उत्पीड़क पितृसत्ताक और इक्कीसवीं शती का प्रवासी हिन्दी उपन्यास (लेखिकाओं के संदर्भ में)

मधु संधु

मधु संधु

पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष,हिन्दी विभाग,गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर, पंजाब।
पितृसत्ताक पिता की सत्ता, शक्ति और वर्चस्व की ऐसी वैचारिक, सामाजिक व्यवस्था है, जो पुरुष को अतिरिक्त वर्चस्व दे औरत को दोयम दर्जे की नागरिक बना उसकी स्थिति को अवमूल्यित कर देती हैं। मौलिक अधिकारों की संवैधानिक प्रतिष्ठा के बावजूद पितृसत्ताक के उपद्रव और मनमानियाँ, वर्चस्व और अहमन्यता, उसके द्वारा होने वाला शोषण और उत्पीड़न सर्वत्र उपस्थित है। पूरे विश्व में, हर महाद्वीप में, सभी सभ्य-असभ्य, विकसित-विकासशील देशों में स्त्री को पुरुषसत्ताक द्वारा उत्पीड़ित ही किया जाता है और इस जंग में औरत अकेली ही है। प्रवासी हिन्दी उपन्यास का एक पक्ष पितृसत्ताक का नृशंस प्रभुत्व और परिणामत: नारी की दशा, बल्कि दुर्दशा का अंकन लिए है। समाज में स्त्री पुरुष के लिए हमेशा अलग-अलग मानदंड रहे हैं-सदियों पहले भी, उसके बाद भी और आज भी। भारत में भी और भारत से दूर लंदन, अमेरिका, कैनेडा, डेनमार्क में भी। व्यक्ति, परिवार, समाज, परम्परायेँ – सभी स्त्री के विरोध में मोर्चा खोले बैठे हैं। सारे गरल इस स्त्री के हिस्से आए हैं। यहाँ बेमेल विवाहों, परस्त्रीगामी पतियों, धीरललित प्रेमियों, निरंकुश पिताओं और अर्थसजग भाई-बंधुओं का तांता लगा है। कुछ भी गलत हो जाए, दोषारोपण स्त्री पर ही लगा सकते हो। स्त्री को उसने बेजान वस्तु मान रखा है। उसे विश्वास है कि स्त्री को वह जिस हाल में रखेगा, उसी में खुश रहेगी। वह जलते आँगन में जलते तलवों के साथ खड़ी है। कैसे हैं इन उपन्यासों के प्रेमी पुरुष? क्या यह धीरललित पुरुष है? अवधारणा रही है कि हर कुंवारी कमसिन और मासूम होती है। स्वदेश राणा के उपन्यास ‘कोठेवाली’[1] का पच्चास वर्षीय बदरीलाल रईस घर की चाँद सी खूबसूरत पत्नी और दो युवा बेटों होते हुए भी एक बदसूरत, मँझले कद, दोहरे बदन, कड़ी चाय से गहरे रंग, माथे पर जुड़ी भवों वाली, कुम्हारिन-रंगरेजन मरासिन पर रीझ जाता है और पत्नी के मरते ही बिना विवाह, बिना किसी कागजी कार्रवाही के बदरुनिस्सा को अपने घर बिठा लेता है। यानी प्रेमिका उसके लिए सिर्फ मौज मस्ती का जरिया ही है।

सुदर्शन प्रियदर्शिनी की ‘पारो उत्तरकथा’[2]

का देवदास भी अपनी बालसखी/ प्रेमिका, पार्वती/ पारो का उतना ही उत्पीड़क है जितना पति वीरेन। पारो के दरवाजे पर आकर देव का प्राण त्यागना नवविवाहित पारो को कलंकित कर देता है, सारी मान-मर्यादा पाँव तले रौंद देता है, उसे पत्थर की अहल्या बना देता है, राय साहब के लिए अपदस्थ कर देता है।

भारतीय-प्रवासी, देशी-विदेशी, भावुक-बौद्धिक-सब प्रेमी अवसरवादी हैं। उषा प्रियम्वदा के उपन्यास ‘नदी’[3]

में प्रौढ़, बड़े-बड़े बच्चों का पिता अर्जुनसिंह घर में बीबी होने के बावजूद आकाशगंगा को वैसे ही संरक्षण देता है, जैसे किसी भोग्या या रखैल को दिया जाये। होटल में रखता है, असली नकली गहने भेंट करता है। आकाशगंगा एरिक के संपर्क में भी आती है। उससे शारीरिक संबंध भी स्थापित होते हैं, लेकिन उसे स्टीवन की माँ बनाने वाले एरिक के पास अपने स्वप्न हैं और आकाशगंगा हर बार ठगी जाती है।

