समकालीन हिन्दी महिला साहित्य एवं संघर्ष

मंजुला चौहान

मंजुला एस. चौहान


समकालीन हिन्दी साहित्य बड़ा व्यापक है। इसमें महिला कहानीकारों की उपस्थिति भी रोचक है। पहले इनकी कथाओं में प्रेम ही प्रमुख विषय था। पर समय के साथ रचनात्मक विशेषता दिखाई देती है। नारी का दूसरा नाम ही संघर्ष है। शताब्दियों से बुनियादी सुविधाओं के लिए लड़ती आ रही है। आज तक उन सुविधाओं से अलक्षित है। जन्म से ही चुनौतियों का सामना करती युग परिवर्तन में अपनी छाप छोड़ती चली आ रही है। तिरस्कृत-बहिष्कृत होने पर भी संघर्षपूर्ण रास्ते पर चलती आ रही है।
आज देखा जाए तो भारतीय महिलाओं की स्थिति थोडी बहुत सुधरी हुई दिख रही है। पर दिखने में और होने में बड़ा फर्क है। वह बराबरी के हक के लिए लड़ाई एवं सुधार की आशा के बीच तरसती आँखों के बीच नज़र आती है। साहित्य में भी उसकी दशा कुछ ऐसी ही थी। महिलाओं को भीतरी जीवन एवं बाहरी जीवन के बीच ताल-मेल करना ही पड़ता है। उसे अपने भीतरी जीवन पर कोई आँच नहीं आने देना है। वह कई रिश्तों में बंटी हुई है। उन सरे रिश्तों को किसी भी हालात में निभाहना है और समस्त दायित्वों के पश्चात जो समय बचता है उसमें उसे अपने लिए समय निकालना है, और साहित्य का सृजन करना है।
नारी पुरुष के साथ साझेदारी करते हुए अत्यंत जागरूकता से आगे बढ़ती आ रही है। पुरुषसत्तात्मक समाज में अपने विचारों को प्रस्तुत करने में वह पीछे नहीं हट रही हैं। आजादी के बाद इनके लेखन में मुक्त स्वर सुनाई देता है। पिता के साये में, पति के अधीन रहकर निजी भावनाओं का अंत करके उसने जिस स्वप्न को खुले आँखों से देखा था, आज उस स्वप्न को पूर्ण करने की स्थिति में है। जीवनानुभव के साथ उसकी सोच में उड़ान के साथ रचनाओं को सृजन किए जा रही है।
परिवर्तन आवश्यक है पर सोच में ही परिवर्तन न हो तो सतही परिवर्तन का कोई अर्थ नहीं। पुरानी मान्याताओं को तोड़ना उन्हें नये ढाँचे में ढ़ालना अति आवश्यक है। स्त्री ने इस भीतरी शक्ति को भेदकर, परंपरा की जंजीरों को तोड कर अपनी भावनाओं को शब्दों में पिरोकर अभिव्यक्ति की धारा बहा दी। नारी साहित्य के सामने चुनौतियाँ बहुत थीं और बड़ी भी थीं। खुशी की बात है कि आज वह उस रेखा को लाँघ कर आगे बढ चुकी है, और नारी और उसका साहित्य चर्चा में आया है।
नई कहानी के संदर्भ में 1960 के आस-पास लेखक मूल्य एवं मूल्यहीनता को कहानी साहित्य के माध्यम से दर्शाया जाने लगा। बदलती सोच में माँ-बेटा, पिता-पुत्र, पति-पत्नी के बीच रागात्मक संबंध भी आकस्मिक प्रश्न बन गये। संबंधों में बढ़ते हुई खट़्टेपन को संवेदनात्मक ढंग से प्रस्तुत करती कहानियों की रचना होने लगी। समाज के बनाए नियम-कानून और उनके मानदंडों की उपक्षा करते हुए एक स्त्री का आगे बढ़ना सहज नहीं है। सर्वप्रथम परिवार से ही यह भेद-भाव आरंभ होता है। ‘कहाँ जा रही है? ‘क्यों जा रही हो?’ बड़ा जरूरी काम नहीं है तो जाने की जरूरत नहीं।’ ‘घर का काम करो, चलो मेरे साथ बाजार चलो, मना करने पर! चुपचाप चलो वरना चोटी काट दूंगी। यही सोच हमें समाज के हर कोने में दिखाई एवं सुनाई देती है।
