हिन्दी भाषा की चुनौतियाँ एवं नवाचारी प्रयोग

नन्दकिशोर साह

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विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में प्रमुख हिंदी भाषा हमारे राष्ट्र का गौरव है। देश में हिंदी का भले ही कितना बोलबाला हो, लेकिन यह हमारी राष्ट्रभाषा नहीं है। हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्राप्‍त है। राष्ट्रभाषा, राजभाषा और मातृभाषा में अंतर है। राष्ट्रभाषा वह भाषा है जिसका किसी देश में सबसे अधिक प्रयोग होता है। यह देश की आधिकारिक भाषा होती है और देश का प्रतिनिधित्व करती है। जैसे डेनमार्क की राष्ट्रभाषा डैनिश है, ब्रिटेन की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी है। दूसरी ओर, जिस भाषा का प्रयोग प्रशासनिक कार्यों और सरकारी कामकाज में होता है, उसे राजभाषा कहते हैं। जैसे हिंदी हमारी राजभाषा है। मातृभाषा से तात्‍पर्य हम जहाँ पैदा होते हैं, वहाँ की बोली से है। जैसे अगर कोई बंगाल में पैदा हुआ है तो उसकी मातृभाषा बंगला है, कोई अगर तमिळनाडु से है तो तमिळ उसकी मातृभाषा है।

हिंदी एक समावेशी भाषा है। भारत की आत्मा, श्रद्धा, आस्था, निष्ठा, संस्कृति एवं सभ्यता से जुड़ी हुई भाषा हैं। हिंदी भाषा की सरलता, सहजता और संवेदनशीलता हमेशा आकर्षित करती हैं। हिंदी दरिद्र नहीं है। उसका अपना वैभव है। किसी भाषा को खतरा नहीं है। वह तो बहता नीर है। नदी है। यह सिर्फ एक भाषा नहीं बल्कि हमारे जीवन, मूल्यों, संस्कृति एवं संस्कारों की सच्ची संवाहक,  संप्रेषण और परिचायक भी है। हमारी मातृभाषा हिंदी अनेकता में एकता के मूल्यों को स्थापित करती है।

संस्कृत भारतीय भाषाओं की ही नहीं अपितु संसार की अनेक भाषाओं की जननी है। ये सभी भाषाएँ एक परिवार जैसी हैं जिनकी माँ संस्कृत है। हिंदी संस्कृत की बेटियों में एक प्रमुख स्थान रखती है। हिंदी के ज्यादातर शब्द संस्कृत, अरबी और फारसी भाषा से लिए गए हैं। यह भारोपीय परिवार की भाषा  है। हिंदी भाषा में, व्याकरण सहित कला, संगीत के सभी माध्यमों में अपनी उपयोगिता, प्रासंगिकता एवं वर्चस्व कायम किया है। यह देश की धड़कन है।

अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन, सूरत में बोलते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कुछ लोग यह अफवाह फैला रहे हैं कि हिंदी और गुजराती, हिंदी और तमिळ, हिंदी और मराठी प्रतिस्पर्धी है। हिंदी देश की किसी अन्य भाषा की प्रतियोगी नहीं हो सकती। आपको यह समझना चाहिए कि हिंदी भाषा प्रतिस्पर्धी नहीं है बल्कि देश की अन्य सभी भाषाओं की मित्र है। इसके साथ क्षेत्रीय भाषाओं को मजबूती प्रदान करना जरूरी है। कोई भाषा, दूसरी भाषा के शब्दों को अपनाकर छोटी नहीं होती बल्कि इसका आयाम बढ़ता है। अतः देश की क्षेत्रीय भाषा तभी समृद्ध हो सकती है, जब हिंदी समृद्ध होंगी और क्षेत्रीय भाषाओं के विकास से हिंदी में समृद्ध होगी।

