हिंदी भाषा: स्थिति और गति

डॉ. सत्यवीर सिंह

सत्यवीर सिंह

सहायक आचार्य (हिंदी); ला. ब. शा. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कोटपूतली (जयपुर) 303108, राजस्थान, भारत
चलभाष: +91 979 996 4305; ईमेल: drsatyavirsingh@gmail.com

भारत के बहुसंख्यक लोगों की जुबान एवं राजभाषा पदवी पर विराजित हिंदी भारत के साथ-साथ विश्व की बोली जाने वाली प्रमुख भाषाओं में शामिल है। देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी को भारत गणराज्य ने संविधान के भाग - 17 तथा अनुच्छेद- 343 के अंतर्गत राजभाषा पद पर 14 सितंबर 1949 को विभूषित किया। 14 सितंबर को हिंदी को सांविधानिक मान्यता मिलने की वजह से प्रतिवर्ष इसी दिन यानी 14 सितंबर को  हिंदी दिवस मनाया जाता है।
हमारी जन भाषा हिंदी का इतिहास लगभग 1000 वर्ष पुराना है। हिंदी साहित्य के आदिकाल पर दृष्टिपात किया जाये तो बौद्ध, जैन, सिद्ध, नाथ, रासो रचनाकार तथा तोता- ए- हिंद अमीर खुसरो इसके प्रारंभिक प्रयोगकर्ता हैं। हिंदी भारतीय भक्तों एवं संत कवियों के अलावा बाहरी आक्रान्ताओ के साथ भारत में आकर बसे सूफी कवियों की भाषा भी बनी है। हिंदी एक ओर जहाँ अपने प्रारंभिक काल में विभिन्न भाषाओं के शब्दों को शामिल करके उभरी वहीं पूर्व मध्यकाल में सगुण - निर्गुण भक्त कवियों के ज्ञान सरोवर में वृहत रूप से विकसित हुई जिसे ईश्वर के निराकार तथा घट- घट व्यापी स्वरूप के साथ-साथ राम तथा कृष्ण के सगुण रूप की बाल क्रीड़ाओं की छवियों का बहुत मनोहर वर्णन कर कवियों ने जन-जन तक पहुँचाया। उत्तर मध्य काल में एक तरफ विद्वानों ने शास्त्रों में, दरबारी कवियों ने राज्याश्रय में नख -शिख सौन्दर्य चित्रण एवं श्रृंगारिक वर्णन द्वारा इसके रूप को और निखारा तो दूसरी तरफ घनानंद, बोधा, आलम जैसे रीतिमुक्त कवियों ने इसे प्रेम रस से सरोबार कर चरम पर पहुँचाया। इस काल में न केवल हिन्दी के विविध रूपों का विकास हुआ वरन हिंदी का शास्त्र भी सामने आया।  आधुनिक काल (18वीं शती) में धार्मिक तथा सामाजिक पुनर्जागरण का स्पष्ट प्रभाव हिंदी साहित्य पर भी पड़ा। इसके फलस्वरूप हिंदी गद्य का आविर्भाव हुआ जिसका सर्वाधिक प्रतिफलन और विकास हमें पत्रकारिता के रूप में मिलता है। पत्रकारिता का उद्भव नूतन सामाजिक जागृति लेकर आया जिससे आम जन में देशप्रेम और स्वतंत्रता की भावना ने बल पकड़ा। राष्ट्रप्रेमियों को हिंदी का महत्व पता था इसलिए उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को बढ़ावा दिया। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि भारत को अंग्रेजी दासता से मुक्ति दिलाने में पत्रकारिता का बहुत बड़ा योगदान है।  स्वतंत्रता के पश्चात एक ओर जहाँ हिंदी गद्य की विविध विधाओं ने हिंदी साहित्य को चरम पर पहुँचाया वहीं दूसरी ओर हिंदी काव्य में नये प्रतीक, नव बिम्ब, नूतन शैली जैसे प्रयोगों ने इसके स्वरूप को और अधिक बुलंद किया। वर्तमान में हिंदी का साहित्यिक रूप अग्रिम पंक्ति में है।

