कामायनी: अनंत आनन्द की तीर्थ यात्रा का महाकाव्य

मनोहर अभय

मनोहर अभय

महाकवि जयशंकर प्रसाद कृत कामायनी, ऐसा कालजयी महाकाव्य है, जो आज सबसे अधिक प्रासंगिक और उपादेय है। वर्तमान जीवन-जगत के उलझे प्रश्नों के उत्तर देती है कामायनी। डॉ.नगेन्द्र इसे मानव चेतना का महाकाव्य मानते हैं। वस्तुतः यह मानव सभ्यता और संस्कृति के विकास की तीर्थयात्रा है, आनंद जिसका अंतिम पड़ाव है। श्रुति कहती है, "सभी प्राणी आनन्द से ही जन्म लेते हैं; आनन्द में ही स्थित या जीवित रहते हैं और इस लोक से प्रयाण करते हुए आनन्द में ही प्रविष्ट हो जाते हैं (आनन्देन जातानि जीवन्ति\ आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति -तैत्ति (3\6)। यह आनन्द इन्द्रिय जनित सुख नहीं, अपरिमित दुःख ही जिसकी परिणति है। योगेश्वर कृष्ण कहते हैं "हे कौन्तेय! इन्द्रिय जनित सुख (सुखद लगते हुए भी) निःसंदेह दुःख का कारण होते हैं, क्योंकि ये अनित्य हैं (आदि और अंत वाले हैं) बुद्धिमान व्यक्ति उनमें रमण नहीं करते (ये हि संस्पर्शजा दुःखयोनम एव ते\आद्यन्तवन्त:कौन्तेय न तेषु रमते बुधः-गीता 5 \22)। नित्य सुख किंवा आनन्द अंतश्चेतना का अहोरात्रि चलने वाला उत्सव है। दिव्य ज्योति से जगमगाता उत्सव "जाकी जोति बरै दिन राती (रैदास)। इसी आनन्द के उन्मेष का महाकव्य है, कामायनी। कवि ने मानवी वृतियों की विवेचना एक कथा रूप में की है जिस का संकेत शतपथ ब्राह्मण में मिलता है।

जल- प्लावन हमारे सांस्कृतिक इतिहास की महत्व पूर्ण घटना है। इस महाप्रलय के कालखंड में सारी पृथ्वी जल में डूब गई थी। समस्त चराचर महामृत्यु का ग्रास बन चुका था। वर्तमान सभ्यता के आदिपुरुष मनु की नौका जिस स्थान पर ठहरी, उसे शतपथ ब्राह्मण में मनोरवसपर्ण कहा गया है। एक शिलाखंड की शीतल छाँव में बैठे विषादग्रस्त मनु मनन कर रहे है कि ऐसी महाविनाशकारी घटना हुई, क्यों हुई? वह भी जब सत्ता के सूत्रधार देवता थे, दिव्य पुरुष सबके उपास्य। दैवी शक्तियों के भोगवादी ह्रासोन्मुखी आचरण और सृष्टि के निकायों में मानवीय हस्तक्षेप ही इसका मूल कारण रहा होगा। स्वयं को सारी भौतिक सम्पदा का स्वामी समझ कर, निसर्ग के नैसर्गिक नियमन उपेक्षा कर अमरों की संतति निश्चिन्त हो अपनी अतृप्त आकांक्षाओं की तुष्टि में लगी रही-- (अरी उपेक्षा भरी अमरते \री अतृप्ति! निर्वाध विलास! द्विधा रहित अपलक नयनों की भूख भरी दर्शन की प्यास)। आकंठ भोग में डूबे अब सत्ता विहीन दीनावस्था की त्रासदी भोग रहे हैं (स्वयं देव थे\ हम सब, तो फिर \क्यों न विश्रृंखल होती सृष्टि \अरे अचानक हुई इसी से कड़ी आपदाओं की वृष्टि)। इतना ही नहीं। वासना में फँसे देवताओं को कवि 'वासना के प्रतिनधि' के रूप में देखता है (विकल वासना के प्रतिनिधि वे \सब मुरझाये चले गए \आह !जले अपनी ज्वाला से \फिर वे जल में गले गए। अरे अमरता के चमकीले \पुतलो!तेरे वे जयनाद \काँप रहे हैं आज प्रतिध्वनि \बन कर मानो दीन विषाद;\प्रकृति रही दुर्जेय, पराजित हम सब थे भूले मद में \भोले थे, हाँ तिरते केवल \सब विलासिता के नद में)। 