यहाँ प्रेम में कोमलता नहीं, क्रूरता है। त्याग नहीं, वहशीपन है। सुधा ओम ढींगरा के उपन्यास ‘दृश्य से अदृश्य का सफर’[4] में सायरा एसिड अटैक का शिकार इसलिए बनती है कि उसने राजनेता के उस बेटे के प्रेम आमंत्रण को अस्वीकार किया है

अमेरिका जैसे विकसित, सम्पन्न, नंबर वन देशों के प्रेमी तो अमानवीयता में सबसे आगे हैं। अनिल प्रभा कुमार ‘सितारों में सूराख’[5] में मानत है कि अमेरिका में बंदूक संस्कृति की सबसे अधिक शिकार स्त्री ही हुई है। अमेरिका में दस करोड़ लोगों के पास बंदूकें हैं। गायिका जेनिफर फॉक्स का बॉय फ्रेंड उसकी सफलता से जलता है और इसीलिए वह उसकी तीन गोलियों का निशाना बन पाँच वर्ष अस्पताल में रहने के लिए अभिशप्त है। लिखती हैं-

“एक औसत माह में, तिरपन अमेरिकी औरतें अपने साथी द्वारा बंदूक से मारी जाती हैं और इससे ज्यादा घायल होती हैं। ----दुनिया के किसी भी समृद्ध देश के मुक़ाबले अमेरिकी औरतों के बंदूक से मारे जाने की संभावना इक्कीस गुना ज्यादा है।--- औसतन साढ़े पाँच सौ औरतें हर साल इन बंदूकों की वजह से अपनी जान गँवा देती हैं। ”

अब हम स्वकीया की, पत्नी की बात भी कर लेते हैं। इक्कीसवीं शती के प्रवासी हिन्दी उपन्यास में पत्नियों की हैसियत बेजान वस्तु सी है। पति पुरुष को विश्वास है कि पत्नी को वह जिस हाल में रखेगा, उसी में खुश रहेगी। स्वदेश राणा के उपन्यास ‘कोठेवाली’ के आत्मकेंद्रित, परस्त्रीगामी पति बदरीलाल की करतूतों के बावजूद पत्नी चांदरानी सोचती है कि बेटों की माँ कभी अकेली नहीं होती। फिर भी कैंसर उसे दबोच लेता है। पत्नी के मरते ही बदरीलाल प्रेमिका बदरुनिस्सा को अपने घर बिठा लेता है। यहाँ पत्नी, उसका मायका, मायके की कीमती चीजें-सब के अस्तित्व पर दोयम दर्जे के प्रश्नचिन्ह लगे हैं। पत्नी को मायके से मिला सतलड़ा हार या गोखड़ू का जोड़ा बेचने में बदरीलाल हिचकता नहीं, क्योंकि यह कौन से उसके खानदानी गहने हैं। ‘कोठेवाली’ के ताहिरा और करन की शादी अंतर्जातीय और अंतर्मजहबी है। यह प्रेम विवाह है, लेकिन पति के सिहासन पर बैठा पितृसत्ताक जागृत है। करन अपना जीवन भरपूर जी रहा है और ताहिरा को उसकी कामेच्छाओं की पूर्ति के लिए रोज़ पिल्ज़ लेने पड़ते हैं। खाला जाहिदा जानती है कि जिससे करन ने शादी की वह ताहिरा नहीं, वह सिर्फ बदरूनिस्सा की बेटी है, बदरीलाल जिसका मुरीद तो था, पर शौहर नहीं।

उषा प्रिंयंवदा के ‘भया कबीर उदास’[6] उपन्यास के पति पुरुष कैंसर पीड़ित पत्नियों के लिए संवेदना शून्य दिखाये गए है। शैलेंद्र राय कैंसर के कारण पत्नी को त्याग परस्त्रीगामी बन जाता है और अपूर्व अपर्णा की मृत्यु का अनुष्ठान करने जाता है और नई दुल्हन लेकर लौटता है।

अर्चना पेन्यूली के ‘वेयर डू आई बिलांग’[7] का विश्वासघाती बेवफा पति सुरेश पूर्व पत्नी से पूर्ववत संबंध रख पत्नी कुसुम की शादी को नरक बना देता है।

