसे लम्बा समुद्र बीच मरीना बीच, बंगलौर, मैसूर में मैसूर पैलेस, ऊटी, वृन्दाबन गार्डन, मदुरै का मीनाक्षी मंदिर, रामेश्वरम्, कन्याकुमारी, विवेकानन्द रॉक मैमोरियल, त्रिवेन्द्रम में सभी के उद्भव और विकास की एतिहासिक व भौगोलिक जानकारी इस तरह क्रमबद्ध प्रस्तुत की है कि पुस्तक को पढ़ते-पढ़ते पाठक को लगने लगता है कि वह स्वयं यात्रा कर रहा हैं।

मैसूर का नाम सुनते ही चन्दन की खुशबू मन में समा जाती है। मैसूर पैलेस को अम्बा विलास पैलेस भी कहते हैं। मैसूर पैलेस मैसूर के वाडियर राजाओं के रहने का महल है जिन्होंने 1399 से 1950 तक राज्य किया। चारों ओर से गुलाबी और रैड स्टोन से सजा पैलेस द्रविड़, पूर्वी और रोमन स्थापत्य कला का संगम है। कहते हैं कि पहले यह महल चंदन की लकड़ी का बना था परन्तु इसमें आग लगने के कारण यह नष्ट हो गया। उसके बाद 1897 से 1912 में यह बनकर तैयार हुआ। एक ऊँचे से चबूतरे पर चढकर जैसे ही हमने महल के अन्दर कदम रखा हमारी आँखें चकाचौंध हो गईं। महल में सोने के खम्बों के ऊपर की गई चित्रकारी, छत पर टंगे झाड़फानूस, संगमरमर पर विविध रंगों से अलंकृत किया गया फर्श हमें किसी परीलोक में ले गया। (पृष्ठ - 38)

इसी तरह वृन्दावन गार्डन, घूमते हुए लेखिका के विचार- 

“दूर-दूर तक सुन्दर हरी कार्पेट से बिछे घास घास के मैदान के किनारे-किनारे रंग-बिरंगे फूलों से सजी क्यारियाँ मोरपंखी, अशोक, एरोकेरिया, बोगेनवेलिया के सुन्दर तराशे हुए वृक्ष। मंत्रमुग्ध करने वाला वातावरण। वृन्दाबन गार्डन को देखकर ऐसा लग रहा था मानो हम सचमुच स्वर्ग के बगीचे में हैं।” (पृष्ठ - 41) 

पुस्तक के तीसरे संस्मरण में लेखिका ने पुरी यात्रा का विशद और यथार्थपरक वर्णन किया है। पुरी के जगन्नाथ मंदिर के बारे में जानकारी देते हुए वे कहती हैं- 

"जगन्नाथ मंदिर उड़ीसा प्रान्त के पुरी नगर में पश्चिम समुद्र तट से लगभग एक किलोमीटर पहले उत्तर में 11वीं शताब्दी में राजा अनन्तवर्मन चोडगंगदेव द्वारा बनवाया गया भव्य प्राचीन मंदिर है, जिसमें भगवान कृष्ण, उनकी बहन सुभद्रा और भगवान बलभद्र की पूजा होती है।” (पृष्ठ - 61)

चौथा संस्मरण असम, दार्जिलिंग और सिक्किम यात्रा का है जिसमें कामाख्या मंदिर, बाबा हरभजन सिंह मंदिर, गोहाटी, शिलांग, दार्जिलिंग एवं सिक्किम आदि का सविस्तार वर्णन किया गया है।

पाँचवे संस्मरण में अध्यात्म यात्रा डेरा बाबा यानि व्यास के बारे में विस्तार से बताया गया है।

छठे संस्मरण में ‘कैलास मान सरोवर यात्रा’ शीर्षक से विदुषी लेखिका स्नेहलता जी ने बहुत ही उत्तम तरीके से मानसरोवर यात्रा प्रारम्भ करने से पूर्व की प्रक्रियाओं जैसे पास पोर्ट का प्रबन्ध, स्वास्थ्य सम्बन्धी चिकित्सकीय जाँचों का ब्यौरा, इन्डैमनिटी बाण्ड, चीन को दिया जाने वाला शुल्क आदि-आदि का विवरण सभी कुछ विस्तार से बताया है जिसने भी उनकी यह पुस्तक पढ़ ली, मानिए उसकी मानसरोवर यात्रा की जटिलताएँ समाप्त हो गईं। 