श्रुति त्याग के साथ भोग की बात कहती है ("तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा (उसे (ईश्वर को) ध्यान में रख कर, त्याग के साथ भोग करो। सोचो (मनन करो) यह धन (भोग्य वास्तु) किस की है "कस्यस्विद्धनम्" (तुम्हारी, ईश्वर की या किसी और) -ईशावास्योपनिषद् 1। जो ऐसा नहीं करते, वे आत्मा की हत्या करने वाले हैं (चात्महनो जना --वही -2)

मन इस ऊँचाई तक नहीं पहुँच पाता। वायु से भी तीव्र गति से भ्रमण करने वाला मन अस्थिर और चंचल है। "हे कृष्ण ! मन बहुत ही चंचल, उपद्रवी जिद्दी और बलवान है;उसे बाँधकर रखना, मैं वायु को बाँधने के समान कठिन मानता हूँ-- (चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्‌। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्‌ गीता 6\34)। योगेश्वर कहते हैं हे महाबाहो! मन नि:संदेह चंचल और कठिनाई से वश में आता है। लेकिन हे कौन्तेय! अभ्यास और वैराग्य (अनासक्ति) से इसे वश में किया जा सकता है।

 वस्तुतःजिस आनन्द की बात ऋषियों ने कही वह 'कुण्ठित- जड़ता रहित अंतश्चेतना का आनन्द है, मन का नहीं। ध्यातव्य है ऋषि वाक्य ":हे समस्त विश्व के रक्षक! तुम हमें उस आनन्द से पोषित करो, जो अत्यधिक विशाल (व्यापक)स्वयं में पूर्ण छिद्र (दोष)रहित है और जिसे कोई वेध कर पार नहीं कर सकता" (यद बंहिष्ठं नातिविधे सूदानू अछिद्रं शर्म भुवनस्य गोपा --ऋक.5 \62 \9)। एक अन्य ऋचा कहती है "हे बलशाली देव! हम मानवी आत्माओं के लिए उस परम आनन्द को ले आओ। वह हमें हमारे मार्ग में तीव्र वेग से आगे बढ़ाए; वह हमारा पोषण और संवर्धन करे। ऐश्वर्य की विजय के लिए हमारे अंदर रहे और हमारे संग्रामों में तुम हमारे साथ अग्रसर हो, ताकि हमारी वृद्धि हो (तं नो अग्नि अभी रयिं सहस्व आ भर। स क्षेपयत्स पोषयद्भुवद्वाजस्य सातय उतैधि पृत्सु नो वृधे (ऋक. 3\9\7) इस आनन्द की प्राप्ति के लिए ही मनुष्य कर्म में प्रवृत होता है। जिस से सुख न मिले या सुख की आशा न हो, मनुष्य वह कार्य नहीं करता (यदा वै सुखं लभतेsथ करोति नासुखं लब्ध्वा-- (छांदोग्य 22\1)। किन्तु इसके लिए मन की निष्कलुषता चाहिए। जैस स्वर्णकार धीमी-धीमी आग की लौ पर सोने को तपा कर उसका समस्त कलुष दूर कर देता है। ऋग्वेद की पहली ऋचा अग्नि को समर्पित है जिसका अंतिम शब्द है 'रत्नधातमम्" (अग्निमीळेपुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्। होतारं रत्नधातमम्)। महर्षि अरविन्द कहते हैं 'रत्नधा का तात्विक अर्थ है सतत स्पंदन अर्थात सीमा रहित स्पंदन या सीमा रहित आनन्द जनित क्रीड़ा, प्रेम, संसर्ग या प्रभा, ज्योति, द्युति, दीप्ति, भास्वर, वस्तु, रत्न। द्युति- दीप्ति अग्नि का स्वभाव हैं। वह तेज, शक्ति या तप की अधिपति है "जो उद्गम है आनन्द का। जिस से उद्भूत होता है आनन्द। यह आनन्द विश्वव्यापी एवं स्वयं -सत और स्वभावतः किसी प्रकार के दुःख के मिश्रण से कलुषित नहीं हो सकता। इसी कारण अग्नि, अत्यंत हर्ष दायक और आनन्द का महान विधायक है। (महर्षि अरविन्द कृत वेद रहस्य)। हमारी सत्ता की सम्पूर्ण दिव्य शक्तियाँ आनन्दावस्था में ही प्रकट होती हैं। यह आनन्द शाश्वत है, चिन्मय और चिरंतन, न कि क्षणिक। आज के विज्ञान और बुद्धिवादी सोच ने हमें केवल क्षणिक सुख के साधन प्रदान किये हैं। फलतः हाथ लगता दुःख। स्वयं प्रसाद ने कामायनी की भूमिका में लिखा है, "बुद्धिवाद के विकास में और अधिक सुख की खोज में दुःख मिलना स्वाभाविक है"। 