हिन्दी भाषा का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना है। यह करीब 11वीं शताब्दी से ही एक राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित रही है। उस समय भले ही राजकीय कार्य संस्कृत, फारसी, अंग्रेजी में होते रहे हो परन्तु सम्पूर्ण राष्ट्र में आपसी सम्पर्क, संवाद-संचार, विचार- विमर्श, जीवन-व्यवहार का माध्यम हिन्दी ही रही है। अतीत के महापुरुषों में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी आदि ने हिन्दी भाषा के माध्यम से ही सम्पूर्ण राष्ट्र से सम्पर्क किया और सफलता हासिल की। उसके बाद वह साहित्यिक भाषा के क्षेत्र में इसका विकास हुआ। समाचार-पत्रों में ‘पत्रकारिता हिन्दी’ का विकास हुआ। 

महात्मा गांधी ने अदालती कामकाज में भी हिंदी के इस्तेमाल की पुरजोर पैरवी की थी। वे कहते थे कि राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है। हिंदी हृदय की भाषा है। देश की उन्नति के लिए राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना अत्यंत आवश्यक है। सही मायने में कोई भी देश तब तक स्वतंत्र नहीं कहा जाएगा जब तक वह अपनी भाषा में नहीं बोलता है। गांधी जी का कहना था कि भाषा को सशक्त बनाकर भारतीय समाज में परिवर्तन किया जा सकता है। उन्होंने हिंदी को राष्ट्रीय आंदोलन के रचनात्मक कार्यक्रम में स्थान दिया। हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में राष्ट्रीय चरित्र से जोड़कर सही दिशा में राष्ट्रभाषा का एक आंदोलन आरंभ किया। उनका विचार था कि अंग्रेज और उपनिवेशवाद से कहीं अधिक हानिकारक अंग्रेजी है।

गांधी जी ने भारत के स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त 1947 के अवसर पर देश को संदेश देते हुए कहा था कि दुनिया से कह दो कि गांधी अंग्रेजी नहीं जानता है। महात्मा गांधी ने 29 मार्च 1918 को इंदौर में आठवें हिंदी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता की थी। उन्होंने अपने सार्वजनिक उद्बोधन में पहली बार आह्वान किया था कि हिंदी को ही भारत का राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलना चाहिए। अपनों तक अपनी बात हम अपनी भाषा द्वारा ही पहुंचा सकते हैं। अपनों से अपनी भाषा में बात करने में हमें कोई संकोच नहीं होना चाहिए। गांधीजी हिंदी विषय के प्रति इतना समर्पित थे कि उन्होंने लिखा था कि यदि मैं तानाशाह होता तो भारत के समस्त संस्थाओं में हिंदी भाषा अनिवार्य कर देता। इससे यह लगता है कि हिंदी विषय विमर्श के लिए उनके मन में कितना अगाध प्रेम था। गांधी जी ने स्वयं कहा था कि राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना देश की उन्नति के लिए आवश्यक है।

महात्मा गांधी ने हिंदी को जनमानस के भाषा कहा था। वे हिंदी को जनसंचार और संवाद की सबसे सशक्त भाषा मानते थे। आजादी की लड़ाई में इसकी महत्ता खूब दिखी। आज जनसंचार माध्यमों में प्रयुक्त हिंदी भाषा को संशोधित करने के लिए अनुसंधान की आवश्यकता है। इस देश में संप्रेषण का माध्यम हिंदी ही हो सकता है। भारत के भविष्य को हिंदी के भविष्य से अलग नहीं कर सकते हैं। सन 1826 में कलकत्ता से हिंदी में पहले समाचार पत्र उदंत मार्तंड की शुरुआत ने एक नए युग का सूत्रपात किया। इस नए युग में पत्रकारिता विज्ञापन एवं प्रचार-प्रसार के लिए हिंदी भाषा का व्यापक प्रयोग किया जाने लगा।

हिंदी को बढ़ाने में फिल्म, मनोरंजन, रंगमंच का योगदान रहा है। जनसंचार के माध्यम से हिंदी भू-भाग पर फैला है और अंतरराष्ट्रीय बनाने में योगदान दिया है। धर्म-दर्शन सहित बच्चों के लिए तरह-तरह के मनोरंजक एवं ज्ञानवर्धक कार्यक्रमों को रूपांतरित कर के हिंदी में प्रसारित कर रहे हैं। हिंदी फिल्म देश में ही नहीं विदेशों में भी बहुत पसंद की जाती है। कई देश ने अपनी अपनी भाषा में ही ज्ञान विज्ञान की पूर्णता प्राप्त की है। अंग्रेजी भाषा जिन पर बुरी तरह हावी हो चुकी है। वही यह तर्क देते हैं कि बिना अंग्रेजी के भारत पिछड़ जाएगा।

