कहानी: संथारा उत्सव

डॉ. आरती ‘लोकेश’

आरती लोकेश


“अक्का!” 
आज सुबह घर से निकल कार पार्किंग तक पहुँची तो पड़ोसी पिड़िशानाथ अय्यर की पत्नी तारामणि ने आवाज़ लगाई। 
आवाज़ बहुत स्पष्ट नहीं थी, पहचानती भी कम थी किंतु स्वर की दिशा से अनुमान था कि यह बाएँ हाथ के बंगले से आती खनखनाती आवाज़ मुझे ही सम्बोधित है। आस-पास के अन्य बँगलों के बाहर कोई न था। उनके भारी-भरकम स्टील के विशाल गेट की पूर्व ध्वनि से यह आभास था ही कि कोई बंगला नं. 5 से बाहर आया है। मैंने आवाज़ की दिशा में गर्दन घुमाई। तारा भाभी कांजीवरम की लाल साड़ी में लिपटी, नवरत्न का दोहरा हार व झुमके से सजी-धजी, मोंगरे के गजरे की सुवास में महकती, शिखरासीन लोकप्रिय तारिका-सी मादक चाल से लहराती बहुत पास आ गई थीं। मैं मंत्रमुग्ध-सी उनके अनघ सौंदर्य को एकटक देखती कार के खुले दरवाज़े को झटके से बंद कर सीधी खड़ी हो गई। 
मैं प्रत्युत्तर में मुस्कुरा दी। नमस्कार की मुद्रा में हाथ स्वत: जुड़ गए। उनके सम्बोधन का अपनापन मुझे उनके व्यक्तित्व के कुछ और निकट ले आया था। तमिळ भाषा का मेरा ज्ञान शून्य या दशमलव में आँकने योग्य था। लेकिन तारा भाभी का मुझे ‘अक्का’ पुकारना हृदय स्पर्श कर गया। 
बाएँ हाथ के सहारे से उनकी बलखाती कमर पर टिकी, नारियल वृक्ष के पत्तों से बनी सुंदर डलिया से उन्होंने एक निमंत्रण पत्र निकाल कर मेरे हाथ में थमा दिया। हिंदी में उनका हाथ तंग था। अधिक तमिळ व कुछ अंग्रेज़ी में उन्होंने मुझसे जो भी कहा, उसमें से काम की बात मैंने पकड़ ली, ‘वडक्किरुत्तल उत्सव’ कंठस्थ कर लिया। इसे याद रखना ऐसे ही आवश्यक था जैसे नवपल्लवित पौधे के चारों ओर बाड़ बनाना। अतिरिक्त अंदर न आए और आवश्यक बाहर न जाने पाए। आमंत्रण संबंधी सारा विवरण तमिळ में लिखा था। उसे स्कैन कर गूगल अनुवाद करने की उत्कंठा होते हुए भी इसके लिए समयाभाव का संज्ञान था मुझे। 
कोडम्वरात्तूर शहर में मेरी बदली को एक माह हुआ था। माइक्रोसॉफ़्ट में बदलियाँ होना स्वाभाविक-सी बात है लेकिन यह बदली मैंने स्वयं निवेदित की थी। इकलौते बेटे शरण्य को  अल्याचातिरुनगर के मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिल गया था। शरण्य को माँ-बाप बनकर पाला था। उसे अपने कलेजे से दूर करना प्राण को तन से निकालने जैसा था। इस शहर में अपना तबादला ही उत्तम उपाय समझ आया। शरण्य ने अपने दोस्तों के साथ होस्टल या किराए पर कमरा लेकर रहने के लिए बहुत हाथ-पैर पटके पर मैंने एक न सुनी। कोडम्वरात्तूर के बाहरी हिस्से में एक एन.आर.आई. का खाली पड़ा बंगला किराए पर जल्दी से मिल भी गया। चाह ने राह बनाकर उस पर खड़ा भी कर दिया। 
पहले दिन टैक्सी से सूटकेस उतारते ही तारामणि अय्यर अपनी नौकरानी के साथ खाने की थाली लेकर उपस्थित हो गई थीं। पिड़िशानाथ भी उनके पीछे ही थे। वे उचक-उचकर जाने किसे ढूँढ रहे थे। शरण्य से तो वे मिल ही चुके थे। घर में उनके मित्र बनने योग्य पुरुष के अभाव को लक्ष्य करते ही वे अपनी मुंड को लपेट मारते हुए अपने घर की ओर मुड़ गए। तारामणि ने मेरा हाथ पकड़ तमिळ में बहुत कुछ कहा जिसका अनुवाद मैंने उनकी सौहार्दता और अपनत्व में कर लिया। उनके लिए ‘तारा भाभी’ का सम्बोधन उसी दिन से आरम्भ हो गया। 