कथासार

कामायनी के नायक हैं आदिपुरुष मनु। नायिका है उनकी सहधर्मिणी श्रद्धा। मनु कहते हैं मननशील को, जबकि श्रद्धा है ‘आस्तिक्य’ (आस्थामयी)बुद्धि। श्रद्धा को वही प्राप्त कर सकता है जो निष्ठावान है और श्रद्धा भी, एकनिष्ठ मननशील को कर्म में प्रवृत करती है : (छान्दोग्योपनिषद -23)। श्रद्धा का संसर्ग समस्त समृद्धियाँ को सुलभ करा सकता है (श्रद्धां देवा यजमान वायुगोपा उपासते\श्रद्धां हृदय्य याकूत्या श्रद्धया विन्दते वसु!' (ऋग्वेद 10-151-4)। वह श्रेष्ठतम मानवीय गुणों का प्रतिनिधित्व करती है वह सर्व मंगला है। सबके दुःख को अपना दुःख समझती है। क्षमाशील कल्याणकारी वचन बोलने वाली है। निरुक्ति में इसे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के प्रति अविपर्य्य बुद्धि उत्पन्न करने वाली देवी कहा है। कामनाओं से जन्मी, ये कामजा और कामायनी अदि नामों से भी सम्बोधित की गई है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने, "श्रद्धा को हृदय वृत्ति का प्रतीक माना है; वह विश्वासमयी रागात्मक प्रवृति है"। 

मनु से भेंट होने पर प्रथम दृष्टि में उसे उनके मुखमण्डल पर विषाद और वेदना की गहरी रेखाएँ दिखाई दीं। उसे लगा कि यह कोई लक्ष्यहीन असहाय पुरुष है-- क्लांत, श्रांत, उद्भ्रान्त। उसका उद्बोधन था :"अरे तुम इतने हुए अधीर \हार बैठे जीवन का दाँव\जीतते मर कर जिसको वीर’’। पुनः -पुनः कर्म के लिए उत्साहित करते हैं श्रद्धा के शब्द:"डरो मत अरे अमृत संतान !अग्रसर है मंगलमय वृद्धि \पूर्ण आकर्षण जीवन केंद्र \खींची आवेगी सकल समृद्धि"। वह बल देकर कहती है मनु तुम प्रसन्न रहो। सारी भिन्नता समाप्त कर प्रसन्नता बाँटो :"औरों को हँसते देखो\ मनु!हँसो और सुख पाओ\अपने सुख को विस्तृत कर लो\ सब को सुखी बनाओ"। मनु परम शक्ति के प्रति कृतज्ञ हैं कि महाप्रलय के बाद भी जीवन यजन कर सके । कृतज्ञता ज्ञापन हेतु वे यज्ञ करना चाहते हैं। पुरोहित मिले बलि- यज्ञ वाले असुरों के किलात -आकुली। श्रद्धा के विरोध के बाद भी बलि- यज्ञ हुआ। अब आखेट मनु की दैनिक क्रिया हो गया। दबी हुई पाशविक वृत्ति जग गई। दुखित मन से श्रद्धा प्रश्न करती है "मनु !क्या यही तुम्हारी होगी \उज्ज्वल नव मानवता\ जिसमें सब कुछ ले लेना हो \हंत! बची क्या शवता" ! किन्तु, मनु को मृगया छोड़, अब कोई और काम नहीं रह गया। दाम्पत्य जीवन में खिचाव बढ़ रहा है। मातृत्व बोझ के साथ श्रद्धा प्रत्याशित- आगन्तुक के स्वागत की तैयारी में रत है। प्रसन्न है। मनु चिंतित। पति और संतति के बीच वह विभक्त हो जाएगी! उस पर उनका एकाधिकार समाप्त हो जायेगा!

