पुस्तक समीक्षा: शैलेन्द्र चौहान कविता को व्यापक अर्थ में लेते हैं

- हितेश व्यास


सीने में फाँस की तरह
कवि: शैलेन्द्र चौहान
प्रकाशक: न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, दिल्ली
मूल्य: ₹ 200.00
पृष्ठ: 106
प्रकाशन वर्ष: 2023

शैलेन्द्र चौहान इंजीनियर स्नातक हैं। 'सीने में फाँस की तरह' उनका चौथा काव्य संग्रह है। उनके दो कहानी संग्रह, एक संस्मरणात्मक उपन्यास और एक आलोचना पुस्तक 'कविता का जनपक्ष' भी प्रकाशित हो चुके हैं। वे एक साहित्यिक अनियतकालिक पत्रिका 'धरती' का संपादन करते रहे हैं। 

106 पृष्ठीय संकलन 'सीने में फाँस की तरह' में 57 कविताएँ हैं, खास बात यह है कि न तो इसमें कवि का आत्मकथ्य है, और न ही किसी अन्य की भूमिका| पेपर बैक संस्करण में छपी इस कृति के मुखपृष्ठ पर प्रतीकात्मक आकृति है और अंतिम पृष्ठ पर कवि का फोटो सहित सुदीर्घ परिचय है।

शैलेन्द्र चौहान प्रगतिशील जनवादी सोच के कवि और आम आदमी के पक्षधर हैं। पहली ही कविता 'सम्मोहन' में वे कहते हैं, 'हमारा सुख, हमारा दुख, माचिस की तीली के कान खुजाने जैसे आनन्द सा संदर्भ-च्युत'। 'आदिवासी' में वे उनके रूढ़िवादी लोक आचरण का उाहरण देते हैं- कपूर और लौंग बांध हाथों में दूर भगाते चिकनगुन्या, मलेरिया, डेंगू विपन्न भील मालवा के। 'मिथ' कविता के केन्द्र में भी ये ही आदिवासी हैं। 'शक्तिवर्धक पेय जरूरी नहीं उनके लिए, जड़ी-बूटियां मिल जाती मुफ्त जंगलों में, आदिवासी इलाकों में हाट के दिन, मरियल, तेजहीन बीमार चेहरों वाली अनेकों मनुष्याकृतियाँ टहलतीं'। शैलेन्द्र चौहान की कविताओं में मामूली आदमी की दशा और दुख-दर्द व्यक्त हुआ है। शैलेन्द्र चौहान की रचना 'कोडबा' में उच्चरित ध्वनियों में अज्ञेय की सुप्रसिद्ध कविता 'असाध्य वीणा' का स्मरण हो आता है। दोनों के नाद सौंदर्य में कितना अंतर है। शैलेन्द्र की कविता- बाग में माली, लकड़हारा जंगल में, मजदूर सड़कों, इमारतों के बनाने में', ठकठक वसूले की, गैंती की धप, खर-खर आरा मशीनों की। इसी कविता का एक दृश्यचित्र देखे', 'खींचते कचरे की टूटी हुई ठेली, नालियों का साफ करते मैल- संम्रान्त लोगों के घरों से, चमकाते बाथरूम और लेटरिन की टाइलें, कमोड। शैलेन्द्र चौहान ने पर्यावरणीय चिंता को न्यूनतय शब्दों में समेटा है। हम खाए जा रहे हैं पृथ्वी का हर अंग प्रत्यंग, खोदकर, काटकर, जला कर, (वन ग्राम)। 'दुकानदार' आठ पंक्तियों से बनी असरदार व्यंग्य कविता है, खाना शानदॎर/ रहना शानदार / भाषण शानदार / श्रोता शानदार/ वीडियोग्राफी जानदार। कविता के समापन में उसके प्राण हैं - बात इतनी थी। तुम ये तमाशबीन/ वे थे दुकानदार। जनता और नेता का अन्तर इसमें स्पष्ट है। नेतागिरी एक धन्धा है। इसी तरह एक अन्य रचना 'दण्डवत' संपादक और लेखक के बीच सम्बन्ध उजागर करती है - 'रचना छपी' गदगद हुए/ आभार से संपादक को/ बिछ-बिछ जाए कृपा समक्ष संपादक की/तुच्छ लाभ के आगे स्वाभिमान सौ बार कुर्बान।

शैलेन्द्र चौहान ने शुभ और लाभ के द्वैत को अद्वैत में बदल दिया है, 'शुम वही है जिससे लाभ हो / अधिक लाभ / अतिरिक्त लाभ/ अतिशय लाभ/ जैसे भी हो वही शुभ'। लाभ ने शुभ की शुभता को अनावृत्त कर दिया है। (शुभ लाभ) यही वणिक वृत्ति है।

