असग़र वजाहत का नाटक “जिस लाहौर नई देख्या, ओ जम्याई नई” एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

सैयद दाऊद रिज़वी

सैयद दाऊद रिज़वी

शोधार्थी हिंदी विभाग, अँग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद, भारत

15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद तो हो गया था लेकिन संपूर्ण देश बटवारे की आग से भी जल उठा था और पाकिस्तान का जन्म हुआ था। यह बटवारा इतिहास के पन्नों में एक शर्मनाक त्रासदी के रूप में दर्ज हो गया है। इस त्रासदी से सांप्रदायिकता और कट्टरता को और बढ़ावा मिला जिसका खामियाज़ा आज की पीढ़ी भुगत रही हैं। हमारे देश की आधारशिला धर्मनिरपेक्ष और सांप्रदायिक सद्भाव रूपी संविधान पर रखी गई थी किंतु आज भी हमारा समाज बार-बार सांप्रदायिक तनाव, झगड़ों और उन्माद की भट्टी में झुलसता है। ब्रिटिश हुकूमत ने भारत में शासन करने के लिए सांप्रदायिकता के जिन बीजों को बोया था आज उन बीजों को अंकुरित करने के लिए राजनीतिक स्वार्थ एवं धार्मिक षडयंत्र उनकी सिंचाई करते हैं। धर्म ने राजनीति के संरक्षण में सांप्रदायिकता का रूप धारण कर लिया है। राजनीति ने समाज में फैल रही हिंदू-मुस्लिम दंगों की खाई को पाटने की बजाए और गहरा किया है और सत्ताधारी अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंक रहे हैं। विभाजन के समय कई स्थानों पर दंगे-फसाद हुए थे, जिसमें हज़ारों घर उजड़ गए थे, लाखों लोग मारे गए थे और लाखों लोगों को स्थानांतरण की समस्या झेलनी पड़ी थी। अंध धार्मिकता, कट्टरता और सांप्रदायिकता ने हिंदू और मुसलमान दोनों को अपने पंजों से लहूलुहान कर दिया था। दरअसल "अंध-धार्मिकता मनुष्य को अविवेकी बनाती है, उसकी मानवीयता को मारती है, जिसके कारण मनुष्य धर्म के नाम पर ऐसे कार्य करने लगता है जिन्हें किसी भी स्थिति में मनुष्योचित नहीं कहा जा सकता।"  इन सब कारणों की पटकथा के मूल में धार्मिक राजनीति की भावना थी। धार्मिक राजनीतिक के कारण आम जन-मानस का जीवन खंडित हो गया था।


धार्मिक उन्माद के विरुद्ध आवाज

सांप्रदायिकता और धार्मिक उन्माद का नंगा नाच आज भी भारत के प्रार्थना स्थलों पर देखने को मिल जाता है। मैनेजर पांडेय के शब्दों में, "आज के भारतीय समाज में उग्र सांप्रदायिकता की आंधी चल रही है। धर्म के नाम पर घृणा, द्वेष और उन्माद का प्रचार-प्रसार हो रहा है। जाति-भेद खूंखार जाति-युद्ध बन रहा है। तरह-तरह के दुराग्रहों कट्टरताओं और संकीर्णताओं का बोलबाला है।"  सांप्रदायिक धार्मिक विवादों का विष भारतीय समाज को लग चुका है। भारतीय समाज में मज़हबी दीवानगी से उत्पन्न बर्बरता हर जगह देखने को मिल जाती है। ऐसा प्रतीत होता है कि ये सांप्रदायिक शक्तियां और उन्माद देश का एक और विभाजन करवाने की फिराक में हैं। प्रसिद्ध गीतकार जावेद अख्तर ने कहा है, "सांप्रदायिक शक्तियाँ संविधान द्वारा प्रदत हमारे अधिकारों पर ही हमला बोल रही हैं।" राजनीति ने धर्म की आड़ में सांप्रदायिक तनाव और अमानवीय कारकों को बढ़ावा दिया जो हमेशा से मानवता विरोधी रहे हैं। इसी बँटवारे, सांप्रदायिकता, कट्टरता और दंगों को आधार बनाकर असग़र वजाहत ने ‘जिस लाहौर नई देख्या, ओ जम्याई नई’ नाटक की रचना की है। इस नाटक की पृष्ठभूमि विभाजन के समय एक लाहौर के मोहल्ले पर आधारित है। लाहौर में यह कहावत प्रसिद्ध थी कि जिन लाहौर नई देख्या ओ जम्याई नई।