मनु का पलायन

मनु पलायन कर जाते हैं, सारस्वत प्रदेश की ओर। भेंट होती है प्रदेश की महिषी इड़ा से। मनु के तेजस्वी व्यक्तित्व से प्रभावित इड़ा, यह कहते हुए कि वह उनकी दुहिता है, उन्हें उजड़े सारस्वत प्रदेश की पुनर्स्थापना का दायित्व सौंप देती है। मनु पूरी निष्ठा के साथ दायित्व निभाते हैं। जनमानस को सुख प्राप्त करने के उपाय बताते हैं। वन्य -जीवन जीते व्यक्तियों को भद्रलोक में प्रतिष्ठित करते हैं। ध्यातव्य है उनका सम्बोधन :‘’तुम्हें तृप्ति- कर\ सुख के साधन सकल बताया \मैंने ही श्रम भाग किया\ फिर वर्ग बनाया... आज न हम हैं पशु\ या गूँगे काननचारी’’। किन्तु, किलात- आकुली से पीछा नहीं छूट रहा। वे दिग्भर्मित कर रहे हैं। मनु का सोया हुआ अधिनायकवादी- पाशविक स्वभाव फिर जाग उठा। अब प्रारम्भ होते हैं बलि –यज्ञ। त्रासदायी दमन, न केवल प्रजा पर, अपितु दुहिता इड़ा पर भी। साथ ही प्राकृतिक संसाधनों का दुरुप्रयोग। सृष्टि की मूलभूत मर्यादाओं का उल्लंघन। इड़ा के साथ दुराचार का प्रयत्न करते हुए वे कहते हैं :‘’मैं शासक, मैं चिर स्वतंत्र, तुम पर भी \मेरा हो अधिकार असीम, सफल हो जीवन मेरा’’। भड़क उठता है जनविद्रोह। भीषण संघर्ष। पराजित मनु घायल अवस्था में मूर्छित पड़े हैं। उनकी तलाश में भटकती, पुत्र 'मानव' के साथ, अंततः श्रद्धा उन्हें खोज लेती है। मनु की दुरावस्था देख वह सोचती है कि उन्हें ऐसे स्थान पर ले जाया जाए जहाँ वे विश्राम के साथ, वास्तविक आनन्द की अनुभूति कर सकें। मनु भी यही चाहते हैं (यह क्या !श्रद्धे !बस तू ले चल \उन चरणों तक, दे निज सम्बल; सब पाप-पुण्य जिसमें जल -जल \पावन बन जाते हैं निर्मल)। पुत्र 'मानव' को इड़ा के संरक्षण में छोड़, दोनों चल पड़े अनंत यात्रा पर । 

