अनिता रश्मि की झकझोरती कहानियाँ

समीक्षक: विजय कुमार तिवारी

समीक्षित कृति: हवा का झोंका थी वह (कहानी संग्रह)
कहानीकार: अनिता रश्मि
मूल्य: ₹ 300.00
प्रकाशक: विद्या विहार, नई दिल्ली

कहानी विधा को लेकर हिन्दी साहित्य जगत में पर्याप्त चिन्तन-मनन की आवश्यकता है। कहानी को समझने के बजाए नाना खाँचो में बाँटकर लोग अपने लेखन या आलोचना धर्म की इति-श्री कर लेते हैं। आज कहानी भी साहित्य की अन्य विधाओं की तरह प्रगति कर रही है और उसका विकास हो रहा है। लेखक अपने आसपास के जीवन को देखता है, संगतियों-विसंगतियों से प्रभावित होता है और अपनी अनुभूतियों को साहित्य की किसी अनुकूल विधा में लिख डालता है। विधा का चुनाव उसकी स्वतंत्रता है। कहानी शायद सर्वाधिक अनुकूल विधा है अनुभूत तथ्यों को प्रकट करने के लिए, विषय का विस्तार के लिए और पात्रों की जीवन्तता के लिए। कहानी लेखन इतना ही नहीं है बल्कि कहानीकार कहीं न कहीं स्वयं को भी लिखता है और लेखन का सुख प्राप्त करता है।

विजय कुमार तिवारी
'हवा का झोंका थी वह' कहानी संग्रह के भीतरी प्रथम आवरण पर प्रकाशक की ओर से इस संग्रह को लेकर लिखा गया है, "पीड़ा-उपेक्षा-क्षोभ और संवेदना से भरपूर मार्मिक कहानियाँ जो पाठक को झकझोर देंगी और उद्वेलित कर देंगी। हमारे आसपास की विद्रूपताओं को उजागर करने वाली पठनीय कहानियों का संकलन।" सुश्री अनिता रश्मि जी की इन कहानियों को लेकर सूत्र की तरह यह कोई सशक्त परिचय है। मेरे लिए सुखद संयोग है, हाल में ही उनके लेखन को पढ़ने-समझने का सुअवसर मिला है। यह उनका 2023 में छपा नवीनतम कहानी संग्रह है। उनकी साहित्यिक पकड़ का आकलन ऐसे किया जा सकता है कि उन्होंने 19-20 वर्ष की आयु में ही अपना प्रथम उपन्यास लिख दिया था। अब तक दो उपन्यासों के साथ उनकी 14 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी कहानियाँ, कविताएँ, लघुकथाएँ दूसरी भाषाओं में अनुदित हुई हैं। उनकी लघुकथाओं पर लघु फिल्में बनी हैं और उन्हें नाना पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। इस कहानी संग्रह में उनकी कुल 14 कहानियाँ संग्रहित हुई हैं और प्रथम कहानी "हवा का झोंका थी वह" के नाम पर ही संग्रह का नामकरण हुआ है। इसका समर्पण प्रभावित करने वाला है, अनिता रश्मि ने झारखण्ड के गुमनाम शहीदों और हर श्रमशील शख्स को अपना संग्रह समर्पित किया है जो जीवन को जीवन बनाता है।

झारखण्ड आदिवासी बहुल क्षेत्र है, अनिता रश्मि रांची में रहती हैं और वहाँ की सभ्यता-संस्कृति से खूब परिचित हैं। 'हवा का झोंका थी वह' आदिवासी मीनवा की सशक्त कहानी है। इसमें उनकी भाषा-बोली, प्राकृतिक जीवन शैली, रीति-रिवाज, पहनावा सहित उनके संघर्ष और साहस का बेहतरीन चित्रण हुआ है। आदिवासियों के जीवन से अभिजात्य की तुलना के क्रम में स्त्रियों की स्थिति और पीड़ा का मार्मिक उल्लेख है। करमा पर्व के पीछे की कहानी भी लिखी गयी है। उनके जीवन में पीना और मादर की थाप पर झूमर नृत्य करना सहज ही रोमांचित करता है। मीनवा के माध्यम से बड़ी बेबाकी से सारा रहस्य खोलते हुए यह कहानी चमत्कृत करती है और वर्तमान बदलाव की भी चर्चा करती है।

