व्यंग्य: तीसरी कसम

जीतेन्द्र भटनागर

- जीतेन्द्र भटनागर

सोचा नहीं था कि हमारी जिन्दगी में कभी कसम खाने का मौका आएगा। पर मौका आया और हमने कसम खाई। वो भी एक नहीं तीन। हिरामन की बात और थी। वो जमाना भी और था। तब हम ग़ुलाम थे और आने-जाने या माल लादने के लिए हमारे पास सिर्फ बैलगाड़ी होती थी। हिरामन जैसे लोग मौका मिलने पर कम्पनी की औरत को भी बिठा लेते थे अपनी बैलगाड़ी में। बाद में ‘कभी कम्पनी की औरत को नहीं बिठाऊँगा’ कह कर तीसरी कसम खा लेते थे। कम-अस-कम ‘मारे गए गुलफाम’ कहानी में फणीश्वर रेणु और उस पर बनी फिल्म ‘तीसरी कसम’ में बासु भट्टाचार्य ने ऐसा बताया था।

अब हम आजाद हैं। बैलगाड़ी के दिन लद चुके हैं। बैलगाड़ी की जगह रेलगाड़ी, कार और हवाई जहाज ने और कम्पनी की औरत की जगह फिल्म की हीरोइन ने ले ली है। चाह कर भी हम उसे कार में नहीं बिठा सकते। श्रीमति जी के बेलन का डर जो है।

हिरामन की कसमों के बीच यकीनन महीनों का फासला रहा होगा पर हम ‘आठ-मिनट-में-अस्सी-खबरें’ वाले अन्दाज़ में तीनों कसमें चन्द सेकन्ड में खा कर निकल लिए। क्या हुआ कि तड़के जनवरी की कड़ाकेदार सर्दी में श्रीमति जी, उनकी बहन और अपने हमजुल्फ से लैस हम शताब्दी एक्सप्रेस में लद गए। एक टाइम था जब इसकी गिनती मुल्क की सबसे अच्छी रेलगाड़ियों में थी। पर वक्त की मार से कौन बच सकता है। बेचारी शताब्दी भी ना बच पाई।

कमल तलछट में फलता-फूलता है और आम हिन्दुस्तानी गन्दी, बदबूदार रेलगाड़ियों में। साफ-सुथरे स्थान उसे रास नहीं आते। इसलिए गाड़ी में घुसते ही मूंगफली, चॉकलेट और साथ लाए अन्य पसंदीदा खाद्य पदार्थों के छिलके वगैरह फैला कर अपनी हैसियत के मुताबिक गन्दगी कर लेते हैं। रॉ मैटीरियल की कमी ना होने पाए इसलिए फेरीवाले मुस्तैदी से चक्कर लगाते रहते हैं। लखनऊ तक का सफर पूरा होते-होते हमारा डब्बा कूड़े के ढेर में तब्दील हो चुका था।

चोली-दामन का साथ रहा है हमारा लखनऊ से। लखनऊ आने का हमारा इकलौता मकसद था अपनी जवानी के उन सात सुहाने सालों की याद ताजा करना जो हमने यहाँ बिताए थे। कामयाब हुए – या नहीं हुए – इसका खुलासा हम कभी और करेंगे। अभी के लिए इतना काफी है कि अपनी तहज़ीब के लिए मशहूर नवाबी शहर लखनऊ सिमट कर चौक में सीमित हो गया है। बाकी के लखनऊ और किसी भी दूसरे ‘आधुनिक’ शहर में कोई फ़र्क नहीं बचा। वही बहुमंजिला इमारतें, वही मॉल और वही फटी जीन्स पहने अँग्रेज़ी में गिट-पिट करते लड़के-लड़कियों के जोड़े यहाँ भी नजर आते हैं। अंग्रेज़ी राज के जमाने के बरलिंग्टन और कार्लटन होटलों को नेस्तनाबूद करके उनकी जगह दुकानें और मॉल बना दिए गए हैं। पूरे शहर में जहाँ देखो इन्सानों और कारों के हुजूम नजर आते हैं। बिना किसी से टक्कर खाए ‘गँजिग’ अब नामुमकिन है। सिर्फ भागम-भाग का माहौल है। ‘आज करे सो काल कर, काल करे सो परसों’ वाला पचास साल पहले का लखनऊ भी वक्त की मार से बच नहीं पाया।

हमारे बाकी तीनों साथी लखनऊ सिर्फ हमारी वजह से आए थे। उनका असल मकसद था काशी में भोले बाबा के दरबार में सजदा करना, लगे हाथों अयोध्या में रामलला के सामने मत्था टेकना, और प्रयागराज में संगम पर डुबकी लगाना।

अयोध्या की हद में दाखिल होते-होते हमारी इनोवा, जो हमारे अज़ीज़ अनिल ने हमारे हवाले की हुई थी, दो हवलदारों ने थाम ली। बिना यह सोचने का वक्त दिए कि हम इक़बाले जुर्म करें या ‘जानते नहीं हम कौन हैं’ का नारा बुलन्द करें, दोनों ने एक तगड़ा सैल्यूट झाड़ा और कुछ दूर खड़ी लाल बत्ती वाली गाड़ी की तरफ इशारा करते हुए कहा, “चलिए सर, साहब आपका इन्तजार कर रहे हैं।“ समझ गए ये अनिल की कारस्तानी है।

