काले दिनों की तिक्तताओं को महसूस करती कहानियाँ

प्रदीप कुमार सिंह

आपातकाल की कहानियाँ आपातकाल की भोक्ता, दर्शक एवं प्रमाण तीनों हैं। कहानी मानव मन की उपज मात्र ही नहीं होती। बल्कि उसके फलक में हमारा समय एवं समाज झाँकता है। आपातकाल के काले दिनों को व्यक्त करती इन कहानियों में उस समय परिवेश को दहाड़ते, फुँफकारते, हाँफते, आकुल, विवश सागर की तरह महसूस किया जा सकता है। इस दौर की कहानियों में गति, प्रश्न, तर्क और परिवर्तन के बहुआयामी गुण देखने को मिलते हैं, जिसके केन्द्र में सामाजिक बदलाव का भाव निहित है। कल्पना के साथ-साथ वास्तविकता का पुट भी इन कहानियों में मौजूद है जो उस समय अथवा परिवेश से पाठक वर्ग को अवगत कराता है, जिसकी उसने मात्र कल्पना की हुई थी। यह कहानियाँ अपने कलेवर में कई अनछूए पहलुओं को प्रस्तुत कर उस कालखंड के विषय में सोचने-समझने की बौद्धिकता को विस्तार देती है। आठवें और नौवें दशक की कहानियों में मुख्य रूप से कई कहानीकारों ने आपातकाल के परिवेश को अपने-अपने स्तर पर अभिव्यक्ति प्रदान की है।

जिसमें अशोक कुमार मिश्र की कहानीआपातकाल का प्रश्नपत्र’, आपातकाल की वास्तविकता पर सवाल-जवाब करती है। अशोक अग्रवाल की से वजीरकहानी आपातकाल के संपूर्ण परिवेश का ब्यौरेवार वर्णन प्रस्तुत करती है। कहानीकार आपातकाल में सत्ता द्वारा आम जनता पर किए गए तानाशाही पूर्ण व्यवहार का समीकरण कुछ इस तरह प्रस्तुत करता है, “ से जनता = से सरकार = से वजीर, हर हालत में हर समीकरण में चाहे उसे किसी भी प्रकार, किसी भी दिशा में फैलाया जाए, सिर्फ वजीर ही शेष रहता है।.... कुछ-कुछ यह खेल शतरंज से मिलता है। किन्तु इसको खेलने वाला एक ही दल है। देखा कितनी होशियारी से वजीर सबका सफाया करता है।1 इन्द्रनाथ मदान ने अपनी कहानी चुनाव और चुनाव में सरकार की कार्य प्रणालियों पर प्रश्नचिह्न लगाया है, “पहले केवलसे गाँधी होता था, फिरसे गाँधी बनने लगा, बाद मेंसे गाँधी बनते-बनते रह गया था।2 कमलेश्‍व की लाश कहानी आपातकाल में लोकतंत्र की हत्या पर ज़ोर देती है, “सारा शहर सन्न रह गया था। गनीमत थी कि इतने बड़े हादसे में सिर्फ एक लाश गिरी थी। उसको गोली लगी थी, वह कहीं से घायल थी। यह लाश मुख्यमंत्री की थी, विरोधी पक्ष के कांतिलाल की।3  कहानीकार केवल सूद अपनी कहानी एक थी रानी में प्रतीकात्मक तौर पर प्रधानमंत्री की नीतियों पर व्यंग्य करते हैं, “रानी ने एक जादुई छड़ी से देश से गरीबी का नामोनिशान मिटा डाला। रानी की राजधानी परीलोक बन गई। रानी और उसके सवार चैन की बाँसुरी बजाने लगे और गरीबों का वहाँ प्रवेश निषेध हो गया।4 काशीनाथ सिंह केआदमीनामाकहानी संग्रह मेंबैल’, ‘मुसईचाऔरमीसा जातकम्जैसी कहानियाँ आपातकाल में घटित घटनाओं को व्यापक फलक में हमारे सामने रखती हैं। मुसईचा कहानी के संदर्भ द्वारा हम इसे समझ सकते हैं, “वह तुम्हें आदमी के रूप में नहीं देखना चाहती, रहने भी नहीं देना चाहती। हर व्यक्ति से उम्मीद करती है कि वह चोर हो, उच्चका हो, बदमाश और कातिल हो। तुम जब उसके आगे आदमी साबित होते हो, वह निराश हो जाती है।5 गंगाप्रसाद विमल अपनेचर्चित कहानियाँसंग्रह मेंसन्नाटा’, ‘बाहर भीतर’, ‘चरित्रजैसी कहानियों में आपातकाल की दहशत को सजीव रूप देते हैं, कहानीकार के शब्दों में, “हर गूँगा आदमी बहरा भी होता है। मैं एक मंदिर से गुजर रहा था, वहाँ लोग आरती कर रहे थे। आरती में जहाँ संकट शब्द आता, उसे जैसे लोग बोलते ही थे।6  