कहानियाँ बुनी जाती हैं, उसमें कथ्य-कथानक, दृश्य-परिदृश्य, भाव-संवेदनाएँ और बहुत कुछ स्वतः मिश्रित होता जाता है। रचनाकार के भीतर कोई बेचैनी, कोई उत्साह, जोश उभरता है और वह किसी कथा-कहानी के रूप में सामने आता है। 'आँखें' कहानी में प्रेम की स्थिति, पात्रों का परिवेश, संघर्ष, कुछ कर गुजरने की चाह, अन्तर्द्वन्द, बदलती परिस्थितियों में जागता संकल्प बहुत कुछ है। आज की पढ़ी-लिखी लड़की, वर्जनाओं को तोड़ती है, मां-पिता के रिश्तों से प्रभावित हो निश्चय के साथ विद्रोह करती है और सबका उत्तर देती है। लेखिका ने युवा लड़की पायल को प्रेम के आसमान पर खूब उड़ने दिया है, वह सारी समस्याओं से जूझती है, असहज नहीं होती और खुलकर आनंद लेती है। सुमंत का बाद का व्यवहार तनिक चिन्तित करता है जिसे नये संकल्प से बदल लेना चाहती है। कहानी में पात्रों का बेहतरी और सच्चाई के साथ चित्रण हुआ है और सबका मनोविज्ञान चमत्कृत करता है।

लेखिका रुमानियत चित्रित करती है, कजरा की छेड़छाड़ से शीशा टूटा है, उसी टुकड़े में जिरगी तांबे के सिक्के से गूँथा हार डाल अपना गला निहारती है। यह दृश्यांकन चमत्कृत करता है, शब्द, भाव, रंग और भीतरी मनःस्थितियों का तालमेल रचनाकार की अद्भुत  उड़ान है। आदिवासी स्त्रियाँ सारा श्रृंगार प्राकृतिक संसाधनों से करती है और खुश रहती है। सरहुल पर्व प्रकृति की पूजा के लिए मनाया जाता है। धरती मइया और सूरज बाबा की बेटी बिंदी के आने से बहार छा जाती है।

'कोलतार की तपती सड़क पर' प्रेम, रोमांस, प्रकृति, रीति-रिवाजों से भरी, जुड़ी आदिवासियों के जीवन की अद्भुत कहानी है। आदिवासी महिलाएँ भीषण गर्मी में कोलतार की सड़कें बना रही हैं, बच्चों को सम्हाल रही हैं, आपस में बातें कर रही हैं, हँस रही हैं, खुश हैं जबकि शहर से आयी हुई महिला बेचैन है, उनके बच्चे परेशान हैं। जिरगी और कजरा का जिस तरह लेखिका ने चित्रण किया है, प्रेम के क्षणों, प्रसंगों को जिस गहन अनुभूति के भाव से लिखा है, पाठकों को आदिवासियों के निश्छल, ऊर्जावान जीवन की झलक मिल रही होगी। अनिता रश्मि के पास शब्दावली है और खूब गहराई से उनके जीवन को समझा है। ऐसी कहानियाँ हमेशा याद की जाती और प्रेरित करती रहेंगी। संग्रह की कहानियों में स्त्री पात्रों में जीवन्तता, रुमानियत, काम के प्रति लगन और अपने प्रेम के प्रति सजगता चमत्कृत करती है। ऐसा लेखन तभी हो पाया है, रचनाकार के मनोभाव अपना तादात्म्य स्थापित करते हैं और उड़ान भरते हैं।

'शहनाई' हृदय को छूने वाली मार्मिक कहानी है। ऐसी भाव-संवेदनाओं को छोटी सी कहानी में उड़ेल देना सहज नहीं है। निशांत के प्रेरणास्रोत हैं सुप्रसिद्ध शहनाईवादक बिस्मिल्लाह खाँ और वह स्वयं विश्व प्रसिद्ध शहनाईवादक है। पुत्र अंकुल की शायद इच्छा नहीं है परन्तु पिता की मेहनत, तालीम और प्रशिक्षण से वह भी पारंगत हो चुका है। अंकुल बीमार है और एक दिन दुनिया छोड़कर चला जाता है। निशांत की मनःस्थिति का चित्रण द्रवित करने वाला है। वह स्वयं को दोषी समझता है। किसी दिन उसे किसी बच्चे की बेसुरी आवाज शहनाई बजाते सुनाई पड़ती है, निशांत सदमे से बाहर निकलता है, बच्चे को शहनाई बजाने की तालीम देता है और धीरे-धीरे शांत होने लगा है। इन भावों, परिस्थितियों, संवेदनाओं को पकड़ना और चित्रित करना लेखिका के भीतर की सहृदयता प्रकट होती है। कहानी की बुनावट, भाषा-शैली में चमत्कार है और हर किसी को चमत्कृत करने की इसमें क्षमता है।

