कहानी: खटका

दीपक शर्मा

- दीपक शर्मा

“मैं उस घड़ी को पास से देखना चाहती हूँ", मधु फिर कहती है।

                इस अजनबी शहर में हम दोनों अपने विवाह के प्रमोद काल के अन्तर्गत विचर रहे हैं, और जब से उसने हमारे होटल के कमरे से इस घड़ी के अंक रात में चमकते देखे हैं, उसने जिद पकड़ ली है,इस क्लॉक  टावर की घड़ी उसे पास से ज़रूर देखनी है।"
                “उसके लिए हमें एक गाइड की जरूरत पड़ेगी,” मीनार की ऊँचाई मुझे भयभीत कर रही है।
                “मैं गाइड कर दूँगा,” एक बूढ़ा अपने पहचान पत्र के साथ आगे बढ़ आया है। वह जरूर सोचता है पति लोग अपने से कम उम्र के पुरूषों से बचते हैं। जरूर वह तभी से हमारा पीछा करता रहा है जब से उसने मुझे उस उत्साही नवयुवक को भगाते हुए देखा था जो हमें इस क्लॉक  टावर की इमारत के दरवाजे पर मिला था, अपने दावे के साथ,“मैं आपको टावर के अन्दर ले जाऊँगा, सर। घड़ी के बारे में मैं सबसे ज्यादा जानता हूँ, सर...”
              “सीढ़ियाँ चढ़ने में हाँफ नहीं जाएँगे?” मैं अपनी आशंका जतलाता हूँ।
              “इन सीढ़ियों को कोई भी पार कर ले साहब” बूढ़ा हँसता है, “छह इंची हैं...”
              “मगर होंगी तो ढेर सारी? बहुत ऊँची मीनार है...”
              “ऊँची कैसे नहीं होगी, साहब? 70 मीटर ऊँची है। पूरे शहर में इससे ऊँची बस एक ही इमारत और है, वह फाइव स्टार होटल...”
               “हम वहीं तो टिके हैं,” मधु मुस्कराती है, “यह क्लॉक टावर वहाँ से साफ दिखाई देता है।”
                “बाहर ही से तो,” बूढ़ा गाइड भी मुस्करा पड़ता है,”टावर का भीतर देखना हो, तो भीतर जाना ही पड़ेगा...” 
               “चलिए भीतर चलते हैं,” मधु ने मेरी बाँह घेर ली |
               “रूको अभी,” अपनी बाँह छुड़ाकर मैं भीतर के उद्यान में पड़े बैंचों में से एक की ओर बढ़ लेता हूँ, “पहले वहाँ थोड़ी देर बैठेंगे और वहीं से इसे देखेंगे समझेंगे... इसका भरपूर नजारा लेंगे...”
             “यह भी ठीक है, साहब”, गाइड अपने कदम मेरे कदमों से आ मिलाता है,“घड़ी का व्यास चार मीटर है, इसका डायल पारभासी शीशे का बना है और इसके अंक काले इनैमल के। रात में जब टावर के अन्दर गैस जेट जलाए जाते हैं तो उसके अंक रौशन हो जाते हैं। पाँच घंटियाँ हैं, एक घंटे -घटें पर बजती है और बाकी चार हर पन्द्रह मिनट पर....”
              “मैं घड़ी पास से देखना चाहती हूँ”, मधु हमारे साथ आगे नहीं बढ़ रही। वहीं खड़ी रह गई है और चिल्लाती है, “ऊपर से नीचे का नजारा देखना चाहती हूँ, नीचे से ऊपर का नहीं।”
              “चलिए साहब”, बूढ़ा गाइड अपने कदम रोक लेता है, “बालकनियों तक ही चले चलिए... बालकनियाँ मीनार की संरचना की पहली काट हैं।"
              “नहीं, अभी मैं बैंच पर बैठूँगा”, मैं मधु से कहता हूँ,“तुम बालकनी में पहुँचकर मुझे बुला लेना...”
               “ठीक है”, मधु झट मान जाती है, “आप बैठिए...”
***