विभाजन, विस्थापन और दंगों की त्रासदी

‘जिस लाहौर नई देख्या, ओ जम्याई नई’ नाटक में एक ऐसे परिवार की पीड़ा और दुखों की कहानी है जो विभाजन के बाद विस्थापित होकर शरणार्थी बनकर लाहौर आ गया था। नाटक के पात्र सिकंदर मिर्जा को लखनऊ में अपना घर-परिवार, धन-दौलत, उद्योग-धंधे सब कुछ छोड़कर अपनी पत्नी एवं बच्चों के साथ लाहौर आना पड़ता है। विस्थापन के समय उनके परिवार के साथ दंगाइयों ने लूटपाट की थी। सिकंदर मिर्ज़ा और उसके परिवार को कई महीनों तक बेसहारा और बे-मददगार की तरह कैंप में ज़िंदगी बसर करनी पड़ती है। सिकंदर मिर्ज़ा अपने पुरखों की जो जायदाद लखनऊ में छोड़ आए थे उसके बदले उनको कस्टोडियन वालों ने लाहौर में रतन जौहरी की हवेली एलाट होती है। इस हवेली में रतन जौहरी की बूढ़ी मां रह गई है, जिसे लाहौर की जमीन से बेहद प्रेम है। उसको यह लगता है कि रतन जौहरी एक दिन ज़रूर वापस आएगा। वह यह बिलकुल स्वीकारने को तैयार नहीं कि उसका बेटा विभाजन के दौरान हुये दंगे में मारा जा चुका है। इसलिए वह बंटवारे के बाद भी लाहौर और अपना घर छोड़ने को तैयार नहीं है।  
सिकंदर मिर्जा हवेली छुड़वाने के लिए हर संभव प्रयास करता है किंतु वह इन प्रयासों में विफल रहता है। लेकिन दूसरी ओर अपने स्नेही व्यवहार और स्वभाव के कारण रतन जौहरी की बूढ़ी मां सबकी चहेती माई बन जाती है। वह सिकंदर मिर्ज़ा के परिवार और आसपास के लोगों के साथ मिलकर दिवाली मनाती है। लेकिन आडंबरों और पाखंड के धार्मिक ठेकेदार अपनी मनमानी चलाने की कोशिश करते हैं। वे रतन जौहरी की माँ को बिल्कुल पसंद नहीं करते और उसको वहाँ से भगाना चाहते हैं। वे एक गैर-धर्म की स्त्री का अपनी जाति-धर्म के बीच रहना बिल्कुल पसंद नहीं करते। जब माई देखती है कि उनके कारण सिकंदर मिर्ज़ा और उसके परिवार पर कठिनाइयाँ और संकट आ सकते हैं तो माई स्वयं अपना मकान और लाहौर छोड़कर जाने कि बात करती है लेकिन सब अपने प्रेम की दुहाई देकर माई को जाने से रोक लेते हैं। माई की मृत्यु के बाद मोहल्ले के सच्चे मौलवी इकरामुद्दीन तथा अन्य नेक मुसलमान मिलकर उसका अंतिम संस्कार कर देते हैं। नाटक के अंत में धार्मिक कट्टरता और सांप्रदायिकता का प्रतीक पहलवान अपने गुंडे साथियों के साथ मिलकर नमाज पढ़ते मौलवी की हत्या कर देता है।
असग़र वजाहत के इस नाटक में बड़ी कुशलता से विभाजन, दंगों की विभीषिका में उलझे मानव संबंधों का रेखाचित्र खींचते हुए सांप्रदायिकता, धार्मिक कट्टरता की आग से आगे हिंदू-मुस्लिम भाईचारे को एक शक्ति और दिशा दी गई है। एक ओर जहाँ रतन जौहरी की माँ जिसका पूरा परिवार दंगों की भेंट चढ़ गया, उसका धार्मिक विश्वास अभिव्यक्त होता है कि दूसरों के साथ मिलजुल कर रहना चाहिए। वहीं दूसरी ओर मोहल्ले का मौलवी इस्लाम का वास्तविक स्वरूप अर्थात मानवीयता, उदारता का उदाहरण समाज के सामने प्रस्तुत करता है। दोनों लोगों के धर्म अलग-अलग हैं किंतु दोनों का संदेश एक ही है। वहीं मोहल्ले में धार्मिक पाखंड, आडंबर और रूढ़ियों के ठेकेदार के रूप में पहलवान याक़ूब खाँ और गुंडे भी हैं जो धर्म की आड़ में अपना हित साधना चाहते हैं। ये लोग रतन जौहरी की बूढ़ी माँ को इसलिए मार देना चाहते थे क्योंकि इन लोगों को लगता था कि उस बूढ़ी औरत के पास बहुत धन-दौलत है। वे इस हत्या को धर्म का चोला पहनाने के प्रयास में मौलवी के पास जाते हैं। किंतु मौलवी ऐसा घिनौना काम कारने से सख्त मना कर देता है। माई अपने स्नेह और व्यवहार के कारण हिंदू होने के बाद भी मोहल्ले के सभी लोगों की चहेती बन जाती है। वह मोहल्ले के सभी लोग बड़े हर्षोल्लास से दिवाली मनाने को कहती है। इस पर धर्म के ठेकेदार पूजा-पाठ किए जाने का बहाना बनाकर मौलवी के पास जाते हैं और उससे यह जानना चाहते हैं कि हिंदू औरत को इस्लामी हुकूमत में यह सब करने का अधिकार है या नहीं। मौलवी कुरान और हदीस के आधार पर कहता है, "भाई हदीस शरीफ है कि तुम दूसरों के खुदाओं को बुरा न कहो ताकि वह तुम्हारे खुदा को बुरा न कहें, तुम दूसरों के मज़हब को बुरा न कहो ताकि वह तुम्हारे मज़हब को बुरा न कहें। बेटा इस्लाम ने बहुत हक़ ऐसे दिए हैं जो तमाम इंसानों के लिए हैं.... उसमें मज़हब, रंग, नस्ल और जान का कोई फर्क नहीं किया गया।" 
मौलवी की यह बात धर्म के ठेकेदारों को पसंद नहीं आती क्योंकि यह इस्लाम उनके आडंबरों, पाखंडों और रणनीति के बीच आ जाता है अतएव वे मौलवी पर आरोप लगाते हैं कि वह काफिर है। मौलवी और लोगों के द्वारा माई का दाह संस्कार कर देने पर पहलवान और उसके चमचे और भी नाराज हो मौलवी की हत्या कर देते हैं। असग़र वजाहत इस नाटक के द्वारा समय की नब्ज को पकड़ कर समाज में रह रहे उन पाखंडों और धार्मिक कट्टर सत्ता का पर्दाफ़ाश करते हैं जो धर्म की रक्षा और उसके गौरव के नाम पर अपनी स्वार्थसिद्धि करते हैं। असग़र वजाहत का यह नाटक विभाजन की त्रासदी का मनोवैज्ञानिक दस्तावेज़ बनकर आता है।


