यथार्थ के खुरदरे धरातलकी साक्षी उत्कृष्ट कहानियों का संग्रह: सकरी गली

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पुस्तक: सकरी गली  (कहानी संग्रह)
लेखक: डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा मृदुल 
ISBN: 978.93.85981.27.5
पृष्ठ: 176
मूल्य: ₹ 500.00 रुपये
प्रकाशन वर्ष: 2019
प्रकाशक: सत्यम पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली-110059


हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं में दो दर्जन के लगभग कृतियों के सृजनकर्त्ता, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के साहित्य भूषण सम्मान से सम्मानित प्रबुद्ध साहित्यकार डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ‘मृदुल’ का कहानी संग्रह- "सकरी गली" पढ़ने का अवसर मिला। संग्रह के 176 पृष्ठों में पूर्ण विस्तार वाली बीस कहानियाँ समाहित की गई हैं।

संग्रह की पहली कहानी ‘रक्षा कवच’ है जो यह सिद्ध करने में पूर्ण सफल हुई है कि बुजुर्ग, घर-परिवार की मान-मर्यादा और आपसी प्रेम-स्नेह तथा रिश्तों का मान आदि किस खूबी से सहेजते रहते हैं। घर को घर बनाये रखने में उनकी अहं भूमिका होती है।

संग्रह की दूसरी, तीसरी और सातवीं, ग्यारहवीं तथा बारहवीं कहानियों के मूल स्वर वृद्धजनों की अवहेलना की ओर इशारा कर रहे हैं। दूसरी कहानी-‘एक रक्त रंजित शाम’ एक ऐसे पिता की पीड़ा को अभिव्यक्त करती है जिसके जीवित रहते ही उसकी सन्तान सम्पत्ति पर अपना अधिकार जताने लगती है। सच तो यह भी है कि सन्तान चाहे कुछ भी समझे पर हर पिता अपनी सभी सन्तानों को समान प्रेम करते हुए उन्हें आपस में प्रेम भाव से रहते हुए देखना चाहता है।

"दोनों भाई मिल-जुलकर रहो, यही मेरी अन्तिम इच्छा है। पुराने खेत में आम का बाग लगाना और हर साल अपने भतीजों को आम जरूर पहुँचाना । (पृष्ठ-23)

तीसरी कहानी -‘मृत्युभोज’ भी गाँव में अकेले रह रहे तीन पुत्रों के पिता की है। बल्कि कहना उपयुक्त होगा कि उन सभी पुत्रों की है जो माता-पिता द्वारा पालन-पोषण और पढ़ा-लिखा दिए जाने के बाद अपने माता-पिता को रामभरोसे अकेले छोड़कर विदेशों में या शहरों में जा बसते हैं और माता-पिता की मृत्यु के बाद अपने हिस्सा-बाँट के लिए अपनत्व जताते हैं।

दिनेश पाठक ‘शशि’
संग्रह की सातवीं कहानी-‘मायाजाल’ भी इसी भावभूमि की कहानी है। मनुष्य लोभ और मोहमाया में फँसकर अपने माता-पिता की अवहेलना करने लगता है तो निश्चित ही उसका प्रतिफल उसके जीवन में उसे भोगना पड़ता है। कहानी के नायक राधे मोहन ने अपने पिता की अवहेलना करते हुए गरीब और असहायों को सताकर धन इकट्ठा किया। उस धन से पुत्र का पालन-पोशण और शिक्षा पूर्ण कराई।

शिक्षा पूर्ण करते ही पुत्र ने अमेरिका में ही बसने का निर्णय सुनाया तो राधे मोहन को झटका लगा-

"अमेरिका की स्थाई नागरिकता प्राप्त करने हेतु उसने एक अमेरिकन लड़की से विवाह कर लिया है। उस लड़की ने विवाह पूर्व यह शर्त रखी थी कि मैं अब कभी वापस भारत नहीं जाऊंगा और न ही भारत से कोई मेरा रिश्तेदार अमेरिका आकर हमारे घर में रुकेगा। इसलिए मैं भारत आने में असमर्थ हूँ (पृष्ठ-70)

जब राधेमोहन के कर्म का फल लौटकर वापस आया तो उसे अपने पिता के साथ किए व्यवहार का अहसास हुआ।

