लोक-जागरण तथा लोक-चित्त के परिष्कार और विस्तार के दोहे

समीक्षक: आशा खत्री 'लता'

पुस्तक: 'बदल गए दस्तूर'
लेखक: डॉ. रामनिवास 'मानव'
विधा: दोहा-संग्रह
मूल्य: ₹ 100.00 रुपये
पृष्ठ: 64
प्रकाशक: समन्वय प्रकाशन, गाज़ियाबाद (उत्तर प्रदेश)


        वरिष्ठ साहित्यकार, छप्पन पुस्तकों के रचयिता डॉ. रामनिवास 'मानव' द्वारा रचित कोविड-19 काल में कोरोना-प्रभाव से उत्पन्न हालात का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते दोहों का संग्रह है उनकी नवीनतम कृति 'बदल गये दस्तूर'। एक ही विषय पर लिखे गये एक सौ अस्सी दोहों को पन्द्रह उप-विषयों में बाँटा गया है, जिससे एकता में विविधता का सुन्दर समावेश दोहों में पाठक को मिलता है और वह तल्लीनता से पढ़ता चला जाता है। प्रस्तुत कृति में सर्वप्रथम, आम जनजीवन पर कोरोना का जो प्रभाव पड़ा, उसकी अभिव्यक्ति है। इसकी एक बानगी प्रथम दोहे में ही देखिये, जब लॉकडाउन में चहुँ ओर सूनापन व्याप्त था-
गली-मुहल्ले चुप सभी, घर दरवाजे बन्द।
कोरोना का भूत ही, घूम रहा स्वछन्द॥

        एक ओर दृश्य दोहे के माध्यम से देखिये-
सूनी हैं सब महफिलें, सूना सब संगीत।
देख मौत के आँकड़े, दुनिया है भयभीत॥

        इस समय में मानव को उसकी औकात का अंदाजा कोरोना ने करवा दिया। अमीर-गरीब, सब इससे डरे रहे और कुछ अभागे मृत्यु को भी प्राप्त हुए। मनुष्य ने इस महामारी के सामने स्वयं को कितना विवश पाया, इसे कवि ने दोहे में कुछ यूँ कहा-
उड़ते थे आकाश में, करते थे उत्पात।
कोरोना ने दी बता, उन सबकी औकात॥

        कोरोना की वजह से काम-धंधे बन्द करने को मजबूर होना पड़ा और जबरदस्त तालाबन्दी सारे विश्व में हुई, जिसका दुष्परिणाम बेरोजगारी और आर्थिक मंदी के रूप में सामने आया-
तालाबन्दी ने किया, पूरा चक्का जाम।
पेट भला कैसे भरे, तुम्हीं बताओ राम॥

        श्रमिक वर्ग काम के बन्द होने, कोरोना के भय और रोजमर्रा के खर्चों से परेशान हो उठा, तो उनकी पीड़ा को कवि ने अपने शब्द दिये-
रोटी-दाल न नौकरी, नहीं किराया शेष।
अपना होकर भी लगे, अपना देश विदेश॥

        परन्तु कवि इस हाल में भी आशा का दामन नहीं छोड़ता और कह उठता है-
मुद्दा बनी विमर्श का, मजदूरों की पीर।
जगी तभी उम्मीद है, बदलेगी तस्वीर॥

        इन हालात में सज्जनों ने खूब मानवता का परिचय दिया, चिकित्सकों ने अपने जीवन की परवाह किये बिना अपने दायित्व निभाये। फिर भी, कुछ लोगों ने दुष्टता का परिचय दिया, उन पर पत्थर बरसाये और जमातियों ने इस बीमारी को फैलाने का कार्य किया, तो कवि हृदय चीत्कार कर उठा-
कोरोना के दौर में, करें जमाती घात।
देवपुत्र अभिशप्त हैं, सहने को उत्पात॥

        कोरोना विषाणु की जन्मस्थली भी चीन है और दुनिया में इसे  फैलाने वाला भी चीन। ऊपर से चीन युद्ध द्वारा भी विश्व को डराने के प्रयास कर रहा है। समस्त विश्व विनाश के पथ पर अग्रसर नजर आता है। इस पर एक दोहा देखिये-
बम, गोले, बारूद क्या, क्या जैविक हथियार।
जग में महाविनाश के, सब साधन तैयार॥