                  मधु नहीं जानती, पन्द्रह साल के हवाई जहाज के चालन के बाद ऊँचाई अब मेरे भीतर घबराहट पैदा कर देती है। कैसी भी। कोई भी। बल्कि इसीलिए अपनी एयरलाइन के इस वर्ष के परीक्षण में मुझे ’स्पेशियल डिस औरिएंटेशन (स्थिति-भ्रान्ति) से पीड़ित घोषित कर दिया गया था जिसके अन्तर्गत अपने हवाई जहाज पर मेरा नियन्त्रण क्षीण पड़ने लगा था। जहाज को ऊँचाई देते समय मुझे आभास होता, मैं नीचे जा रहा हूँ। या फिर उसे सीधे दिशा-कोण पर रखने के बावजूद मुझे मालूम देता मैं दाईं दिशा की ओर अभिमुख हूँ। 
                मधु को मैंने नहीं, मेरी माँ ने चुना है। चालीस साल की आयु में जब अपनी नौकरी के जाते ही मैं अपने शहर लौटा था तो मेरे माता-पिता ने खिले माथे से मेरा स्वागत किया था।
               “अभी हमने किसी को कुछ नहीं कहना-बताना”, माँ घोषणा किए थीं, “बस तेरी शादी कर देनी है...”
               “हमे रुपये पैसे की कमी है कोई?” पिता ने कहा था, “तुम चाहे तो जिन्दगी भर नौकरी के बिना अच्छा गुजारा चला सकते हो।”
             “आपकी तरह?” माँ हँसी थीं।
               मेरे पिता ने कभी नौकरी नहीं की थी। इधर शहर में उन्होंने अपने बंगले का आधा भाग एक बड़े बैंक को ऊँचे किराए पर दे रखा है। साथ ही गाँव की अपनी जमीनों से भी हम लोग को अच्छी रकम वसूल हो जाती है। 
               “और अपनी जैसी पत्नी तुम इसे दिला देना”, पिता ने माँ को छेड़ा, “तस्वीर पूरी हो जाएगी...”
                मेंरे पिता जितने स्वकेन्द्रित आत्म सन्तोष में मग्न रहते हैं, माँ उतनी ही व्यग्र और स्वतोविरोधी। वे भी एक बड़े जमींदार की बेटी हैं, लेकिन मेरे नाना ने उन्हें ब्याहने से पहले कान्वेंटी शिक्षा दिलाई थी जिसे बी.ए. तक पूरी भी कराई। जिस कारण मेरे पाँचवीं फेल पिता के संग अपने आत्मतत्व का तालमेल बिठलाना माँ के लिए शुरू से असम्भव रहा है।
              “अपनी जैसी क्यों?” मैं तमक पड़ा था, “शशि क्यों नहीं?”
              शशि मेरी प्रेमिका है। मेरी पुरानी एयरलाइन की परिचारिका। जिसके संग मेरे विवाह की सम्भावना माँ पिछले दस वर्षों से लगातार तितर-बितर कर रही हैं।
              “क्योंकि दहेज के असबाब के नाम पर उसके पास बिन बाप के आठ छोटे भाई-बहन हैं जो तुम्हारा सारा रुपया भकोसने में कोई कसर नहीं छोडेंगे," माँ अपना कथन दोहरा रही थी।
               अपनी नई योजना के साथ, “तुम्हारे लिए मैंने एक डाॅक्टर देख रखी है। इधर सिविल अस्पताल में उसकी तैनाती हाल ही में हुई है। मध्यवर्गीय उसके पिता के पास तीन बेटे हैं। सभी के पास नौकरियाँ हैं। सभी के शहर दूसरे हैं। दूर हैं। ऐसे में उसके बैंक अकाउंट और उसकी तनख्वाह में उनमें से किसी के भी हस्तक्षेप करने की गुंजाइश नहीं के बराबर है...”
              “लेकिन आप जानती हैं शशि को मैं कभी नहीं छोड़ूंगा...” 
              “उसे छोड़ने को कह कौन रहा है? यह डॉक्टर तुम्हारे नहीं, हमारे काम आएगी...”
              “मगर किसी भी लड़की को अपने पास दास बनाए रखने में मैं कोई रुचि नहीं रखता."
               “उस डॉक्टर की नौकरी ही उसे तुम्हारे नहीं, हमारे पास रखेगी। और वह तुम्हारी नहीं, हमारी दासी होगी...” माँ मुझे एक कुटिल मुस्कान दिए थीं और अगले ही सप्ताह मधु और मेरी सगाई सम्पन्न हो गई थी। 
                 हमारी सगाई और विवाह के बीच जो एक माह का अन्तराल रहा वह पूरा माह भी माँ ही ने मधु के संग अधिक बिताया था, मैंने नहीं। उसे पूरी तरह अपने वश में करने। दावत पर दावत खिलाकर l भेंट पर भेंट दिलाकर। 
                     विवाह का आयोजन भी हमारे ही शहर में रखा था l केवल एक ही माँग के साथ। आयोजन किसी फाइव स्टार होटल में रखा जाएगा, जिसका बिल मधु के पिता चुकाएँगे, जिसे अपनी 6 साल की सरकारी नौकरी के बूते पर मधु सहर्ष  मान गई थी।
                    और सहज ही अपने विवाह के अगले  दिन हम इस अजनबी शहर के लिए निकल लिए  थे।
                  परसों।
***