अनंत आनन्द की तीर्थ यात्रा

यह यात्रा आनन्द की तीर्थ यात्रा है। समाप्त होने का नाम नहीं ले रही। बस चलना ही चलना है "चरैवेति, चरैवेति" अर्थात् चलते रहो। पार्थिव सुखों के व्यामोह से मुक्त आनन्द के उच्चतम शिखर तक पहुँचना है, पाप - पुण्य से क्षीण होकर। ऊँचाइयाँ बढ़ रही हैं। आनंद के ज्ञानसरोवर तक पहुँचना सरल नहीं है। 'भीषण खड्ड भयकरी खाई’’पार करनी हैं। नीचे रह गई है वसुधा। उसके सारे अवयव लघु से लघुतम दिख रहे हैं (पार्थिव जगत से ऊपर पहुँचने पर पृथ्वी के सारे आकर्षण तुच्छ लगते हैं) किन्तु, मननशील मनु, धरती के व्यामोह से मुक्त नहीं हो पा रहे (‘’कहाँ ले चली हो अब मुझको\श्रद्धे ! मैं थक चुका अधिक हूँ;\ साहस छूट गया है मेरा \निस्संबल भग्नाश पथिक हूँ। लौट चलो, इस वात -चक्र से\मैं दुर्बल अब लड़ न सकूँगा")। श्रद्धा ने कहा जिसे तुम पीछे छोड़ आए हो, वहाँ प्राणी मर- मर कर जीते हैं। वहाँ "प्राप्य मिलता है केवल \ तृप्ति नहीं, कर भेद बाँटती; बुद्धि, विभूति सकल सिकता- सी\प्यास लगी है ओस चाटती")। इनके ज्ञान, कर्म और इच्छा में ऐक्य नहीं है। आवश्यकता है भिन्न को अभिन्न करने की। मनु की सहमति (‘’स्वप्न, स्वाप, जागरण भस्म हो \ इच्छा क्रिया ज्ञान मिल लय थे \दिव्य अनाहत पर निनाद में \श्रद्धायुत मनु बस तन्मय थे’’। अंततः पहुँच गए कैलास स्थित मानसरोवर, जहाँ सब ऐक्य भाव से रह रहे हैं। पराया कोई नहीं (हम अन्य न और कुटुम्बी\ हम केवल एक हमीं हैं \तुम सब मेरे अवयव हो\जिस में कुछ नहीं कमी है (सर्वो मायं विभव इत्येकं परिजानत--गीता) भेद- भाव से मुक्त वह स्थल विश्व - नीड़ सा लगता था। योगेश्वर कृष्ण कहते हैं: "जो सभी प्रणियों में स्वयं को ;और स्वयं में सभी प्राणियों को देखता है;वह सर्वत्र एक ही रूप के दर्शन करता है (गीता 6 \29)वैदिक वाणी है "हे अग्निदेव!आप के आशीष हमारे जीवन के सत्य सिद्ध तभी होंगे (तभी हमें सत्यधर्मी आनंद प्राप्त होगा) जब हम आपको समर्पित हो, आपके बन जाएँ और आप हमारे (ऋक.8 \44\23)। 

आनन्द की अवधारणा में महाकवि प्रसाद सौंदर्य, समरसता और समत्व- भाव (जड़ -जंगम में एक तत्त्व की विद्यमानता) पर बल देते हैं। श्रद्धा कहती है - "विषमता की पीड़ा से व्यस्त \हो रहा स्पंदित विश्व महान \यही दुःख- सुख विकास का सत्य \यही भूमा का मधुमय दान"। दुःख- सुख, निवृति और प्रवृति के कारण भूमा हैं। ‘’ यदा सुखम वै सुखं लभतेsथ करोति नासुखमं लब्ध्वा---छान्दोग्य 22\1)भूमा ही निरतिशय सुख है वही महान है। अल्प में सुख नहीं। अल्प से तृषा नहीं बुझती; और तृष्णा दुःख का बीज है (यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्तु -- (वही 23\1)। कहना न होगा कि ‘भूमा’ ही परम चेतन है, अंतश्चेतन भी। जो उसे देख लेता है, जान लेता है, या उसे सुन लेता है; उस के लिए फिर किसी और को देखने, जानने या सुनने की आवश्यकता नहीं रह जाती। क्योंकि वह आनंद की परम स्थिति पर पहुँच जाता है। (वही24\1)। यही अनंत रमणीय, सुन्दर और सत्य है। लगता है रमणीयता ने आकार ग्रहण कर लिया है। एक हो गए हैं प्रकृति और पुरुष (चिर-मीलित प्रकृति से पुलकित\वह चेतन पुरुष पुरातन;\निज शक्ति तंरगायित था, आनंद अम्बुनिधि शोभन)। द्वैत को नष्ट करके ही अखण्ड आनंद पाया जा सकता है (कर्म का भोग, भोग का कर्म\यही जड़ का चेतन आनंद। अभेद सागर में प्राणों का सृष्टि-क्रम है, \सब में घुल मिलकर रस मय, रहता वह भाव चरम है)। आनंद विधान के लिये श्रद्धा आवश्यक है, इसलिए कि वह अन्तर्विरोधों को सुलझाकर शांति और शीतलता देने वाली है और जड़-चेतन के भेद को समाप्त करने वाली है (जड़-चेतन की गाँठें\ वही सुलझन है भूल सुधारों की, \वह शीतलता है शान्तिमयी \जीवन के उष्ण विचारों की। ऋचा कहती है "यत्र वेथ्य वनस्पते देवानां गुह्या नामानि \तत्र हव्यानि गामय"-- हे वनस्पति (प्रकृतिरूपा) ! हे आनन्द के स्वामी !जहाँतक तुम देवों के गुह्य नामों को जानते हो, वहाँ तक हमारी भेंट ले जाओ। अर्थात दिव्य परमानन्द की अवस्था जिस में हमारी सत्ता की सम्पूर्ण शक्तियाँ, अपने पूर्ण देवत्व में प्रकट होती हैं, वह आनन्द यहाँ गुह्य है और हमसे छुपा हुआ है (ऋक 10 \57)। 