प्राय: कोई उत्सव या पर्व होता था या यह उनका प्रतिदिन का आहार था कि आए दिन एक बड़ी-सी परातनुमा थाली में हम माँ-बेटे के लिए तारा भाभी की सेविका चेराश्री खाना दे जाती। थाली में बिछे केले के पत्ते पर दस-बारह से कम कटोरियाँ कभी न होती थीं। छोटी आकार की खिलौनेनुमा उन कटोरियों में तरह-तरह की बिना तरी वाली दाल-सब्ज़ियाँ हुआ करती थीं। वे हमारी राजस्थानी दाल-सब्ज़ी से पूर्णत: पृथक होती थीं। दाल का दाना साबुत मगर पूरी तरह गला हुआ बारीक कटे हुए नारियल व गुड़ के साथ रहता जो खाने के बाद मीठे की चाह को तृप्त करता था। उन सब्ज़ियों के ठीक से नाम भी नहीं पता थे जिनमें कसा हुआ नारियल अंदर व बाहर विराजा रहता था। मूँग की दाल का पापड़, अचार, पूरी, पोंगल, केसरी, पुट्टू और न जाने क्या-क्या! शरण्य उसे देख उबकाई आने वाला मुँह बनाता, किंतु मुझे वह विशुद्ध मद्रासी खाना बड़ा रास आता।      
शहर से बाहर होने के कारण कोई आठ-दस बँगले ही वहाँ थे। वहाँ का आम रिवाज़ था कि बंगले के बाहर रोज़ाना ताजी रंगोली का आलेखन सजाया जाता। बाहरी दीवार के तले आटे से चौक पूरा जाता। इन सजीले आकर्षक बँगलों के बीच एक, जिसमें हम माँ-बेटे थे और एक और एन.आर.आई. का खाली पड़ा बँगला इस सजावट को धूमिल करते थे। तारा भाभी ने मौका मिलते ही अपनी भाषा में मुझे प्रतिदिन की रंगोली तथा उसके खास डिज़ाइन की महत्ता समझाई। मुझे और मेरी व्यस्तता दोनों को ही वह भाषा अपरिचित जान पड़ती थी। तारा भाभी की बातों पर मुस्कुराने और सिर हिलाने के अलावा मुझे कोई प्रतिक्रिया न आती थी। एक दिन दो-तीन बार उनके द्वारा किए गए ‘ओके? ओके! ओके।’ के अलग-अलग भावों से मिश्रित ‘ओके’ का अर्थ समझ आया कि यह उनके प्रस्ताव के अनुमोदन की पुष्टि के लिए था। इस ‘ओके’ के परिणामस्वरूप अगले दिन चेराश्री ने मेरे बँगले के द्वारे भी उसी रंगालेख की चित्रमाला बना दी। 
“चेची! नेअक्कु!” मन कृतज्ञता से भर गया। अब मेरा सुसज्जित बँगला भी उस एकमात्र निर्जन शृंगारविहीन बँगले को मुँह चिढ़ा रहा था। 
मतलब भी समझ आ रहा था और अंतर भी। चेराश्री मलयाली थी। बहन के लिए दो अलग-अलग भाषाओं के शब्दों से मेरे शब्दकोश में वृद्धि हुई। हम उत्तरवासी तो सभी दक्षिणवासियों को मद्रासी ही कहते समझते थे।  
शरण्य अधिकतर अपने दोस्तों के साथ ही कॉलेज से घर आया करता था। उस दिन दोस्त की गाड़ी गैराज में होने के कारण मैं शरण्य को उसके ‘कस्तूरी मेडिकल कॉलेज’ लेने पहुँची। शरण्य ने अपने बैठने की सीट पर रखा निमंत्रण-पत्र उठाकर पीछे रख दिया। मैंने कार में जी.पी.एस. लगाकर घर की ओर ड्राइव करना शुरु किया। फिर जैसे सहसा उसे कुछ याद आया तो पूछ बैठा, “ये कैसा कार्ड है मम्मी?” 

“पड़ोस वाली तारा भाभी दे गई हैं? कल कुछ उत्सव है उनके यहाँ। तू चलेगा?” मैंने शरण्य के चेहरे के भाव परखते हुए पूछा। 
“नहीं मम्मी, आप ही जाओ। आप ही जीमो उनका सद्या! अप्पम, रसम, पोरियल, कूटू, मुरुक्कू, थायिर पचड़ी, पायसम! एंजॉय सापड़! कॉलेज में भी इडली, उपमा, उत्तपम और दावत में भी साऊथ इंडियन? न बाबा न! मुझसे न होगा।” सब एक साँस में बोल गया वह। 
डैशबोर्ड के शीशे पर उसका इनकारी हाथ ऐसे नाचता दिखा जैसे वह डमरू बजा रहा हो। मैं हँसे बिना न रह सकी। हैरान थी कि यह लड़का मेडिकल कर रहा है या दक्षिण भारतीय व्यंजनों पर शोध!   
