काव्य: अनिमा दास

अनिमा दास
स्वतंत्रता (सॉनेट)

रच न पाऊँ एक शब्द, क्या रचूँगी कविता
स्वप्न-भारत… स्वतंत्र भारत… या नग्न भारत
क्या लिखूँ किस हेतु उदित हुआ यह सविता
इतिहास मौन वर्तमान मौन तुम भी आरत।

हुआ है विकास, अमानवीय धारणाओं का
आई है क्रांति अकल्पनीय अत्याचार की
विकास होता रहा उन्मुक्त वासनाओं का
क्रांति भी है अनवरत निर्मम अविचार की।

क्या हुआ है स्वतंत्र? कौन हुआ है स्वतंत्र? 
सीमांत? पशु-पक्षी? पर्वत या स्वार्थ-नीति? 
मृतवत् शरीर… अश्रुदग्ध आत्मा का अमंत्र? 
निस्तब्ध द्रष्टा मैं, हृदय में प्रश्नों की है भीति।

जीवित हूँ अथवा मृत, पृथी मेरी है क्षताक्त
वह है क्रूर आततायी, मैं सदा रहूँगी रक्ताक्त।

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व्यथित भारती (सॉनेट)

वह अतीत भी रक्तिम था यह समय भी रक्तिम होगा 
वर्तमान के वस्त्र में एक भविष्य भी रहेगा भयभीत 
सिंदूरी मृण में तल्लीन होता श्वास यदि अंतिम होगा 
क्यों स्वर्ग की प्रतीक्षा में नित्य, है मौन हृदय-प्रमीत? 

जल में थल को लीन होते करती हूँ सदा निरीक्षण 
अनाहूत सी रश्मि मैं, होती संकुचित अशुद्ध वायु में 
न होती परिपूर्ण अतिमित अभीप्सा एवं प्रतीक्षण 
मैं रहती अस्पृश्य व प्रलंबित देह की रिक्त स्नायु में । 

जिसकी सीमा उदीची हिमगिरि में होती उदासीन 
जिसकी वेदना होती दक्षिण गह्वर की भित्ति प्रस्थ 
क्यों आज यह म्लान, उन्मत्त, उन्मादन में है आसीन 
क्या यह भारतवर्ष नहीं है मेरे कुमानस में गर्भस्थ? 

मैं समय सीमांत की स्वर्णिम भारती! चाहूँ होना मुक्त 
भ्रष्टाचार से निपीत काल से मैं, हो जाऊँ आज उन्मुक्त।
***


नर्तकी (सॉनेट) 

मदिर नयनों में है अव्यक्त भाषा… अपरिगत अभिलाषा 
भंगिमाओं में उभरती तृष्णा… क्या है तृष्णा की परिभाषा? 
झरती तारिका, थिरकते अश्रुबिंदु… है तेरा हृदय स्पंदित 
मौन अधर पर… क्यों प्रियतम का नाम… है गुप्त-कंपित।

पदताल में अग्नि स्फुरित… मृणाल सी देख अँगुलियाँ
मन अस्थिर व काया अधीर… कटि पर स्वेदित मंजरियाँ
मदमत्त से पल्लव… पर्वत, दिगंत में… सुलोलित गीतिका
ध्वनि में रागिनी… नृत्यरता कामिनी… मुद्राएँ-वीथिका।

आ! मेघ वाहिनी… आ! मधुर शिंजन… की निर्झरिणी 
अंग-अंग कुमकुमित नृत रंग, सखी! तुम ही हो चित्रिणी
ऋतुएँ गाती हैं सप्तस्वर के गीत… मन है उदास… तथापि
यह आकाश नहीं बरसता नितांत… हाँ, निदाघ में कदापि।

लावण्यमयी लास्या! नूपुर के दीर्घ राग में है क्यों उजास 
प्रणय निवेदन, आह, रच रहा देखो, अर्वाचीन का इतिहास।
***


कलंक भी है सौंदर्य (सॉनेट)

मंजुरिम सांध्य कुसुम… मधुर ज्योत्स्ना में है दीर्घ प्रतीक्षा
तुम्हारा आगमन एक भ्रमित कामना मात्र लेती है परीक्षा
दृगंचल में शायित इच्छा… व इच्छा में है अनन्य अभिसार
कल्पना ही कल्पना है… हाय! वर्णिका में है यह अभ्याहार।

अस्ताचल की अरुणिमा में… मंत्रमुग्ध सा यह मुखमंडल
कृत्रिम क्रोध से स्पंदित हृदय में जैसे नव प्रणय पुष्पदल
द्वार से द्वारिका पर्यंत है कृष्णछाया, हाँ! क्यों कहो न? 
ऐ! लास्य-लतिका, ऐ! मानिनी मदना, शून्य में बहो न।

कलंक भी सौंदर्य है… यह कहा था मुझे सुनयना ने कभी
सौम्य-मृदु अधरों से छद्म -शब्दों का मधु झर गया तभी 
देहान्वेषी ने उसके अंगों का अग्नि से किया था अभिषेक
तथापि निरुत्तर प्रतिमा में शेष नहीं था मुक्ति का अतिरेक।

स्वप्नाविष्ट प्रकृति, अद्य अंतर्मुखी विवेचना में है पुनः संध्या
तिक्त वासना में है चीत्कार करती क्यों शताब्दी की बंध्या? 
***


वर्षा (सॉनेट)

वर्षा… वर्षा… आहा! वर्षा के आलिंगन में गिरि पल्लव
शी… शी करती गुप्त अभीप्सा में हाय! द्रवित अवयव
निःशब्द-नादित, नादित-निःशब्द नीरव निशा नर्तकी
मंद मंद मुस्काती मौन वाणी में… जैसे तंद्रा थिरकती।

श्रावण! ऐ श्रावण! देखो न… यह वैशाख सा तपन
दक-दक करता वस्त्र… थर-थर थरता मन का स्पर्श
न… न… करती यह स्वप्नमयी शय्या… कभी यह कुसुम
संध्या के घुँघरू में छम-छम मैं… कभी छन- छन तुम।

दो कोठरियों पर मृदु उँगलियाँ, अधर लगे उष्म- सिक्त
मुक्त-मुग्ध… उन्मुक्त कटि, यह उन्मादी-बंधन अतिरिक्त
हाँ… हाँ… मोहना! बूँद-बूँद… टिप- टुप… टुपुर में यति
प्रिया… तुम्हारी प्रिया मैं… कभी तुम देव… कभी मैं रति।

आहा! सुनो! कोलाहल क्षितिज में, रिक्त जीवन दीपक
मैं लीन हो चुकी… है ऊर्ध्व उड़ चुका, इस उर का धुमक।

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