हिन्दी कहानी की इस प्रारंभिक स्थितियों का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है। पुरुषप्रधान समाज में नारी को स्वतंत्र रूप से जीवन जीने का अधिकार कभी मिला ही नहीं। पर जैसे-जैसे आजादी की गति जोर पकड़ने लगी वैसे ही समाज में महिलाओं की भूमिका को महत्व दिया जाने लगा। जन-जागरण एवं नारी जागरण के लिए संघटनों का प्रादुर्भाव हुआ। जिसमें भारतीय नारी के योगदान एवं सहयोग को महत्वपूर्ण माना गया। भारतीय महिलाओं ने भी इन संगठनों का सम्पूर्ण रूप से फायदा उठाया और अपने आप को गौरवान्वित करने का प्रयास भी किया।
‘सरस्वती’, ‘चाँद’ जैसी पत्रिकाओं ने लेखिकाओं के लिए एक मील के पत्थर का काम किया। महिला कहानीकारों ने हिन्दी कहानी के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया है। प्रस्तुत समय में कई महिला कहानीकारों का आगमन हो चुका है। अधिकतर लेखिकाओं ने नारी जीवन की भिन्न-भिन्न समस्याओं तथा प्रश्नों को लेकर कहानी का गठन किया है। इसमें विधवा विवाह, भ्रूण हत्या, बल्य विवाह, ज्यादातर विषय रहे हैं। कुछ कहानियों में आदर्शों की भी झलक मिलती है। 
चित्रा मुदगल की कहानी ‘गेंद’ इसमें बुढापे को विषय बनाकर रचा गया है। वृद्धावस्था में जब अपनों की आवश्यकता होती है, यदि वे ठुकरा देते हैं तब प्रेम बाहर ढूंढना पड़ता है। सचदेव जो इस कहानी के वृद्ध पात्र मधुमेह से त्रस्त हैं। अपने पिता के इलाज के लिए पैसा भेजने के लिए हमेशा कोई न कोई बहाना बना देता है। सचदेव का मन बेटे-बहु और पोती के लिए तड़पता रहता है। अपनी लाचारी एवं अपनी मरी हुई पतनी पर गुस्सा करते दिखाई देते हैं।
सुधा अरोड़ा की कहानियों की विशेषता स्त्री का शोषण पक्ष है। उन्होंने इसे बड़ी शालीनता एवं सरसता से अपनी कहानियों में उतारा है। जीवन के प्रति उनकी सोच बहुत स्पष्ट है। ‘रहोगी तुम वही’ कहानी में पति का एकालाप रटना, पत्नी का एक शब्द भी सुनाई न देना स्पष्ट है। पत्नी से शिकायतों का भंडार जिन्हें वो हर वक्त प्रकट करता है। उसे पत्नी की हरकत से शिकायत है। उसके उठने-बैठने पर भी आपत्ति है। खाने-पीने, कपड़े पहनने, बच्चे की देख भाल में वह इतनी व्यस्त रहने लगी थी कि उसे अपने लिए समय नहीं मिलता। अब वह क्या करे? इसका समाधान क्य है? पत्नी चाहे तो बहुत कुछ कह सकती है पर वह कहना नहीं चाहती। इसका यह अर्थ नहीं की वह डर कर चुप है। चुप रहना डर नहीं बल्कि उसकी शक्ति है, उसकी संवेदनशीलता है। वहीं पर पति डरपोक दिखाई देता है। वह हडबड़ाहट में चीखता-चिल्लाता है। यह उसकी हार थी जिसे वह सम्भाल नहीं पा रहा था। वहीं पत्नी चुप रह कर भी जीतती दिखाई पड़ती है।
मन्नू भंडारी की कहानी ‘ऊँचाई’ में स्त्री के आधुनिक विचारों को दर्शाया गया है। शिवानी और शिशिर पति-पत्नी है। दोनों के बीच बहुत प्रेम और विश्वास था। शादी के ग्यारह साल बाद एक दिन शिवानी अपने दोस्त अतुल से मिलती है। वह बड़ा अकेला हो गया था, जिसकी वजह शिवानी थी। शिवानी को बड़ा बुरा लगा। एक दिन शिवानी अतुल के अकेलपन की साथी बनती है और शिशिर के सामने सत्य भी कहती है। शिशिर गुस्से में आ कर शिवानी को तलाक देने का फैसला भी करता है। पर शिवानी समझाती है कि चाहे मैं किसी के साथ भी कोई संबंध क्यों न बना लूँ, तुम्हारी जगह कोई नहीं ले सकता और किसी के साथ तुम्हारी तुलना नहीं हो सकती। शिशिर अपने गुस्से को काबू कर सोचता है और फिर दोनों सुखी जीवन बिताते हैं। यहाँ शारीरिक सुख से ऊपर मानसिक प्रेम को महत्व दिया गया है। 
