काव्य: अंकित पाण्डेय

1- घर दूर है साहब


घर बहुत दूर है साहब
5 मील पैदल
1 कोस छकड़ा
तो आधा साँस के सहारे जाएंगे
ठंड है
बदरी ऊपर सूखे पत्तन सी बिछी है
घर की बाड़ी म कपास लगा है
रोग लगा है साहब,
पानी के कुआँ
माटी के बड़ा तालाब
और हनुमान जी जैसा सीना चीरे नदी
बैठी है, बैठी है कि बारिश
अमीरन के बाथरूम के शॉवर से निकल
बूँद-बूँद बरस जाई
त मन तृप्त होइ जाई,
घर चली, घर दूर है साहब,
खेत के सीना फटे हैं
कौन वैसलीन, कौन बोरोप्लस लगाई
पाँव के बिमाईं होय त भर भी जाय
हफ्ता से बिजली न आयी
केरोसीन से जले दियासलाई
बड़का कहत रहें
तोहार खेत बटाई म बाँटा
नहीं त ना मिली निमक न मुट्ठी भर आटा
घर तो है घर है
ज़िन्दगी भी नासूर है साहब,
घर चली, घर दूर है साहब,
कहे रहे आप लोग कि विकास आएगा
शहर तक ही पहुंचा
गाँव किसके साथ आएगा
बड़का लोग के कुर्सी म सुने थे
बड़ा जोर है साहब
तनिक बात हमरी भी रखियो
घर दूर है साहब,
किसान हम भी हैं
हमार भी भरतार है
महीना भर से बैठा है
न चिट्ठी है, ना ही तार है,
बात तो निकल जात है बस बात म साहब
भूख नहीं मिट रही सूख भात म साहब
गए रहे दिल्ली कि मिलिहैं हुजूर साहब
किसान, मजदूर हैं हम, घर दूर है साहब।।
***


2- युद्ध

युद्ध कितने भयावह होते हैं,
आते हैं, मारते हैं, चले जाते हैं
और अपने पीछे छोड़ जाते हैं
लाशों के अम्बार,
चोट खाये आधे अधूरे शरीर,
भूखे पेट, रोते बिलखते परिवार,
कर जाते हैं बच्चों को अनाथ
भर जाते हैं जीवन भर की सारी रातें
अंदर, दिमाग़ में,
मिसाइलों के पड़े टुकड़ों से
नहीं बन पाती है एक भी थाली,
बम के चिथड़ों से
नहीं बनाए जा सकते साज-ओ-सामान,
ग्रैनेड के छल्ले से
घर की चाबियाँ नहीं रह पातीं इकट्ठा,
गिरी छतों के नीचे से
नहीं उठाए जा सकते दबे कुचले सपने,
चिथड़े हुए सिरों से
नहीं सोचे जा सकते साइंस के इन्वेंशन,
आधे अधूरे हाथों से
नहीं उठाए जा सकते गुरुत्वाकर्षण के विपरीत
अपने हक़ के निवाले,
यूद्ध हमसे सब ले जाते हैं,
युध्द हमसे दूर हमें भी ले जाते हैं,
युद्ध जब-जब होते हैं
वह मात्र युद्ध नहीं
एक सदी का विनाश होते हैं,
जिसकी कल्पना न इतिहास कर पाया है
और आगे चलकर ना ही कोई खगोलविद,
इतिहासकार कर पायेगा,
युद्ध तो एक काला दाग़ है,
जो जितना दूर रहे
उतना सुंदर होता है,
जैसे नागफनी के बीच खिला
नागफनी का ही फूल।।
***


3- मेह

मेह ये मन मोहते गिरते झरा-झर
मेह के अंतस गए हैं फूल भीतर
रवि छुपा है गर्जना से ओटरे में
दूब के अंकुश निकलते हैं धरा पर

हाय कितना है प्रतिम आकाश देखो
श्यामवर्णी अम्बुदों के पास देखो
जा रहे हैं कोटरों को लौट पंछी
हाए बरखा की सुखद सी आस देखो

तम हुआ कम, भीगता मन और उपवन
नाचती कत्थक धुनों में मोरनी वन
प्राण भरती जा रही मिट्टी सुंगंधित
जी रहा कवि लिख रहा सुंदर समागम

सींचती हैं बाद बरखा कोयलें फिर
कूजती हैं आम की शाखों से घिर-घिर
क्या कहूँ मैं बस इसी को जी रहा हूँ
वो भी ऐसे ज्यों कहीं झरने रहे झिर।।
***