गिरिराज किशोर अपने कहानी संग्रहआओ प्यार कर लेंमें संकलितमंत्री पद’, ‘ततैयाऔररेडजैसी कहानियाँ आपातकाल के कुप्रबंध के साथ-साथ उस समय हुए अच्छे कार्यों जैसे- ‘बैंकों का राष्ट्रीयकरण’, ‘प्रिवीपर्स की समाप्तिआदि का समर्थन करती है। कहानीकार आपातकाल की सिर्फ एक पक्षीय आलोचना नहीं करता है, अपितु जो सही हुआ उसका वर्णन भी वह अपनी कहानियों में करता है। गोविंद मिश्र अपने कहानी संग्रहअंतःपुरमें संकलित कचकोंध, अपाहिजऔर धाँसू कहानी के माध्यम से सत्ता की अवसरवादिता, प्रशंसात्मक प्रवृत्ति एवं उसके वास्तविक स्वरूप को उजागर करते हैं। कहानीकार के शब्दों में, “जिस दिन हम आम आदमी का गौरवगान अपने संपादकीय के लिए लिखाकर लाए, उसी दिन शाम को टी. वी. में उसरिजीपकी प्रशंसा कर आते हैं जो आदमियों को रौंदने में लगी है। इमरजेंसी के पहले कविता, कहानियों में जो आग उगली जा रही थी, वह इमरजेंसी लगते ही सबसे पहले बुझी।7 दिनेश पालीवाल की बंजर कहानीसारिकापत्रिका के जुलाई (1975) के अंक में तत्काल प्रकाशित ऐसी कहानी है जो आपातकाल के लागू होने के तत्काल बाद सरकारी कार्य-प्रणाली में आयी गति को परिभाषित करती है। दीप्ति खंडेलवाल की एक और कब्र (1975) आपातकाल में कब्रगाह बनती जा रही व्यवस्था का वर्णन करती है। दिनेशचंद्र दुबे केतबादलाकहानी संग्रह में संकलित कहानियों में तबादला और कगार की आगजैसी कहानियाँ आपातकालीन दौर में लागू सरकारी व्यवस्था की कार्य प्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाती है। धीरेन्द्र अस्थाना अपने कहानी संग्रहलोग हाशिए परमें माने तंत्र और युद्धरत जैसी कहानियों के माध्यम से प्रतीकात्मक रूप में व्यवस्था के आगे असहाय हो चुकी जनता का चित्र प्रस्तुत किया है, इस व्यवस्था का एक उदाहरण कहानीकार इस प्रकार प्रस्तुत करता है, “यह जानते हुए भी शहर में मेरा हुक्म ही कानून है। तुमने मेरी व्यवस्था को भंग करने की कोशिश की.... उसने सहमी हुई मुस्कराहट के साथ देखा। शहर का नक्शा धीरे-धीरे प्रदेश के नक्शे में बदल रहा था और प्रदेश का नक्शा देश का आकार ले चुका था और प्रधानमंत्री की तस्वीर अभी तक वैसे ही मुस्करा रही थी।8 रामदरश मिश्र कीकादम्बिनीजुलाई सन् 1975 . में प्रकाशित कहानी मुर्दा मैदान प्रधानमंत्री की गरीबी हटाओ के नारे की पोल खोलती प्रतीत होती है, जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री द्वारा गरीब जनता के लिए बनाई गई योजनाओं की वास्तविकता निहित है जिसे कहानीकार इस प्रकार से कहानी में प्रस्तुत करता है, “यानी कि हम गरीब लोग अब अमीर हो गए हैं। हमारे पास अच्छे मकान हो गए हैं। धत्त तेरे की- तब चल प्यारे हम लोग इस मुर्दाखाने में क्यों पड़े हैं। हम लोग तो रईस हो गए हैं- हट्ठी ठठाकर हँसने लगा। फिर एकाएक चुप हो गया। झपट कर भोला के हाथ से वह कागज़ (घोषणाएँ) छीन लिया और फाड़कर उसे कीचड़ में रगड़ते हुए गाली बकने लगा- कमीने, हरामजादे, कागजराम। तुम्हें झूठ बोलते शरम नहीं आती।9  