लाल बत्ती के पीछे चलते हुए रामलला के मन्दिर के करीब जा पहुँचे। कुछ आगे पैदल चल कर सुरक्षा जाँच करवानी थी। फ़ोटो खींचना मना है इसलिए साहब ने सब के मोबाइल गाड़ी में रखवा लिए।

यूँ तो भगवान का दरबार हर एक के लिए खुला रहता है। पर मन्दिर भी अब मॉल, स्टेशन, हवाई अड्डा वगैरह की तर्ज पर सुरक्षा जाँच की गिरफ्त में आ गए हैं। बिना सुरक्षा जाँच के प्रवेश वर्जित है। पुलिस के साहब के साथ होने के बावजूद सुरक्षा जाँच के बाद दर्शनार्थियों की लम्बी लाइन में लग कर जैसे-तैसे करीब पहुँचे तो छोटे से बेचारे रामलला को फूलों के पहाड़ में दबे साँस लेते पाया।

काशी विश्वनाथ में भी मोबाइल गाड़ी में छोड़े और अपने आप को सुरक्षा जाँच के हवाले किया। सुरक्षा कर्मियों ने जाँच में कोई कसर नहीं छोड़ी। जेबें खाली करवाईं, महिलाओं के पर्स उलटवाए और फॉउन्टेन पेन, कंघे, यहाँ तक कि लिपस्टिक तक जब्त कर ली। इतनी जाँच तो फोर्ट नॉक्स, जहाँ अमरीकी सरकार अपना हजारों टन सोना रखती है, में भी नहीं होती होगी। राम-राम, या कहें कि शिव-शिव, करके आगे बढ़ने की इजाजत मिली। बेड़ा पार! जल्दी ले ली थी हमने राहत की साँस। एक और सुरक्षा जाँच से मुकाबला बाकी था। जब्त करने को कुछ बचा नहीं था पर करना तो था ही! इसलिए श्रीमति जी के बालों का क्लचर जब्त कर लिया। पूछना चाहा कि’ पहने हुए कपड़े भी उतार कर जमा करा दें क्या। इस डर से नहीं पूछा कि हम ही जब्त न कर लिए जाएँ।

दर्शनार्थियों की तीन किलोमीटर लम्बी कतार देख कर हमारे होश फाख्ता हो गए। भोले बाबा भला करें यादव जी का, जिनकी ड्यूटी अनिल ने हमें वाराणसी, सारनाथ वगैरह घुमाने के लिए लगाई थी। ना जाने उन्होंने क्या चाभी लगाई कि वी आई पी प्रवेश खुला और फटाक से हम भोले बाबा के सामने पहुँच गए। और, ठीक से दर्शन कर भी नहीं पाए थे, कि झटाक से अन्य दर्शनार्थियों की भीड़ ने हमें आगे धकेल दिया। भोले बाबा के दरबार में सब बराबर होते हैं न।

प्रयागराज पहुँचने पर पता चला कि आज तो मौनी अमावस्या है। दो करोड़ से ज्यादा स्नानार्थियों ने संगम पर प्रयागराज से भी बड़ा नगर बसाया हुआ था। हमारे मार्गदर्शक शुक्ला जी की एक ना चली’ और हम संगम में डुबकी लगाने में नाकामयाब रहे। नन्दन कानन एक्सप्रेस के प्रयागराज पहुँचने का टाइम तड़के सात बजे का है। लेकिन रेलगाड़ियाँ भी वक्त की उतनी ही पाबन्द होती हैं जितने हमारे नेता। दोनों आम आदमी की परेशानी की फिक्र किए बिना घण्टों लेट आते है। नन्दन कानन भी, बिना उन मुसाफिरों के बारे में सोचे जो तड़के बिना कुछ खाए-पिए खाली पेट होटल से निकले थे, तीन घण्टे से भी ज्यादा लेट पहुँची। पुरी से आनन्द विहार तक चलने वाली इस लम्बी दूरी की गाड़ी में खाने का कोई माकूल इन्तजाम नहीं है। जैसे-तैसे, फेरी वालों से कुछ उल्टा-सीधा खा कर बग़ावत करते पेट को काबू किया। तीन बजे दोपहर की जगह दस बजे रात को घर पहुँचने से पहले ही हमने एक के बाद एक तीन कसमें खा डालीं।

कसम नम्बर एक – जहाँ कुछ साल रह चुका हूँ वहाँ कभी घूमने नहीं जाऊँगा।
कसम नम्बर दो – कभी ट्रेन में नहीं बैठूँगा।
कसम नम्बर तीन – सिर्फ कार या हवाई जहाज से सफर किया करूँगा।

 

2 comments :

  1. बहुत अच्छा हल्का फुल्का व्यंग। पढ़ने में मज़ा आया।

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  2. Well written. Everything soo true and well expressed in a light tone

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