“मुझे पता था, तेरा यही रिएक्शन होगा। चल तू मत जाइयो। जैसी तेरी मर्ज़ी। मैं सोच रही हूँ वह पोचमपल्ली वाली ग्रीन साड़ी पहन लूँ। साऊथ इंडियन स्टाइल में ही तैयार होकर जाऊँ।”  
“क्यों? उनके रंग में रंग मिलाना बहुत ज़रूरी है क्या? नहीं तो रंग में भंग पड़ जाएगा?” शरण्य ने छेड़ते हुए कहा। मैंने उसे आँखें तरेरीं। मैं उसकी सुधरती हिंदी से खुश थी। माएँ तो बनी ही उस मिट्टी की होती हैं कि दो-चार बूँदें भी उन्हें सम्पूर्ण गलाने के लिए पर्याप्त होती हैं।  
वह मुझे इसी प्रकार बात-बात पर उलाहने दिया करता है। कभी तो लगता है कि मैं उसकी माँ न होकर भाभी, सहेली या साली हूँ। 
“अपनी खुशी से पहनो मम्मी! दूसरों को खुश करने की मत सोचो।” वह कभी भी बच्चे के बाबासूट से निकल दड़ियल बाबा बन जाता था। 
“हँम्म!” मैंने सहमति जताई और आँखों ने वात्सल्य। 
“वैसे ऑकेज़न क्या है?” वह मेरी खुशी में शामिल दिखना चाहता था। 
“ कोई वडक्किरुत्तल उत्सव है।” मैंने हकलाते हुए यत्न से याद किए हुए नाम का प्रत्यास्मरण किया।  
“...क्या...?” शरण्य जैसे चिल्लाया। उसने पीछे गर्दन घुमाकर बैक सीट पर पड़े कार्ड को ऐसे देखा जैसे वह कोई विषधर हो। 
विस्मय के अतिरेक ने पैर को ब्रेक पर रपटा दिया। सफर को अल्पविराम दे, गाड़ी को साइड में लगाया। मेरी आँखें शरण्य की आँखों में झाँकने लगीं। उसकी साँस धौंकनी-सी चल रही थी। उसे पानी पिलाकर मैंने शांत किया। मेरा खुद का गला सूखने लगा था। 
“मम्मी, तुम्हें पता भी है कि यह उत्सव क्या है? क्या होता है इसमें?” उसका स्वर लड़खड़ाया। 
“नहीं... नहीं तो!” ... “पता तो नहीं” ... “तू जानता है क्या?” … “क्या है ये? बता तो!” ... मैंने प्रश्नों की झड़ी लगा दी। 
“मम्मी!” … वह थूक सटकते हुए बोला, “यह एक क्षेत्रीय रिवाज़ है, जिसमें मरने तक उपवास किया जाता है।”
“क्या...? क्या कह रहा है तू? होश में तो है?” मुझे दक्षिण में ऐसे रिवाज़ की कोई भनक नहीं थी।
“सच कह रहा हूँ। जब मैंने मेडिकल कॉलेज जॉइन ही किया था तब हमारे एक प्रोफ़ेसर के पिता ने यह व्रत किया था। छ: दिन में उनकी मृत्यु हो गई।” उसकी आँखें आतंक से लाल हो गई थीं। 
“संथारा...! आह!” मैंने सिर को झटका। आँखें कस के मींच लीं और सिर को हेडरेस्ट पर टिका दिया। शरण्य ने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया। कौन किसको सँभाल रहा था जाने! कुछ देर में उसने ही चुप्पी तोड़ी। 
“मैं बहुत घबरा गया था। उनके पार्थिव शरीर को कुछ घंटे के लिए कॉलेज में छात्रों के दर्शन के लिए रखा गया था। सभी वहाँ जाकर मृत काया की ऐसे अर्चना कर रहे थे जैसे वह किसी संत-साधु की समाधि हो। वहाँ सब उन्हें इच्छा-मृत्यु का वरदान बता रहे थे।” वह अब तक के दबे भय को उगल उससे मुक्त हो जाने को प्रयासरत था। 
“साल्लेखाना...” मैं बुदबुदाई। आँखें मींचे स्पष्ट देख पा रही थी। 
“हाँ यही! ... यही बताया था मेरे सीनियर ने। ‘वडक्किरुत्तल उत्सव’ मायने साल्लेखाना...। मुझे बहुत दहशत हो गई थी मम्मी!” कहकर उसने मेरे कंधे पर सिर रख दिया। 
शरण्य का चेहरा सफेद पड़ गया था। वह छोटे बच्चे-सा सहम गया था। 
घर पहुँचने तक रास्ते भर कार में हम दोनों के बीच लाश-सी ठंडी चुप्पी पसरी रही। 
‘कौन कर रहा है यह व्रत?’, ‘क्यों कर रहा होगा?’, ‘इतने सम्पन्न परिवार में मृत्यु की चाह?’ क्या पिड़िशानाथ? या उनके घर में कोई और? पर कौन? और क्यों? मेरे सामने एक विस्तृत प्रश्न-पत्र खुला पड़ा था। 
मैं जानती थी शरण्य इस रीति से सम्पूर्णत: अनभिज्ञ था। कोई अपनी इच्छा से मृत्यु का वरण करने के लिए अन्न-जल त्याग दे, यह कैसे हो सकता है। तिस पर उसके घरवाले उसे ऐसा करने दें, रोके नहीं, और भी हैरानी की बात है। पाप है यह, घोर पाप है। आत्मघात है यह। 
रात शरण्य पर निद्रा देवी ने तो कदाचित दया बरसाई भी पर मेरी वीरान आँखों से तो वह रूठी ही रही। कँटीली यादों के पल्लव अनार्द्र मौसम में ही उगते हैं। मेरी शुष्क पलकों में भी स्मृति के अंकुर तैर गए।   
मेरे दादा उमापति तालिंसगार पक्के जैनी थे। सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह पाँचों वचन निभाते थे। अधेड़ावस्था में वे एक जैन भिक्षुओं-साधुओं के मठ में निवास करने लगे थे। युवा आयु में भी उन्हें हास-परिहास में संत बुलाते थे। कदाचित उनका नाम ही संत पड़ गया था। वे भौतिक और सामाजिक बंधनों से परे थे। कैसी भी सम्पत्ति से उन्हें कोई लगाव नहीं था। तृष्णा और लालच तो उन्हें छू भी न गए थे। चालीस की आयु में उनके जैन साधु बनने पर संबंधियों को अधिक आश्चर्य न हुआ। आश्चर्य में डूबे तो घरवाले, जिन्होंने यह न सोचा था कि वे पारिवारिक संबंधों का यूँ क्षण में परित्याग कर देंगे। विवाह का बंधन व पुत्र का स्नेह; क्या रेशा भर भी उन्हें घर से जोड़ कर न रख सका?   