कहानीपत्रिका के जुलाई सन् 1975 . के अंक में प्रकाशित विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी की लाल लकीर शीर्षक कहानी आपातकाल के दौर में सत्ता की निर्ममता को उजागर करती है जिसमें समाजवाद का खंडन प्रमुख बन गया है। जवाहर सिंह की अपना अपना महाभारतसारिकापत्रिका अक्टूबर सन् 1976 . और राष्ट्रीय विदूषककल्पनापत्रिका मार्च सन् 1977 . में प्रकाशित महत्त्वपूर्ण कहानियाँ हैं, जिनमें कहानीकार आपातकाल के अंतर्गत तत्कालीन सरकार की नीतियों और योजनाओं द्वारा लाभांवित होने का वर्णन प्रशंसा स्वरूप करते हैं। साथ ही राष्ट्रीय विदूषक कहानी में लोकतंत्र, आंतरिक सुरक्षा, मीसा एवं पाँच सूत्रीय कार्यक्रम के अंतर्गत चलने वालेनसबंदीऔरनगर सौंदर्यीकरण जैसे कार्यक्रमों की कटु आलोचना भी करते हैं। रमेश उपाध्याय अपनेपैदल अँधेरे मेंशीर्षक कहानी संग्रह में संकलित कहानी आग के माध्यम से व्यवस्था की वास्तविक छवि को उभारने का प्रयास करते हैं जो छोटे-छोटे प्रतीकों के माध्यम से उजागर होता है, “एक राजा था.... उसने लोगों का जीवन दूभर कर रखा था। जब लोगों के सब्र का प्याला भर गया, वह मरने-मारने को उतारू हो गए।10 अपनी दूसरी कहानी पानी के माध्यम से वह प्रतीकात्मक रूप में मौजूदा सत्ता की दमनकारी मानसिकता को प्रस्तुत करते हैं। वर्ष सन् 1976 . मेंकथावर्षपत्रिका में प्रकाशित उनकी पानी की लकीरतथा देवी सिंह कौन जैसी कहानियाँ भी सत्ता पर सीधा प्रहार करती हैं। साथ ही आपातकाल के दौर में आम जनता के मन की व्यथा को भी उकेरती है, जिसमें सामान्य जन व्यवस्था के आतंक एवं शक्ति के समक्ष आतंकित एवं नतमस्तक सा नज़र आता है। रमेशचंद्र शाह के कहानी संग्रहजंगल में आगमें संकलित कहानी अंधड़ आपातकाल का समर्थन करने वाली कहानी है जिसमें कहानीकार आपातकाल से पूर्व की स्थितियों की अराजकता से मुक्ति हेतु आपातकालीन स्थिति को विकास के लिए ज़ायज ठहराते हैं। साथ ही आपातकाल की समाप्ति के बादजनता पार्टीके शासन की अवसरवादी प्रवृत्ति और आपसी कलह पर व्यंग्य भी करते हैं, “और दो जनता पार्टी को वोट और हटाओ इंदिरा गाँधी को.... कहाँ गई वो जनसंघर्ष समितियाँ कहाँ गए वे समाजवादी, जो दावा करते थे कि महीने भर के अंदर इन व्यापारियों की अकल ठिकाने लगा देंगे.... इन हरामियों को जनता ही ठीक कर सकती है।11  

प्रवण कुमार वंद्योपाध्याय केश्‍व बाबू अनुपस्थित थेसंग्रह में इसी शीर्षक नामक कहानी औरसलाखेंदोनों आपातकाल के अलग-अलग पक्ष को हमारे सामने रखती है। पहली कहानी में दिल्ली के जामा मस्जिद के तुर्कमान गेट हत्याकांड का क्रमानुसार वर्णन कहानीकार ने प्रस्तुत किया है। सलाखेंकहानी आपातकाल में स्वतंत्र भारत के हास्यास्पद हो जाने की दास्तान को प्रस्तुत करती है, “एक खतरनाक किस्म के खोह में महीनों से जिन्दा हूँ। जब इस देश के शासक अंग्रेज थे, तब ऐसी खोहों में जिन्दा रहना हमारी मजबूरी थी और अब अंग्रेज नहीं हैं, तब भी उसी में रहना हमारी मजबूरी है। हमारी मजबूरियाँ भी किस कदर स्थितिशील और नपुंसक हो गई हैं कि हम उन्हें बदल नहीं सकते।12 प्रियदर्शी प्रकाश कीसंचेतनापत्रिका के अंक जून सन् 1976 . में प्रकाशित जलूस कहानी में आपातकालिक भय और पीड़ा को  अभिव्यक्ति मिली है, “फिजा खामोश थी- बाहर सन्नाटा था। थोड़े से लोग थे, वे डरे हुए थे और सुरक्षित कोना खोज रहे थे.... रेस्तराओं के बाहर और बरसातियों के नीचे ज़िद्दी किस्म के लोग खड़े थे और गंभीरता से बातें कर रहे थे कि शहर में आज कुछ होने वाला है- असल बात यह है कि चैन की साँस कोई नहीं ले रहा था।13  

नरेंद्र कोहली का कहानी संग्रहआधुनिक लड़की की पीड़ामें संकलित कहानी लोककथा में गतिरोध परिवार-नियोजन जैसे कार्यक्रम पर करारा व्यंग्य करती है, “सरकार ने परिवार नियोजन के नाम से नगर उजाड़ने वाला एक विभाग अवश्य बना रखा है। ये विभाग पोल्ट्री फार्म के सिद्धांतों के प्रतिकूल जनसंख्या घटाने का काम करता है.... पुराने राजाओं की आत्माएँ छाती पीट-पीट कर रो रही हैं। कलियुग में राजधर्म का पालन करने वाला कोई नहीं रहा। बनाता कोई नहीं, उजाड़ सब रहे हैं।14 यह कहानी आपातकाल में जनता के हित के लिए बनाई गई योजनाएँ कैसे जनता का ही अहित कर रही थीं, इस बात को खोलती है। प्रभु जोशी की अलग अलग तीलियाँकथावर्षपत्रिका सितंबर सन् 1976 . और कमीगाहकहानीसारिकापत्रिका नवंबर सन् 1977 . को छपी ऐसी कहानियाँ हैं, जिसमें आपातकाल के दौरान सामान्य जनता के साथ होने वाले अत्याचार और उसके प्रतिक्रियास्वरूप किए गए आक्रोश को अभिव्यक्ति मिली है। प्रदीप पंत केआम आदमी का शवकहानी संग्रह में संकलित कहानियों में भय और मैं गुटनिरपेक्ष हूँ के अंतर्गत आपातकाल के दौरान आम जनता के मानसिक अंतर्द्वंद्व को उभारने का सफल प्रयास कहानीकार ने किया है। संग्रह के शीर्षक नामक कहानी में जनता के मानसिक अंतर्द्वंद्व को इस प्रकार अभिव्यक्ति प्राप्त हुई है, “वह स्टेशन से बाहर निकला तो उसने देखा लोग डरे थे, उनके चहरे पर भय था। थोड़ी दूर में सेना के जवान बंदूक लिए तैनात थे। उनके चेहरों पर वहशियत थी, जैसे किसी-किसी के चेहरे पर विवशता थी, मानों वे अपना काम रोजी-रोटी की मजबूरी में कर रहे हों।15  