शैलेन्द्र चौहान कविता को व्यापक अर्थ में लेते हैं उनका अर्थ भावुकता से मुक्त और यथार्थपरक है। 'उदासी एक कविता है/ अंतरिक्ष भी कैविता है/ भूख और जीवन संघर्ष, जीत-हार, सुख- उपभोग/ कामनाओं और वासना का नैरंतर्य/युद्ध, संहार महामारी, व्यापार, बहती लाशें, जलती चिताएँ, शाश्वत कविताएँ है, (याप्ति कविता की)। शैलेन्द्र चौहान को स्वयं के बारे में कोई गलतफहमी नहीं है- जैसे मैं नहीं रचता कविताएँ/ लेकिन उनसे विलग भी 'नहीं'। कहीं बाँध बनता है तो उसका एक पहलू यह भी है, * बांध की परिधि में साढ़े छह हजार गाँव, अड़तालीस हजार ग्राम-वासी हैं/ तो उनका क्या / पुनर्वसन में लपकती लोभ की लंबी जिव्हाएँ, चमकती लालच की सहस्त्रों शहतीरे। ये है बाँध के पीछे की राजनीति और उसके कुत्सित उद्देश्य। ( कैसा नरखलिस्तान) 'दरकता है सरदार सरोवर/ लपकती मगरमच्छों सी राजनीति/ बेदखल नागरिकों की गर्दन दबोचने को।

शैलेन्द्र चौहान की कविता में चमत्कार नहीं' है। शैलेन्द्र चौहान दूर की कौड़ी नहीं लाते हैं। निकट सच और निकट यथार्थ को कहते हैं? कई बार शैलेन्द्र चौहान की कविता, कविता नहीं लगती। कंथनी और करनी में अंतर पर व्‍यंग्‍य करते हुए शैलेन्द्र चौहान कहते हैं- एक ईमानदार ने मुझसे कहा, वह बेईमानी के सख्त खिलाफ है/ भ्रष्टाचार व्यवस्था में जहर है/ झूठ असह्य /सामने हर जगह गिड़हाता और खुशामद करता/ एक पहचाना हुआ चेहरा था/ शायद हम/ शायद में' (शायद मैं शायद हम)। 'अवसान' कविता दरअसल लोकतंत्र के अवसान की रचना है। हमें हत्यारों से कोई परेशानी नहीं/ न ही तस्करों और हवाला कारोबारियों से/ चोर लुटेरे तो किस्मत के मारे हैं/ सहानुभूति के पात्र/ जटाधारी पूज्य हैं/ और बलात्कारी क्षम्य/ अधिकारी विनत/ अपराधी सजग। शैलेन्द्र चौहान अपने वक्त की शिनाख्त करते हैं - 'कहीं घर बौरियों में भरे हैं नोट/ पर भूख शांत हो नहीं पाती/ सात मंजिला इमारत में हर मंजिल पर स्वीमिंग पूल है/ रहने वाले चार/ और चौदह सेवकों के साथ कुल अठारह (आगे की राह कौन)।

कबीर ने कहा था, जागे सो रोवे। शैलेन्द्र कहते हैं, 'सोचना अच्छी बात नहीं' में - 'अथाह पैसा है/ क्रिकेट खिलाडियों की सैंकड़ों करोड़ में खरीद हो रही है/ कोरोना समय में जो पैदल लौटे उनकी छोड़िये/ कुछ पूँजीपति और अमीर हुए हैं। शैलेन्द्र विकास रचना में परिवर्तन को कुछ यूं अंकित करते हैं- मां पहली टीचर थी/ पिता खुरदुरा ब्लैकबोर्ड/ मैं एक हरी-मटमैली टाटपट्टी था जो कारपेट में परिवर्तित हुई। 'जघन्यतम' में वे एक त्रासदी का स्मरण करते हैं- चित्रकृतियाँ नराधम नर-पिशाचों की/ अबोध शिशु/ कितने बाल कंकाल/ विरूपी रसायन लीपापोती इंटेलीजेंस/ निठारी! निठारी! निठारी!