कामायनी का आनन्दवाद

कामायनी का आनन्दवाद समरसता, समन्वय और श्रद्धा-मूलक लोकमंगल की भावना है। यह जीवन से पलायन नहीं, सांसारिक आपदाओं का सामना करते हुए संसार को अपने में, और अपने को संसार में देखना है। आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी ने कामायनी को जीवन के सारे बहुमुखी घात - प्रतिघातों और विस्तृत जीवन दशाओं में पद- पद पर आने वाली उलझनों को चित्रित करने वाला, उन्हें सम्हालने वाला और कला में सब को सजीव करने वाला काव्य कहा है (देखें डॉ. प्रेमशंकर कामायनी का रचना संसार)। प्रसाद के समरसता और समन्वय मूलक आनन्दवाद में कुछ पूर्वाग्रही ऐसा मर्यादावाद सिद्ध करना चाहेंगे जो विभाजित समाज को स्थायित्व प्रदान करता है। वे भूल जाते हैं कि आस्थावादी भारतीय मनीषा एकत्व में विश्वास करती है, द्वैत्व में नहीं। समाज को वर्गों में बाँट कर पशुओं की तरह आपस में लड़ाया नहीं जाता, बल्कि एकात्मभाव को समृद्ध किया जाता है ईश्वरी आस्था के साथ। ‘हम प्रार्थना करते हैं ’मुझ में जो पशुता है, उसे बाँध दो। उत्सर्ग के लिये अर्पित हूँ और जीवन की समिधाएँ उद्दीप्त हों। हे पुरुषोत्तम !मुझमें देवत्व जगाओ (ऋक-१०\९०\१५)। ईश्वरी आस्था या प्रेम से उपलब्ध हुई अखण्ड आनन्दानुभूति चेतन और परमचेतन के साक्ष्य की चरम अवस्था है, जहाँ तिरोहित हो जाता है द्वैत्व। दहाई हो जाती है, इकाई (प्रेम गली अति सांकरी जा में द्वै न समाएँ)। यहाँ प्रकृति और पुरुष अथवा जड़ और चेतन एक हो जाते हैं, समरस, भेद रहित। क्योंकि दोनों में एक ही तत्त्व व्याप्त है। श्रुति वाक्य है ‘’जो भिन्नता देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु को ही प्राप्त करता है (मृत्यो: स मृत्युमाप्नोति य नानवे पश्यिति कठो. 7)। सृष्टि के कण- कण में एक ‘वही’ है जिसने सृष्टि की सर्जना की। वही समस्त जड़-जंगम में समाया है। श्रुति कहती है ‘’वह जगत को रच कर, फिर उसी में प्रवेश का गया (तत्सृष्ट्वा तदेवानु प्राविशत्‌। तदनु प्रविश्य सच्च त्यच्च्याभवत्‌-- तैत्तिरीयोपनिषद -6\2)। अतः सृष्टि के कण- कण में एक वही व्याप्त है। बिहारी कहते हैं ‘’होँ जान्यो निराधार\ यह जग काँचो काँच सौ\एकै रूप अपार प्रतिबिंबित लखियतु जहाँ’’॥जब एक ही रूप सर्वत्र व्यप्त है तब भिन्नता कैसी ?मानव मन की तीन वृत्तियाँ हैं (इच्छा, ज्ञान और कर्म) । कर्म की सिद्धि या आनंदानुभूति के लिए आवश्यक है इन तीनों का समन्वय है। 

 (ज्ञान दूर कुछ, क्रिया भिन्न है \इच्छा क्यों पूरी हो मन की \एक दूसरे से न मिल सकें यह विडंबना हैं जीवन की)। श्रद्धा कहती है

इस त्रिकोण के मध्य विन्दु तुम \शक्ति विपुल क्षमता वाले ये \एक एक को देखो \इच्छा ज्ञान क्रिया वाले ये--यही त्रिपुर है देखा तुमने\