        कवि का हृदय यह देखकर दुःखी होता है कि इस विपद काल में जब प्राणों पर बन आयी है, कुछ लोग लाभ के अवसर तलाश रहे हैं-
संकट में भी नोचते, मानवता को गिद्ध।
कोरोना के दौर में, पुनः हुआ यह सिद्ध॥

        मगर भारत ने इस चुनौती का भी डटकर और मिलकर मुकाबला किया तथा सुखद हालात के प्रति आशान्वित किया, जिसे कवि कुछ यूँ कहता है-
कल तक हम उन्नीस थे, आज बने हैं बीस।
कोरोना के बाद हम, फिर होंगे इक्कीस॥

        परन्तु भारत में राजनीति भी खूब जमकर हुई। संकट के समय संवेदनशील मन को यह सब कचोटता है, जिसकी अभिव्यक्ति बेबाकी से इन दोहों में खूब हुई है। 

        दूसरी ओर, कोरोना में मनुष्य अपनों के साथ रहने और घर-परिवार की ओर अधिक उन्मुख हुआ। रिश्तों के महत्त्व को समझा, हाथ के हुनर को जाना। चक्का जाम हुआ, तो प्रदूषण की समस्या स्वतः समाप्त हो गयी। पुनः प्रकृति का सुन्दर, निर्मल रूप हमारे सामने आया। वैक्सीन की खोज के प्रयास एवं आयुर्वेद के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए कवि ने 'सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयः' की हमारी संस्कृति को दोहराते हुए कामना की है-
सारे सुखी-निरोग हों, भूखा रहे न एक।
यही हमारा धर्म है, यही हमारी टेक॥

कवि का मानना है कि कोरोना हमें हमारी सीमाएँ दिखा रहा है, तो मानवता और संघर्ष की सीख भी दे रहा है। विपरीत काल में भी आशावादी रहना, सकारात्मक दृष्टिकोण रखना, उत्साहवर्धन करना, संघर्षशील बनना और कैसी भी विकट परिस्थिति हो, साहस से सामना करना, कवि की व्यापक विचार-क्षमता का परिचय देते हुए, इंगित करता है कि विभीषिका में भी जिजीविषा का सूत्र थामे रखने का मंत्र कवि के पास है। तभी वह कह उठता है-
रोग, बाढ़, भूकम्प हों, अथवा कष्ट विशेष।
जाते हैं देकर सदा, सारे कुछ सन्देश॥

        कुल मिलाकर, प्रस्तुत कृति में संगृहीत दोहों में मानवीय व्यवहार, देश और विश्व की परिस्थितियों और क्षमताओं का वृहद-विस्तृत सांगोपांग चित्रण पाठक को मिलता है, जिसमें वह अपने समय का सच देखता है। साथ ही, प्रस्तुत कृति आने वाले समय में एक ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में भी अपना स्थान बनायेगी और आने वाली पीढियां इस काल का समूचा परिदृश्य इन दोहों में पायेंगी, ऐसा विश्वास इसमें संकलित कालजयी दोहों को पढ़ने के बाद पूर्ण रूप से होता है। भाषा मुहावरेदार और अलंकारों तथा प्रतीकों से सुसज्जित एवं सहज बोधगम्य है। सुंदरता में सरलता का यह मेल प्रभाव को गहरा करता है। प्रस्तुत दोहों पर टिप्पणी करते हुए भूमिका में बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय, रोहतक (हरियाणा) के कुलपति डॉ. रामसजन पाण्डेय कहते हैं, "डॉ. 'मानव' के दोहे लोक-जागरण के दोहे हैं, लोक-चित्त के परिष्कार और विस्तार के दोहे हैं।" उन्होंने इन्हें वामन की विराट काया माना है।

      ‌ पुस्तक का आवरण-पृष्ठ चित्ताकर्षक है और शीर्षक 'बदल गये दस्तूर' इस काल में आये परिवर्तनों का द्योतक है। पाठक के लिए यह अनमोल कृति पठनीय है, संग्रहणीय है। 
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--आशा खत्री 'लता'
2527, सेक्टर 1, रोहतक 124001(हरियाणा)
चलभाष: 8295951677

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