प्रेम जनमेजय के कहानी संग्रहराजधानी में गँवारके अंतर्गत संकलित कहानी मनुष्य और ठग, जनतंत्र की कथा, मंत्री क्षेत्रे, इंस्पेक्टर का तबादला, एक प्रेमपत्र और स्वर्णाक्षरों की खोज में आदि व्यंग्यात्मक कहानियों में उनके शीर्षक के अनुसार प्रधानमंत्री की तत्कालीन नीतियों, भ्रष्टाचार, शोषणकारी व्यवस्था और प्रशासनिक कार्य प्रणाली पर सीधे-सीधे व्यंग्य करते हैं जिसेस्वर्णाक्षरों की खोज मेंकहानी के उदाहरण स्वरूप समझा जा सकता है, “आपातस्थिति में स्वर्णाक्षर राजनीतिक हो गए थे- एक ऑटोरिक्शा में लिखा था- नामी चोर बीस सूत्री कार्यक्रम को सफल बनाएँ, इसमें दो स्वर्णाक्षर एक हो गए। एक टैक्सी में लिखा था- ‘हम सुनहरे भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं, यह टैक्सी श्मशान की ओर बढ़ रही थी। एक ऑटो रिक्शा में लिखा था- ‘बीस सूत्री क्रियाकर्म।मैं इसे प्रूफ रीडिंग की गलती नहीं मानता हूँ, ही लिखने वाले का अज्ञान। मैं इसे एक आम आदमी द्वारा किया गया सार्थक विद्रोह मानता हूँ।16 बदीउज़्ज़माँ काचौथा ब्राह्मणकहानी संग्रह में संकलित कहानियों मेंदुर्गएवंक्रांति के सौदागरप्रमुख हैं, जो अपने परिवेश में आपातकाल के दौरान व्यवस्था से जुझते आम आदमी के संघर्ष को अभिव्यक्त करते हैं। क्रांति के सौदागर कहानी के प्रसंग द्वारा उस संघर्ष को समझा जा सकता है, “मुझे बार-बार यह महसूस हुआ था कि अगर आदमी को रोजी-रोटी की चिंता हो। घर में खाने-पीने और ऐश करने के लिए दौलत की कमी हो तो इंकलाब और वर्ग-संघर्ष की बातें कितनी मनोरंजक हो सकती है। उसमें वैसा ही लुत्फ़ आता है, जितना किसी खुबसूरत लड़की से इश्क करने में।17  

बलराम केकलम हुए हाथकहानी संग्रह में संकलित कामरेड का सपना कहानी आपातकाल की दुरूह स्थिति, सत्ता विरोध एवं व्यवस्था के प्रति जनता के मन में व्याप्त असहमति को दर्शाती है, “जिस तरह की स्थितियाँ बनती जा रही थीं, उसमें मैं शायद मार दिया जाऊँ, पर मेरा विश्‍वास है कि इस तरह की मौतें बेकार नहीं जाती- मेरी चिता की आग धीरे-धीरे फैलेगी और एक दिन यह भी आएगा, जब सड़े हुए लोकतंत्र के यह सारे ढोंग खत्म होंगे और नई व्यवस्था में हमारा सपना साकार होगा।18 बल्लभ डोभाल केखुले दरवाजेकहानी संग्रह में संकलित इमरजेंसी से पहले नामक कहानी देश में आपातकाल लागू होने के कारणों की पड़ताल करती है। हिन्दुस्तान साप्ताहिक में 30 नवंबर सन् 1977 . को प्रकाशित इनकी एक अन्य कहानी बुलडोजरआपातकाल के दौर में अनाधिकृत बस्तियों में चलाए जाने वाले बुलडोजरों की अमानुषिक व्यथा को परिभाषित करती है। मधुकर सिंह केपहला पाठकहानी संग्रह में संकलित भगोड़े, भाई का ज़ख्म, दुश्मन और उसका सपना जैसी कहानियाँ आपातकाल में व्याप्त व्यवस्था के अमानुषिक कृत्य को उजागर करती है, जिसमें संविधान का अपने हित के लिए प्रयोग, आज़ादी के सपनों का बिखराव और देश के सुनहरे भविष्य की आस प्रमुख है। कहानीकार को लगता है जब तक व्यवस्था में भ्रष्टाचार व्याप्त है तब तक सामाजिक स्तर पर कोई भी बदलाव संभव नहीं है।