सन 1913 में हिंदी में पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र दादा साहेब फाल्के ने बनाई। हिंदी भाषा का सही परिचय तभी मिला जब यह गूंगी फिल्म बोलने लगी। सन 1913 में आलम आरा के प्रदर्शन के साथ ही भारतीय परिदृश्य में नई क्रांति का उदय हुआ, जिसमें श्रव्य-दृश्य माध्यम आदि के रूप में हिंदी ने अपनी क्षमता का परिचय दिया। बाद में आकाशवाणी,  टेलीफोन,  दूरदर्शन,  संगणक,  इंटरनेट  संचार माध्यम में हिंदी अपनी क्षमता का परिचय दे रही है। कंप्यूटर को लेकर भी भारत में हिंदी की मांग इतनी बढ़ गई कि माइक्रोसॉफ्ट कंपनी का हिंदी संस्करण बाजार में लाना पड़ा। जबकि कंप्यूटर का विकास सर्वप्रथम रोमन लिपि से ही हुआ किंतु देवनागरी लिपि के प्रयोग का श्रीगणेश होते ही बिल गेट्स को भी स्वीकार करना पड़ा कि कंप्यूटर प्रयोग में हिंदी पूरी तरह सक्षम है। सर्वप्रथम भारतीय रिजर्व बैंक ने देवनागरी में ईमेल भेजने की शुरुआत की।

हिंदी की लिपि देवनागरी होने के कारण इसमें जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखा जाता है। भाषा लादी और थोपी नहीं जा सकती, वह तो स्वाभाविक रूप से मुँह से निकलती है। बच्चा जब पहली बार बोलता है, तब माँ कहता है। यह स्वाभाविक भाषा है। यही हिंदी है। हिंदी हृदय की भाषा है। हिंदी में मानवीय अनुभूतियों के जो शब्द है, वे  विश्व के कई भाषाओं में नहीं है। हिंदी जोड़ती है, तोड़ती नहीं है। जितने स्वर आवाज हिंदी में निकलते हैं, उतने किसी अन्य भाषाओं में नहीं निकलते। जिस प्रकार भावनाएँ हिंदी में प्रकट कर सकते हैं, उस प्रकार से दूसरी भाषाओं में नहीं। अतः वैज्ञानिक भाषा हिंदी है। घर में जिस तरह माँ  की महत्व है, उसी तरह देश में हिंदी का महत्व है।

मातृभाषा के साथ-साथ एक अन्य भाषा का ज्ञान होना अच्छी बात है। मगर अपनी ही भाषा का ज्ञान न होना कौन सी अच्छी बात है? समाज या देश में किसी भी भाषा के विकास या बदलाव में महिलाओं की बहुत बड़ी भूमिका है। इसका मुख्य कारण यह है कि अपने बच्चों की प्रथम शिक्षिका महिलाएँ होती हैं। इस कारण हर स्थान प्रदेश और देश  की भाषा को मातृभाषा का नाम दिया गया है, लेकिन पहले के समय और आज के समय में हिंदी भाषा के प्रयोग में काफी बदलाव आया है। हिंदी भाषा का शुद्ध रूप तो सुनने को ही नहीं मिलता है। बोलचाल की भाषा में अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग अत्यधिक बढ़ गया है।

देश स्वतंत्र होने के पश्चात, संविधान का  विदेशी भाषा में लिखा जाना  गुलामी का धब्बा है। अगर संविधान अपनी भाषा में लिखा गया होता तो उसका भाव दूसरा होता और उसका संदेश भी। हिंदी को सही मायने में संवैधानिक दर्जा दिलाया जा सकता था, लेकिन जैसे-जैसे इसमें देर हुई वैचारिक विवाद बढ़ता गया। वोट बैंक की राजनीति भी बढ़ती गई और जैसे-जैसे राजनीति का लक्ष्य सेवा के बाजार सत्ता साधन होता गया, वैसे-वैसे हिंदी ही क्यों अन्य भाषाओं की राजनीति भी बदल गई।

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