                    बैंच से वह मीनार और भी ऊँची लग रही है। और ज्यादा स्पष्ट भी। दीवारगीर चार बन्धनियों पर खड़ी उन चार बालकनियों के मेहराबी दरवाजे घोड़े की नाल के आकार के हैं, बीच का उसका भाग लम्बी, लाल सपाट ईंटों की दीवार लिए है। और घड़ी प्रकट होती है : फूलकारी वाले रंगदार पत्थरों की 6 पट्टियों के बाद। जहाँ बीच-बीच में ईंटों के कुन्दे मोड़ लेते मालूम देते हैं। घड़ी के ऊपर वे निकास हैं जो घड़ी के घंटों की गूँज बाहर ले जाते हैं l दूर तक। निकास तीन परतों में बँटे हैं। पहली परत में चार निकास हैं। बालकनियों के चार दरवाजों की सीध पर उन्हीं की लम्बाई लिए। दूसरी परत के निकास चौड़े कम हैं किन्तु मात्रा अधिक रखते हैं। उनके ऊपर मीनार का पहला तल उस चौरस अंश पर जा खत्म होता है जो अपनी दीवारों पर एक एक गुम्बद लिए हैं। ये चारों गुम्बद प्याज के आकार के हैं। मीनार के अगले तल पर एक और संरचना है। चार बड़े निकास वाली पहले तल से ऊँचे तल पर। उसमें चार गुम्बद बने हैं। आकार में समान, किन्तु कहीं छोटे। शिखर पर एक बहुत बड़ा गुम्बद है, वातसूचक लिए।
              अकस्मात मुझे लगता है मैं उसे नीचे से नहीं, ऊपर से देख रहा हूँ। किसी हवाई जहाज से। और वह वातसूचक कोई पक्षी है जो मेरे जहाज से आ टकराने वाला है। अपनी देह का स्थापन मैं निश्चित नहीं कर पा रहा था। 
                  तभी एक उच्छृंखल अनवलि मेरी ओर बढ़ आती है। यह मधु के मोबाइल की रिंगटोन है। शायद अपना मोबाइल वह मेरी जेब में भूल गई है। 
                   नम्बर देखता हूँ तो चौंक जाता हूँ। 
                    नम्बर शशि का है जो मधु से कभी नहीं मिली है और मैं सोचता हूँ उन दोनों को एक दूसरे से कभी मिलना भी नहीं चाहिए।
              “तुम यकीन क्यों नहीं करतीं?” शशि मोबाइल पर बोल रही है, “मैं तुम्हारे पति की लिव-इन गर्लफ्रैंड हूँ। देहली में हमारा सांझा फ्लैट है जिसका किराया हम बारी-बारी से भरते हैं...”
              “तुम ऐसा क्यों कर रही हो, शशि?” मुझसे बोले बिना अब नहीं रहा जाता।
              “क्योंकि तुम्हारा मोबाइल मिलाती हूँ तो कॉल नॉट  अलाउड लिखा चला आता है”, उसकी आवाज रोआँसी है।
             “तुम समझ सकती हो, शशिl समझने की चेष्टा करो, शशि, मैं हनीमून पर हूँ...” 
              “लेकिन मैं अकेली हूँ। तुम्हें मिस कर रही हूँ...”
             “यकीन मानो, मैं भी तुुम्हें बहुत ही मिस कर रहा हूँ। मगर अपनी माँ के सामने मेरी एक नहीं चलती……"
               तभी मुझे सामने से मधु आती दिखाई देती है। मेरे बैंच की दिशा में। लम्बे डग भरती हुई। बूढ़े गाइड को पिछेलती। 
                  मैं तत्काल उसका मोबाइल स्विच ऑफ कर देता हूँ। उस पर कोरी स्क्रीन लाने हेतु।
               “कौन थी?” मधु हँसती है, शशि? शी इज अ स्टौकर। एन अटर न्यूसेन्स (लुक-छिपकर वार करने वाली एक घातिनी। उपद्रवी, लोककंटक...)”
                मैं झेंप जाता हूँ।
                “ऐसे लोगों को मैं बहुत अच्छी तरह जानती हूँ। ये बहुत दिक करते हैं...”
                “मतलब?” मैं सतर्क हो लेता हूँ, “तुम्हारे बारे में भी मुझे ऐसे दावे सुनने पड़ सकते हैं?”
             “शायद,” मधु एक ठहाका छोड़ती है,“लेकिन आप भी उन्हें गम्भीरता से मत लीजिएगा। जैसे शशि का कहा मैं बेकहा मानती हूँ और उसका सुना, अनसुना...’
           क्या वह मेरी हँसी उड़ा रही थी? या मुझे तैयार कर रही थी? किसी रहस्योद्घाटन के लिए?
          “इनसे पूछिए”, बूढ़ा गाइड मधु के बराबर आ पहुँचता है,“दूसरी सीढ़ी पार करते ही यह लौट क्यों आई?”
           “क्यों लौट आईं?” मैं मधु से पूछता हूँ।
          “मुझे याद आया मेरा मोबाइल आपकी जेब में रह गया है। इन गाइड साहब से पूछा तो इन्होंने बताया ये मोबाइल रखते ही नहीं। ऐसे में बालकनी पर पहुँचकर आपको अपने पास बुलाती कैसे?”

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।