उषा प्रियम्वदा के उपन्यास ‘नदी’ में अमेरिका/ बोस्टन की धरती पर तीन बच्चों और तुनक मिजाज, उच्चतम शिक्षित पति के साथ लगभग सामान्य जीवन जी रही, अपने को परिवार का केन्द्र बिन्दु मान रही आकाशगंगा के पाँच वर्षीय बेटे भविष्य की ल्यूकीमिया से मृत्यु हो जाती है। क्योंकि गंगा के दो भाइयों की भी ल्यूकीमिया से मृत्यु हुई थी, इसलिए पति गगनबिहारी सारा दोष गंगा के दूषित रक्त पर मढ़, उसे पीड़ा, आत्म लांछना, अपराध भावना से भर, पासपोर्ट, वीज़ा, गहने, रुपए पैसे-सब कुछ सहेज उसे ठंडे, पराये, गैर भाषाई देश में, बिना वर्क पेपर के छोड़ भारत चला आता हैं। वह स्त्री अंधेरे अकेले घर में, कीमोथैरेपी लाउन्ज में, समुन्द्र किनारे के खारे पानी और तर ठंडी बालू पर तड़पती रहती है - वह अवांछित है, उसकी किसी को जरूरत नहीं। घर-परिवार से विस्थापन उसे आत्महत्या की ओर धकेलता है। विधवा से भी बदतर जीवन भोग रही परित्यक्ता । उत्पीड़न उसके जीवन में नैरन्तर्य बनाए ही रखता है। सखी प्रवीण की मृत्यु के बाद वह उसके पति प्रवीण की दूसरी बीबी बनती है, लेकिन प्रवीण जी को उस पर नहीं, अपने बेटे पर भरोसा है। यहाँ वह पत्नी नहीं अवैतनिक दासी बनकर रह जाती है।

वह खलनायक है। दिव्या माथुर के शाम भर बातें’[8] की पार्टी में बड़े बड़े रहस्य खुल रहे हैं, जैसे सायरा का पति उससे धंधा करवाना चाहता था, दरिंदों की तरह मारता था।

क्रूरता की यह कहानी पीढियों से चली आ रही है। सुदर्शन प्रियदर्शिनी के पारो उत्तरकथा में वीरेन की माँ लीलावती चौदह वर्ष की उम्र में हवेली में आई थी। पति लीलावती की उपस्थिति में हवेली में ही नाच-गाने की महफिलें-मजमे लगाता है और ठकुरानी होकर भी उनकी उपेक्षित, अतृप्त, अपमानित, लहूलुहान आत्मा हवेलीनुमा पिंजरे में फड़फड़ाती, तड़पती, भटकती, अपमानित होती रहती है। अपनी जिद्द, अभिमान और अहं को लेकर बेटा वीरेन अपने से दस वर्ष बड़ी राधा से विवाह करके ही छोड़ता हैं। उत्पीड़न का जहर राधा को रोज़ घूँट-घूँट पिलाया जाता। उसपर लगातार शक किया जाता है। उसके सौंदर्य को नष्ट करने के लिए पति शेविंग किट से कैंची निकाल उसके बाल काट देता है। राधा हर समय डरी, सहमी, भीगी बिल्ली बनी रहती है और अंतत: आत्महत्या कर लेती है। दूसरी पत्नी पारो वीरेन के लिए एक खरीदी हुई गुड़िया है, किराये की आया है। उसने उसे बड़ी हवेली की ठकुराइन और बड़े-बड़े बच्चों की माँ बनाया है, लेकिन पत्नी का दर्जा नहीं दिया है। स्त्री का मुख्य उत्पीड़क समाज और इसकी वह परम्पराएँ हैं, जो लिंग भेद की बात करती हैं, मानती हैं कि पुरुष होने के नाते वीरेन तो राधा को अपने मन में बसा सकता है, लेकिन स्त्री होने के नाते पारो मृत देव को भी याद नहीं रख सकती।