 तीन विन्दु ज्योतिर्मय इतने \अपने केंद्र बने दुःख सुख में \भिन्न हुए हैं ये सब कितने। श्रद्धामयी साधना ही इन्हें सम्बद्ध कर सकती है (महाज्योति रेखा- सी बन कर \ श्रद्धा की स्मिति दौड़ी उनमें ;\वे संबध हुए फिर सहसा \जाग उठी थी ज्वाला जिनमें)। इस ज्वाला को शांत किया त्रिपुरारी अर्थात शिव ने। स्वप्न, स्वाप, जागरण भस्म हो \इच्छा क्रिया ज्ञान मिल लय थे\दिव्य अनाहत पर निनाद में \श्रद्धायुत मनु बस तन्मय थे 

 ये इच्छा, ज्ञान और कर्म के लोक हैं। उषा की लालिमा लिए जो बिन्दु दिखाई देता है, वह इच्छा-लोक है और इसमें भावों की प्रतिमाएं निवास करती हैं। इस लोक में शब्द, स्पर्श, रस, रूप एवं गंध की अप्सराएं नृत्य कर रही हैं और माया यहाँ की शासिका है तथा वही सम्पूर्ण भावचन का संचालन करती है। यह लोक जीवन की प्रधान भूमि है, जो कि प्रेम-रस से सिंचित होती है। इस लोक में कामना की तरंगें उठती रहती हैं और यहाँ मधुर चित्रों का वैभव भी है। इस प्रकार यहाँ अमृत और विष दोनों होने के कारण मनुष्य सुख व दुःख दोनों की अनुभूति करता है। यह सुनकर मनु ने श्याम लोक के बारे में पूछा। मनु की जिज्ञासा शान्त करने के लिये श्रद्धा ने बताया कि यह श्याम लोक कर्म लोक है। यह एक पहेली की तरह उलझा हुआ है। यहाँ इच्छाओं से ही कर्मों का नवीन जन्म होता है। कर्म करने वालों को विश्राम नहीं मिलता। वे सदैव संघर्षरत रहते हैं। संघर्षरत रहने वालों का जयघोष होता है, परन्तु जो पराजित होता है वह व्यक्ति अपनी ही उन्नति के लिये मतवाला रहता है और बड़े-बड़े पाप करने को उतारू हो जाता है। बड़े-बड़े उद्देश्यों की पूर्ति हो जाने पर भी वह असंतुष्ट रहता है। तब श्रद्धा बताती है कि यह श्वेत रंग का ज्ञान लोक है। यहाँ व्यक्ति सुख-दुःख दोनों से ही उदासीन रहकर केवल मुक्ति की अभिलाषा रखता है। इस लोक में कठोर अनुशासन का पालन करना है और बुद्धि चक्र हमेशा चलता रहता है, इसलिये यहाँ प्राणी तर्कशील हैं। तीनों लोकों का परिचय देने के उपरान्त श्रद्धा ने मनु से कहा- ये तीनों ज्योतिपूर्ण बिन्दु ‘त्रिपुर’ कहलाते हैं और वे तीनों अपने आप में ही लीन हैं तथा एक-दूसरे से भिन्न हैं, इसलिये इनमें से कोई भी लोक एक दूसरे के सुख-दुख में भाग न लेकर अपने-अपने सुख दुख का केन्द्र बना हुआ है। इतना कहकर प्रकाश किरण के समान तीनों लोकों में उजाला फैल गया। वे तीनों मिलकर एक हो गये। शिव के श्रृंग एवं डमरू की ध्वनि गूंज उठी और नटराज ताण्डव करते दिखाई दिये। यह दृश्य देखकर मनु की सांसारिक भावनाएं शान्त हो गयी और वे श्रद्धा सहित एक अलौकिक आनंद में मग्न हो गये। समस्त स्थावर-जंगम समरस हो जाएँ (समरस थे जड़ या चेतन\ सुन्दर साकार बना था \चेतनता एक विलसती \आनन्द अखंड घना था)।

1 comment :

  1. अति उत्तम!
    जय शंकर प्रसाद की कामयानी तो पढ़ने का सौभाग्य नहीं मिला, पर आपके आलेख ने वह कमी भी पूरी कर दी।
    बेहद विस्तृत, ज्ञानवर्धक व रोचक ।

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