धर्म के सवाल पर बहस
समाज में आखिर ऐसा क्या हो गया कि आज धर्म केंद्र में आ गया है। धर्म जो मनुष्य की व्यक्तिगत अभिव्यक्ति हुआ करती थी, आज वह नितांत सामाजिक हो चुका है। धर्म एक ऐसी संस्था है जिसमें मान्यताएं, सिद्धांत और शिक्षाएं होती हैं। समाज में अनेक धर्म के लोग रहते हैं और सबकी मान्यताएँ, सिद्धांत और शिक्षाएँ पृथक होती हैं, पर सभी धर्मों की आत्मा में मानवता का संदेश निहित है। लेकिन जब से राजनीति के वशीभूत होकर सत्ता रूपी धर्म का पदार्पण समाज में हुआ है, समाज और धर्म दोनों की शक्लें बहुत भयानक हो गई हैं। यह परिवर्तन एक दिन या एक साल में नहीं हुआ है, बल्कि यह परिवर्तन सदियों का परिणाम है। आज भी सत्ता और राजनीति अपने हित और स्वार्थ के अनुसार धर्म का स्वरूप बदल देती है। आज धर्म वो अफ़ीम बन चुका है जिसका नशा समाज का हर तबका करना चाहता है। इस नशे में समाज और मनुष्य इतना मंत्र-मुग्ध हो चुका है कि सारी भावनाएँ, संबंध और आचरण को ताक पर रख दिया है। सत्ता रूपी धर्म ने समाज के हर तबके को कट्टरता, सांप्रदायिकता और हिंसा के चश्मे बाँट दिये हैं। अब इन चश्मों को पहन कर मनुष्य को मनुष्य नहीं नज़र आता है बल्कि हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई नज़र आता है। 
असग़र वजाहत ने अपने इस नाटक के माध्यम से इसी सत्ता और राजनीति से पैदा हुए धर्म पर प्रहार किया है। साथ ही साथ नाटककार ने समाज को कट्टरता, सांप्रदायिकता और हिंसा के चश्मे उतारकर मानवता, शिष्टाचार, प्रेम और भाईचारे का चश्मा पहनने का संदेश दिया है। 
इसको समझने के लिए नासिर और अलीम के संवाद दृष्टव्य हैं -
नासिर - 'देखो तुम क्या इसलिए मुसलमान हो कि जब तुम समझदार हुए तो तुम्हारे सामने हर मज़हब की किताबें रखी गई और कहा गया कि इसमें से जो मज़हब, तुम्हें पसंद आए, अच्छा लगे, उसे चुन लो?
अलीम -  नहीं नासिर साहब.... मैं तो दूसरे मज़हब के बारे में कुछ नहीं जानता। 
नासिर-  इसका मतलब है तुम्हारा जो मज़हब है, उसमें तुम्हारा कोई दखल नहीं है... तुम्हारे मां-बाप का जो मज़हब था वही तुम्हारा है। 
अलीम- हाँ जी बात तो ठीक है। 
नासिर- तो यार जिस बात में तुम्हारा कोई दखल नहीं है... उसके लिए खून बहाना, कहाँ तक वाजिब है?"