कैराली मसाज पार्लर’[9] में अर्चना पेन्यूली बताती हैं कि पूरे विश्व में, हर महाद्वीप में, सभी सभ्य-असभ्य देशों में पितृसत्ताक का ही साम्राज्य है। स्त्री को पति पुरुषों द्वारा उत्पीड़ित ही किया जाता है और इस जंग में औरत अकेली ही है। मसाज थैरेपिस्ट, बॉडी वर्कर, कंप्यूटर विशेषज्ञ, जल परी, नैन्सी का पहला पादरी/ धर्मगुरु पति अब्राहम भारत में रहे या अफ्रीका में-अपने पर-स्त्री सम्बन्धों से, दांपत्य की नैतिकता का अतिक्रमण करके नैन्सी को अपमानित-उत्पीड़ित करने से बाज़ नहीं आता। दूसरा डेनमार्क से सभ्य देश का पति लार्स हिंसा के मानसिक विकार से पीड़ित/ कुंठित है। वह उस पर हाथ उठाता है, थप्पड़ मारता है, गालियाँ बकता है, बाल खींचता है, बांह मरोड़ता है, धक्के देता है, जूते चलाता है, लहूलुहान करता है, मुँह पर थूकता है, अस्पताल पहुंचा देता है। तीसरा मार्को भी उत्पीड़न में कम नहीं है। डेनमार्क के महिला आश्रय गृह की 21 से 65 वर्ष की सभी स्त्रियाँ इसी त्रासदी का शिकार हैं। लेबनान से आई इक्कीस वर्षीय जन्नत का पति उसे वेश्यावृत्ति में धकेलने का मंसूबा लिए है। मना करने पर पीटता है, सुलगती सिगरेट से दागता है, स्टोव से चिमटा गरम करके उस पर बरसाता है। पाकिस्तान की बेनज़ीर का पति शराब पीकर पीटता भी है और शराब के लिए सारे पैसे/ बचत छीन लेता है। घाना की अबीना का पति उसे डायन या चुड़ैल कह कर पुकारता है। सिख महिला जसबीर का पति उसके पेट में छुरा घोंप देता है। नानी दादी बन चुकी बासठ वर्षीय फारसी महिला फिरोज़ा दरिंदे पति के कारण इस पनाहगार में है।

सुधा ओम ढींगरा के दृश्य से अदृश्य का सफर में डॉ. लता तीन स्त्रियों के त्रासद, उलझे जीवन का चित्रण कर रही है- मध्यवर्गीय नर्स, उच्च मध्यवर्गीय सायरा और उच्चवर्गीय तेलगू युवती- सभी एक सी भयंकर विसंगति से जूझ रही हैं। हर स्त्री प्राणघाती वेदना से गुजर रही है। दक्षिण भारतीय लड़की का पति उसका रोज़ बलात्कार करता है, क्योंकि पति जानता है कि वह युवती विवाह से पहले किसी ओर युवक से प्रेम करती थी। उसे पहले दिन ही बता दिया जाता है कि वह लव की नही लस्ट की चीज़ है।

अनिल प्रभा कुमार के‘सितारों में सूराख’में जय खलनायक नहीं है, लेकिन नायक या महामानव भी उसे नहीं कह सकते। सिर्फ तर्जनी उठाकर पत्नी जसलीन या बेटी चिन्मया की बात काटने का अचूक अस्त्र उसके पास है। चाहे पत्नी का दूर वाशिंगटन में रह रही बचपन की सहेली से मिलने का अनुरोध हो या बेटी का समीर खान के साथ हाई स्कूल की प्रोम डेट पर जाने अनुरोध।

पिता, बेटी का प्रथम संरक्षक पिता भी हर बार नायक नहीं होता। सुदर्शन प्रियदर्शिनी के ‘पारो उत्तरकथा’ में राधा के लिए देवदास इतना पोजेसिव रहा कि बेटी कंचन की उपस्थिति भी बर्दाश्त नहीं कर पाता और उसे ननिहाल भेज दिया जाता है बेटी कंचन को माँ राधा से, उसके वात्सल्याधिकार, अभिभावकत्व, संरक्षण से वंचित करना एक क्रूर पिता द्वारा किया जाने वाला भयंकर उत्पीड़न ही है। बाज की तरह पिता ने उसकी सारी खुशियाँ दबोच रखी हैं। उसके मन में पिता की छवि एक आततायी सी आक्रामक और नृशंस है। पिता द्वारा माँ का स्थान दूसरी औरत को देना भी कंचन को वितृष्णा से भर देता है। शोभना यानी वीरेन की बहन के बारे में सुदर्शन प्रियदर्शिनी ने अधिक नहीं लिखा, लेकिन पिता की बेरुखी और आत्मकेंद्रण ने उसे तिरस्कृत बच्चे का जीवन ही दिया। महेन की प्रेमिका दिव्या का पिता अपने राजपूती गौरव के कारण बेटी की शादी महेन से नहीं करता और वह पिता की इच्छा से हुई शादी को नकार दूसरे दिन ही पति का घर छोडकर चली जाती है, किसी को नहीं मालूम कि वह कहाँ है। पिता के जातीय भेद-भाव एक किशोरी को त्रिशंकु बना देते हैं।

उषा प्रिंयंवदा के ‘नदी’ की आकाशगंगा के पास न पति है, न प्रेमी, न संतान, न माँ-बाप। सोचती है-उसके पास दो फ्लैट हैं, एक में रहेगी और एक को किराये पर देकर अपना गुजारा कर लेगी। लेकिन उसके वकील कज़िनज़ उसके दोनों फ्लैट्स पर कब्जा जमा लेते हैं। सुषम बेदी के ‘पानी केरा बुदबुदा’ में अमेरिका में रह रही प्रिया का भाई उससे पूछे बिना, उसे बताए बिना उसका दिल्ली वाला घर बेच देता है।

