कविता: सूखी धरती

जितेन्द्र कुमार

- जितेन्द्र कुमार


नागदा-रतलाम की जटिल पेयक  समस्याएँ, 
सूखी चट्टानी  धरती  और हैं प्यासी   गायें।
भरने भूखे  पेट-औ-तृषित  सुत कण्ठ की,
मटिले चट्टानों पर ढुलकती श्रांत-क्लांत माएँ।

हैं जो शोभा घर की, ऐसी नव वय किशोरियाँ,
देखी जातीं लिए वनों में झुण्डों की बकरियाँ ।
या तो जबरन वा भरने पेट को, गँवा जातीं निज तन,
है बाबुल समझता कि गई हैं वे लाने लकड़ियाँ।
             
अनायास ही झुक जाती दृष्टि देख व्यथा इनकी,
नहीं हो सकते वे अच्छे मानव, नम हो जाए न पलक जिनकी।
है आशाएँ और विश्वास उन सदनवीरों से, जो
कर सकें सार्थक  जीवन और मिटें शूल इनके तन की।

न कर सको कुछ तो, कर दो बस इतना ही,
मिले जल सबको, चाहे किसको कितना ही।
शासन-ओ-प्रशासन से भी है करुण गुहार मेरी,
कि करें मदद उन व्यथितों की, चाहे हो सके जितना ही।'
***

वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर, उ०प्र०,
चलभाष: +91 945 250 8522; ईमेल: jksir1988@gmail.com

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