मणि मधुकर की कहानी एक मुर्दाबाद आदमीकहानीपत्रिका के मई अंक के सन् 1977 . में प्रकाशित ऐसी कहानी है जो आपातकाल के दौरान शासन-तंत्र द्वारा आम जनता की अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य के हनन की दास्तान को बयाँ करती है। महीप सिंह की कहानी मौत का एक दिन परिवार नियोजन जैसे कार्यक्रम के अंतर्गत चलने वालेनसबंदी कार्यक्रमऔर सभी सरकारी कर्मचारियों द्वारा नसबंदी करने की अनिवार्यता अथवा मज़बूरी को दर्शाती है। एक उदाहरण दृष्टव्य है, “प्रिंसिपल ने बताया कि इस आदेश के द्वारा हर अध्यापक को कम-से-कम पाँच व्यक्तियों को नसबंदी के लिए तैयार करना चाहिए- एकाएक उसके मन में उभरा अध्यापक को नसबंदी के लिए तैयार करना चाहिए- एकाएक उसके मन में उभरा अध्यापक का नसबंदी के कार्य से क्या प्रयोजन?”19 महीप सिंह की दूसरी कहानी एक प्रभावशाली व्यक्तित्व और चार मुर्गेआपातकाल के दंश का विरोध करने वाले आम नागरिकों के स्वरों को सत्ता द्वारा कुचले जाने की प्रक्रिया को क्रमवार प्रस्तुत करती है जिसका प्रतीक कहानी मेंमुर्गोंको बनाया गया है जो इस प्रकार है, “एक बड़ा आदमी था, उसके सामने किसी के बोलने का साहस था। उसके पास चार मुर्गे थे। उसने तीन मुर्गों की गरदनें इसलिए उड़ा दीं कि वह इस व्यक्ति के अन्याय के खिलाफ बांग दे रहे थे। चौथा जो उसकी झूठी प्रशस्ति गान कर रहा था, उसका दाना-पानी बढ़ाने का आदेश दिया।20

मार्कंडेय का कहानी संग्रहदाना भूसा तथा अन्य कहानियाँमें आपातकाल के दौर में नीति-विहीन हो चुकी राजनीति के प्रति क्षोभ प्रकट हुआ है, जिसमें नौ सौ रुपए और एक ऊँट दानाऔर कल्याणमनजैसी कहानियाँ प्रमुख हैं जो यह दर्शाती हैं कि आपातकाल से देश के साधन-संपन्न वर्ग को ही अधिक लाभ प्राप्त हुआ निम्न और मध्यम वर्ग की स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं आया। मिथलेश्‍व अपनेश्रेष्ठ कहानियाँनामक कहानी संग्रह में आपातकाल के दौरान ग्राम और कस्बे में व्याप्त तत्कालीन संत्रास को अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं, जिसमें बंद रास्तों के बीच और सरेआम जैसी कहानियाँ प्रमुख हैं जो यह दर्शाती हैं कि आपातकाल में भय इस कदर व्याप्त हो गया था कि सरेआम प्रशासन द्वारा समाज विरोधी गतिविधियों को अंजाम दिया जा रहा था और आम जनता उस दंश को सहन करने के लिए मजबूर थी। रवीन्द्रनाथ त्यागी अपने कहानी संग्रहऋतु वर्णनमें संकलित कहानी शोक मुद्रा में आपातकाल के दौरान राजनेताओं में अपने स्वार्थ पूर्ति हेतु किए जाने वालेदल-बदलकी नीति पर व्यंग्य करते हैं जो आपातकाल के समय भारतीय राजनीति पर छाए हुए थे, “जब तक प्रशासन के विरोध में है, सेठ लोग इज्जत करते हैं और मुद्रा देते हैं। जब सरकार में प्रविष्ट हो जाते हैं, बड़े-बड़े अधिकारी कालीन की भांति बिछ जाते हैं- सरकार के खिलाफ झंडे खड़े किए, पर आदमी होशियार थे, झंडे पर अपनी कीमतें लिखते रहे।21    

राबिन शा पुष्प का कहानी संग्रहआक्रोशजनतंत्र के नाम पर होने वाले राजतंत्र की व्याख्या करता है, जिसमें आपातकाल के कई पक्ष एक-एक कर सामने आते हैं जिनमें हत्यारे जा रहे हैं और भूख भूख भूख जैसी कहानियाँ प्रमुख हैं। इन कहानियों में इमरजेंसी केछात्र आंदोलन’, ‘बढ़ती महँगाई’, ‘भ्रष्टाचारऔरपुलिसिया व्यवहारआदि का स्वर स्पष्टत: देखा जा सकता है। वेद राही का फटा हुआ जूता कहानी साप्ताहिक हिन्दुस्तान मई सन् 1977 . में प्रकाशित हुई थी यह कहानी आपातकाल के माध्यम से व्यवस्था परिवर्तन की ओर संकेत करती है। सच्चिदानंद धुमकेतू अपने कहानी संग्रहआख़िरी कैफियत के बादमें संकलित कहानी टूटते कगार में आपातकाल में रामराज्य के आने के मिथक का खंडन करते हैं जिसे कहानी इस रूप में व्याख्यायित करती है, “अब किसी भी आदमी को भूख से मरने नहीं दिया जाएगा, रमुआ चहकता हुआ बोला- जब वे लोग हमें अनाज देंगे, तब भरपेट भात खाएँगे। उन्हें घोंघे-केकड़े खाने की जरूरत नहीं रहेगी।22 किन्तु उन्हें अनाज मिलता है ही रमुआ की स्थिति में कोई सुधार होता है। आपातकाल में सत्ता पक्ष के सारे वायदे कागजों में ही सिमटकर रह जाते हैं जिसे रामराज्य की अपेक्षा जंगलराज कहना ज्यादा उचित होगा। संजीव कुमार अपनी कहानी तीस साल का सफ़रनामा में आम आदमी के दिन-प्रतिदिन गुलाम होते जाने की दास्तान की व्याख्या करते हैं जिसका व्यापक रूप आपातकाल में देखने को मिलता है। कहानी आपातकाल में आपातकाल के समर्थक ही कैसे खुलेआम लुट कर रहे थे इसको प्रस्तुत करती है। सिद्देश की सुरक्षाकहानी भारतीय शासन-व्यवस्था पर वंश परंपरा के एकाधिकार का विरोध करती है जो प्रतीक रूप में आपातकाल की उत्पत्ति का कारण इसी वंश परंपरा को मानती है, जिसके वशीभूत होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री ने आपातकाल का सृजन किया था, “एक सीमित वर्ग ने अधिकार अपने पास जमा कर रखा है तथा वह वर्ग उस अधिकार से चिपका रहना चाहता है- घूरकर मत देखिए, सच्ची बात हमेशा कड़वी होती है- क्या कहा? आप मुझे गिरफ्तार करवा देंगे।23