अपने कोख जाए, अपने बेटों ने भी अस्तित्व की खोज में निकली स्त्री की वेदनाओं से आँखें मूँद रखी हैं। अपनी खुशी की तलाश में भटक रही स्त्री नैतिकता के मुखौटे नहीं लगा सकती। नियति ने नैन्सी द्रोपदी का दूसरा संस्कारण बना दिया। वह कैनेडा बेटे जोशुआ के पास आती है, पर महसूसती है कि बेटा उसके पास होकर भी कितनी दूर है। अपने बेटों ने भी उसे कोसने से नहीं बख्शा। जोशुआ अकसर गुनगुनाता रहता है, “जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा लेते हैं लोग---एक चेहरे पर कई चेहरे चढ़ा लेते है लोग।” \छोटा बेटा नील भी माँ के पास नहीं पिता मार्को के पास रहना पसंद करता है। जबकि माँ की स्थिति यह है-“कोई हमदर्द नहीं दर्द मेरा साया है। हंसने की चाह ने कितना मुझे रुलाया है।“

पितृसत्ताक का कोई पक्ष नहीं, जिसने इस औरत का दमन न किया हो, छला न हो । सुधा ओम ढींगरा के‘नक्काशीदार कैबिनेट’ में नाना और मामा के षडयंत्रों और दुराभिसंधियों का शिकार हो सोनल शादी के जाल में फंस अमेरिका पहुँचती है । मंगल चाचा अपनी ही भतीजी मीनल से दुष्कर्म करवा उसकी हत्या करवा देता है।

नक्काशीदार कैबिनेट का सुलेमान बलदेव बन मानव तस्करी का धंधा करता है। वह शादी के नाम पर युवतियों को विदेश लाता है और उन्हें वेश्यावृति में धकेल अगली शादी में जुट जाता है। दिव्या माथुर के ‘शाम भर बातें में बीच पार्टी के ही घनश्याम प्रिया के रेप की कोशिश करता है।पारो उत्तरकथा में देव का पिता उसकी प्रेमिका पारो को परकीया करार देता है। दृश्य से अदृश्य का सफर में डॉली को नशीला पानी पिला कर उसके दो देवरों और जेठ द्वारा बलात्कार किया जाता है। ससुर भी इस षड्यंत्र में, कुकृत्य में, साजिश में पूरी तरह शामिल हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है कि उसने कभी उस आदमी से शादी से इंकार किया था, जो आज उसका जेठ है।

यह स्वनिर्मित, स्वयंसिद्ध नायक है। उसे आप चुनौती नहीं दे सकते। उसके पास पितृसत्ताक के पुष्ट नियम-सिद्धान्त हैं। सिर पर परिवार और समाज का हाथ है। अपनी उच्छृंखलताओं, क्रूरताओं का औचित्य सिद्ध करने की दबंगता है । वह कुछ भी हो सकता है-धीर प्रशांत, धीरललित, धीरोदात्त, धीरोद्धत्त -लेकिन मनुष्य नहीं। शराबी-धर्मगुरु-परस्त्रीगामी, जमीदार-नौकरीपेशा, देशी-विदेशी, स्थानीय-प्रवासी, उच्चशिक्षित, पति-प्रेमी, भाई-पुत्र, चाचा-नाना-मामा सभी के पास पितृसत्ताक का रक्षाकवच है। स्त्री जीवन भर लहरों की तरह पत्थरों से सिर पटकती रहती है, लहूलुहान होती रहती है।

संदर्भ:
[1] स्वदेश राणा, कोठेवाली, अभिव्यक्ति,
[2] सुदर्शन प्रियदर्शिनी, पारो उत्तरकथा,
[3] उषा प्रियम्वदा, नदी, राजकमल, दिल्ली, 2014
[4] सुधा ओम ढींगरा, दृश्य से अदृश्य का सफर, शिवना, सीहोर, 2022
[5] अनिल प्रभा कुमार, सितारों में सुराख, भावना, दिल्ली, 2021
[6] उषा प्रियम्वदा, भया कबीर उदास, राजकमल
[7] अर्चना पेन्यूली, वेयर डू आई बिलांग, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, 2010
[8] दिव्या माथुर, शाम भर बातें, वाणी, दिल्ली,
[9] अर्चना पेन्यूली, कैराली मसाज पार्लर, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, 2020

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