फिर वृद्धावस्था में छ:-सात वर्ष पहले वे अचानक घर लौट आए। घर आए तो तन-प्राण पर संथारा व्रत धारण किए हुए थे। दादी सोमवती ने तो उनके साधु बनने के बाद बिना संथारा ही प्राण त्याग दिए थे। वे यह समाचार जानकर भी न लौटे थे। कहलवा भेजा- ‘सोमवती के जैसा सौभाग्य सबका रहे।’ निश्चित तौर पर एकमात्र पुत्र मेरे पापा ने इस आशीष को वरदान नहीं अभिशाप वर्ग में लिया। दादाजी के इस कृत्य पर कोप करते हुए पापा ने पैंतीस साल निकाले। गाहे-बगाहे वे दादाजी के आचरण को कोस बैठते। क्रोध पिता के साधु बन जाने का था; न-न, ऐसा नहीं था। क्षोभ था कि उनका यह फैसला सिर से माँ का साया भी ले गया और उन्हें अनाथ बना गया। 
कोई जोड़, कोई हिसाब तो अब बाकी न था; जाने अब कौन-सा धागा उन्हें घर बाँध लाया था। उस दिन पिताजी की सेवानिवृत्ति का आनंद-भोज था। नाते-रिश्तेदार बेहद खुश हुए कि बड़े अच्छी घड़ी हुई कि उमापति घर लौट आए। पापा के मन में दादाजी को गलत समझने का मलाल हो आया। उनका घर लौटना और बड़े कष्ट का कारण बनेगा, यह कौन जानता था। 
प्रीति-भोज में दादाजी द्वारा संथारा की घोषणा ने सारी सभा को सन्न कर दिया। अपना जीवन स्वेच्छा से समाप्त करने के लिए क्रमिक रूप से खाद्य पदार्थों के त्याग की सूची भी जारी कर दी। पापाजी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उन्होंने दादाजी को बहुतेरा समझाया किंतु दादाजी को न मानना था न माने। वे जो मानते थे वही दोहराते रहे- 
“साल्लेखाना व्रत एक धार्मिक अनुष्ठान है, जो जीवन के अंत में करना परम आवश्यक है। यह जीवन-मरण की अनुशंसा का उत्सव है। इससे नकारात्मक कर्म का प्रतिफल घटता है, परलोक सुधरता है और मृत्यु का मार्ग विशुद्धता को ग्रहण कर मोक्ष उन्मुख हो जाता है।” दादाजी के विचार प्रवचन की भाँति प्रस्फुटित हो रहे थे। 
वे कब के साधु हो चुके थे। घर छोड़ने की क्रिया तो परिवार को सूचित करने जैसा भर था। पापा सारे काम, सारे रिश्तेदार और दोस्तों को बधाई देता छोड़ दादाजी के पास फसक्का मार बैठ गए।  
“क्या मोक्ष की महत्त्वाकांक्षा अन्य कामनाओं से श्रेयस्कर है? फिर आप कैसे साधु हैं पिताजी! अगर यह चाह अभी भी आपके जीवन और निर्णयों को संचालित करती है? अगर आपको सती के समकक्ष ही होना था तो तब ही क्यों न हो गए जब आपने मेरा इहलोक बिगाड़ा, माँ ने आपके विछोह में प्राण त्यागे?” जो बात पापा को सालती रही थी आज गहरे घाव के मवाद-सी फूट पड़ी थी।   
“संथारा व्रत सती प्रथा से भिन्न है बालक! सती स्त्रियों पर थोपी गई परंपरा है जबकि संथारा इच्छा-मृत्यु की भारतीय संस्कृति है। मत भूलो कि महाभारत काल में गंगापुत्र भीष्म ने भी अपनी इच्छा से देहत्याग किया था।” दादाजी के शब्दों में दृढ़ विश्वास था। 
साधु-संत आरोप-प्रत्यारोप व तर्क-वितर्क से परे होते हैं। दादाजी वाद-विवाद में न पड़कर पापा को उपदेश देने में मग्न थे। 
“फिर इसके लिए आप घर आकर हमें क्यों परेशान कर रहे हैं? मठ में ही क्यों नहीं कर लिया यह महान अनुष्ठान?” पापा का आक्रोश और प्रश्न; औचित्यपूर्ण था।  
“आत्मा के पुनर्जन्म से मुक्ति के लिए इस जन्म के संबंधों से अनुमति लेना परम आवश्यक है, तभी निर्वाण सम्भव है।” दादाजी शांत स्वर में बोले। 
दादाजी ने पहले ही कब किसकी सुनी थी जो अब सुनते। उनके पास हर बात का प्रत्युत्तर उपलब्ध था।  
“वाह पिताजी! वाह! तब कहाँ थे इस जन्म के नाते, जब मेरे सिर पर हाथ रखने की उम्र में आप पाँवों से पादुका भी खींच ले गए।” पिताजी क्रोध से बिलबिला रहे थे।  