सुरेश सेठ की भवदीय कहानी आपातकाल के वातावरण का चित्रण करती है जिसमें आम जनता की मानसिक प्रताड़ना को देखा जा सकता है, “सुबह मिलने वाले अखबार मौन हो गए और प्रवचननुमा खबर छपने लगे थे। शहर में एक अलग सरगोशी का आलम था और लोग कानाफूसी से ऊँचे स्वर में बात करने से कतराने लगे थे। अपने देश में, अपने शहर में क्या हो रहा है, यह जानने के लिए लोग हर रात लंदन का रेडियो खोलकर कुछ जानकारी हासिल करने की चेष्टा में लगे रहे.... चंद लोग शहर की सड़कों से या दफ्तरों में छूटते समय या आधी रात में घरों से उठाकर वैनों में बंद करके जेल भेज दिए गए।24 सुरेश मल्होत्रा की इम्रे और समय के बीच आप क्योंकहानी आपातकाल में सत्ता के अधीन हो चुके बौद्धिक वर्ग की मानसिकता पर कटाक्ष करती है। सुदीप की कहानी अंतहीन दो आपातकाल के दौरान अपने मार्ग के प्रतिकूल हो चुके युवाओं की दास्तान को हमारे सम्मुख रखती है। सुदर्शन नारंग केइतना बड़ा पुलकहानी संग्रह में संकलित परिवर्तन कहानी आपातकाल मेंमीसाके अंतर्गत हुई गिरफ्तारियों का वर्णन कुछ इस प्रकार करती है, “कारण बताने की हमें अनुमति नहीं है- वारंट का क्या है? अब्बी कटा जाता है.... हमें केवल जनजीवन को सुव्यवस्थित करने का आदेश है।25 शरद जोशी अपनेपिछले दिनों मेंकहानी संग्रह में संकलित कहानी कब-कब लगी इमरजेंसीमें आपातकाल का विश्लेषण करते हुए प्रश्न करते हैं, “उस कीर्तन मंडली का क्या होगा, जो प्रतिबद्धता के बहाने मलाई पर नज़र गड़ा सबको फासिस्ट और प्रतिक्रियावादी करार दे रही थी और कविता छोड़कर सत्तारूढ़ पार्टी का मैनफेस्टो लिख रही थी- देश में आपातकाल क्या आया, आफतकाल गया। हमने अपनी नागरिकता अपनी अस्मिता, अपने आदमी भर रह जाने का हक़ खो दिया था। देश का संविधान, छोटी कार का डिज़ाइन बनकर रह गया था, जिसे जब चाहे बदला जा सके।26 गुलशेखर ख़ाँ शानी की बिरादरी कहानी राजनीतिक वादों को बेनकाब करती है जिसे कहानीकार आपातकाल से जोड़कर दर्शाता है। श्रीकांत चौधरी अपनी कहानी कहानी एक लोकप्रिय क्रांतिकारी की में आपातकाल के दौरान गरीबी और भूखमरी से होने वाली मौतों की व्याख्या कुछ इस रूप में करते हैं, “ये मौतें भूख से नहीं हुईं, वरन् महीनों से खाने-पीने को होने के कारण लोगों ने जंगली फल-फूल खाने शुरू कर दिए और मृत्यु इन विषैले फल-फूल खाने से हुई।27 हिमांशु जोशी केविशिष्ट कहानियाँशीर्षक कहानी संग्रह में संकलित कहानी जलते हुए डैने आपातकाल में समाजवाद के नाम पर किए गए राजनीतिवाद को व्याख्यायित करने का प्रयास करती है। हिमांशु जोशी राजनीति की भर्त्सना करते हुए लिखते हैं, “देश को गृहयुद्ध की सी भयानक स्थिति में ला खड़े करने का दायित्व तुम्हारा है- तुम्हारे चेहरे पर कालिख लगाकर तुम्हें देश के कोने-कोने के हिस्से में भेजा जाए ताकि देशवासी, जिनके विश्‍वास की तुमने हत्या की है, तुम्हारी भर्त्सना और उपहास कर सके। इसके बाद भी तुम मर सके तो तुम्हें चाँदनी चौक के भरे बाज़ार में सरे आम फाँसी की सजा दी जाए।28