'एक नौनिहाल का जन्म' भटकते, बहकते, सुखी-दुखी होते गाँव के युवा की कहानी है। लम्बे सूखे के बाद बरसात हुई है। मगन हो सब झोपड़ियों से बाहर खेतों में, मेड़ों पर, वनों में नाच उठे हैं। पेड़-पौधों के साथ इनका मन भी हरा हो गया है। उसी दिन यानी वृहस्पति को शनीचरी ने वृहस्पतिया को जन्म दिया और अगली जचगी के समय उपर चली गई। कहानी गाँव की गरीबी का चित्र दिखाती है। सरकारी योजनाएँ अक्सर सफल नहीं होती। मालिक ने भोला को दो कट्ठा जमीन लिख दिया। वृहस्पतिया को तेजी से बड़ा आदमी बनना है, वह उस जमीन में अफीम की खेती करना चाहता है, पिता से बार-बार आग्रह करता है और नहीं मानने पर उनकी हत्या कर देता है, वैसे भी देश में किसान आत्महत्या करते रहते हैं। खबर यह है कि वृहस्पतिया जैसे लोग पोस्तो की खेती करने के कारण जेल में डाल दिए गये हैं और मुखबिरों की बन आई है। अनिता रश्मि को कहानियों के लिए बहुत दूर-दूर तक जाना नहीं पड़ता, गाँव में, शहर में, पास-पड़ोस में उनके पात्र प्रतीक्षा करते मिल जाते हैं और उनका खोजी मन कहानी गढ़ने की भरपूर सामग्री ढू़ँढ लाता है। उनके पास शब्द-सामर्थ्य है, सशक्त शैली है और हूबहू आँखों देखा चित्र खिंचती रहती हैं। 'उस घर के भीतर' मार्मिक कहानी है। मानसिक-शारीरिक रूप से कमजोर बच्चों को लेकर अक्सर समस्याएँ होती हैं, लोग उसे छिपाते फिरते हैं और मासूम को पीड़ित-प्रताड़ित करते हैं। कहानी सही संदेश देती है-किसी को क्या हक है, किसी मासूम को उसके अनकिए अपराधों की सजा दो? सुकेश ने पड़ोसी धर्म निभाते हुए बहुत सही प्रस्ताव दिया है।

कहानी सुनाना भी एक कला है और उसे कागज पर उतारना शायद उससे बड़ी कला। अनिता रश्मि की कहानियों में इस कला को देखा जा सकता है। स्त्री-विमर्श खूब उभरता है उनके लेखन में। स्त्री कहीं भी सुखी नहीं है, खूब पढ़-लिखकर भी, डाक्टर जैसी नौकरी की आत्मनिर्भरता के बावजूद उसे और उसके मां-पिता को जीवन भर दुख सहना है। 'किर्चें' एक ऐसी ही कहानी है। प्रशान्त जैसे लोग हमारे समाज में भरे पड़े हैं। हमारी विवाह संस्थाएँ ऐसी हैं, अक्सर सुयोग्य को कोई अयोग्य मिल जाता है। वह अयोग्य ही नहीं होता बल्कि पतित होता है और गिरता चला जाता है। उसकी आत्मीयता भी खतरे की घंटी है और चौंकाती है। शुभदा लम्बी असहनीय स्थिति के बाद निर्णय लेती है और अलग हो जाती है। ऐसी कहानियाँ आँखें खोलती हैं और पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर महिलाएँ भी पिसती रहती हैं। 'एक उदास चिट्ठी' मार्मिक कहानी है। इसमें भारतीय संस्कृति-सभ्यता की दुहाई और दरकते विश्वास की कहानी है। यह सशक्त और बहुत जरुरी चिन्तन है, हर भारतीय को पढ़नी चाहिए। यह कोई कोरी कल्पना नहीं लगती बल्कि किसी का भोगा हुआ सच है। लेखिका ने एक बेहतरीन कथा लिखी है, परत-दर-परत सब कुछ खोलकर रखा है और प्रश्न उठाया है, हमारे देश में लड़कियाँ, महिलाएँ सुरक्षित क्यों नहीं हैं, सर्वाधिक दुखद प्रसंग यह भी है कि अधिकांश अपनों, अपने रिश्तों, पड़ोसियों व श्रद्धेय लोगों की वासना का शिकार होती हैं।