मालती जोशी ने कामकाजी महिलाओं पर अत्यंत संवेदनशीलता के साथ कलम चलाई है। परिवार का पालन-पोषण कर बाहर जा कर भी काम सम्भालने वाली स्त्रियों का जीवन अत्यंत संघर्षशील होता है। कभी कभी काम में इतनी घिर जाती है कि सांसारिक जीवन भोगने का समय भी निकल जाता 
है। कामकाजी महिलाओं का शोषण भी आम बात बन जाती है। इनको घर में भी शोषण भोगना पड़ता है और काम की जगह पर भी। मालती जोशी की कहानियों की स्त्रियाँ उपेक्षा और अपमान सहती हुई, चुनौतियों से घिरी हुई दिखाई देती है। 
राजी सेठ ने कहानियों के माध्यम से नारी की निजी समस्याओं के साथ-साथ समाज से कटे हुए बुजुर्ग व्यक्तियों की आप बीती को भी कहानी में बड़े संवेदनात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है।
दीप्ति खंडेलवाल की कहानियाँ संवेदनशील हैं। उन्होंने नारी के आतंरिक उत्पीड़न को सूक्ष्मता के साथ दर्शाया है। वर्तमान युग में नारी की जीवन शैली बहुत बदल गई है। वह विवाहपूर्व संबंधों को बुरा नहीं मानती। दीप्ति खण्डेलवाल ने अपनी कई कहानियों में विवाहपूर्व संबंधों को खुल कर दर्शाया है। ‘एक पारो पुरवैया’ कहानी में विवाहपूर्व प्रेम और वैवाहिक जीवन के बिखराव का प्रभावशाली प्रस्तुतीकरण मिलता है। इस कहानी में सुधा सुशिक्षित एवं कामकाजी महिला है। विवाहित होने के बावजूद पति के साथ भावनात्मक संबंध नहीं होता। सुधा को विवाह से पूर्व कई पुरुषों से प्रेम था। विवाह के बाद पति के साथ भी वह रहना चाहती है, और विवाहपूर्व प्रेमी के साथ भी संबंध रखना चाहती है। अंत में वह एक बात कहती है ‘मेरा कोई देवदास नहीं बन पाया लेकिन मैं पारो बनकर रह गई हूँ’। इसका अर्थ है नारी को शारीरिक, भावनात्मक और बौद्धिक तीनों स्तरों पर एक साथ जुड़ जाना चाहिए अन्यथा उसका बिखर जाना स्वाभाविक है।
मंजुल भगत ने कहानी ‘पायदान’ में पति द्वारा प्रताड़ित नारी का चित्रण किया है। मुक्ता और मुकेश का विवाह होता है। मुक्ता ने विवाह से पूर्व कई सपने देखे थे। मुकेश को शराब की लत थी। मुक्ता हमेशा पति को शराब पीने से रोकती थी पर मुक्ता पति से प्रेम भी उतना ही करती थी। इसी प्रकार संघर्ष के बीच तड़पती जीवनयापन करती है पर उसे छॊडने का ख्याल नहीं लाती, क्योंकि अंतत: यह समस्या मुक्ता की ही थी। मंजुल भगत ने इस कहानी में जीवन संघर्ष से पराणित न होने वाली एक एसी स्त्री का चित्रण किया है जो हर समय साहस के साथ हर समस्या का सामना करना जानती है। 
महिला कहानीकारों की कहानियों का कथ्य एवं परिवेश भिन्न-भिन्न है। इन कहानीकारों ने समस्याओं का एक अलग ही रूप को अभिव्यक्त किया है। आज साहित्य की सभी विधाओं में विभिन्न प्रयोग किए जा रहे हैं। आज कहानी में वैचारिकता का प्रभाव स्पष्ट रूप से झलक रहा है। महिला कहानीकरों ने अपनी-अपनी कृतियों में विभिन्न रूपों में अपने विचारों को व्यक्त किया है।


परामर्शित ग्रंथ:
1. कथा सप्तक, संपादक, डॉ. मंजुल चौहान
2. प्रतिनिधि महिला कहानिकरों में चित्रित नारी, डॉ. मीना जोशी
3. नव निकष, पत्रिका
4. मनस्वी, पत्रिका
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संप्रति:
हिन्दी विभागाध्यक्ष,
बसवेश्वर कला महाविद्यालय, 
बागलकोट, कर्नाटक – 587101
चलभाष: 08884003700
ईमेल: manjularaj4u@gmail.com


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