हृदयेश अपनी स्वयंसेवक कहानी में आपातकाल के दौर में भारतीय राजनीति के दलबदल होने की प्रवृत्ति को रेखांकित करते हैं जिसे कहानी इस प्रकार प्रस्तुत करती है, “हमारे चुने हुए नुमाइंदे पार्टियों को ऐसे बदलते हैं, जैसे छोटे बच्चे गीले हो गए कच्चे।29 क्षितीश विद्यालंकार की देवता कुर्सी के नामक कहानी प्रधानमंत्री द्वारा कांग्रेसआईके नाम से अपनी पार्टी के पुनर्गठन और उनके राजनीतिक वर्चस्व की दास्ताँ को बयाँ करता है, जिसमें आपातकाल के कालखंड से लेकर जनता पार्टी की सरकार तक की कथा, समीक्षा स्वरूप गढ़ी गई है, “जब इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा का नारा लगा था, तब चारों ओर इस आई. और . के कुछ और था- महारथियों की आँखों के सामने लगभग 90 वर्ष पुरानी कांग्रेस जैसी महनीय संस्था ध्वस्त हो गई औरकांग्रेस आईऐसी उभरकर आई, जो सबको चकाचौंध कर गई।30 श्रीकांत वर्मा के कहानी संग्रहघरमें संकलित कहानी रिपोर्ट आपातकाल में प्रेस-सेंसरशिप के अंतर्गत समाचार पत्रों की अंतर्व्यथा को वर्णित करती है, इस व्यथा को कहानी के संदर्भ द्वारा समझा जा सकता है, “उसकी आज की रिपोर्ट में एक तिहाई भी सच था, सारा का सारा झूठ था।31  

आपातकाल की कहानियाँशीर्षक से डॉ. अरुण कुमार भगत ने उन्नीस कहानियों का संपादन वर्ष 2019 में किया है। संजय सिंह बघेल इस संग्रह के संदर्भ में लिखते हैं, “संकलन की एक-एक कहानी आपातकाल की व्यथा का जिस प्रकार से चित्रण करती है। उनको पढ़ते हुए लगता है मानो हम एक ऐसी अँधेरी खोह में से गुजर रहे हैं जिसमें संताप, टीस के साथ-साथ घनघोर चुप्पी साध लेने के सिवा और कोई दूसरा रास्ता समझ में नहीं आता है। मानवीय जीवन में फैले क्लांत को ये कहानियाँ जितने बड़े प्लाट और कैनवास के साथ उठाती है उसकी वेदना उससे भी गहरी प्रतीत होती है।32 इनमें मुख्य रूप से वह कहानियाँ हैं जिन पर आम तौर पर सामान्य पाठक-वर्ग का ध्यान नहीं जा पाता है, इस संग्रह में संकलित पहली कहानी काला अध्याय ऋता शुक्ल द्वारा लिखित है। यह कहानी आपातकाल के दौर में जब सत्ता स्वार्थ और लोलुपता का पर्याय बन गई थी और अधिकार लिप्सा की कठपुतलियाँ छाया नृत्य करती दिखाई देने लगी थी, तब भी क्या मौन धारण किए सब कुछ सहते जाना उचित था? कहानी ऐसे ही कई प्रश्नों की पड़ताल करती है। तपेश्‍व नाथ अपनी कहानी बगावत के माध्यम से जे.पी. के छात्र-आंदोलन और सत्याग्रह के नाम परमीसाके अंतर्गत हुई छात्रों की गिरफ्तारी का वर्णन करते हैं जिसमें आम हड़ताल, चक्का जाम, गाड़ी बंद, दुकान बंद, कोर्ट-कचहरी बंद जैसे संदर्भों को कहानीकार ने उद्धृत किया है। यह अपनी अगली कहानी स्पर्शाघात में उस काली रात का वर्णन करते हैं जिसकी अगली सुबह ने पूरे देश को आपातकाल की पीड़ा एक साथ सहने पर मजबूर कर दिया था।

पंकज बिष्ट की खोखल और कवायद कहानी आपातकाल की निष्ठुरता को अपने कथानक के माध्यम से दर्शाती है, जिसमें आम नागरिकों के दैनिक जीवन में आए बदलाव एवं किसी भी पल कुछ भी अनिष्ट घटित होने का भाव निहित है। दयाकृष्ण विजयवर्गीय विजयकी छाती ठंडी हो गई कहानी इमरजेंसी की घोषणा के साथ ही सभी सक्रीय विरोधी पक्ष के नेताओं के राजनीतिक बंदी बना लिए जाने की विकलता को स्वर प्रदान करती है। दीप्ति खंडेलवाल की कहानी एक और कब्र आज़ाद भारत के सपनों एवं लोगों की आशाओं की व्याख्या करती है। साथ ही आपातकाल लगाए जाने के कारणों की भी पड़ताल करती है। आचार्य निशांतकेतु अपनी कहानी पीपल और बरगद के माध्यम से आपातकाल जैसे दंश से उभरने के लिए आम जनता द्वारा किए जाने वाले यज्ञ और हवन जैसे आयोजनों का वर्णन करते हैं, “बरगद और पीपल की जड़ों के चारों ओर चबूतरा बना दिया गया था, जिसे जयप्रकाश चौक के नाम से प्रसिद्धि मिल गई। आपातकाल के विरुद्ध तरह-तरह के उपाय किए जाते। इनमें एक प्रयोग था हवन का।33 और इस हवन में पढ़े जाने वाले मंत्रों मेंआपातकाल-विनाशाय स्वाहा।जैसे मंत्र प्रमुख थे। कहानी आपातकाल के बाद जनता सरकार के बनने का भी संकेत देती है, “सन् सतहत्तर की ललकार, दिल्ली में जनता सरकार।34