'लाल छप्पा साड़ी' शराबी पति द्वारा धोखा दिए जाने से त्रस्त स्त्री की मार्मिक कहानी है जहाँ अंधविश्वास उसकी त्रासदी को और बढ़ा देता है। इस कहानी में अनेक कहानियाँ जुड़ी हुई हैं और जुड़ा हुआ है बुधनी का संघर्ष। गरीबी के दृश्यों को बुनने हुए कथाकार चमत्कृत करती है। बुधनी हार नहीं मानती, संघर्ष करती है, वह पढ़ना चाहती है और हालात को बेहतर बनाने का सपना पाले रहती है। दूसरी ओर सोमानी जैसी लड़की है जो पतन के मार्ग पर चल पड़ी है और बुधनी के खिलाफ अंधविश्वास फैलाने में साथ देती है क्योंकि वह उसे रोकती-टोकती है। गाँव में अफवाह फैलती है, जीतना नदी में अचानक तेज बहाव में बह गया है। कहानी गजब मोड़ लेती है, गाँव में उस पर डायन होने का आरोप लगता है और गाँव निकाला की सजा मिलती है। बुधनी बच्चों संग भाग रही है। नया कच्चा मकान देख रुकती है, भीतर जाती है, दूसरी नव विवाहिता स्त्री दिखाई देती है और पता चलता है कि जीतना ने दूसरी शादी कर ली है। लेखिका ने स्थानीय बोली-भाषा में अद्भुत सच्चाई की कहानी लिखी है और स्त्री की दुर्दशा पर, उसके संघर्ष पर प्रकाश डाला है।

'रस' कहानी की विषय-वस्तु झकझोरने वाली है। आजकल बच्चे बड़ा होकर अपनी दुनिया में कहीं खो-से जाते हैं, उन्हें अपने मां-बाप, गाँव-घर की याद नहीं रहती और गाँव से दूर किसी बड़े शहर या विदेश भागने की धुन रहती है। उधर गाँव में माता-पिता उनकी बाट जोहते रहते हैं, उनकी स्मृतियों में खोये रहते हैं और तिल-तिल तड़पते रहते हैं। इस मार्मिक, मनोवैज्ञानिक भाव-दशा का चित्रण इस कहानी में बड़ी सच्चाई के साथ हुआ है। उज्ज्वल के साथ पार्वती का भाव-संवेग हिला देने वाला है।  अनिता रश्मि ललहुन, कोमल कपोल, हरियाए पत्ते जैसे बिंब वाले शब्दों का प्रयोग करती हैं, उनकी रचनाओं में मुहावरे प्रभावशाली होते हैं और भाव-संवेदनाएँ खूब मुखरित हुई हैं। कहानीकार को ऐसी पीड़ा की गहरी अनुभूति है और उनकी भाषा-शैली उस भाव-दशा को जीवन्त कर देती है। "फैसला एक और" भावुक कर देने वाली मनोवैज्ञानिक कहानी है। जज की मनोदशा और पूरे हालात का दृश्यांकन चमत्कृत करने वाला है। किसी को फाँसी दे देना सहज नहीं होता। फाँसी जैसे निर्णय पर यह कहानी भिन्न तरीके से प्रश्न उठाती है कि किसे मौत मिलती है, अपराधी को या उसके घर वालों को? जज साहब का हृदय परिवर्तन होता है और वे उस अपराधी की पत्नी और उसके बच्चों को सहारा देते हैं।

हमारे समाज में व्याप्त छुआछूत जैसी बीमारी पर व्यंग्य करती यह एक सशक्त रचना है। जिस गंगाजल से सुनंदा घर-आँगन को पवित्र करती हैं जहाँ कलुआ खड़ा होता है, उसी गंगा माता ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी, पेड़ की डाली पर सुनंदा माय को सहारा देकर कलुआ बैठाता है और जान बचती है। इतना ही नहीं, वही कलुआ सुनंदा माय को चुल्लू से पानी पिलाता है। इस कहानी का शीर्षक बिल्कुल सही है-'यह जीवन का कौन सा रंग है प्रभु!' दरअसल सुख और समृद्धि में ही सारे आडम्बर छिपे होते हैं, आपातकाल में सब बराबर हो जाते हैं। बाढ़ की वीभत्सता का यथार्थ चित्रण हुआ है और ऐसे में लोगों के मनोविज्ञान का भी।

