प्यार का कारवाँ: उपन्यास - रोशनी का पहरा (आरती गोयल 'लोकेश')

उपन्यास समीक्षा: कौसर भुट्टो

उपन्यास: रोशनी का पहरा
लेखिका: आरती गोयल लोकेश
मूल्य: ₹ 300.00
पृष्ठ संख्या: 178
प्रकाशक: हिंदी साहित्य निकेतन, बिजनौर (उत्तर प्रदेश)
ISBN: 978-93-84033-40-8

लेखक डॉ आरती गोयल जी अपने उपन्यास में लिखती हैं कि जीवन के सफर में हम अकेले नहीं बल्कि एक कारवाँ का हिस्सा हैं और यह कारवाँ समय-समय पर बदलता रहता है।

आरती गोयल लोकेश
उपन्यास 'रोशनी का पहरा' प्यार का  कारवाँ है। कहानी की मुख्य पात्र रोशनी प्यार के समुंदर में गोते लगाते हुए कभी डूबती है कभी उभरती है परंतु किसी और के प्यार को मंजिल तक पहुँचा कर उसे बहुत सुकून मिलता है। उसे जिंदगी के विभिन्न पड़ावों पर प्रेम के विभिन्न रूप देखने को मिलते हैं और उन्हें दर्शाने का अलग-अलग तरीका भी। यह डॉ आरती जी का पहला उपन्यास है परंतु इसमें उनका लेखन अनुभव साफ झलकता है।

यह उपन्यास 10 भागों में विभाजित है और हर भाग एक अलग कहानी कहता है परंतु इन सभी कहानियों के तार एक मुख्य कहानी से जुड़े हैं। कहानी की मुख्य पात्र ऊष्मी संस्कारी, समझदार और सहयोगी है और एक अंतर्द्वंद से जूझ रही है।

कहानी के दूसरे मुख्य पात्र दिवित के लिए एक और जहाँ सहानुभूति होती है वही दूसरी और उसके द्वारा किए बलिदान पर मन नतमस्तक हो उठता है। कहानी के अन्य पात्र प्रभाकर जो ऊष्मी के पति हैं, अपनी भावनाएँ ज्यादा व्यक्त नहीं करते परंतु अपनों की परिधि से बाहर निकलकर बिना कहे ऊष्मी के सहयोगी बन जाते हैं। कहानी के अन्य दो पात्र किरण और गगन एक दूसरे से असीम प्रेम करते नजर आए हैं फिर भी अपनों के लिए अपने प्यार को हारने के लिए तैयार हैं।
 
कौसर भुट्टो
आपकी विविध विषयों पर अच्छी पकड़ को देखकर मुग्ध हूँ, चाहे वह लंदन और केदारनाथ के भुगोल का विवरण हो या गुर्दे की बीमारी का विज्ञान। हर विषय को आपने इतने विस्तार और रोचक ढंग से बताया है कि मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञान भी बढा।

हर भाग में प्रकृति का अलग-अलग तरह से विवरण मोहित करता है, जैसे- "सूरज की किरणें कभी केसरिया रंग की चुनर बन जाती है कभी सिपाहियों की भांति धरा की पगडंडियों को बुहारा करती हैं कहीं रविराज अपनी सहस्त्रबाहु रश्मियों को समेटने को आतुर है तो कहीं यह सांझ की तिरछी किरणें घोसले में बैठे नवजात बच्चों का केसर से नहला कर अभिषेक करती हैं"।

कोई भी दृश्य और संवाद वास्तविकता से परे नहीं लगता तथा प्रेम की इतनी परिभाषाएँ एक साथ शायद ही कहीं पढ़ी हैं। प्रेम के लिए वे लिखती हैं "प्रेम हर किसी के जीवन में एक अलग रूप में घटित होता है। कितनी अलग अलग परिस्थितियाँ और कितनी अलग प्रस्तुतियाँ। प्रेम एक ही होता है पर उसके रूप हजारों होते हैं। कितना विशाल होता है यह प्रेम और इस प्रेम की भावना। प्रेम कब, कहाँ और कैसे उदित हो जाए यह कोई नहीं जानता।"
"समाज और परिवार के कायदे कानून प्रेम के चारों और पहरा बिठा भी दे तो भी प्रेम की धारा अपना मार्ग बदल सकती है, गंतव्य नहीं। उसके चंचल बहाव‌ में शांति और गंभीरता तो आ सकता है, ठहराव और परिवर्तन नहीं। प्रेम प्रतीक्षा में उत्तेजना का त्याग कर सकता है, धीरज धर सकता है पर विमुख या उदासीन नहीं हो सकता।"

उपन्यास में नारी जीवन की सामाजिक व्यथाओं की ओर ध्यान इंगित करते हुए वे सवाल पूछती हैं कि "क्या स्त्री के अरमानों की कब्र पर ही गृहस्थी की बुनियाद संभव है क्या दो मनुष्य साथ-साथ हाथ पकड़कर आगे नहीं बढ़ सकते, जरूरी है कि एक को गिरा कर ही दूसरा आगे बढ़े?"