महीप सिंह की निशाना कहानीमीसाके अंतर्गत पकड़े गए लोगों की दास्तान को बयाँ करती है, कहानी का शीर्षक भी प्रतीकात्मक रूप से मीसा का निशाना बने लोगों की गाथा को प्रदर्शित करता है। मृदुला सिन्हा की जब-जब होही धरम की हानी कहानी आपातकाल में जबरन हुई नसबंदियों की व्यथा को कहानी के पात्रमास्टर जीके माध्यम से अभिव्यक्त करता है, “तुम्हें शर्म नहीं आई! पचास वर्ष की आयु में नसबंदी करा आए। अब क्या तुम्हें बच्चा होने वाला था? घर में बहु गई है। मुझे तो बोलते भी शर्म रही है। मास्टर जी का विलाप स्वर था- मैंने कोई स्वेच्छा से यह सब किया है क्या? तुम तो घर में रहती हो, बाहर क्या हो रहा है, तुझे क्या पता। शिक्षकों, सरकारी कर्मचारियों पर कहर ढाया जा रहा है। नौकरी करनी है तो सब बर्दाशत करना होगा; मास्टर साहब ने अपनी बेबसी पसार दी थी।35   

विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी की डायरी कहानी मिस्टर भुवनेश्‍व की डायरी से प्रारंभ होती है जिसमें वह आपातकाल के प्रसंगों को लिखा करते थे। जब प्रशासन को इसका पता चलता है तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है और घंटो उनके साथ पूछताछ भी की जाती है। प्रस्तुत कहानी पूछताछ के दौरान पुलिस प्रशासन द्वारा मिस्टर भुवनेश्‍व के साथ की जाने वाली मानसिक प्रताड़ना को व्यक्त करती है। शत्रुघ्न प्रसाद की अँधेरे से संघर्ष कहानी सत्ता के लोभ और अहंकार में दमन के चक्र को दिखाती है। आपातकाल के दौर मेंमीसाके अंतर्गत, “ जमानत और अदालत। ऐसा ही आदेश इंदिरा जी का था।36 जिसमें कहानी के पात्र भरत बाबू की तरह आम जनता भी असहाय थी जिसमेंहम क्या कर सकते हैंका भाव निहित है। हिमांशु जोशी की जलते हुए डैने कहानी आपातकाल में शासन की अंधी जेलों मेंशिव दाजैसे पात्रों की कथा को व्यक्त करती है जो पशुओं से भी बदतर जिन्दगी जीने को मजबूर थे। बाड़ों में जानवरों की तरह उन्हें रखा जाता था जहाँ तन ढँकने के लिए पूरे वस्त्र तक नहीं होते थे। समुद्र और सूर्य के बीच कहानी देश को गृहयुद्ध की सी भयावह स्थिति में ला खड़ा करने वाले आपातकाल का वर्णन करती है, जिसमें करोड़ों देशवासियों के विश्‍वास की एक साथ हत्या हुई थी। यह सबसंभव है कहानी आपातकाल में दिल्ली शहर के हालातों का वर्णन करती है, जिसमें दिल्ली परिवहन की बसों के बंद होने से लेकर पार्लियामेंट स्ट्रीट में लगे कर्फ्यू तक का चित्र कहानीकार द्वारा चित्रित किया गया है।

वेद व्यथित अपनी कहानी ताम्र पत्र के माध्यम से आपातकाल में पुलिस प्रशासन द्वारा निर्दोष जनता पर किए गए अत्याचारों की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं, जिसमें अपने शीर्षक के अनुकूल आपातकाल के बाद आपातकालीन यातनाओं से गुजरे कहानी के पात्ररमेश जीकी मनोदशा को भी देखा जा सकता है जो सरकार द्वाराताम्र पत्रसे सम्मानित होना व्यर्थ मानता है, क्योंकि उसके लिए पुरस्कार से अधिक राष्ट्र निर्माण सर्वोपरि है। अशोक मनवानी की पुरानी चाबी कहानी अपनी स्मृतियों में इमरजेंसी के दौर की याद दिलाती है, जिसमें बोलना, सुनना और बताना भी प्रतिबंधित हो गया था, ऐसे दमन के माहौल में पुलिस-प्रशासन की ज्यादतियाँ, पत्र-पत्रिकाओं के आदान-प्रदान पर रोक औरमीसाजैसे मुद्दों को कहानी एक साथ उठाती है।

आपातकाल को केन्द्र में रखकर लिखी गई कहानियों में जो सामान्य तथ्य उभरकर सामने आते हैं, वह यह हैं कि यह कहानियाँ अपने समय एवं परिवेश को बड़ी ही गहनता के साथ प्रस्तुत करते हुए, आपातकालीन कालखण्ड का बहुआयामी चित्र प्रस्तुत करने वाली हैं। यह कहानियाँ आम आदमी की पीड़ा, राजनीति का स्वभाव, प्रशासनिक ढाँचे में व्याप्त भ्रष्टाचार, विसंगतियाँ एवं विद्रूपताओं आदि के साथ-साथ आपातकाल में आम जनमानस के भीतर उपजे आक्रोश को स्वर प्रदान करती है जिसका आपातकाल से गहरा संबंध है।

 

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