“इतना क्रुद्ध न हो वत्स! हम जैन धर्म के अनुयायी हैं। चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने साल्लेखाना को आध्यामिकता का उत्तम परीक्षण बताया है। उनके माता-पिता ने भी इस परीक्षा को उत्तीर्ण कर परधाम प्राप्त किया। इसी का पालन करते हुए महाराजाधिराज चंद्रगुप्त मौर्य ने भी कर्नाटक में चंद्रगिरि की पहाड़ियों पर श्रावण बेलगोला में साल्लेखाना अनुष्ठान सम्पन्न कर परमपद प्राप्त किया था। यह जैन धर्म की पवित्रतम अंतिम दीक्षा है।” कहकर दादाजी ने आँखें बंद कर ध्यान की मुद्रा में चले गए। 
वास्तव में पिताजी के रोषपूर्ण बड़बड़ाहट के शब्द उनके कानों से टकराकर कमरे में गुंजायमान हो रहे थे किंतु दादाजी की चमड़ी पर उनका कोई प्रभाव नहीं था। वे यूँ ही ध्यानमग्न रहे।  
दादाजी के अपवर्ग के सौभाग्य के साथ दुर्भाग्य भी द्वार खटखटा रहा था। राजस्थान सरकार ने संयोगात उसी दिन ‘साल्लेखाना’ पर रोक लगाई थी। न्यायालय ने उसे आत्महत्या की श्रेणी में रखा था। दादाजी को सरकारी कैद हो गई। पापा के भाग्य में आराम कहाँ था। नौकरी से सद्य-निवृत्त पिताजी की हाजिरी अब कोर्ट-कचहरी में लगनी शुरु हो गई। तीन सप्ताह चप्पल घिसने के बाद राजस्थान न्यायालय के विपरीत उच्च न्यायालय ने इस आदेश पर रोक लगा दी तो उनके पैर टिके। 
दादाजी को छुड़ाकर घर लाया गया। जेल से निकलते ही उनके स्वागत में उन्हें फूलों के हार पहनाए गए। वे सूखकर काँटा हो चुके थे। हड्डियाँ त्वचा से बाहर आने पर उतारू थीं। दादाजी दुख-सुख से उदासीन प्रतीत हुए। बाँगड़मेर की ढपलुनुँ जेल से घर तक पिताजी, घर के अन्य सदस्य और मित्र-मण्डली उन्हें काँधों पर उठाए रहे। किसी राजनैतिक पार्टी का विजय जश्न प्रतीत होता था। घर से कुछ मीटर दूर दादाजी को कंधे से उतारा गया। दादजी ने विजयी भाव से एक बार सबको देखा और घर की देहरी छूते ही प्राण त्याग दिए। पापा एक बार फिर जीतकर भी हार गए थे। 
“शरण्य का मन लग गया?” घुर्र-घुर्र वाइव्रेशन की आवाज़ से संदेश पर ध्यान गया। अशांत मन था और फ़ोन को साइलेंट कर छोड़ा था। 
शरण्य अभी सो रहा था। ऐसा ही अबोध जैसा मैं उसे अस्पताल से लाई थी। सीज़ेरियन था तब भी एक क्षण क्यूबेटर में न ठहरता था। रो-रोकर सारा अस्पताल सिर पर उठा लिया था। जब नर्सें मेरे पास लाईं तो मेरी ऑक्सीज़न की नली को अपनी मुट्ठी में जकड़ ऐसे संतुष्ट हो गया जैसे गर्भनाल से माँ से जुड़े होने का अहसास ढाढस बँधाए रहता है।    
कोडम्वरात्तूर आकर काम की मशरूफियत इतनी थी कि बाँगड़मेर ध्यान में बहुत पीछे छूटता गया था। पिताजी का मैसेज देख मैंने अपने कमरे में पहुँचकर तुरंत फ़ोन मिलाया। 
“शरण्य का मन लग गया?” वही प्रश्न अब पिताजी की आवाज़ में उभरा। 
“हाँ पापा! और आपका?” पापा की आवाज़ सुनकर बहुत तसल्ली मिली। 
“मेरा मन तो तू है। तेरी माँ तुझे दस बरस का छोड़ गई थी। अब तू भी इतनी दूर चली गई है। रात-रात भर नींद ... ... पर तू चिंता मत कर। शरण्य को सँभाल। मन का क्या है? सब मोह-माया है। यह तो दुनिया की रीत है।” पापा ने निश्वास छोड़ी। 
मेरे मन की आकुलता ने उग्र रूप ले लिया। अंतर्ग्लानि बहिरागमन को मचल उठी। मेरा गला रुँध गया।   
“आप अपना ध्यान रखना। दवा टाइम पर लेते रहना।” इस वाक्य के अतिरिक्त मेरे पास कहने को कुछ नहीं था। 
‘उधो, मन न भए दस बीस’ इस उक्ति को दोहरा-दोहरा कर दूसरी शादी के सारे प्रस्ताव ध्वस्त किए थे पापा ने। अकेले मुझे पाला। मेरे विवाह के बाद वे अकेले पड़ गए थे तो उन्मेश पापा के घर रहने को राजी हो गए। काल ने माँ को पापा से छीना और उन्मेश को मुझसे। नन्हे शरण्य के साथ मैं पापा की छड़ी और पापा मेरी छतरी बन गए।   