"आज उन्हें अपने द्वारा बापू के साथ किया गया व्यवहार भी अनुचित लग रहा था और मन के किसी कोने से यह विचार भी सुगबुगा रहा था कि जैसा तूने अपने पिता के साथ किया उससे चार गुना ईश्वर बेटे के माध्यम से तुझे वापस कर रहा है।" (पृष्ठ-70)
 
‘सकरी गली’ संग्रह की चौथी और शीर्षक कहानी है। सँकरी गली के बहाने विद्वान कहानीकार ने अपने ही देश के अन्दर जाति-धर्म और मंदिर-मस्जिद के नाम पर लड़ने वालों की सकरी सोच को पूर्णतः उजागर कर दिया है। 

अपने प्रथम पुत्र के जन्म पर गाँव आये समर को जब अपने साथी सैनिक आलम के माता-पिता की अस्वस्थता के बारे में ज्ञात हुआ तो उसने उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया। ड्यूटी पर वापस जाने से पहले समर ने आलम के माता-पिता के स्वास्थ्य के बारे में जानने के लिए आलम के गाँव जाने का कार्यक्रम बनाया। आलम की माता जी द्वारा चाय के लिए पूछे जाने पर समर के उत्तर द्वारा कहानीकार ने भारतीय सेना के वास्तविक स्वरूप को कहलवा दिया है- 

"अब्बू, हम सैनिकों की तो एक ही जाति होती है- हिन्दुस्तानी। और एक ही धर्म होता है- दुश्मन को देश की सीमाओं से दूर रखना। यही बात ट्रनिंग के दौरान हमारे दिलों में बैठा दी जाती है। हमारी सेना में न कोई हिन्दू है और न मुसलमान। सब हिन्दुस्तानी हैं, सिर्फ और सिर्फ हिन्दुस्तानी और हर सैनिक हमारा भाई है जिसके कंधे से कंधा मिलाकर हमें अपने देश की रक्षा करनी है। (पृष्ठ-37)

इतना ही नहीं विद्वान कहानीकार ने सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव की ओर भी इस कहानी में इशारा किया है। फेसबुक पर हिन्दू-मुस्लिम युवकों के बीच हुई झड़प ने आतंक का रूप धारण कर लिया और उस सकरी गली में जिसमें आलम के माता-पिता को देखने के लिए समर आया था, निकल न पाने के कारण, गोली लगने के कारण समर की मृत्यु हो गई।

"आलम के अब्बू ने लाश देखी तो फूट-फूट कर रोने लगे। उन्होंने पुलिस कोतवाल को बताया कि मृतक भारतीय सेना का सैनिक समर बहादुर सिंह है। वह जम्मू-कश्मीर सीमा पर मेरे बेटे मोहम्मद आलम के साथ नियुक्त था तथा छुट्टी पर अपने गाँव मिसरौली आया हुआ था। दो दिन बाद उसकी वापसी थी और आज वह बेचारा हम लोगों से मिलने आया था। सकरी गली होने के कारण शायद यह बेचारा जुलूस में फंस गया और जुनूनी दरिंदों ने इसे मार डाला।

उनकी बात सुनकर जिलाधिकारी महोदय ने गहरी साँस लेकर कहा, "बड़े मियाँ! मुझे तो लगता है कि पूरा देश ही आज धर्म की सकरी गली में फँस गया है। ये मंदिर-मस्जिद के झगड़े हमें न जाने कहाँ लेकर जायेंगे।" (पृष्ठ -39, 40)

संग्रह की पांचवी कहानी-‘मोहनी सखी’ निःस्वार्थ प्रेम और पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन तथा साँसारिकता में फंसे मानव के संकीर्ण विचारधारा को सहज अभिव्यक्ति प्रदान करती मार्मिक कहानी है तो छठवीं कहानी-‘पत्थर शहर’ शहर की बेरुखी और गाँव की आत्मीयता को दर्षाती कहानी है। 