4- उदास कविताएँ

उदास चेहरों के साथ आती हैं
हम उदास कविताएँ पढ़ते हुए
देख सकते हैं उन चेहरों को
जो मुरझाए फूल की तरह हो जाते हैं
हम पढ़ सकते हैं उन कविताओं में
उनकी पीड़ाओं को
महसूस कर सकते हैं उनकी फटी जेबें
पर अफसोस
हम उस उदासी को उस वक़्त में जा कर
मुस्कान में नहीं बदल सकते
इसलिए हमेशा
हम उदास कविताओं को पढ़ते हुए
उन्हें जीने लगते हैं
और उसी उदासी के साथ
झूठों के पुलिंदों के उस पार
जी लेते हैं थोड़ा सा सच भी।।
***


5- तुम नहीं जान सकते

कवेलू वाली छत के नीचे सोने का सुख,
तुम्हारे लिए धूप से अलग आ रही रोशनी
मात्र एक ऑब्जेक्ट है,
कैमरे में क़ैद करने के लिए,
लेकिन खपरैल की पोर से छन कर आती
रोशनी की एक रेखा
मेरे लिए है यह जानने का कारण
कि किस तरह धूल के कण
हवा में कब तक रहते हैं,
धुएँ का आकार चूल्हे से निकल कर
किस तरह और किस गति से बदलता है,
तुम नहीं जान सकते
सीमेंट की ढाली गयी छतों के भीतर
गिट्टियों का क्रमों में जमना,
लेकिन खपरैलों को ऊपर से देख सकते हो
और जान सकते हो वह क्रम,
उसमें लगाया गया समय,
उसके लिए जलाई गई शारीरिक ऊर्जा के बारे में,
तुम विज्ञान पढ़ सकते हो पक्की छतों के नीचे
परंतु उसका असल प्रयोग
बिना किसी बैरोमीटर या बीकर
या फ़िर गैलन के कर सकते हो
कवेलू की छत के नीचे बड़ी ही सहजता से
मुझे लगता है
मरने से पहले तुम्हें गाँव जीना चाहिए,
गाँव की सहजता में शहर का आधुनिक विज्ञान
गुलाटियाँ खाता हुआ
खपरैलों की पोरों में ज़िन्दा मिलेगा
इतना ज़िन्दा कि उसमें तुम भी जी उठोगे।।
***


6-छतरी

मैं बरसात के बाद
टाँग देता हूँ छतरी को खिड़की किनारे,
एक-एक बूँद कब झर जाती है
पता नहीं चलता,

पिता भी उसी छतरी की तरह हैं,
उनके भीतर-बाहर से
कब झर जाती हैं सुख-दुःख की बूँदें,
पता नहीं चलता,

मैं सोचता हूँ
हर पिता
बरसात की छतरी जैसे क्यों होते हैं!!
***

7- आकार

मैंने भरा अंजुली भर पानी
दोनों हथेलियों को एक-एक आकार दे कर,
एक-एक अंजुली पानी ऐसे था
मानो चिड़िया की चोंच में भर गयी हो नदी,
दोनों हथेलियों को मिला देने से
मालूम पड़ रहा था
जैसे वह अंजुली नहीं बल्कि पूरा समुद्र हो,
मैंने हाथों में लिए फूल,
दोनों हाथों में,
हाथों में लिए वह फूल ऐसे लग रहे थे
मानो मेरे हाथ नहीं वह पूरा वृक्ष हों,
जिन पर खिल आए हैं रंग बिरंगे स्वप्न बीती रात के,
मैंने लिया तुम्हारा हाथ जब मेरे हाथों में
लगा जैसे रख दिया गया हो गर्मी में
बर्फ का ठंडा स्पर्श
जिससे देह का तामपान भाँपा जा सकता है
उसकी पिघलती अवस्था को देख कर,
अब डाला गया पानी पुनः
तुम्हारे और मेरे हाथों के बीच,
फूलों को पकड़ाया गया,
दोबारा सींचा गया उसी पानी से हाथों को
जहाँ, मेरे हाथों में जो कि एक वृक्ष थे
उन्हें सहारा मिला,
जो तैयार थे, खिलने को एक और बार,
जो तैयार थे, समुद्र जीवन भर रहने को,
जो अब नहीं होना चाहते थे
गाँव का सूखा कुआँ, पोखर और प्यास को तरसती
किसी चिड़िया की चोंच,
तो आओ, भरते हैं मिलकर अंजुली भर पानी
अपनी-अपनी दोनों हथेलियों को
एक-एक आकार दे कर,
जो अंजुली नहीं बल्कि पूरा समुद्र बन जाएँ
आजीवन, तुम्हारे साथ।
***

भोपाल, मध्यप्रदेश 
सम्पर्क: 7389042508

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