वे माँ पर अपनी कविता को शीर्षक देते हैं - 'अग्निगर्भा हूँ मैं'। किसान आंदोलन, शैलेन्द्र चौहान की कलम से अछूता नहीं रहा। 'हम उन्हें रोकेंगे राजधानी के बाहर/ गाड़ेंगे कीलें, लगाएंगे कांक्रीट के अवरोधक/ काटेंगे सड़कें/ करेंगे पानी की बौछार / चलाएंगे बेंत' (सांत्वना)। शैलेन्द्र चौहान की कविताएँ दुःस्वप्नों की कविताएँ हैं। वे कहते भी हैं- यह दु:स्वप्नों का दौर है मित्रो/ सावधान रहने की आवश्यकता है। (दुःस्वप्न )। बसंत पर कविता यूँ भी लिखी जा सकती है, 'घिसे हुए जूतों के तल्लों में घुस गए हैं कंकड़/ वसंत अभी शबाब पर नहीं आया/ चप्पलों से घुसी कील/ सायकल पंक्चर होने से बच गई/ मैंने अवसाद को लाख रोका लेकिन/ कौन कहता है कि वसंत में उदास नहीं हुआ जा सकता। (फूल भी कहां खिले हैं अभी)।
ब्रह्मज्ञान में तथाकथित विद्वानों पर व्‍यंग्‍य है- अधकचरापन आत्म-विश्वास के साथ उत्पन्न करता है अजब रसायन/ मंच पर चढ़कर बहुत देर तक आप प्रमाणित करते हैं अपनी विहता /(ब्रह्मज्ञान)। फैंटेसी की तरह इसी कविता में वे सत्ताधीशों पर व्यंग्य करने से 'नहीं चूकते - राजपाट त्याग कर बन बैठे बुद्ध / भलीभांति कर सकते थे जन सेवा बैठकर सिंहामन पर जीवन पर्यन्त। इसी रचना में वे अचानक मुक्तिबोध का स्मरण करते हैं - मैं भी चाहता था कि बनूं किसी ब्रह्मराक्षस का सजल उर शिष्य / अब सजल उर मेरे पास है दक्षता औरों के पास।(वही)

'खराब कविताएँ' रचना को कवि का आत्मकथ्य कहा जा सकता है। यह भी व्यंग्य कविता ही है। 'मैं खराब कविताएँ लिखता हूँ / अच्‍छे कवि, आलोचकों से मेरा दुआ सलाम नहीं है। ने भद्रलोक के वासी हैं/ भाषा में भद्र/ मैं भदेस और अक्खड़ / प्राध्यापक-साहित्यकारों से ज्ञान लेने में विफल रहा/ तो आप मुझे कवि मत मानिये/ कभी मिगिड़ाया/ कोई दक्षिणा दी? केसर-कस्तूरी भी नहीं/ एक अकादमिक अभिजात और केरियरिस्ट विद्वान की दिव्य भाषा समझना मेरे वश का नहीं/ मेरी खराब कविताएँ आप न पढें'।

अंत में कृति शीर्षक कविता - 'सीने में फाँस की तरह' की चर्चा करके मैं अपनी टिप्पणी समाप्त करूंगा। कविताओं पर लिखी पारंपरिक मान्यताओं से हटकर शैलेन्द्र कविताओं का उद्गम बताते हैं,-'स्त्रियों के लिए कविताएँ झूठे बर्तन मैले कपड़े/ गीला पोंछा, बच्चों का बस्ता और पति का टिफिन होती हैं/ कर्मकांडी ब्राह्मणों के पोथे में बंद हैं कविताएँ / खेतों में आलू हैं, चौपायों में भेड़ हैं / पुरस्कार बन जाती हैं अकादमियों में / किसी सेठ के न्यास में हड्डी का बचा हुआ मांस / गरीब गुरबों के लिए हैं एक बीडी का धुआं'। और अंत में वे वह पंक्ति कहते हैं जिससे कृति शीर्षक उपजा है- 'पीडितों के सीने में फाँस की तरह करकती हैं।

इस प्रकार हम शैलेन्द्र चैहान की नवीनतम काव्य कृति की कविताओं से गुजरे। मैं शैलेन्द्र चौहान की कविताओं पर आलोचनात्मक निष्कर्ष नहीं देता। कुल मिलाकर कुछ नहीं कहता। मुझे तो जो काव्यांश अच्‍छे लगे उन्हें सकारण उद्‌धृत भर कर दिया है। कविता के शब्दों से ऊपर आलोचना नहीं होती, क्योंकि आखिर वह टिकी कविताओं पर ही रहती है।
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sameeXakaहितेश व्यास
संपर्क: 6 ए/705, कल्पतरु सेरेनिटी, महादेव नगर, मांजरी, पुणे-412307 (महाराष्ट्र)
चलभाष: 826 831 2404
 

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