उनके पास होती हूँ तो हमारा दिन खत्म हो जाता है पर बातें खत्म नहीं होतीं। एक के बाद एक, पापा क्या-क्या किस्से सुनाते। अपने बचपन की, मेरे बचपन की, अपने यारों की बातें बताते हुए नहीं अघाते। 
एक चक्र में बहते हुए हम उसी बिंदु पर आ रुके थे। उनकी निर्बाध बातों का कोष रीता पड़ा था और मुझे अँधेरे में औंधी रखी किताब की तरह शब्द न सूझते थे। क्या दूरियाँ शब्दों में भी फासले ले आती हैं? मैं असमंजस में थी।  
“ठीक है। ठीक है।” पापा ने रटा-रटाया सा वाक्य दोहराया। इस ‘ठीक है’ में कितना कुछ था जो ठीक नहीं था और वह ठीक इसी शब्द के नीचे दबा हुआ था।  
शाम को बँगला नं. 5 में आने वाली गाड़ियों ने उनकी पार्किंग से बढ़ते-बढ़ते हमारी भी घेर ली थी। मैंने अपनी खिड़की के पर्दे हटाकर आनेवालों का निरीक्षण किया। युवा, वृद्ध, बालक सब वर्ग के अतिथि सजे-धजे आ रहे थे। किसी के माथे पर शिकन का नामो-निशान न था। कुछ दिन पूर्व भी तारा भाभी के घर ऐसे ही किसी जश्न में लोग इकट्ठा हुए थे। चेराश्री ने बताया कि उनके घर ‘वज्रमणि पूजा’ है। हीरों का हार जड़वाने से पहले घर पर हीरों को लाकर रात भर रखा जाता है और उसके सकारात्मक-नकारात्मक प्रभाव का आकलन किया जाता है। घनात्मक-ऋणात्मक ऊर्जा का हिसाब लगाकर ही उसे गहनों में जड़वाया जाता है ताकि घर की समृद्धि व ऐश्वर्य में वृद्धि हो। सुनकर मैं हैरान रह गई। रत्नों के संबंध में ऐसी सावधानी ने मुझे बहुत आकर्षित किया। उत्तरी इलाकों में ऐसा कोई रिवाज़ मैंने कभी न देखा था न सुना था। 
उत्सव में सम्मिलित होने का उत्साह उसके मंतव्य से टकराकर शून्य हो चुका था। फिर भी कौन-सी अवशता थी कि ‘वडक्किरुत्तल उत्सव’ के वृहद आयोजन में मैं गई। धार्मिक आलेखन की रंगोली से पूरा घर अलंकृत था। 
पिड़िशानाथ अय्यर के पिता कुंभकोणनाथ को स्वर्णाभूषणों से सजाया गया था। सब नातेदारों ने उनकी उपासना-अर्चना की। एक-एक करके माथे तिलक लगाया। फूल अर्पित किए। गंगाजल जैसा कोई अन्य पावन द्रव्य का छिड़काव किया। चरण स्पर्श कर आशीष ग्रहण किया। छप्पन भोग का अर्थ उस दिन समझ आया। विभिन्न प्रकार के व्यंजनों के 1-1 टुकड़े का उन्हें भोग लगाया गया। 
कुछ मुँह में गया कुछ पहने हुए कपड़ों व अलंकारों में। अन्न से विरक्ति जीवन से वितृष्णा को स्वत: घोषित कर रही थी। मैं विस्मित-सी यह सब देखती रही। मैं इसके कारण को अपनी बुद्धि से जाँच रही थी। कदाचित यह प्रक्रिया इसलिए की जाती हो कि मनुष्य की कुछ विशिष्ट खाने की कोई आकांक्षा शेष न रहे।  
“धर्मम् शरणम् गच्छामि।” कुंभकोणनाथ नेत्र मूँदे ओष्ठों को तनिक सा हिलाकर कँपकँपाते स्वर में मंत्र उचारते। उनकी मुँदीं आँखों के कोरों में मुझे वह अविच्छिन्न शांति नहीं दृष्टिगोचर हुई जो मैंने अपने दादाजी के चेहरे पर लक्षित की थी। उनकी वह मुखमुद्रा मेरे सामने आज भी चित्रलिखित थी। 
मैंने दर्द, दुविधा, दु:ख और लाचारगी की मिली-जुली उपस्थिति की पड़ताल के लिए पिड़िशानाथ और तारामणि के चेहरे के हाव-भावों का अवलोकन किया। पिड़िशानाथ दर्प से दीप्त दमकते प्रतीत हुए तो तारा भाभी बुझे दीपक सी। आज वह चहकती हुई नहीं, अन्यमनस्क-सी दिखाई पड़ीं।  