संग्रह की आठवीं कहानी-‘कारवां’ सहज रूप् से आगे बढ़ते हुए समाज का मार्ग दर्शन करने वाली एक उत्प्रेरक उत्कृष्ट कहानी है जो बताती है कि जब कोई निःस्वार्थभाव से अच्छे कार्य को अंजाम देने के लिए पग बढ़ाता है तो उसकी सहायता करने वाले स्वतः ही जुटने लगते हैं। राकेश द्वारा अनाथालय को प्रतिमाह एक निश्चिंत राशि देना तथा अनाथ और दिग्भ्रमित भटके हुए बच्चों को सुधारने व उनकी शिक्षा हेतु उपाय करने की ओर पग बढ़ाया तो अन्य लोगों ने भी सहयोग प्रारम्भ कर दिया।

‘नेहनाते’ संग्रह की नवीं कहानी है। मनुष्य के जीवन में बहुत कुछ ऐसा घटित हो जाता है जिसके बारे में कभी सोचा भी नहीं होता। घर में कुत्ता पालने से एतराज करने वाले रामेन्द्र के दोनों पुत्रों ने चुपके से एक कुतिया पालकर उनसे मनुहार की तो वह मान गये। उनके पुत्र शंटी-बंटी और कुतिया डेजी के बीच ऐसे मानवीय सम्बन्ध स्थापित हुए कि रामेन्द्र जी देखकर दंग रह गये।

"ड्राइंगरूम में बैठे रामेन्द्र बाबू अपने मित्र कौशल किशोर को साश्चर्य बता रहे थे, "यार, पूरे दस दिन बिना भोजन के बंटी के इंतजार में वह जिंदा रही और उसके आते ही दस मिनट के अन्दर शरीर त्याग दिया। ऐसा नेहनाता तो मनुष्य के बीच भी नहीं मिलता।" (पृष्ठ -87)

कभी जाति-पाति तो कभी प्रदेश तो कभी धर्म-सम्प्रदाय के बहाने खोजकर खून-खराबा करने वाले लोगों को किसी पर तरस नहीं आता। पूरे देश के कोने-कोने से अनेक लोग रोजी-रोटी के लिए मुम्बई की शरण लेते रहे हैं। ऐसे में प्रदेशवाद का सहारा लेकर दंगा करने वालों ने बहुत से प्रदेश के लोगों को बेघर करके उनकी रोटी छीन ली। इसी दर्द को उकेरती मार्मिक कहानी है बेघर तो संग्रह की चौदहवीं कहानी ‘भीड़ का न्याय’ भी यही सिद्ध करती है कि जाति-धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर लड़ने वालों को केवल बहाना चाहिए। उन्हें प्रेम-भाव की यह बात बिल्कुल भी समझ में नहीं आती-

"हमारे मजहब भले अलग-अलग हैं, मगर हमारी कौम एक ही है। दुनिया की नजरों में हम हिन्दू-मुसलमान नहीं, हिन्दुस्तानी हैं। ...जब हम मिलके रहेंगे, तभी सुकून से रह सकेंगे। लड़ेंगे तो तबाह हो जायेंगे। (पृष्ठ -120)

‘नागरिक अभिनन्दन’ संग्रह की तेरहवीं कहानी है। इस कहानी में विद्वान कहानीकार ने कई बातों की ओर इशारा किया है। उनका मानना है कि -‘ईश सहाय करे तबही जब आप सहाय करे नर अपनी’ तथा ‘मेहनत का फल हमेशा मीठा होता है’ के साथ-साथ मेहनत, ईमानदारी, लगनशीलता की महत्ता को बहुत ही उत्तम तरीके से अभिव्यक्त किया गया है।

घर-घर वर्तन माँजने वाली की पुत्री गीता का जब आई.ए.एस. के लिए चयन हो गया तो उसने मंच से उन सबका उल्लेख करते हुए आभार व्यक्त किया जो किसी भी रूप में उसके सहायक बने।

"गीता ने माइक सम्भालते हुए कहा-‘मैं आज जिस मुकाम पर पहुँची हूँ यह केवल मेरे परिश्रम का फल नहीं है।" कहानी के सभी पात्रों का चरित्र चित्रण बहुत ही मानवीय तरीके से डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा मृदुल जी ने किया है।

 संग्रह की सभी कहानियों में शिल्प की कसावट और अद्भुत भाषा-शैली, कहानीकार की प्रबुद्धता और कहानी कौशल में प्रवीणता को प्रदर्शित करती है। कहानी संग्रह "सकरी गली’ का हिन्दी साहित्य जगत में भरपूर स्वागत होगा ऐसी पूर्ण आशा है


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