'चीखें---सन्नाटा' कोई सशक्त मनोवैज्ञानिक कहानी है। देखी हुई वीभत्स घटनाएँ पीछा नहीं छोड़ती, जीवन भर आदमी कुछ न कर पाने के पीड़ा-बोध मे फँसा, और उलझता चला जाता है, दलदल में फँसता जाता है। अमृत मां की हत्या का बदला लेना चाहता है और पतन के रास्ते पर चल पड़ता है। इस कहानी में बाल मनोविज्ञान और अपराधी बनने के कारणों का संकेत मिलता है। अनिता रश्मि ने सच्चाई के साथ यह कहानी लिखकर हमारे समाज का वीभत्स चेहरा दिखाया है। ऐसे चरित्रों की भाव-संवेदनाओं की अभिव्यक्ति चमत्कृत करती है और उनकी पकड़ दर्शाती है। यह कथन हर किसी को याद रखना चाहिए-'हर किसी की आत्मा गलत कदम उठाने से पहले रोकती-टोकती है, हम अपनी अन्तरात्मा की आवाज नहीं सुनते।'

'बड़ी मां की गठरी' स्वयं में इतिहास समेटे भाव प्रधान मार्मिक कहानी है। स्वतन्त्रता आंदोलन से जुड़े न जाने कितने सेनानी हैं जिन्हें आज कोई नहीं जानता, उनके परिजनों की आंदोलन से जुड़ी कोई पहचान नहीं है और उन्हें उसका कोई लाभ भी नहीं मिलता। बड़ी मां ऐसी ही लुप्तप्राय स्वतन्त्रता सेनानी हैं, चुप, शांत और गठरी लिए हुए। उनके चेहरे की गहन शांति प्रभावित करने वाली है और साफ-सफाई उनकी दिनचर्या में है। शिकवा-शिकायत किए बिना ढेरों काम करती रहती हैं। स्वतन्त्रता आंदोलन के समय उन्होंने अपने पति एवं उनके आठ-दस साथियों को पोरा के ढेर में छिपा कर रखा था, भूसे की ढेरी में उनकी पिस्तौल, डायरी, बम छिपाकर रखती थीं और उनके खाने-पीने की व्यवस्था करती थीं। इतनी सहज और शांत थी कि कोई शक नहीं कर पाता था। इधर कई दिनों से पति की समाधि पर जाती थीं, घंटों बैठी रहती थीं। ठंड लग जाने से उन्हें बुखार हुआ और चल बसीं। उनकी गठरी खोली गई, उसमें दो पिस्तौल, एक जोड़ी खड़ाऊँ, एक जोड़ी धोती-कमीज, डायरी और अखबारी कतरन, उसमें छपी दाढ़ीवाले व्यक्ति की तस्वीर। यह उनके पति की फोटो है जिसे गाँव के जाति-बिरादरी वालों ने ही पोरा में आग लगा, जलाकर मार दिया था। यह कहानी बहुत कुछ कहती है जिसे नए सिरे से पढ़ने-समझने की जरुरत है।

सुश्री अनिता रश्मि झारखंड में रहती हैं, हिन्दी के अलावा नागपुरी भाषा-बोली का अपनी रचनाओं में भरपूर प्रयोग करती हैं। आदिवासियों के लोक जीवन को उन्होंने बहुत करीब से देखा है, उनका रहन-सहन, सुख-दुख, उनके पर्व-उत्सव, जोश-उल्लास, उनकी संस्कृति, शादी-विवाह आदि का मनोहारी चित्रण करती हैं। नागपुरी भाषा-बोली को उनकी रचनाओं ने खूब पहचान दी है और प्रकृति के साथ उनका जीवन मुखरित होता है। स्त्रियों के श्रृंगार के लिए सोने-चाँदी की आवश्यकता नहीं है, हरे पत्ते, लतर, फूल और तांबे के सिक्कों की माला पर्याप्त है, स्त्री-पुरुष के बीच खूब प्रेम है और दारू उनके जीवन में है। अनिता रश्मि की कहानियाँ नाना अनुभवों से भरी हैं और उनकी सशक्त भाषा-शैली चमत्कृत करती है। अलग से कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं है, उन्होंने हिन्दी कथा साहित्य में अपना स्थान बना लिया है।

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