इसके बाद लेखिका ने मानसरोवर यात्रा का प्रतिदिन के कार्यक्रमों का विस्तृत उल्लेख किया है। लेख के अन्त में लेखिका ने वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी को इस बात के लिए धन्यवाद दिया है कि उनके प्रयास से सिक्किम के एक अन्य मार्ग के खुल जाने से यात्रा सुगम हो गई है वहीं उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री माननीय योगी आदित्य नाथ जी को इस बात के लिए धन्यवाद दिया है कि उन्होंने वर्ष 2017 से उत्तर प्रदेश से कैलाश मानसरोवर जाने वाले तीर्थ यात्रियों को एक लाख रुपये अनुदान राशि स्वीकृत करने का निर्णय लिया है।

पुस्तक के सातवें संस्मरण में स्नेहलता जी ने पाताल भुवनेश्वर यात्रा शीर्षक से अपना संस्मरण लिखा है। पाताल भुवनेश्वर की जानकारी देते हुए बहुत ही रोचक कथा के माध्यम से स्नेहलता जी ने संस्मरण को मोहक बना दिया है।

"गुफा के बाहर चीड़ और देवदार के जंगल से ढँके पहाड़ थे। वहीं गुफा के अन्दर पहाड़ों का कहीं नामोनिशान तक नहीं था। जो जगह बाहर से दिखाई तक नहीं देती थी वह अन्दर बहुत खुली और साफ सुथरी थी। प्रकृति के इस अनुपम रहस्य से हमारा मन अभिभूत था। हमें स्वीकार करना पड़ा कि विज्ञान से आगे अध्यात्म है।" (पृष्ठ - 143)

अगला संस्मरण योरोप यात्रा का है। लन्दन के स्वामी नारायण मंदिर के बारे में स्नेहलता जी जानकारी देते हुए लिखती हैं-

"सफेद संगमरमर का खूबसूरत नक्काशीदार स्वामी नारायण मंदिर अक्षर धाम के जैसा ही सुन्दर बना है। इसमें 2,828 टन बेल्जियम पत्थर लगे हैं। 2,000 टन इटैलियन मार्बल लगा है। इसे पहले भारत में लाकर 1,526 कारीगरों द्वारा तराशा गया था।" (पृष्ठ - 149) 

पूरे योरोप यात्रा का बहुत ही तथ्यपरक एवं रोचक वर्णन लेखिका ने किया है।

पुस्तक के अन्य संस्मरण-मणि महेश यात्रा, लुम्बिनी यात्रा, भूटान यात्रा, नार्वे यात्रा शीर्षकों से बहुत ही सामजस्य तरीके से पूरी जानकारी उपलब्ध कराते हुए लिखे हैं। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद उन लोगों को जो विदेश के गुणगान करते नहीं थकते यह अहसास अवश्य होगा कि अपने देश की धरोहर इतनी विशाल है कि विदेश भागने से पहले उन्होंने अपने देश का हजारवां भाग भी नहीं देखा और समझा है। लेखिका ने पहले अपने देश की धरोहर को बहुत बारीकी से देखा और समझा है फिर विदेश की भूमि का भी अपने देश से तुलनात्मक रूप में समझने का प्रयास किया है।

पुस्तक के बारे में विशेष बात यह है कि जिसने भी पुस्तक एक बार पढ़ना प्रारम्भ कर दी तो पूरी पढ़े बिना मन को शान्ति नहीं मिलेगी।

सभी आलेखों की भाषा-शैली सरल और सहज ग्राह्य है। आवरण आकर्षक है तथा मुद्रण त्रुटिहीन है। पुस्तक का सर्वत्र स्वागत होगा, ऐसी आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है।


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