काव्य: विनीता तिवारी

विनीता तिवारी
सपने और अपने


बचपन में देखे थे सपने
सोचा,
पूरे होंगे एक दिन
लेकिन जब वो उम्र हुई
कुछ करने की
कर जाने की
सपनों को सच बनाने की
तो सलाह मिली अपनों से
पढ़ लिखकर
ब्याह रचाने की

ब्याह करो
फिर जो जी चाहे
कर लेना
छू लेना चाँद सितारों को
सपनों से झोली भर लेना

बस रहे ध्यान!
परिवार, पति न हो हैरान
घर गृहस्थी न थकने पाये
ना आहत हों मर्यादाएँ

ग़र लगे ज़रूरी करना तो
सपनों को सीमित कर लेना
घर भर की
ख़ुशियों से तुम भी
छोटी सी झोली भर लेना

सपनों को सीमित कर लेना!
***


चलने भर को याद रखो

कुछ कहते हम या ना कहते
क़िस्से तो बनते ही रहते

मैं चुप रहना भी
खेल चुकी
कहना सुनना भी
झेल चुकी
पर बात वहीं पे अटकी है
कुछ मूल तथ्य से भटकी है

हम क्यों औरों में
खोज रहें हैं
अपनी ख़ुशियों के मौसम
क्यूँ ना ख़ुद के साथ
चलें कुछ कदम
बने ख़ुद के हमदम


दुनिया जो
जलती कुढ़ती है
अपना ढंग न छोड़ेगी
थोथी, झूठी बात करेगी
मतलब से दिल जोड़ेगी

जलने दो
जलने वालों को
तुम अपना मन
साफ़ रखो!
मोह माया सब
छोड़ सफ़र में

चलने भर को याद रखो!
***


सावन

सावन की रिमझिम बौछार
भीग रहा मन भाव पसार
टप टप बूँदों सी थिरकूँ मैं
गाऊँ पी संग राग मल्हार

नाचे मोर पपीहा बोले
फुदक फुदक मेंढक दिल खोले
कोयल कुहुक कुहुकती डोले
चहक रहा आँगन घर द्वार

फूल खिले हैं उपवन उपवन
बौराया भँवरों का तन मन
ताक रही पगडंडी बिरहन
याद करें प्रियतम का प्यार

घिर घिर आए घटा घनेरी
बिजली चमक चमक ले फेरी
बन बरखा की साथी संगी
ठंडी ठंडी चली बयार
***

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