कुंभकोणनाथ के आस-पास से भीड़ छँटी तो उनके आजू-बाजू रखी तसवीरें मुझसे बतलाने लगीं। उन्हें एक सिंहासननुमा कुर्सी पर बिठाया गया था। उनके दाएँ हाथ छोटे सिंहासन पर रखी स्त्री की तसवीर उनकी पत्नी और पिड़िशानाथ की माँ की जान पड़ती थी। बाएँ हाथ सिंहासन पर भी स्त्री की तसवीर थी। यह स्त्री कौन हो सकती है? मेरी नज़रें उसके नाते का संबंध खोजने में जुट गईं। मैंने दीवारों पर टँगे चित्रों को देखा। उनके कुछ चित्र दाएँ हाथ वाली स्त्री के साथ तो दिखाई दिए परंतु बाएँ हाथ वाली का कुछ पता न था। 
समझते देर न लगी कि यह श्रीमती अवश्य उनकी दूसरी पत्नी रही होंगी। चेराश्री से पता चला था कि उनका एक बेटा विदेश में भी है। कदाचित वह दूसरी पत्नी का बेटा होगा। कुंभकोणनाथ के संथारा व्रत का कारण इस पुत्र द्वारा डाला गया दबाव भी हो सकता है, मेरे मन में विचार कौंधा। 
उनके घर के भीतर आज मैंने पहली बार ही प्रवेश किया था। घर की साज-सज्जा किसी किले से कम न थी। घर की शान बढ़ाने में पुरावस्तुओं का महत्त्वपूर्ण योगदान था। प्राचीन कलाकृतियों से हॉल अटा पड़ा था। हॉल से बाहर बरामदा, शयनकक्ष, शृंगारकक्ष, स्नानघर सभी की सजावट देखते ही बनती थी। बड़े-बड़े आलीशान झूमर, शीशम की लकड़ी पर पुरातन कारीगरी वाला फर्नीचर, राजसी दरवाज़े; घर किसी संग्रहालय से कम न था। 
एक कमरे में बहुत उजाला न था। अँधेरा भी कहा जा सकता था। उसका किवाड़ आधे से ज़्यादा भिड़ा हुआ था। सारी रंगीनियत छोड़कर मेरा ध्यान बरबस उस ओर खिंचा चला गया। मैं शरबत का गिलास हाथ में लिए उस कमरे की ओर बढ़ गई। एक गंदी-सी चारपाई पर पुराने गद्दे-लिहाफ़, मैला तकिया, बदबू भरा माहौल, बेरंगी सुराही, बेढंगे बर्तन, औंधी पड़ी लालटेन, उधड़ी-सी तिपाई पर रखे कुछ कागज़-पत्तर। यह कमरा रेशम में टाट के पैबंद से अधिक कुछ न था। 
मैं चीह्न रही थी कि घर में स्थान पुराने समान के लिए था, पुराने इंसान के लिए नहीं। मेरे कौतूहल ने मुझे सबसे ऊपर वाला कागज़ उठाकर पढ़ने को विवश कर दिया। यह उनके दूसरे बेटे का पत्र था। पत्र मलेशिया से इंग्लिश में लिखा गया था। मेरा अनुमान सही था वह उनकी दूसरी पत्नी की इकलौती संतान था। उस पत्र में उसने कोडम्वरात्तूर आकर अपने हिस्से की सम्पत्ति अपने नाम करा लेने की बात लिखी थी। वह 15-20 दिन बाद आने वाला था। 
बाहर बैठे सुसज्जित मनुष्य का स्वरूप इस दड़बे के विद्रूप से मेल नहीं खा रहा। आज इस नए रूप की नुमाइश जो की गई है, वह उसकी क्रमवार समाप्ति की सामाजिक अनुमति का पूरा कथाक्रम है।   
मुझे वडक्किरुत्तल उत्सव के गंतव्य का मंतव्य समझ आने लग गया। दिल में तो आया कि चीख-चीखकर सबको बता दूँ कि यह स्वेच्छा से नहीं बल्कि जबरन कुंभकोणनाथ को मौत के मुँह में ढकेलने के लिए रचा गया षडयंत्र है। सीधा-सीधा हत्या को सामाजिक जामा पहनाने का प्रपंच है। पिड़िशानाथ सारी सम्पत्ति को हथिया लेना चाहता है। हो सकता है हथिया भी चुका हो।  
मस्तिष्क में सवालों की बौछार हो गई। आखिर कुंभकोणनाथ क्यों राज़ी हुए वडक्किरुत्तल के लिए? अगर पहले खिलाफ़त न कर सके तो आज क्यों न विद्रोह कर दिया? आज तो सबके सामने पिड़िशानाथ कुछ जबरदस्ती न कर सकेंगे। 
कैसे यह रहस्योद्घाटन करूँ, करूँ कि न करूँ? यह सोचते हुए मैं कमरे से बाहर आई। चारों ओर ही तो उल्लास का वातावरण था। केवल कुंभकोणनाथ इस उल्ल्सोत्सव के केंद्र बिंदु होते हुए भी इससे उदासीन थे। तारामणि की बुझी हुई मुखाकृति भी मेरी खोज और सोच को पुख्ता कर रही थी। सोच में पड़ गई कि ये ढेरों मेहमानों को भी इस सच्चाई का ज्ञान होगा क्या? क्या वे इस हत्या की योजना में शामिल होंगे, उनकी रज़ामंदी होगी या निपट अनजान होंगे? क्या मेरी बात पर कोई विश्वास करेगा? मैं कोई होती भी हूँ इस मामले में टाँग अड़ाने वाली? उनके निजी मामलों में दखल देने वाली? शायद ऐसा ही मानकर ये सब भी बस आनंद मना रहे होंगे।