 भारत ही नहीं विश्व पटल पर भी आज हिंदी का भविष्य न केवल उज्जवल है बल्कि शिखर पर है। हिंदी 1952 में विश्व की अन्य बोली जाने वाली भाषाओं में पाँचवें स्थान पर थी। 1980 में चीनी तथा अंग्रेजी के बाद तीसरे स्थान पर आ गई। 1991 की जनगणना के आधार पर हिंदी चीनी भाषा के बाद दूसरे स्थान पर पहुँची। 1998 में प्रकाशित यूनेस्को की एक रिपोर्ट ने यह दावा किया कि हिंदी विश्व की बोली जाने वाली दूसरी सबसे बड़ी भाषा है। विश्व के 180 देशों के लगभग 80 करोड लोग हिंदी भाषा का प्रयोग करते हैं।

वर्तमान में लगभग 20 करोड़ से अधिक भारतीयों की यह मातृभाषा है तथा 30 करोड़ से अधिक भारतीयों ने इसे द्वितीय भाषा के रूप में अपनाया है। भारत की सीमाओं से बाहर भी हिंदी भाषी लोगों की संख्या बहुत है। इसी वजह से हिंदी विश्व की बोली जाने वाली दूसरी बड़ी भाषा के स्थान पर काबिज हुई है। भारत की भौगोलिक सीमाओं के बाहर हिंदी के वैश्विक विस्तार को लेकर हम विश्व के देशों को तीन वर्गों में विभाजित करके देख सकते हैं - 
प्रथम वर्ग में हमारे पड़ोसी मुल्क है । इनमें प्रमुख हैं - नेपाल, भूटान, बर्मा, बांग्लादेश, मालदीव, श्रीलंका, पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान। इस वर्ग के साथ हमारा बहुत पुराना व प्रगाढ़ रिश्ता रहा है जिसका प्रभाव इनकी सभ्यता, संस्कृति व समाज पर स्पष्ट दिखाई देता है। इन देशों में हिंदी का विस्तार स्वत स्फूर्त है।

द्वितीय वर्ग में वे देश शामिल हैं जिनके रहवासियों का संबंध भारत से रहा है अर्थात जहाँ कभी भारतीय मूल के लोग जाकर बस गए  और फिर वहीं के हो गए। इन भारतीयों ने अपनी भाषा, संस्कृति व पहचान को बनाए रखा। इनमें प्रमुख देश हैं-  सूरिनाम, मारिशस, फिजी, कनाडा, ट्रिनिडाड-टोबैगो आदि। जहाँ के आसमां में हिंदी गूंजती है और रहवासियों की नसों में हिंदी का रक्त बहता है।

 तृतीय वर्ग में वे देश समाहित हैं जहाँ भारतीय लोग आजीविका, संस्कृति तथा ज्ञान विज्ञान के अध्ययन हेतु जाते हैं। इस वर्ग में अमरीका, रुस, इंग्लैंड, चीन, जापान, आस्ट्रेलिया, इटली, जर्मनी, पोलैण्ड, रोमानिया, बुल्गारिया, फ्रांस, स्पेन, स्वीटजरलैंड, न्यूज़ीलैंड कोरिया, दक्षिण अफ्रीका, युगाण्डा आदि को सम्मिलित किया जा सकता है। इस वर्ग के देशों के साथ हमारा शैक्षिक, व्यापारिक, राजनैतिक संबंधों के साथ ही अध्ययन-अध्यापन का संबंध भी है। इन देशों में हिंदी का विस्तार व्यापारिक, सामरिक तथा रोजगार की दृष्टि को मद्देनजर रखकर देखा जा सकता है। इन तमाम वजहों से  हमारी हिंदी वैश्विक स्तर पर पल्लवित व पुष्पित हो रही है।

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी भाषा के पत्र - पत्रिकाओं की बात करें तो जनसंचार माध्यमों ने हिंदी का बहुत विकास किया है वैश्विक स्तर पर जर्मनी के वेले, चीन के चायन, जापान के एन.एच.के. वर्ल्ड का स्थान अग्रणी है। श्रीलंका के रेडियो शिलोन  की इंटरनेशनल हिंदी सेवा विशेष रूप से प्रशंसनीय है। यदि शैक्षिक स्तर पर नजर डालें तो वर्तमान में विश्व के लगभग 150 विश्व विद्यालयों में बहुत से विद्यार्थी हिंदी का अध्ययन तथा शोधकार्य कर रहे हैं जिससे हिंदी अध्ययन एवं शोध के क्षेत्र में उच्च प्रतिमान स्थापित हो रहे हैं। यह हमारी हिंदी का उज्ज्वल भविष्य है तथा गौरव की बात है।