मनुष्यता के धर्म का संदेश

असग़र वजाहत का यह नाटक पूर्णतः मनुष्यता का संदेश देता नज़र आता है। आज जब समाज घुटन, हिंसा, सांप्रदायिकता और आतंकवाद से ग्रसित हो चुका है तो मनुष्यता और उसके मूल्यों को प्राथमिकता देने वाले लोग भी समाज में हैं। इसी मनुष्यता और उसके मूल्यों का चित्रण नाटक में किया गया है। इस मनुष्यता के आधार पर आज भी घोर सांप्रदायिक और कट्टरता के वातावरण में पलने वाले धार्मिक मतभेद औंधे मुँह गिर रहे हैं, मनुष्यता तथा सांस्कृतिक एकता और मज़बूत हो रही है। जो लोग सांप्रदायिकता और धार्मिक उन्माद को बढ़ावा देते हैं, वे लोग मनुष्यता के पक्षधरों से हमेशा हार जाते हैं। नाटक की पात्र तन्नो भी जिस प्रकार सांप्रदायिकता की आग से झुलसी थी और धर्मांधता के आतंक से आतंकित हुई थी ठीक उसी प्रकार नाटक के पाठकों और दर्शकों के मन में यही सवाल बार-बार उठता है कि "अगर हम लोग और माई एक ही घर में रह सकते हैं तो हिंदुस्तान में हिंदू और मुसलमान क्यों नहीं रह सकते?" 
आज के समय में इस नाटक की प्रासंगिकता असंदिग्ध है। आज देश के लोग जाति, धर्म, भाषा की राजनीति के दलदल में धंसते जा रहे हैं और देश मनुष्यता और उसके मूल्यों को खोता जा रहा है। नाटक में इस्लाम धर्म और उसके उसूलों का प्रतिनिधित्व करने वाले मौलवी साहब और एक हिंदू औरत में मनुष्यता दिखाई गई है। मौलवी साहब के शब्दों में वह ताकत है जो मनुष्य को मनुष्य बनाने के लिए प्रेरणा-स्रोत है। मौलवी साहब कहते हैं, "इरशाद है कि तुम जमीन वालों पर रहम करोगे आसमान वाला तुम पर रहम करेगा और जो दूसरों पर रहम नहीं करता खुदा उस पर रहम नहीं करता।"  धार्मिक ठेकेदार धर्म को तोड़-मरोड़ कर, उसके सत्य, अहिंसा, शांति, प्रेम-सद्भावना जैसे मूल तत्वों को छुपाकर मनुष्य को धर्म से दूर कर आडंबरों, पाखंडों और धार्मिक उन्माद की आग में झोंक देते हैं।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि नाटककार ने नाटक की कथावस्तु से समाज की नवीन समस्याओं को उकेरा है। नाटककार ने सांप्रदायिकता, कट्टरता और धार्मिक उन्माद पर प्रहार करके हिंदू-मुस्लिम एकता और भाईचारे पर बल दिया है और समाज को एक नयी दिशा प्रदान की है। अंत में जयदेव तनेजा के शब्दों में, "इसका उद्देश्य देश, धर्म और जाति के नाम पर हुई और हो रही हिंसा, राजनीति तथा गुंडागर्दी के सामने प्रेम, भाईचारे और इंसानियत की बाहर से कमजोर किंतु भीतर से आस्थावान अटूट ताकतों की अनवरत लड़ाई को रेखांकित करना है।" 
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संदर्भ:
1. साहित्य और सामाजिक मूल्य – डॉ हरदयाल, पृ 99 
2. कबीर की खोज- राजकिशोर, पृष्ठ 123
3. जावेद अख्तर- नव भारत टाइम्स, पृष्ठ 6, 19-01-2003
4. पाँच नाटक- असगर वजाहत, पृष्ठ 254
5. पाँच नाटक- असगर वजाहत, पृष्ठ 238-239
6. वही – पृष्ठ 245
7. वही – पृष्ठ 234
8. नई रंग-चेतना और हिन्दी नाटककार-जयदेव तनेजा, पृष्ठ 191 

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