तभी मेरे शांत मोबाइल ने घुर्र-घुर्र कर अपनी उपस्थिति का भान कराया। दवाई की डिलीवरी का मैसेज दिखा। पिताजी को जोड़ों के दर्द की दवाई भिजवाई थी। पहुँच गई देखकर संतुष्टि हुई। मोबाइल पर फिर एक मैसेज बजा। 
“दवा क्यों भिजवाई? मैं लहसुन की गाँठ ले तो रहा हूँ।” मैसेज पापा का आया। 
पापा जैसे मेरे सामने बैठे ही बोल रहे हों।  
“उससे असर कहाँ पड़ रहा है। आपका चलना-फिरना भी दूभर हो रहा है। एक कमरे में सिमटकर रह गया है आपका जीवन।” मैंने मैसेज टाइप किया। 
टाइप करते-करते मेरे ज़ेहन में कुंभकोणनाथ अय्यर का कमरा घूम गया। उनके फटे-चीथड़े सामान की गंध मेरे नथुनों में भर गई। सापड़ और सद्या; आज कुछ न भा रहा था। किसी तरह दो-चार कौर हलक के नीचे उतारे। कुंभकोणनाथ पर एक उड़ती निगाह डाली। खुद को सांत्वना देना चाहती थी। आज हृदय के भाव हृदय का साथ न दे रहे थे; विरोधोन्मुख होने पर तुले थे। वे प्रतिष्ठाओं पर अविश्वास कर मूल्यों के पुनर्निर्माण की पैरवी करते थे। भावनाओं का विपरीत दिशा में बहना शुभ संकेत नहीं। चक्षु तो मस्तिष्क से जुड़े हैं। वे मिथ्या भाषण करना नहीं जानते। उन्होंने भी मस्तिष्क की ही पुष्टि की। उनके भारी-भरकम मुख्य गेट से अधिक बोझ मुझे अपने कदमों का महसूस हुआ। आगंतुक अभी भी आए जा रहे थे। उनके गेट से निकल अपने गेट में आई तो पैरों में पंख लगे जान पड़े। 
ताला खोलने को अपने पर्स से चाबी निकाली। शरण्य सो गया होगा। पता नहीं इस लड़के ने क्या खाया होगा। उसके लिए खाना बनाकर आई थी पर मेरे बिना उलटा-सीधा कुछ भी पेट में डाल लिया होगा उसने। कटोरेदान खोलकर भी न देखा होगा। उलझनों में फँसकर उसकी सुध भी न ली थी। मोबाइल चैक किया कि शरण्य का कोई मैसेज अगर हो तो।
“अब जोड़ों का दर्द प्राणों के साथ ही जाएगा।” वापसी मैसेज पापा का आया हुआ था।  
“ऐसी बात न करो पापा! भोलू है न! आपकी देखभाल के लिए ही है। उसे आवाज़ लगा लिया करो किसी काम के लिए, पापा!”  
“भोलू किस-किसकी जगह लेगा?” इन शब्दों ने मुझे झिंझोड़कर रख दिया। 
“क्या रखा है अब जीने में! पिताजी क्यों साधु हुए, अब समझ आता है। मेरे संस्कार मुझे पुकार रहे हैं।” मैसेज आया और मेरी नज़र पड़ते ही गायब हो गया। क्या यह मेरा भ्रम था?
भ्रम की झलकियाँ निराधार नहीं होतीं। अवचेतन की भीतियाँ अंधकार में प्रत्यक्ष संदृश्य की सर्जना करती हैं। वे सत्य नहीं होतीं, पर यथार्थ की परछाईं अवश्य होती है। किसी यथार्थ से अधिक भयावह उसकी परछाई होती है। ऐसी परछाई का साया मुझे अपने चारों ओर घिरता दिखाई दिया। दृष्टि कुंद हो गई। विभ्रम का अंधियारा छँटा तो सहसा चेतना लौटी।  
‘दिस मैसेज वाज़ डिलीटिड’ पढ़कर मेरे प्राण हलक में आ गए। गला सूखने लगा। 

मेरे हृदय की तुला एक पलड़े में शरण्य और दूसरे में पापा को बिठाकर तौलने लगी। माँ के मुँह से एक कहावत सुनी थी- ‘माँ मरे धी को, धी मरे धींगड़े को’। अधिक नहीं पर आंशिक समझ आ रही थी। मैं खुद भी इंजीनियरिंग करने पापा से दूर चली गई थी और अब शरण्य के लिए फिर पापा को ही अकेला कर आई हूँ। वे बरगद की भाँति वहीं रह गए जबकि उसको छाया देनेवाले वारिददल, उसपर बसेरा करनेवाले खग-मृगदल; सभी दूर निकल गए। 
घर आकर मैंने ऑनलाइन बाँगड़मेर की एक टिकट बुक कराई। माइक्रोसॉफ्ट में अपनी बदली को निरस्त करने की अर्जी डाली। शरण्य के लिए हॉस्टल बुक किया। जीवन उत्सव की एक नई सुबह की प्रतीक्षा करने लगी।

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