एक और जगह वे लिखती हैं कि "कुछ तो प्रकृति ने हीं औरत को ऐसा बनाया कि पुरुष की तुलना में शरीर से कमजोर, बंधनों से घिरी निग्रहों से लदी और वंश की मान मर्यादा के ताज की वाहिका। फिर उत्तरदायित्व की लंबी कतार- गर्भधारण, संतान को जन्म, उसका पालन पोषण, उसकी समस्त जिम्मेदारियों का वहन, संतान का विवाह भी हो जाए तो स्त्री को कोई आजादी या राहत नहीं।  कुदरत का यह कहर हम औरतों पर क्या कम था कि फिर समाज ने ऐसे कायदे कानून बनाए की जीवन भर गुलामी करने का अमर पट्टा औरत के नाम लिखवा दिया गया।"

पति और प्रेमी की तुलना करते हुए वे लिखती हैं  "इंसान तब तक ही किसी चीज की प्रशंसा करता है जब तक वह उसकी अपनी नहीं हो जाती। अपनी हो जाने के बाद वह औरों के मुंह से तो प्रशंसा सुनना चाहता है पर स्वयं अपने भाग्य को सराहना भूल जाता है। पति नामक प्राणी तो अक्सर यह भूल जाते हैं कि उनकी पत्नी जो कि उनकी अपनी है वह उनकी संपत्ति से कहीं अधिक और ऊपर एक जीती जागती इंसान है। अपने पति से तारीफ के दो मीठे बोलों के लिए वह तरसा करती है।बाहर वालों की तारीफ की उसे परवाह नहीं होती।",‌

स्त्री अगर पढ़ी लिखी हो तो अपने परिवार को मुश्किल समय से उबार सकती है। स्त्री शिक्षा कितनी जरूरी है इस बात को समझाते हुए वे लिखती हैं "उस जमाने में लड़कियों को पढ़ने लिखने ही कहाँ दिया जाता था। उनका तो जन्म ही जैसे शादी करने और दूसरे का घर बसाने के लिए होता है। लड़कियों की शिक्षा की कोई अहमियत नहीं थी‌ यहाँ बेटी की कमाई खाने से बड़ा पाप कोई और नहीं समझा जाता। जब बेटी से नौकरी ही नहीं करवानी तो उसे पढ़ाने लिखाने की क्या जरूरत है। पढ़ाई में समय बर्बाद करने की बजाय ज्यादा अच्छा हो कि वह घर के कामकाज सीख जाए और पराए घर जाने पर नाक ना कटे। नाक तो शायद कटने से बच गई पर जिंदगी कटनी दुभर हो गई।"

उपन्यास में दृश्यों का ऐसा सजीव चित्रण है मानो मन मस्तिष्क में चलचित्र चल रहा हो और स्वयं उस पल के साक्षी रहे हों। इसके अलावा उपन्यास में जीवन के विभिन्न पक्ष, पिता का प्यार, शिक्षा का महत्व, नौकरी में परेशानी और भाई भतीजावाद का भी बखूबी उल्लेख किया है। बीच-बीच में गीतों,  शायरियों और कविताओं का समावेश गागर में सागर भरता है और कम शब्दों में परिस्थितियों तथा पात्रों कि मनोस्थिति को बयान करता है।

कहानी बड़ी रोचक है और मन कहानी के बहाव में बह चलता है। आरंभ से लेकर अंत तक रोचकता बनी रहती है कहीं भी कोई भी दृश्य अनावश्यक नहीं लगता।

आशा करती हूँ कि यह उपन्यास पाठकों को बहुत पसंद आएगा और आपको इस उपन्यास के लिए बहुत-बहुत बधाई।
***

समीक्षक आत्म-परिचय: मैं कौसर भुट्टो मूलतः बीकानेर, राजस्थान की रहने वाली हूँ, गत 4 वर्षों से अपने परिवार के साथ दुबई में रह रही हूँ। मैं सूक्ष्म जीव विज्ञान में स्नातकोत्तर हूँ और शिक्षा में स्नातक किया है। दुबई आने से पूर्व 3 वर्षों तक नोएडा में विज्ञान अध्यापन कार्य किया है। वर्तमान में सामायिक परिवेश पत्रिका के अंतर्राष्ट्रीय अध्याय की उप संपादक तथा महिला काव्य मंच दुबई की सचिव हूँ। मेरे दादाजी कवि मोहम्मद सदीक भाटी हिंदी और राजस्थानी भाषा के जाने-माने कवि थे। दिल्ली नेशनल लाइब्रेरी में उनकी कविताओं की 13 अंतर प्रांतीय भाषाओं में अनुवादित पुस्तकें है। राजस्थान शिक्षा बोर्ड के कक्षा बारहवीं के ऐच्छिक विषय राजस्थानी के पाठ्यक्रम में भी उनकी कविताएँ सम्मिलित हैं।