हम वैश्विक व्यवसाय की दृष्टि से देखें तो आज भारत दुनिया के लिए बहुत बड़ा बाजार है। इस बाजार में अपने उत्पादों के प्रचार-प्रसार हेतु अन्य देशों को यहाँ की भाषा की आवश्यकता है। यही वजह है की लगभग 75 फीसदी विज्ञापनों में हिंदी भाषा का प्रयोग किया जाता है ताकि देश के शहरी के साथ ग्रामीण व प्रत्येक वर्ग तक विज्ञापन पहुँच सके। विज्ञापनों के नारों, बैनर व झण्डों के लिए हिंदी सबसे उपयुक्त भाषा है । यह भी हमारी हिंदी के लिए सुखद पहलू है।

फिल्म उद्योग तथा संचार माध्यम  भी हिंदी के प्रचार-प्रसार में महती भूमिका निभा रहे हैं। भारत में मुम्बई फिल्म उद्योग विश्व में प्रथम स्थान पर है जहाँ प्रतिवर्ष सर्वाधिक फिल्मों का निर्माण किया जाता है। भारतीय फिल्मों की विदेशों में भी धूम रहती है यह भी हिंदी के विस्तार में अपना पक्ष अदा करती हैं। संचार माध्यमों की अगर बात की जाए तो हिंदी में 24 घंटे प्रसारित करे जाने वाले समाचार, इसके अतिरिक्त स्पोर्ट्स चैनल, मनोरंजन तथा बच्चों में लोकप्रिय कार्टून चैनलों का भी हिंदी के फैलाव में अभूतपूर्व योगदान है। हमारे देश के अलावा विदेशों से भी मुद्रित हिंदी की ई- पत्रिकाओं ने भी हमारी हिंदी वैश्विक महत्ता को बढ़ावा दिया है।

आगे यदि हम बात करें हिंदीत्तर भारतीयों की तो पहले यह माना जाता था कि हिंदी उत्तर भारतीयों की भाषा है परन्तु हिंदी आज मीडिया, पर्यटन, बाजार, फिल्मों, रोजगार, हिंदी अध्ययन - अध्यापन एवं ज्ञान -विज्ञान की भाषा बन गयी है बहुत से अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में भी अब इसी वजह से हिंदी को प्रसारित होने का विस्तृत अवसर मिला है हिंदी को।  मानव संसाधन विकास मंत्रालय के संरक्षण में अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में हिंदी  के अध्ययन एवं प्रचार - प्रसार का कार्य केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, राजभाषा विभाग तथा केन्द्रीय हिन्दी संस्थान भी व्यापक स्तर पर कर रहा है। 
भारत में पर्यटन उद्योग बहुत विकसित हो रहा है। विदेशों से बहुत अधिक संख्या में पर्यटक भारत आते हैं उनके पर्यटन मार्गदर्शन तथा दुभाषिया बनने हेतु प्रतिवर्ष बहुत से विदेशी लोग यहाँ हिंदी सीखने आते हैं। इसी तरह वैश्वीकरण के तहत रोजगार व अच्छी आमदनी के लिए भारत के अनेक प्रांतों से खाड़ी देशों में  युवा जाते हैं। इसमें भी हिंदी अहिंदी भाषी क्षेत्रों के युवाओं के लिए सहायक भाषा बन रही है।

हमारी हिंदी भाषा के शब्दकोश ने भी कुछ अन्य भाषाओं के अच्छे शब्दों को समाहित कर अपने कोश को भी समृद्ध किया है। हमारी हिंदी अपने एक हजार वर्षों के इतिहास में अनेक शीततापों को सहन करती हुई निरन्तर प्रगति के पर निरंतर अग्रसर है। इसकी वजह है इसकी सरलता, सहिष्णुता, लचीलापन व्यवहार। यह सच्चाई है कि हमारी हिंदी सही मायने में जनभाषा एवं लोकतांत्रिक मूल्यों की हिमायती है।

अंत में हिंदी के महत्व, विस्तार तथा उज्ज्वल भविष्य के बारे में कुछ काव्य पंक्तियों के माध्यम से मैं यही कहना चाहूँगा कि - 
जैसे माथे पर सजती है बिंदी
 वैसे भाषाओं में अग्रणी है हिंदी
 भारत की राजभाषा है हिंदी
अन्य भाषाओं की सहचरी है हिंदी
सहज, सरल, लचीली है हिंदी
सामाजिक जागृति का आधार है हिंदी
एकता की धुरी है हिंदी
भारतीयों की आन है हिंदी
भारत की शान है हिंदी
सब भाषाओं में सिरमौर है हिंदी।
 हमारी हिंदी, हमारी हिंदी।

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