UAE से प्रकाशित हिंदी की पहली पुस्तक 'सोच' (हिंदी इमाराती चश्मे से) में मेरी कविता को स्थान मिला। स्वतंत्रता के 75वें वर्ष के उपलक्ष्य पर, मेरी कविता को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित पुस्तक `भारत काव्य पीयूष` के लिए चुना गया, जिसमें 8 देशों के 115 कवियों का चयन किया गया था। भारतीय काउंसिल आवास न्यूयॉर्क से निकलने वाली मासिक पत्रिका अनन्य में मेरी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं।

 कई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय ऑनलाइन कवि सम्मेलनों का संचालन किया तथा भाग लिया। कई पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। विभिन्न प्रकार के कवि सम्मेलनों में लगातार सक्रिय रहती हूँ। अपने दादाजी की कविताओं के प्रचार प्रसार में लगी हूँ, जन-जन तक उनकी कविताएँ पहुँचाना चाहती हूँ।
***


लेखिका परिचय: डॉ. आरती ‘लोकेश' दो दशकों से दुबई में निवास करती हैं। तीन दशकों से शिक्षण कार्य करते हुए यू.ए.ई. विद्यालय में वरिष्ठ प्रशासनिक अध्यक्ष के पद पर नियुक्त हैं। अंग्रेज़ी-हिन्दी दोनों विषयों में स्नातकोत्तर होने के साथ ही हिन्दी में गोल्ड मैडलिस्ट हैं। रघुवीर सहाय पर पी.एच.डी. की है। इनके 3 उपन्यास, 3 कविता-संग्रह, 2 कहानी-संग्रह, 1 यात्रा-संस्मरण, 1 शोध ग्रंथ व 1 कथेतर गद्य मिलाकर 11 पुस्तकें प्रकाशित हैं।

इनके समग्र साहित्य पर भारत और विदेश के विश्वविद्यालय में विद्यार्थी शोधरत हैं। 'अनन्य यू.ए.ई.' पत्रिका की मुख्य संपादक होने के साथ-साथ वे अमेरिका, यू.ए.ई. तथा भारत की कई पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं तथा शोध जर्नल की संपादक, सह-संपादक तथा उपसंपादक भी हैं। टैगोर विश्वविद्यालय भोपाल के विश्वरंग यूएई की निदेशिका तथा विश्व हिंदी सचिवालय मॉरीशस के हिंदी दिवस यूएई की समन्वयक होने के अलावा शोधार्थियों को सह-निर्देशन का कार्यभार भी सँभाला हुआ है।

इन्हें ‘महाकवि प्रो॰ हरिशंकर आदेश साहित्य सम्मान’, ‘रंग राची सम्मान’, 'शब्द शिल्पी भूषण सम्मान', 'प्रज्ञा सम्मान', ‘निर्मला स्मृति हिन्दी साहित्य रत्न सम्मान’ तथा ‘प्रवासी भारतीय समरस श्री साहित्य सम्मान’ से नवाज़ा गया है। वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स लंडन, भारतीय कौंसलावास दुबई, अंतर्राष्ट्रीय काव्य प्रेमी मंच, वैश्विक हिंदी संस्थान ह्यूस्टन, यू.एस.ए. द्वारा प्रशस्ति-पत्र प्रदान किया गया है। हिन्दी साहित्य में योगदान के लिए ‘शुभ संकल्प एवं हुनर फ़ोक्स एकेडेमी’ तथा शिक्षा क्षेत्र में योगदान के लिए ‘शिक्षा रत्न’ शिक्षिक आगाज़ संस्था से तथा ‘हिंदुस्तानी भाषा अकादमी’ द्वारा सम्मानित किया गया है। रेडियो ‘मेरी आवाज़’ द्वारा विश्व की 101 प्रभावशाली महिलाओं में नाम आया है। कविताएँ ‘माँ तुम मम मोचन’, ‘तुम बिन जाऊँ कहाँ’, ‘राधा का ध्यान योग’ तथा कहानियाँ ‘संथारा उत्सव’, 'फ़िबोनाची प्रेम' व ‘श्याम वर्ण के दर्पण’ पुरस्कृत रचनाएँ हैं। उनकी अनेक कविताएँ 'कविता कोश' पेज पर संकलित हैं।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।